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जानिए क्या होता है पुरुषोत्तम मास

भारतीय पंचांग की सबसे विशिष्ट विशेषता यह है कि यह केवल तिथियों का गणना-पत्र नहीं, बल्कि प्रकृति और खगोलीय गति के साथ तालमेल बैठाने वाली एक अत्यंत सूक्ष्म और वैज्ञानिक प्रणाली है। इसी प्रणाली का एक महत्वपूर्ण अंग है पुरुषोत्तम मास, जिसे सामान्यत: ‘अधिक मास’ कहा जाता है। यह मास न केवल काल-गणना की दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि धार्मिक और आध्यात्मिक दृष्टि से भी अत्यंत पवित्र माना जाता है।

 

पुरुषोत्तम मास

पुरुषोत्तम यह शब्द मुख्य रूप से भगवान श्री विष्णु या श्री कृष्ण के लिए प्रयुक्त होता है, जो क्षर (नाशवान) और अक्षर (अविनाशी) से परे है। और सर्वोच्च सत्ता का प्रतीक है। यह शब्द धार्मिकता, सद्गुण और परम पूर्णता का सूचक है। पुरुषोत्तम मास को अधिक मास और मलमास के नाम से भी जाना जाता है। यह मास भगवान श्री हरि विष्णु को समर्पित है।

पुरुषोत्तम मास, अधिक मास और मलमास में अंतर

1 पुरुषोत्तम मास—पौराणिक कथाओं (नारद पुराण, और पद्म पुराण) के अनुसार जब कोई भी देवता इस महीने का स्वामी बनने के लिए तैयार नहीं हुआ तब भगवान श्री विष्णु ने इस महीने को अपना नाम और स्वामित्व प्रदान किया और इसे मलमास से सबसे उत्तम पुरुषोत्तम मास बना दिया।

अहमेते यथा लोके प्रार्थत: पुरुषोत्तम: ।

तथायमपि लोकेषु प्रथित: पुरुषोत्तम: ।।

अधिक मास- यह हिंदू माह पंचांगो में अतिरिक्त 13 वां महीना है।

 

मलमास-

यास्मिन मासेन संक्रांति: संक्रांति: इमेव व।

मलमास: स विज्ञेयो मासे त्रिंशत्तमे भवेत् ।।

इस महीने में कोई भी सूर्य संक्रांति नहीं होने पर (सूर्य एक राशि से दूसरी राशि में प्रवेश नहीं करता) इस कारण इसे ज्योतिषी रूप से अशुद्ध या मलिन माना जाता है। इसलिए इसे मलमास कहते हैं। निष्कर्ष यह है कि तीनों एक ही महीने के अलग-अलग नाम हैं।

 

क्यों आता है यह 13वां महीना

भारतीय काल-गणना चंद्र और सूर्य दोनों की गति पर आधारित है, जिसे लूनी-सोलर प्रणाली कहा जाता है। एक चंद्र मास लगभग 29.5 दिनों का होता है, और इस प्रकार 12 चंद्र मास मिलकर लगभग 354 दिन बनाते हैं। दूसरी ओर, सौर वर्ष लगभग 365 दिन का होता है। इस प्रकार हर वर्ष लगभग 11 दिन का अंतर उत्पन्न होता है। यदि इस अंतर को यथावत रहने दिया जाए, तो कुछ वर्षों में ऋतुओं और महीनों का संतुलन पूरी तरह बिगड़ जाएगा।

इस असंतुलन को दूर करने के लिए भारतीय ज्योतिष में एक अद्भुत समाधान दिया गया है। लगभग हर 2.5 से 3 वर्ष में, जब यह अंतर लगभग 30 दिन (एक महीने) के बराबर हो जाता है, तब एक अतिरिक्त मास जोड़ा जाता है, जिसे अधिक मास कहा जाता है। यही अधिक मास आगे चलकर पुरुषोत्तम मास के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

अधिक मास के निर्धारण का आधार अत्यंत रोचक और खगोलीय नियमों पर आधारित है। सामान्यत: प्रत्येक चंद्र मास के भीतर सूर्य एक राशि से दूसरी राशि में प्रवेश करता है, जिसे संक्रांति कहा जाता है। किंतु जब किसी चंद्र मास में सूर्य की कोई भी संक्रांति नहीं होती, अर्थात सूर्य उस पूरे महीने में राशि परिवर्तन नहीं करता, तब वह मास अधिक मास घोषित कर दिया जाता है।

 

