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प्रसिद्ध बारह संवाद

पाश्चात्यता या आधुनिकता के नाम पर विचारों का खुलापन भ्रामक विचारों के फैलने के लिए, देश विरोधी विचारों और गतिविधियों के लिए भी अच्छा माहौल तैयार करता है। लोगों को ईश्वर से काट दो, बेरोजगारी को बढ़ाओ, गरीबी का सम्मान करो, युवाओं को हर तरह की वर्जनाओं को तोड़ना सिखाओं, मीडिया के माध्यम से देश में असंतोष की आग को भड़काओं, धर्मों में फूट डालों और फिर तभी आप किसी देश को तोड़ सकते हैं।

 

 आजकल देखने में यही आ रहा है कि हमारे देश का युवा भटक गया है। वह उन विचारों के हाथों की कठपुतलियां बन गया है जो उसे ही नहीं भारत को भी बर्बादी के रास्ते पर ले जाती है।

अधिकतर हिन्दुओं को अपने धर्म का ज्ञान नहीं होता। यही कारण है कि वे युवा अवस्था में विपरित विचारधारा के प्रभाव में आकर अपना जीवन नष्ट कर लेते हैं। इसके अलावा वे जिंदगी भर द्वंद्व, दुविधा या असंतोष की भावना में ही रहते हैं। वे कभी यह निर्णय नहीं ले पाते हैं कि क्या सही और क्या गलत। ऐसे लोग खुद के परिवार को ही संकट में नहीं डालते बल्कि ये लोग देश, धर्म और समाज के लिए भी घातक सिद्ध होते हैं, क्योंकि वे जो भी सोचते हैं वह उनकी सोच नहीं होती है वह या तो बाजार से प्रभावित या वामपंथ से प्रभावित सोच होती है। खैर..

भारत में ऐसे बहुत से ज्ञानी और ध्यानी हुए जिनकी गाथा और जिनके विचार जानकर आप हैरान रह जाएंगे। वामपंथ या एकेश्‍वरवाद की विचारधारा भी भारत के दर्शन की देन है। भारत में ही ऐसे कई महान राजनीतिज्ञ, नीतिज्ञ, दार्शनिक, आध्यात्मिक, आस्तिक, नास्तिक, वैज्ञानिक और चमत्कारिक संत हुए है तो हमें किसी विदेशी को जानने की कोई जरूरत नहीं।

आओ जानते हैं कि हिन्दू धर्म में दो लोगों के बीच होने वाले ऐसे कौन से विश्‍व प्रसिद्ध संवाद है जिन्हें पढ़कर या सुनकर लाखों लोगों का जीवन बदल गया है और जिन्हें पढ़कर दुनियभार के राजनीतिज्ञ, नीतिज्ञ, वैज्ञानिक, आध्यामिक और दार्शनिकों ने अपना एक अलग ही धर्म, दर्शन, नीति और विज्ञान का सिद्धांत गढ़ा। यह तय है कि इन्हें पढ़कर आपकी जिंदगी में शांति, दृढ़ता, निर्भिकता और बुद्धि का विकास होगा। हम यहां आपके लिए ऐसी जानकारी लाएं हैं जिन्हें जानकार आप निश्‍चित ही हैरान रह जाएंगे।

 

पहला संवाद

 

अष्टावक्र और जनक संवाद :अष्टावक्र दुनिया के प्रथम ऐसे व्यक्ति थे जिन्होंने सत्य को जैसा जाना वैसा कह दिया। न वे कवि थे और न ही दार्शनिक। चाहे वे ब्राह्मणों के शास्त्र हों या श्रमणों के, उन्हें दुनिया के किसी भी शास्त्र में कोई रुचि नहीं थी। उनका मानना था कि सत्य शास्त्रों में नहीं लिखा है। शास्त्रों में तो सिद्धांत और नियम हैं, सत्य नहीं, ज्ञान नहीं। ज्ञान तो तुम्हारे भीतर है।

अष्टावक्र ने जो कहा वह ‘अष्टावक्र गीता’ नाम से प्रसिद्ध है। राजा जनक ने अष्टावक्र को अपना गुरु माना था। राजा जनक और अष्टावक्र के बीच जो संवाद हुआ उसे ‘अष्टावक्र गीता’ के नाम से जाना जाता है।

