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मुक्ति

“सुनो 35 मिनीट हो गए क्या ?”

 

“हाँ हो गए।”

 

“अच्छा एक काम करोगी।”

 

“जिस काम के लिए बुलाया वो काम तो किया नहीं, अब और क्या काम है।”

 

“तुम इसके लिए 500 रूपये चार्ज करती हो, महीने के मान लो 15 हजार अर्न करती हो, अगर तुम ये काम न करो तो मैं तुम्हें हर महीने 15 हजार रूपये भेज सकता हूँ, तुम अपना बैंक खाता नम्बर बता सकती हो।”

 

“अरे तुम ये एहसान क्यों कर रहे हो, मैं कोई सगीवाली हूँ क्या? कौन किसी को यूँ फालतू में पैसे बांटता है, तुमने जिस काम के लिए बुलाया है वो करना है तो करो , नहीं तो वैसे भी मेरा टाइम हो गया है मैं जा रही हूँ।”

“तुम मेरी कोई सगीवाली नहीं हो, पर मैं चाहता हूँ तुम ये काम छोड़ दो। यकीन करो तुम्हें पैसे मिलेंगे हर महीने की 1 तारीख को ही। बाकी तुम यकीन करना चाहो तो कर सकती हो। ये देखो मैं हर महीने इन चार औरतों को पैसे भेज रहा हूँ तुम पांचवीं होवोगी। बाकी तुम्हारी मर्जी है, तुम्हारा निर्णय तुम जानो।” कहते हुए उसने चार औरतें के खाते दिखाए जिसमें उसके मोबाईल से वो हर महीने 15 हजार भेज रहा था।

 

कुछ देर सोचने की मुद्रा में रही वो, फिर उसने शायद कोई निर्णय लेते हुये कहा, “सुनो तुम्हारी बात मान लेती हूँ, पर कभी कोई यदि बहुत खास कस्टमर आया तो उसे अटेंड कर सकती हूँ ?”

 

“वो तुम्हारे ऊपर निर्भर करता है, जो तुम्हें सही लगे करना।”

 

“पर अगर कभी मेरे खाते में पैसे नहीं आये तो, फिर मैं तुम्हें कहाँ ढूँढूँगी ?”

 

 

 

 

“निश्चिंत रहो ऐसा कभी न होगा, फिर भी मेरा नम्बर तुम्हें दे रहा हूँ, पर कभी भी फ़िज़ूल फोन मत करना। अगर जीने मरने की बात हो या बेहद ही जरूरी बात हो तो ही कॉल करना।

 

उसने हामी भरते हुए उसे अपना बैंक खाता नम्बर दे दिया , उस आदमी ने उसे अपना फोन नम्बर बताया, जिस पर उसने मिस्ड कॉल देकर कन्फर्म किया।

 

 

 

 

उस बात को तीन महीने हो चुके थे, सुबह सात बजे उसके नम्बर पर कॉल आई, उसने उठाया।

 

“नमस्ते सर, मैं स्वाति आपसे जो मिली थी। आप पिछले तीन महीने से मुझे 15 हजार रूपये भेज रहे हैं। सर मुझे आपसे बहुत जरूरी बात करनी है मिलना है। बस सर जीने मरने का सवाल ही समझ लीजिए।”

 

” ओके, मैं दोपहर तक बिजी रहूँगा, उसके बाद मिलूं तो चलेगा ?”

 

“जी सर, पर कहाँ मिलेंगे ?”

 

“यमुना के पास की टेकरी पर मिलना। ठीक चार बजे मैं वहाँ पहुँच जाऊंगा, तुम वहाँ आकर मुझे फोन करना।”

 

“ओके सर।”

 

ठीक चार बजे वो यमुना की टेकरी पर खड़े थे , सामने ताजमहल नजर आ रहा था।

 

“कहो क्या बात हो गई, जो बात जीने मरने वाली हो गई।”

 