पुरुषोत्तम मास में क्या करें क्या ना करें

क्या करें – यह महीना विशेष रूप से भगवान श्री हरि नारायण विष्णु को समर्पित है तो इस महीने में यज्ञ, अनुष्ठान, मंत्र जाप, हवन, पूजा पाठ श्रीमद् भागवत जी का पाठ, मानस पाठ एवं श्री विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ करने से विशेष फल एवं पुण्य लाभ प्राप्त होता है।

 

यह महीना आत्म शुद्धि एवं आत्म चिंतन, ध्यान योग साधना के लिए अच्छा माना जाता है।

क्या ना करें- इस महीने में कोई भी मांगलिक कार्य जैसे विवाह, शादी व्दिरागमन, जमीन की रजिस्ट्री, गृह प्रवेश, भवन निर्माण, किसी भी नए वस्त्र या चीजों को खरीदना, मुंडन,

यज्ञोपवीत आदि सभी प्रकार के मांगलिक कार्य नहीं करना चाहिए।

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अधिकमास पुरुषोत्तममास मलमास मलिम्लुच अधिमास संसर्प अंहस्पति अंहसस्पति

 

क्या होता है मलमास

मलं वदन्ति कालस्य मासं कालविदोऽधिकम् (गृह्यपरिशिष्ट)

 

मलमास काल का मल है। मलमास = मल + मास। मास का सीधा अर्थ महीने से है जो काल मापन की एक इकाई है। नौ प्रकार के मास होते हैं परन्तु ‘चतुर्भिव्यर्वहारोऽत्र’ सूर्यसिद्धान्त के वचनानुसार उनमें से चार – चान्द्र, सौर, सावन और नाक्षत्र मास से ही व्यवहार होता है। चार विभिन्न प्रकार के महीनों की आवश्यकता क्या है, इसका उत्तर भी हमारे शास्त्रों में दिया गया है कि विभिन्न कर्म विभिन्न प्रकार के मासों में करणीय हैं :

 

विवाहादौ स्मृतः सौरो यज्ञादौ सावनः स्मृतः। आब्दिके पितृकार्ये तु चान्द्रो मासः प्रशस्यते ॥ (स्कंदपुराण, ७.१.२०६.६१)

 

शास्त्रभेद से इस कथन में भी भिन्नता है। वृद्ध गर्गाचार्य, श्रीपति, बृहस्पति, नारद, वसिष्ठ के कथनों में भिन्नतायें देखने को मिलती हैं परन्तु हमारा विषय उनसे सम्बंधित नहीं है। एक कथन सभी का समान है कि वार्षिकी का ज्ञान चान्द्र मास से ही किया गया है।

 

मल क्या है ? तत्रोक्तं मलम् अर्थात् विकारः, मल विकार है। प्रश्न है – कैसा विकार?

 

‘मलमासोऽयं सौरचान्द्रमासयोः विकारः’ अर्थात सौरमास और चंद्रमास से विकार स्वरुप मलमास की उत्पत्ति होती है। विकार के बारे में आगे समझेंगे।

 

मलमास दो प्रकार का है:-

 

अधिकमास

क्षयमास

सिद्धांतशिरोमणि के अनुसार ‘यस्मिन्मासे न सङ्क्रान्ति सङ्क्रान्तिद्वयमेव वा । मलमासः स विज्ञेयः’ अधिकमास और क्षयमास दोनों में विकार है। एक संक्रांति रहित है और दूसरा दो संक्रांति से युक्त।

अधिकमास संक्रान्ति रहित है ‘संक्रान्तिरहितो मासोऽधिमासः’ और क्षयमास दो संक्रान्ति से युक्त है ‘संक्रांतिद्वययुक्तो मासः क्षयमासः’ । मास में इस विकार के कारण इनका नामकरण मलमास किया गया है।

 

एक अन्य मत के अनुसार –

 

शकुन्यादिचतुष्कं तु रवेर्मलमुदाहतम् । तदूर्ध्वं क्रमते भानोर्मासः स्यात्तु मलिम्लुचः ॥

 

शकुनि, चतुष्पद, नाग व किंस्तुघ्न ये चार करण, रवि के मल कहे गये हैं, इनके ऊर्ध्व क्रम से यदि सूर्य का संक्रमण हो तो अधिकमास होता है। (एक चांद्रमास में ३० तिथियाँ होती हैं। तिथि का अर्धांश ‘करण’ कहा जाता है अर्थात ६० की संख्या। करण ११ होते हैं जिनमें चार स्थिर होते हैं। अंतिम किंस्तुघ्न से गिन कर सात करण एक मास में आठ बार क्रम से पुनरावृत्ति करते हैं, ७x८ = ५६ + शेष स्थिर ४ = ६०।)

 

यह विकार उत्पन्न कैसे होता है?