 

दूसरा संवाद

 

श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद:हिन्दू धर्म के एकमात्र धर्मग्रंथ है वेद। वेदों के चार भाग हैं- ऋग, यजु, साम और अथर्व। वेदों के सार को उपनिषद कहते हैं और उपनिषदों का सार या निचोड़ गीता में हैं। उपनिषदों की संख्या 1000 से अधिक है उसमें भी 108 प्रमुख हैं। गीता के ज्ञान को भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कुरुक्षेत्र में खड़े होकर दिया था। यह श्रीकृष्‍ण-अर्जुन संवाद नाम से विख्‍यात है।

किसी के पास इतना समय नहीं है कि वह वेद या उपनिषद पढ़ें उनके लिए गीता ही सबसे उत्तम धर्मग्रंथ है। महाभारत के 18 अध्याय में से एक भीष्म पर्व का हिस्सा है गीता। गीता को अच्‍छे से समझने से ही आपकी समझ में बदलाव आ जाएगा। धर्म, कर्म, योग, सृष्टि, युद्ध, जीवन, संसार आदि की जानकारी हो जाएगी। सही और गलत की पहचान होने लगेगी। तब आपके दिमाग में स्पष्टता होगी द्वंद्व नहीं। जिसने गीता नहीं पढ़ी वह हिन्दू धर्म के बारे में हमेशा गफलत में ही रहेगा।

श्रीकृष्ण के गुरु घोर अंगिरस थे। घोर अंगिरस ने देवकी पुत्र कृष्ण को जो उपदेश दिया था वही उपदेश कृष्ण गीता में अर्जुन को देते हैं। छांदोग्य उपनिषद में उल्लेख मिलता है कि देवकी पुत्र कृष्‍ण घोर अंगिरस के शिष्य हैं और वे गुरु से ऐसा ज्ञान अर्जित करते हैं जिससे फिर कुछ भी ज्ञातव्य नहीं रह जाता है।

 

 तीसरा संवाद

 

यक्ष-युद्धिष्ठिर प्रसिद्ध बारह संवाद

पाश्चात्यता या आधुनिकता के नाम पर विचारों का खुलापन भ्रामक विचारों के फैलने के लिए, देश विरोधी विचारों और गतिविधियों के लिए भी अच्छा माहौल तैयार करता है। लोगों को ईश्वर से काट दो, बेरोजगारी को बढ़ाओ, गरीबी का सम्मान करो, युवाओं को हर तरह की वर्जनाओं को तोड़ना सिखाओं, मीडिया के माध्यम से देश में असंतोष की आग को भड़काओं, धर्मों में फूट डालों और फिर तभी आप किसी देश को तोड़ सकते हैं।

 आजकल देखने में यही आ रहा है कि हमारे देश का युवा भटक गया है। वह उन विचारों के हाथों की कठपुतलियां बन गया है जो उसे ही नहीं भारत को भी बर्बादी के रास्ते पर ले जाती है।

अधिकतर हिन्दुओं को अपने धर्म का ज्ञान नहीं होता। यही कारण है कि वे युवा अवस्था में विपरित विचारधारा के प्रभाव में आकर अपना जीवन नष्ट कर लेते हैं। इसके अलावा वे जिंदगी भर द्वंद्व, दुविधा या असंतोष की भावना में ही रहते हैं। वे कभी यह निर्णय नहीं ले पाते हैं कि क्या सही और क्या गलत। ऐसे लोग खुद के परिवार को ही संकट में नहीं डालते बल्कि ये लोग देश, धर्म और समाज के लिए भी घातक सिद्ध होते हैं, क्योंकि वे जो भी सोचते हैं वह उनकी सोच नहीं होती है वह या तो बाजार से प्रभावित या वामपंथ से प्रभावित सोच होती है। खैर..