“सर, पहले महीने तो आपके 15 हजार आये अच्छा लगा। फ्री का पैसा बड़ा सुकून देता है। दूसरे महीने अजीब लगा, इस महीने बहुत बुरा लग रहा है। मैं आपके भेजे पैसे से एक रुपया भी खर्च नहीं की हूँ। बहुत बेचैनी हो रही है, एक शरीफ इंसान का पैसा जिसने मुझे छुआ तक नहीं, उसके खून पसीने की कमाई पर मेरा कोई हक नहीं। प्लीज ये पैसे भेजने बन्द कर दीजिए अगर मेरे लिए कुछ करना ही है तो मुझे कोई नौकरी दिलवा दीजिये । मैं 12 वीं तक पढ़ी हुई हूँ, आपकी बहुत मेहरबानी होगी। प्लीज सर… प्लीज…. और मैंने वो गलीज़ काम भी बिल्कुल छोड़ दिया है।”

 

“ओके, समझ लो आज से तुम्हारी नौकरी पक्की। सोमवार से तुम बताए गए पते पर जाकर काम शुरू कर सकती हो। काम तुम्हें वहीं बता दिया जाएगा, सैलेरी 18 हजार, चलेगा।”

 

“चलेगा नहीं सर, दौड़ेगा।”

 

 कहकर उसने उसके पाँव छूने चाहे, पर वो दो कदम पीछे हट गया, “प्लीज ये सब नहीं करो, बहनें पाँव नहीं छुआ करती।”

उसके मुँह से बहन शब्द सुनकर उसकी आँखें बरस गईं, उसकी रुलाई फूट गई। कुछ देर बाद उसने शांत होकर पूछा।

 

“सर आप ये सब क्यों कर रहे हैं?, यूँ बेवजह हम जैसियों को 15 हजार क्यों दे रहे हो?”

 

   ……..” मुक्ति के लिए….!! “

 

“मुक्ति के लिए, कैसी मुक्ति सर? और किससे मुक्ति ?”

 

“उसका नाम मुक्ति था। बचपन से हमारा प्रेम था। उस वक़्त वो 12 वीं में थी मैं बी टेक के तीसरे साल में था। उसी साल मेरे केम्पस इंटरव्यू में मुझे अमेरिका की कम्पनी ने सलेक्ट कर लिया और मैं वहाँ चला गया।

 

मैं अमेरिका 4 साल रहा, मैंने वहाँ बहुत पैसा कमाया और फिर कम्पनी ने मुझे अपने इंडिया के ऑफिस में ही भेज दिया। जब मैं वापस इंडिया आया तो सबसे पहले मुक्ति के घर गया। वहाँ गया तो दिल टूट कर चूर हो गया।

 

 उसके चचेरे भाई ने बताया उसे किसी कॉलेज के सहपाठी से प्रेम हो गया। एक दिन वो दोनों भाग गए। उसके परिवार ने लड़के की खोज खबर निकाली तो वो मिल गया। उसने बताया उसने उसे किसी कोठे पर बेच दिया।

 

उन लोगों ने उसको मार मार की उसका कचूमर बना दिया। वो लोग जब उसके कोठे पर उसे बरामद करने गए तो पता चला उन्होंने उसे आगे कहीं बेच दिया और वो यहीं कहीं आगरा के लोग थे जो खरीद ले गए थे उसे, उन्होंने उसे खोजने की बहुत कोशिश की, पर वो नहीं मिली।

 

 थक हार कर वो सब बैठ गए, और नियति को स्वीकार कर लिया। उसके बाद मैंने नौकरी छोड़ दी और आगरा में ही अपना आई टी बिजनेस खोल लिया।

 

अब मैं हर महीने एक सैक्स वर्कर से मिलता हूँ, हो सकता है कभी मुझे मुक्ति मिल ही जाए और मैं उसे इस नर्क से मुक्ति दिला सकूँ। जब वो नहीं मिलती है तो हर लड़की हर औरत में मुझे मुक्ति दिखाई देती है और मैं उसे 15 हजार ऑफर करके ये काम करने से मना करता हूँ, पर अधिकतर सैक्स वर्कर को ऑफर किया पर सब अपने इस काम में ही खुश हैं तुम पाँचवी थी जिसने मेरी बात मानी। काश कभी मुझे मुक्ति भी मिल जाये तो उसे इस गलत धंधे से मुक्ति दिला सकूँ।”

 