सौर-वर्ष का मान ३६५ दिन, १५ घड़ी, २२ पल और ५७ विपल हैं। जबकि चांद्रवर्ष ३५४ दिन, २२ घड़ी, १ पल और २३ विपल का होता है। इस प्रकार दोनों वर्षमानों में प्रतिवर्ष १० दिन, ५३ घटी, २१ पल (अर्थात लगभग ११ दिन) का अन्तर पड़ता है। सौर वर्ष और चांद्र वर्ष में सामञ्जस्य स्थापित करना परम आवश्यक है। यह सामंजस्य स्थापित करने के लिए हर तीसरे वर्ष हिन्दू पञ्चाङ्ग में एक चान्द्रमास की वृद्धि कर दी जाती है। यही अधिकमास है। वस्तुतः यह स्थिति स्वयं ही आ जाती है जब किसी चंद्रमास में सूर्य का सङ्क्रमण एक राशि से दूसरे में नहीं होता अर्थात जब दो अमावस्या के बीच सूर्य की संक्रान्ति नहीं आती – अमावस्याद्वयं यत्र रविसंक्रान्तिवर्जितम् । मलमासः स विज्ञेयो विष्णुः स्वपिति कर्कटे ॥

वसिष्ठ के अनुसार बत्तीस महीने (सावन मास) सोलह दिन और सोलह घड़ी के बीतने पर अधिक मास पड़ता है – द्वात्रिंशद्भिर्मितैर्मासौर्दिनैः षोडशभिस्तथा घटिकानां चतुष्केण पतत्यधिकमासक।

 

मलमास का द्वितीय प्रकार क्षयमास है जिसमें दो संक्रांतियाँ होती हैं। यह अभी हमारे लेख का विषय नहीं है। अब अधिकमास पर और चर्चा कर लेते हैं।

 

सूर्यपुराण में किस मास के अधिक मास होने पर क्या फल होता है, इसका वर्णन मिलता है, जिसका सार इस प्रकार है –

 

मास       फल

चैत्र        सुभिक्ष, कल्याण, निरोगता, इच्छित शुभ कामनायुत जनता

वैशाख   सुभिक्ष, सुन्दर वर्षा, ज्वर और अतिसार रोग की सम्भावना

ज्येष्ठ      रोग से कष्ट, अधिक यज्ञ और दानादि

आषाढ़  पुण्य, यश, सुभिक्ष, अधिक सुख

श्रावण    समस्त कामों में समृद्धि, शूद्रों में वृद्धि

भाद्रपद क्षत्रियों में युद्ध, विरोध

आश्विन  दूसरे के शासन व चोरों से जनता दुःखी, सुभिक्ष, कल्याण, निरोगता, दक्षिण में दुर्भिक्ष, राजाओं का नाश और ब्राह्मणों की वृद्धि

कार्त्तिक शुभ, अच्छे अनाज, समस्त जनता प्रसन्न, अनेक यज्ञ और ब्राह्मणों की वृद्धि

अगहन  सुभिक्ष, समस्त जनता रोगों से हीन

फाल्गुन राजा का परिवर्तन, सुभिक्ष, सुख

 

 

केवल ये नौ महीने ही अधिक मास हो सकते हैं, अगहन (अग्रहायण या मार्गशीर्ष, जिसमें पूर्णिमा को चंद्र मृगशिरा नक्षत्र पर होते हैं) और पौष केवल क्षयमास हो सकते हैं। माघ मास न अधिक मास हो सकता है और न ही क्षय मास, कार्त्तिक अधिक मास भी हो सकता है और क्षय भी। अधिकमास में सभी मांगलिक कार्य, महोत्सव, प्रतिष्ठा, यज्ञ आदि वर्जित हैं।

 

अधिकमास माहात्म्य में वर्णन आया है कि अधिकमास की उत्पत्ति होने पर यह सभी से तिरस्कृत हुआ और दुःखी होकर विष्णुलोक गया। वहाँ अधिकमास ने नारायण से कहा कि प्रत्येक मास का एक स्वामी होता है परन्तु मेरा कोई स्वामी नहीं है,  जिस कारण सभी मुझे मलमास, मलिम्लुच आदि नामों से पुकारते हैं और सभी प्रकार के मांगलिक कार्य, शुभ एवं पितृकार्य वर्जित किये हैं। तब भगवान् विष्णु ने अधिकमास को अपना नाम ‘पुरुषोत्तम’ प्रदान किया और यह पुरुषोत्तम मास कहलाया।

 

श्रीनारायण कहते हैं –

 

गुणैःकीर्त्याऽनुभावेन षड्‌भगैश्च पराक्रमैः । भक्तानां वरदानेन गुणैरन्यैश्च मासकैः ॥