भारत में ऐसे बहुत से ज्ञानी और ध्यानी हुए जिनकी गाथा और जिनके विचार जानकर आप हैरान रह जाएंगे। वामपंथ या एकेश्‍वरवाद की विचारधारा भी भारत के दर्शन की देन है। भारत में ही ऐसे कई महान राजनीतिज्ञ, नीतिज्ञ, दार्शनिक, आध्यात्मिक, आस्तिक, नास्तिक, वैज्ञानिक और चमत्कारिक संत हुए है तो हमें किसी विदेशी को जानने की कोई जरूरत नहीं।

आओ जानते हैं कि हिन्दू धर्म में दो लोगों के बीच होने वाले ऐसे कौन से विश्‍व प्रसिद्ध संवाद है जिन्हें पढ़कर या सुनकर लाखों लोगों का जीवन बदल गया है और जिन्हें पढ़कर दुनियभार के राजनीतिज्ञ, नीतिज्ञ, वैज्ञानिक, आध्यामिक और दार्शनिकों ने अपना एक अलग ही धर्म, दर्शन, नीति और विज्ञान का सिद्धांत गढ़ा। यह तय है कि इन्हें पढ़कर आपकी जिंदगी में शांति, दृढ़ता, निर्भिकता और बुद्धि का विकास होगा। हम यहां आपके लिए ऐसी जानकारी लाएं हैं जिन्हें जानकार आप निश्‍चित ही हैरान रह जाएंगे।

 

पहला संवाद

 

अष्टावक्र और जनक संवाद :अष्टावक्र दुनिया के प्रथम ऐसे व्यक्ति थे जिन्होंने सत्य को जैसा जाना वैसा कह दिया। न वे कवि थे और न ही दार्शनिक। चाहे वे ब्राह्मणों के शास्त्र हों या श्रमणों के, उन्हें दुनिया के किसी भी शास्त्र में कोई रुचि नहीं थी। उनका मानना था कि सत्य शास्त्रों में नहीं लिखा है। शास्त्रों में तो सिद्धांत और नियम हैं, सत्य नहीं, ज्ञान नहीं। ज्ञान तो तुम्हारे भीतर है।

अष्टावक्र ने जो कहा वह ‘अष्टावक्र गीता’ नाम से प्रसिद्ध है। राजा जनक ने अष्टावक्र को अपना गुरु माना था। राजा जनक और अष्टावक्र के बीच जो संवाद हुआ उसे ‘अष्टावक्र गीता’ के नाम से जाना जाता है।

 

दूसरा संवाद

 

श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद:हिन्दू धर्म के एकमात्र धर्मग्रंथ है वेद। वेदों के चार भाग हैं- ऋग, यजु, साम और अथर्व। वेदों के सार को उपनिषद कहते हैं और उपनिषदों का सार या निचोड़ गीता में हैं। उपनिषदों की संख्या 1000 से अधिक है उसमें भी 108 प्रमुख हैं। गीता के ज्ञान को भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कुरुक्षेत्र में खड़े होकर दिया था। यह श्रीकृष्‍ण-अर्जुन संवाद नाम से विख्‍यात है।

किसी के पास इतना समय नहीं है कि वह वेद या उपनिषद पढ़ें उनके लिए गीता ही सबसे उत्तम धर्मग्रंथ है। महाभारत के 18 अध्याय में से एक भीष्म पर्व का हिस्सा है गीता। गीता को अच्‍छे से समझने से ही आपकी समझ में बदलाव आ जाएगा। धर्म, कर्म, योग, सृष्टि, युद्ध, जीवन, संसार आदि की जानकारी हो जाएगी। सही और गलत की पहचान होने लगेगी। तब आपके दिमाग में स्पष्टता होगी द्वंद्व नहीं। जिसने गीता नहीं पढ़ी वह हिन्दू धर्म के बारे में हमेशा गफलत में ही रहेगा।

श्रीकृष्ण के गुरु घोर अंगिरस थे। घोर अंगिरस ने देवकी पुत्र कृष्ण को जो उपदेश दिया था वही उपदेश कृष्ण गीता में अर्जुन को देते हैं। छांदोग्य उपनिषद में उल्लेख मिलता है कि देवकी पुत्र कृष्‍ण घोर अंगिरस के शिष्य हैं और वे गुरु से ऐसा ज्ञान अर्जित करते हैं जिससे फिर कुछ भी ज्ञातव्य नहीं रह जाता है।