उसकी आँखों में एक शून्यता छा गई थी शायद वो अपने आँसू रोकने की भरकस कोशिश कर रहा था और इसको करने में उसके जबड़े सख्ती से भिंच गए थे।

 

“सर….मेरा मतलब है भैया, क्या आपके पास मुक्ति की कोई फ़ोटो है, हमें इस गलीज धंधे में रहते हुए बहुत सी लड़कियों से सम्पर्क हो जाता है । हो सकता है कभी वो मुझसे मिली हो तो मैं उसका पता निकलवा सकती हूँ।” उसने कहा।

 

“एक फोटो है, जब वो 12 वीं में थी, पर तब बच्ची थी हो सकता है उसकी शक्ल में बदलाव आ गया हो।”

 

“आप फोटो तो दिखाओ एक बार।”

 

उसने अपना पर्स निकाला, उसे खोला और उसकी ओर बढ़ा दिया।

 

        “अरे ये तो मोहिनी है !”

 

“मोहिनी नहीं….मुझे मुक्ति की तलाश है।”

 

“हमारे धंधे में असली नाम बदलकर कुछ और रख दिया जाता है। जहाँ तक इस शक्ल की बात है मैं इसे कभी नहीं भूल सकती। इसकी दाईं आंख की आइब्रो के नीचे एक बहुत बड़ा तिल था, ये मोहिनी ही थी जो तुम्हारी मुक्ति है।”

 

“प्लीज….अगर तुम जानती हो तो मुझे बताओ न , मैं इसे इस नरक से मुक्त करना चाहता हूँ।”

 

“भैया अब चाहकर की भी तुम इस मुक्ति को कभी मुक्त नहीं कर सकते।”

 

“क्यूँ ऐसा क्या है? मैं इसके लिए अपनी पूरी पूंजी खर्च कर सकता हूँ, तुम बताओ न ये कहाँ मिलेगी।”

 

“ये कभी न मिलेगी भैया, क्यों…कि ये पहले ही मुक्त हो चुकी है।” उसने मायूसी से बताया।

 

“क्या मतलब है तुम्हारा।”

 

“भैया इसे आगरा लाया गया था, और मेरे ही कमरे में इसको ठहराया गया था। वो दिनरात रोती रहती थी, पर मुझे उसके रोने से कोई खास फर्क नहीं पड़ा था, क्योंकि वहाँ आने वाली सभी लड़कियां शुरू शुरू में रोती ही हैं। फिर वो इस माहौल में ढल जाती हैं। उस दिन इसका पहला कस्टमर आना था। इसको एक नई साड़ी दी गई थी पहनने को। मेरा कस्टमर आ गया था तो मैं उसके साथ व्यस्त हो गई। जब मैं वापस अपने कमरे में आई तो देखती हूँ कि उस नई साड़ी से उसने अपने आपको पँखे से लटकाकर फांसी लगा ली थी। मैं कांप गई, जो कोठा हमको खाने की और जान की सुरक्षा देने का दावा करता था वहीं एक जान चली गई थी ।

 

उसके बाद मेरा मन बहुत उदास हो गया सोचा केवल वहाँ पर खाने की सुरक्षा थी। जान से ज्यादा तो इज्जत की सुरक्षा थी जो वहाँ सुरक्षित नहीं थी। फिर मैंने एक दिन वो कोठा छोड़ दिया, और स्वत्रंत रूप से ये काम करने लगी। भैया अब तो मुक्ति कभी की मुक्त हो चुकी है उसकी तलाश करना छोड़ दो,  शायद भगवान ने मुझे इस काम में इसीलिए धकेला है कि मैं तुम्हारी इस तलाश को खत्म कर सकूं।” कहते हुए वो सुबकने लगी।

 

माहौल में एक अजीब उदासी भर गई थी यमुना की नदी की लहरें शोर मचा रही थीं, सामने दिखाई दे रहा ताजमहल अपने होने पर शर्मिंदा हो रहा था। हवा वहाँ अजीब आवाजें सुना रही थी जैसे कह रही हों, ‘तुम्हारी मुक्ति तो मुक्त हो चुकी है, बस उसे माफ कर देना…..वो तुम्हारा इंतजार न कर पाई।’

 

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