अहमेतैर्यथालोके प्रथितः पुरुषोत्तमः । तथाऽयमपि लोकेषु प्रथितः पुरुषोत्तमः ॥

गुणों से, कीर्ति के अनुभाव से, षडैश्वर्य से, पराक्रम से, भक्तों को वर देने से और जो मेरे अन्य गुण हैं, उनसे मैं लोक में पुरुषोत्तम नाम से प्रसिद्ध हूँ। वैसे ही यह मलमास भी लोकों में पुरुषोत्तम नाम से प्रसिद्ध होगा ।

 

पुरुषोत्तम मास के स्वामी दयासागर पुरुषोत्तम ही हैं –

 

पुरुषोत्तमेति मासस्य नामाप्यस्ति सहेतुकम्‌ ।

तस्य स्वामी कृपासिन्धु पुरुषोत्तम उच्यते ॥

श्रीभगवान कहते हैं –

 

एतन्नाम्ना जगत्सर्वं पवित्रं च भविष्यसि । मत्सादृश्यवमुपागम्य मासानामधिपो भवेत्‌ ॥

जगत्पूज्यो जगद्वन्द्यो मासोऽयं तु भविष्यति । पूजकानां च सर्वेषां दुःखदारिद्र्यखण्डनः ॥

सर्वेमासाः सकामाश्च निष्कामोऽयं मया कृतः । मोक्षदः सर्वलोकानां मत्तुल्योऽयं मया कृतः ॥

अकामः सर्वकामो वा योऽधिमासं प्रपूजयेत्‌ । कर्माणि भस्मसात्कृऽत्वा मामेवैष्यत्यसंशयम्‌ ॥

इसके पुरुषोत्तम नाम से सारा जगत पवित्र होगा। मेरी समानता पाकर यह अधिमास सब मासों का राजा होगा। यह अधिमास जगत्पूज्य एवं जगत से वन्दना करवाने के योग्य होगा। जो इसमें पूजा और व्रत करेंगे, उनके दुःख और दारिद्र्य का नाश होगा। चैत्रादि सब मास सकाम हैं, इसको हमने निष्काम किया है। इसको हमने अपने समान समस्त प्राणियों को मोक्ष देने वाला बनाया है। जो प्राणी सकाम अथवा निष्काम होकर अधिमास का पूजन करेगा, वह अपने सब कर्मों को भस्म कर निश्चय ही मुझको प्राप्त होगा।

श्रीभगवान यह भी कहते हैं कि जैसे हल से खेत में बोये हुए बीज करोड़ो गुणा बढ़ते हैं, वैसे ही मेरे पुरुषोत्तम मास में किया हुआ पुण्य करोड़ो गुणा अधिक होता है।

 

सीतानिक्षिप्तबीजानिवर्धन्ते कोटिशो यथा । तथा कोटिगुणं पुण्यं कृतं मे पुरुषोत्तमे ।

पुरुषोत्तम नाम क्यों ?

श्रीभगवान ने मलमास को अपना पुरुषोत्तम नाम ही क्यों दिया, अन्य कोई क्यों नहीं?  इसका उत्तर पुरुषोत्तम के अर्थ में छिपा है। पुरुषोत्तम का अर्थ है पुरुषों में उत्तम ‘पुरुषाणमुत्तमः पुरुषोत्तमः’ अर्थात श्रीभगवान पुरुष मात्र नहीं, पुरुषों में सर्वोत्तम हैं। पुरुष शब्द की उत्तम व्याख्या उपनिषदों में की गयी है तथा पुरुषसूक्त श्रीभगवान के लिए की जाने वाली सबसे अधिक प्रचलित स्तुति है।

 

लक्ष्मीनारायणसंहिता में वर्णित नारायण सहस्रनामस्तोत्र में वर्णित है – भूमा त्वं पूरुषसंज्ञः पुरुषोत्तम इत्यपि। महाभारत के अनुसार – पूरणात् सदनाच्चापि ततोऽसौ पुरुषोत्तमः, असतश्च सतश्चैव सर्वस्य प्रभवाप्ययात्।

 

भगवान सर्वत्र परिपूर्ण हैं तथा सर्वव्यापक हैं, इसलिये ‘पुरुष’ हैं और सब पुरुषों मे उत्तम होने के कारण उनकी ‘पुरुषोत्तम’ सञ्ज्ञा है।

 

गीता में भगवान् का वचन है –

 

यस्मात्क्षरमतीतोऽहमक्षरादपि चोत्तमः। अतोऽस्मि लोके वेदे च प्रथितः पुरुषोत्तमः॥

 