 

 तीसरा संवाद

 

यक्ष-युधिष्ठिर संवाद :यक्ष और युधिष्ठिर के बीच हुए संवाद को यक्ष प्रश्न कहा जाता है। यक्ष और युधिष्ठिर के बीच जो संवाद हुआ है उसे जानने के बाद आप जरूर हैरान रह जाएंगे। यह अध्यात्म, दर्शन और धर्म से जुड़े प्रश्न ही नहीं है, यह आपकी जिंदगी से जुड़े प्रश्न भी है। आप भी अपने जीवन में कुछ प्रश्नों के उत्तर ढूंढ ही रहे होंगे।

‘यक्ष’ ने किए थे युधिष्ठिर से ये प्रश्न,,,,भारतीय इतिहास ग्रंथ महाभारत में ‘यक्ष-युधिष्ठिर संवाद’ नाम से एक बहु चर्चित प्रकरण है। संवाद का विस्तृत वर्णन वनपर्व के अध्याय 312 एवं 313 में दिया गया है। यक्ष ने युद्धिष्ठिर से लगभग 124 सवाल किए थे। यक्ष ने सवालों की झड़ी लगाकर युधिष्ठिर की परीक्षा ली।

 अनेकों प्रकार के प्रश्न उनके सामने रखे और उत्तरों से संतुष्ट हुए। अंत में यक्ष ने चार प्रश्न युधिष्ठिर के समक्ष रखे जिनका उत्तर देने के बाद ही उन्होंने मृत पांडवों (अर्जुन, भीम, नकुल और सहदेव) को जिंदा कर दिया था। यह सवाल जीवन, संसार, सृष्टि, ईश्‍वर, प्रकृति, नीति, ज्ञान, धर्म, स्त्री, बुराई आदि अनेकों विषयों के संबंधित थे।

 

 चौथा संवाद

 

लक्ष्मण और रावण संवाद :प्रभु श्रीराम के तीर से जब रावण मरणासन्न अवस्था में हो गया, तब श्रीराम ने लक्ष्मण से उसके पास जाकर शिक्षा लेने को कहा। श्रीराम की यह बात सुनकर लक्ष्मण चकित रह गए।

भगवान श्रीराम ने लक्ष्‍मण से कहा कि इस संसार में नीति, राजनीति और शक्ति का महान पंडित रावण अब विदा हो रहा है, तुम उसके पास जाओ और उससे जीवन की कुछ ऐसी शिक्षा ले लो जो और कोई नहीं दे सकता।

श्रीराम की बात मानकर लक्ष्मण मरणासन्न अवस्था में पड़े रावण के नजदीक सिर के पास जाकर खड़े हो गए, लेकिन रावण ने कुछ नहीं कहा। लक्ष्मण ने लौटकर प्रभु श्रीराम से कहा कि वे तो कुछ बोलते ही नहीं। तब श्रीराम ने कहा यदि किसी से ज्ञान प्राप्त करना है तो उसके चरणों के पास हाथ जोड़कर खड़े होना चाहिए, न कि सिर के पास। श्रीराम ने लक्ष्मण से कहा, जाओ और रावण के चरणों के पास बैठो। यह बात सुनकर लक्ष्मण इस बार रावण के चरणों में जाकर बैठ गए। रावण ने लक्ष्मण को जो सीख दी उसे सभी जानते हैं।

 

 पांचवां संवाद

 

अंगद और रावण के बीच संवाद :गोस्वामी तुलसीदास कृत महाकाव्य श्रीरामचरितमानस के लंकाकांड में बालि पुत्र अंगद रावण की सभा में रावण को सीख देते हुए बताते हैं कि कौन-से ऐसे 14 दुर्गुण है जिसके होने से मनुष्य मृतक के समान माना जाता है।

अंगद-रावण के बीच जो संवाद हुआ था वह बहुत ही रोचक था उसे पढ़ने और उसकी व्याख्या जानेने से व्यक्ति को अपने जीवन की स्थिति के बारे में बहुत कुछ ज्ञान हो जाता है।

 

छठा संवाद

 

यमराज-नचिकेता संवाद :वाजश्रवस पुत्र नचिकेता और मृत्यु के देवता यमराज के बीच जो संवाद होता है वह विश्‍व का प्रथम दार्शनिक संवाद माना जा सकता है। वाजश्रवस अपने पुत्र को क्रोधवा यमराज को दान कर देते हैं। नचिकेता तब यमलोक पहुंच जाते हैं।

यमलोक में उसे वक्त यमदूत नचिकेता से कहते हैं कि यमराज इस वक्त नहीं है। तब नचिकेता तीन दिन तक यमराज की प्रतिक्षा करते हैं। यमपुरी के द्वार पर बैठा नचिकेता बीती बातें सोच रहा था। उसे इस बात का संतोष था कि वह पिता की आज्ञा का पालन कर रहा था। लगातार तीन दिन तक वह यमपुरी के बाहर बैठा यमराज की प्रतीक्षा करता रहा। तीसरे दिन जब यमराज आए तो वे नचिकेता को देखकर चौंके।

जब उन्हें उसके बारे में मालूमe हुआ तो वे भी आश्चर्यचकित रह गए। अंत में उन्होंने नचिकेता को अपने कक्ष में बुला भेजा। यमराज के कक्ष में पहुंचते ही नचिकेता ने उन्हें प्रणाम किया। उस समय उसके चेहरे पर अपूर्व तेज था। उसे देखकर यमराज बोले- ‘वत्स, मैं तुम्हारी पितृभक्ति और दृढ़ निश्चय से बहुत प्रसन्न हुआ। तुम मुझसे कोई भी तीन वरदान मांग सकते हो।’

 

 सातवां संवाद

 

शिव-पार्वती संवाद :रामायण या रामचरित के बालकांड में शिव-पार्वती संवाद का वर्णन मिलता है। ‘गायत्री-मंजरी’ में भी ‘शिव-पार्वती संवाद’ आता है। हम इस संवाद की बात नहीं कर रहे हैं। भारत के कश्मीर राज्य में अमरनाथ नामक गुफा है जहां जून माह में बाबा अमरनाथ के दर्शन करने के लिए हजारों हिन्दू जाते हैं। दरअसल, यह गुफा शिव और पार्वती संवाद की साक्षी है। यहां भगवान शिव ने माता पार्वती को ‘रहस्यमयी ज्ञान’ की शिक्षा दी थी। इस ज्ञान को विज्ञान भैरव तंत्र में संग्रहित किया गया है।

शिव ने अपनी अर्धांगिनी पार्वती को मोक्ष हेतु अमरनाथ की गुफा में जो ज्ञान दिया, उस ज्ञान की आज अनेकानेक शाखाएं हो चली हैं। वह ज्ञानयोग और तंत्र के मूल सूत्रों में शामिल है। ‘विज्ञान भैरव तंत्र’ एक ऐसा ग्रंथ है जिसमें भगवान शिव द्वारा पार्वती को बताए गए 112 ध्यान सूत्रों का संकलन है।

अमरनाथ के अमृत वचन :शिव द्वारा मां पार्वती को जो ज्ञान दिया गया, वह बहुत ही गूढ़-गंभीर तथा रहस्य से भरा ज्ञान था। उस ज्ञान की आज अनेकानेक शाखाएं हो चली हैं। वह ज्ञानयोग और तंत्र के मूल सूत्रों में शामिल है। ‘विज्ञान भैरव तंत्र’ एक ऐसा ग्रंथ है जिसमें भगवान शिव द्वारा पार्वती को बताए गए 112 ध्यान सूत्रों का संकलन है।

योगशास्त्र के प्रवर्तक भगवान शिव के ‘‍विज्ञान भैरव तंत्र’ और ‘शिव संहिता’ में उनकी संपूर्ण शिक्षा और दीक्षा समाई हुई है। तंत्र के अनेक ग्रंथों में उनकी शिक्षा का विस्तार हुआ है। भगवान शिव के योग को तंत्र या वामयोग कहते हैं। इसी की एक शाखा हठयोग की है। भगवान शिव कहते हैं- ‘वामो मार्ग: परमगहनो योगितामप्यगम्य:’ अर्थात वाम मार्ग अत्यंत गहन है और योगियों के लिए भी अगम्य है। मेरुतंत्र