‘मैं क्षर (नाशवान जड़ पदार्थ) से परे और अक्षर (अविनाशी आत्मा) से भी उत्तम हूँ, इसलिये लोक और वेद में पुरुषोत्तम नाम से प्रसिद्ध हूँ।’

 

चूँकि मलमास श्रीभगवान के पास जब गया था तो वह दुःखी और इस हीन भावना से ग्रस्त था कि उसको सब निम्न कोटि का समझते हैं, उसका तिरस्कार करते हैं; इस कारण श्रीभगवान ने उसको अपने ब्रह्मस्वरूप नाम पुरुष में भी उत्तम पुरुषोत्तम नाम से विभूषित कर दिया।

 

इसके अतिरिक्त मलमास को न केवल विकारों से युक्त (जैसे कि संक्रान्ति रहित) बताया गया था, वरन इसकी उत्पत्ति का कारण ही विकार (जैसा कि ऊपर बताया गया है) था। अतः श्रीभगवान विष्णु जो जन्म, वृद्धि, परिणाम, क्षय, हेयता और नाश; इन छः भाव-विकारों से परे पुरुषों में उत्तम हैं, इसे अपना पुरुषोत्तम नाम प्रदान किया।

 

अधिकमास कर्म

विभिन्न शास्त्रों में ऋषि मुनियों ने अधिकमास के वर्जित कर्म और उसमें विहित कर्म बताये हैं जिसका सार इस प्रकार है।

 

वर्जित कार्य : अग्नयाधान, यज्ञ, मूर्ति प्राण प्रतिष्ठा, माङ्गलिक कार्य, विशेष दान, महादान, गौदान, व्रत, वेदव्रत (वेदाध्ययनका आरम्भ), दीक्षा, महोत्सव, व्रतोत्सर्ग, चूड़ाकर्म, देवतीर्थों में गमन, वास्तुकर्म, ऐसे देव और तीर्थ का दर्शन जो पहले न देखे हों, विवाह, किसी कामना के लिए देवता का अभिषेक, गृहारम्भ, गृहप्रवेश, कुँआ तालाब आदि खुदवाना, किसी भी काम्य कार्य का आरम्भ, उद्यापन कर्म, महालय, अष्टकाश्राद्ध, उपाकर्म, यज्ञोपवीत संस्कार, मुण्डन, संन्यास ।

 

परन्तु स्मृति-रत्नावली ग्रन्थ में आया है कि जिस काम्य कर्म का प्रारम्भ मलमास से पहले हो चुका है, उसकी समाप्ति इसमें हो सकती है –

 

प्रवृत्तं मलमासात् प्राक् यत् काम्यमसमापितं । आगते मलमासेऽपि तत् समाप्यं न संशयम्॥

 

विहित कार्य : सभी नित्य कर्म, सभी नैमित्तिक कर्म, नित्य दान, मन्वादि तिथियों का दान, सभी कार्य जो निष्काम भाव से किये जायें, वार्षिक श्राद्ध, दर्शश्राद्ध, प्रेतश्राद्ध, तीर्थश्राद्ध, गजच्छाया श्राद्ध, ग्रहणस्नान, प्राणघातक रोगादि की निवृत्ति के रुद्रजपादि अनुष्ठान, कपिलषष्ठी जैसे अलभ्य योगोंके प्रयोग, बुधाष्टमी आदि के प्रयोग।

 

अधिकमास के वर्जित कार्य देखकर लोगों को ऐसा आभास होता है कि इसमें जपादि नहीं करने चाहिए, जो कि अर्द्धसत्य है। अधिकमास में किसी कामना से जपादि वर्जित हैं जबकि निष्काम जपादि करने का करोड़ों गुना महत्व है। पुराणों ने तो यहाँ तक कह दिया है कि जो मनुष्य इस अधिमास में जप, दान नहीं करते, वे महामूर्ख हैं – य एतस्मिन्महामूढ जपदानादिवर्जिताः, वे दुष्ट, अभागी और दूसरे के भाग्य से जीवन चलाने वाले होते हैं, जायन्ते दुर्भगा दुष्टाः परभाग्योपजीविनः अर्थात भाग्यहीन होते हैं।

 

पुरुषोत्तम मास के धार्मिक कार्य

ततः सम्पूज्य कलशमुपचारैः समन्त्रकैः। गन्धाक्षतैश्च नैवेद्यैः पुष्पैस्तत्कालसम्भवैः॥

 

पुरुषोत्तम मास के पुरुषोत्तम देवता हैं। पुरुषोत्तम मास के आने पर उनकी पूजा करनी चाहिये ।

 

तस्मात्सर्वात्मना सर्वैः स्नानपूजाजपादिकम्‌। विशेषेण प्रकर्तव्यं दानं शक्त्योनुसारतः॥

 

सब प्राणियों को अधिमास में स्नान, पूजा, जप आदि और विशेष करके शक्ति के अनुसार दान अवश्य कर्तव्य है ।

 

एकमप्युपवासं यः करोत्यस्मिस्तपोनिधे। असावनन्तपापानि भस्मीकृत्य द्विजोत्तम। सुरयानं समारुह्य बैकुण्ठं याति मानवः।

 

इस पुरुषोत्तम मास में जो एक भी उपवास करता है, हे द्विजोत्तम! वह मनुष्य अनन्त पापों को भस्म कर विमान से बैकुण्ठ लोक को जाता है ।

 

अधिकमास में श्रीमद्भागवतपुराण श्रवण का परम फल है –

 

श्रीमद्भागवतं भक्त्या श्रोतव्यं पुरुषोत्तमे । तत्पुण्यं वचसा वक्तुं विधाताऽपि न शक्नुयात्‌ ॥

 

पुरुषोत्तम मास में भक्ति से श्रीमद्भागवत का श्रवण करे तो उस पुण्य को ब्रह्मा कभी कहने में समर्थ नहीं होंगे ।

 

शालग्राम जी का तुलसीदल से पूजन करने का विधान है –

 

शालिग्रामार्चनं कार्यं मासे श्रीपुरुषोत्तमे । तुलसीदललक्षेण तस्य पुण्यमनन्तकम्‌ ॥

 

श्रीपुरुषोत्तम मास में लाख तुलसीदल से शालग्राम का पूजन करे तो उसका अनन्त पुण्य होता है ।

अधिकमास में जपने योग्य विशेष मन्त्र

गोवर्धनधरं वन्दे गोपालं गोपरूपिणम्। गोकुलोत्सवमीशानं गोविन्दं गोपिकाप्रियम्॥

 

पुरुषोत्तम-माहात्म्य के अनुसार प्रथम कौण्डिन्य ऋषि ने इस मन्त्र को बार-बार कहा कि जो इस मन्त्र का भक्ति से जप करता हुआ पुरुषोत्तम मास को व्यतीत करता है वह पुरुषोत्तम भगवान को प्राप्त करता है।

 

दक्षिण भारत में सम्पूर्ण अधिकमास में प्रतिदिन ३३ वस्तुयें, जैसे ३३ मालपुआ, ३३ फल, ३३ मेवा आदि दान करने का विधान है।

 

इस ३३ संख्या के सम्बन्ध में २ मत हैं :

 

अधिक मास ३३ मास में एक बार आता है

अधिकमास में ३३ देवता प्रधान हैं

अष्टवसु (८)

एकादश रूद्र (११)

द्वादश आदित्य (१२)

वषट्कार (१)

प्रजापति (१)

अधिकमास के बताये ३३ देवता प्रधान वास्तव में विष्णु जी के ३३ स्वरुप हैं जो इस प्रकार हैं :

 

अष्टवसु विष्णु स्वरुप

१            द्रोण       विष्णु

२            ध्रुव         जिष्णु

३            दोष       महाविष्णु

४            अर्क      हरि

५           अग्नि      कृष्ण

६           द्यौ          अधोक्षज

७           प्राण       केशव

८            विभावसु              माधव

एकादश रूद्र विष्णु स्वरुप

९            भीम       राम

१०          रैवत      अच्युत

११          ओज      पुरुषोत्तम

१२          अजैकपात्          गोविन्द

१३          महान्    वामन

१४         बहुरूप श्रीश

१५         भव        श्रीकण्ठ

१६         वामदेव विश्वसाक्षी

१७         उग्र        नारायण

१८         वृषाकपि              मधुरिपु

१९         अहिर्बुध्न्य             अनिरुद्ध

द्वादश आदित्य विष्णु स्वरुप

२०         विवस्वान             त्रिविक्रम

२१          अर्यमा   वासुदेव

२२         पूषा       जगद्योनि

२३         त्वष्टा      अनंत

२४         सवितृ    शेषशायिन्‌

२५         भग        संकर्षण

२६         धातृ       प्रद्युम्न

२७         पर्जन्य    दैत्यारि

२८         वरुण     विश्वतोमुख

२९         मित्र       जनार्दन

३०         शक्र      धरावास

३१          उरुक्रम दामोदर

३२         प्रजापति              अघमर्दन

३३         वषट्कार            श्रीपति

 

 

विष्णुं जिष्णुं महाविष्णुं हरिं कृष्णमधोक्षजम् । केशवं माधवं राममच्युतं पुरुषोत्तमम् ॥

गोविन्दं वामनं श्रीशं श्रीकण्ठं विश्वसाक्षिणम् । नारायणं मधुरिपुमनिरुद्धं त्रिविक्रमम् ॥

वासुदेवं जगद्योनिमनन्तं शेषशायिनम् । सङ्कर्षणं च प्रद्युम्नं दैत्यारिं विश्वतोमुखम् ॥

जनार्दनं धरावासं दामोदर अघमर्दनम् । श्रीपतिं च त्रयस्त्रिंशदुद्दिश्यप्रतिनामभिः ॥

मन्त्रैरेतैश्च यो दद्याद् त्रयस्त्रिंशदपूपकम् । प्राप्नोति विपुलां लक्ष्मीं पुत्रपौत्रादिसन्ततिम् ॥

 

अधिकमास में इन ३३ नामों का अधिक से अधिक जप करना चाहिए। अधिकमास माहात्म्य में इस मास में किये जाने वाले तीन प्रमुख दान बताये हैं:

 

दीपदान

मालपुआ दान

ताम्बूल दान

दीपदान

अधिकमास में श्रीपुरुषोत्तम भगवान्‌ को प्रसन्न करने के लिये दीपदान का अत्यधिक महत्त्व है और यह बिना व्रत के, बिना तीर्थ के, बिना दान के, बिना प्रयास के दरिद्रता दूर करने वाला है – कर्तव्यं दीपदानं च पुरुषोत्तमतुष्टये। तेन ते तीव्रदारिद्रयं समूलं नाशमेष्यति॥

 

यदि सामर्थ्यवान हैं तो शुद्ध घी से करें। सम्भव नहीं तो तिल के तेल से करें। विधिहीन दीप-दान करने से भी मनुष्यों को लक्ष्मी की वृद्धि होती है। यदि पुरुषोत्तम मास में विधिपूर्वक दीप-दान किया जाय तो क्या कहना!

अवैधं दीपदानं हि रमावृद्धिकरं नृणाम्‌। विधिना कियमाणं चेत्किं पुनः पुरुषोत्तमे॥

 

अधिकमास में किये दीपदान के महत्व के बारे में कहा गया है

 

वेदोक्तानि च कर्माणि दानानि विविधानि च । पुरुषोत्तमदीपस्य कलां नार्हन्ति षोडशीम्‌ ॥

तीर्थानि सकलान्येव शास्त्राणि सकलानि च । पुरुषोत्तमदीपस्य कलां नार्हन्ति षोडशीम्‌ ॥

योगो ज्ञानं तथा साङ्‌ख्यं तन्त्राणि सकलान्यपि । पुरुषोत्तमदीपस्य कलां नार्हन्ति षोडशीम्‌ ॥

कृच्छ्रचान्द्रायणादीनि व्रतानि निखिलानि च । पुरुषोत्तमदीपस्य कलां नार्हन्ति षोडशीम्‌ ॥

वेदाभ्यासो गयाश्राद्धं गोमतीतटसेवनम्‌ । पुरुषोत्तमदीपस्य कलां नार्हन्ति षोडशीम्‌ ॥

उपरागसहस्राणि व्यतीपातशतानि च । पुरुषोत्तमदीपस्य कलां नार्हन्ति षोडशीम्‌ ॥

कुर्वादिक्षेत्रवर्याणि दण्डकादिवनानि च । पुरुषोत्तमदीपस्य कलां नार्हन्ति षोडशीम्‌ ॥

 

वेद में कहे हुए कर्म और अनेक प्रकार के दान पुरुषोत्तम मास में दीप-दान की सोलहवीं कला की भी समता नहीं कर सकते। समस्त तीर्थ, समस्त शास्त्र पुरुषोत्तम मास के दीप-दान की सोलहवीं कला को नहीं पा सकते हैं । योग, दान, सांख्य, समस्त-तन्त्र भी पुरुषोत्तम मास के दीप-दान की सोलहवीं कला को नहीं पा सकते। कृच्छ्र, चान्द्रायण आदि समस्त व्रत पुरुषोत्तम मास के दीप-दान की सोलहवीं कला की समता नहीं कर सकते। वेद का प्रतिदिन पाठ करना, गयाश्राद्ध, गोमती नदी के तट का सेवन पुरुषोत्तम मास के दीप-दान की सोलहवीं कला की समता नहीं कर सकते । हजारो उपराग, सैकड़ो व्यतीपात पुरुषोत्तम मास के दीप-दान की सोलहवीं कला के तुल्य नहीं हो सकते। कुरुक्षेत्रादि श्रेष्ठ क्षेत्र, दण्डक आदि वन पुरुषोत्तम मास के दीप-दान की सोलहवीं कला की समता नहीं कर सकते।

 

अधिकमास में शुद्ध घी का अखण्ड दीपक जलाने का भी विधान है –

 

दीपः कार्यस्त्वखण्डश्च यावन्मासं च सर्पिषा। पुरुषोत्तमस्य प्रीत्यर्थं सर्वार्थफलसिद्धये॥

 

पुरुषोत्तम मास पर्यन्त घृत का अखण्ड दीप समस्त फल की सिद्धि के लिये और पुरुषोत्तम भगवान्‌ के प्रीत्यर्थ समर्पण करें ।

 

दीपदान कहाँ करें?

किसी भी मंदिर, गौशाला, नदी, तालाब, घर, छत आदि पर कहीं भी करें। बिना विधि के, बिना शास्त्र के जो पुरुषोत्तम मास में जिस किसी स्थान पर भी दीप-दान करता है. वह इच्छानुसार फल को प्राप्त करता है ।

 

विना विधिं विना शास्त्रं यः कुर्यात्‌ पुरुषोत्तमे ।

दीपं तु यत्र कुत्रापि कामितं सर्वमाप्नुयात्‌॥

 

मालपुआ दान

पुरुषोत्तम मास में ब्राह्मण को मालपुओं के दान का विशेष महत्व है। पुरुषोत्तम मास में प्रतिदिन काँसे के बर्तन में 33 मालपुआ (गुड़ और घी से बने) रखकर बर्तन सहित घी और स्वर्ण (सामर्थ्यवान के लिए) के साथ दान कर दें। कहा गया है –

 

प्रत्यपूपं तु यावन्ति छिद्राणि पृथिवीपते। तावद्वर्षसहस्राणि वैकुण्ठे वसते नरः॥

 

हर एक मालपुये में जितने छिद्र होते हैं, मनुष्य उतने वर्ष पर्यन्त वैकुण्ठ लोक में वास करता है।

 

निर्णयसिन्धु के अनुसार इस दान से पृथ्वीदान का फल मिलता है – उद्दिश्यापूपदानेन पृथ्वीदानफलं लभेत्।

 

यदि पुरुषोत्तम मास में प्रतिदिन न कर सकें, तो कृष्णपक्ष की चतुर्दशी, नवमी तथा अष्टमी को करें। वह भी न कर सकें, तो किसी भी एक दिन अवश्य करें।

 

मालपुआ दान मन्त्र (निर्णयसिन्धु से संकलित)

विष्णुरूपी सहस्रांशुः सर्वपापप्रणाशनः । अपूपान्नप्रदानेन मम पापं व्यपोहतु ॥

नारायण जगद्बीज भास्करप्रतिरूपक । व्रतेनानेन पुत्रांश्च सम्पदं चाभिवर्धय ॥

यस्य हस्ते गदाचक्रे गरुडो यस्य वाहनम् । शङ्खः करतले यस्य स मे विष्णुः प्रसिदतु ॥

कलाकाष्ठादिरूपेण निमेषघटिकादिना । यो वञ्चयति भूतानि तस्मै कालात्मने नमः ॥

कुरुक्षेत्रमं देशः कालः पर्व द्विजो हरिः । पृथ्वीसममिदं दानं गृहाण पुरुषोत्तम ॥

मलानां विषुद्ध्यर्थं पापप्रशमनाय च । पुत्रपौत्र्यादिवृद्ध्यर्थं तव दास्यामि भास्कर ॥

 

जो व्यक्ति पुरुषोत्तम मास में प्रतिदिन ३३ वस्तुयें दान करके ऊपर बताये विष्णु के ३३ नामों का उच्चारण करता है, उसको विपुल मात्रा में लक्ष्मी, पुत्र, पौत्र आदि प्राप्त होते हैं।

 

ताम्बूल दान

पुरुषोत्तम मास में ब्राह्मण को ताम्बूल दान देने का भी महत्व बताया है

 

एला-लवङ्ग-कर्पूर-नागवल्ली‌दलानि च । कस्तूरी मुरामांसी च चूर्णं च खदिरं शुभम्‌ ॥

एतैश्चमीलितैर्देयं ताम्बूलं भगवत्प्रियम्‌ । तस्मादेवं विधायैव देयं ताम्बूलमादरात्‌ ॥

ताम्बूलं यो द्विजाग्र्‌याय एवं कृत्वा प्रयच्छति । सुभगश्च भवेदत्र परत्रामृतभुग्भवेत्‌ ॥

 

इलायची, लौंग, कपूर, नागरपान, कस्तूरी, जावित्री, कत्था और चूना इनमें से जो पदार्थ मिल जाएँ उन सब पदार्थों को मिलाकर भगवान्‌ के लिये प्रिय ताम्बूल को जो ब्राह्मणश्रेष्ठ के लिये देता है,

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