आठवां संवाद

 

याज्ञवल्क्यजी-गार्गी संवाद :वृहदारण्यक उपनिषद् में दोनों के बीच हुए संवाद का उल्लेख मिलता है। राजा जनक अपने राज्य में शास्त्रार्थ का आयोजन करते रहते थे। जो भी शास्त्रार्थ में जीत जाता था वह सोने से लदी गाएं ले जाता था। एक बार के आयोजन में याज्ञवल्क्यजी को भी निमंत्रण मिला था। तब याज्ञवल्क्यजी ने शास्त्रार्थ से पहले ही अपने एक शिष्य से कहा बेटा! इन गौओं को अपने यहां हांक ले चलो।

 

ऐसे में सभी ऋषि क्रुद्ध होकर उनसे शास्त्रार्थ करने लगे। याज्ञवल्क्यजी ने सबके प्रश्नों का यथाविधि उत्तर दिया और सभी को संतुष्ट कर दिया। उस सभा में ब्रह्मवादिनी गार्गी भी बुलायी गयी थी। सबके पश्चात् याज्ञवल्क्यजी से शास्त्रार्थ करने वे उठी। दोनों के बीच जो शास्त्रार्थ हुआ। गार्गी ने याज्ञवल्क्यजी से कई प्रश्न किए। अंत में याज्ञवल्क्य ने कहा- गार्गी! अब इससे आगे मत पूछो।

 

 इसके बाद महर्षि याज्ञवक्ल्यजी ने यथार्थ सुख वेदान्ततत्त्‍‌व समझाया, जिसे सुनकर गार्गी परम सन्तुष्ट हुई और सब ऋषियों से बोली-भगवन्! याज्ञवल्क्य यथार्थ में सच्चे ब्रह्मज्ञानी हैं। गौएं ले जाने का जो उन्होंने साहस किया वह उचित ही था।

 

 

नौवां संवाद

 

काक भुशुण्डी-गरुड़जी संवाद :काक भुशुण्‍डी ने पक्षीराज गरुड़जी को राम की कथा पहले ही सुना दी थी। इसका वर्णन हमें रामायण और रामचरित मानस में मिलता है। शिवजी माता पार्वती से कहते हैं कि इससे पहले यह सुंदर कथा काक भुशुण्डी ने गरुड़जी से कही थी।

 

रामचरित मानस में काकभुशुण्डी ने अपने जन्म की पूर्वकथा और कलि महिमा का वर्णन किया है। इसका उल्लेख रामचरित मानस में मिलता है।

 

नारदजी की आज्ञा से जब भगवान राम को नागपाश से छुड़ाकर गरुड़जी पुन: अपने धाम लौट रहे होते हैं तब उनके मन में शंका उत्पन्न होती है कि यह कैसे भगवान जो एक तुच्छ राक्षस द्वारा फेंके गए नागपाश से ही बंध गए? इस शंका समाधान के लिए वे नारद से पूछते हैं। नारदजी उन्हें ब्रह्मा के पास भेज देते हैं। ब्रह्माजी उन्हें शिवजी के पास भेज देते हैं। तब शिवजी ने कहा भगवान की माया बताना मुश्‍किल है। एक पक्षी ही एक पक्षी को समझा सकता है अत: तुम काक भिशुण्डी के पास जाओ। काक भुशुण्डी और गरुड़जी के बीच जो संवाद होता है वह अतुलनीय है।

 

दसवां संवाद

 

युधिष्ठिर-भीष्म संवाद :अंतिम वक्त में पितामह भीष्म ने युधिष्ठिर को समझाया धर्म का मर्म। क्या कहा भीष्म ने युधिष्ठिर से जब वे तीरों की शैया पर लेटे हुए थे?

 

भीष्म यद्यपि शरशय्या पर पड़े हुए थे फिर भी उन्होंने श्रीकृष्ण के कहने से युद्ध के बाद युधिष्ठिर का शोक दूर करने के लिए राजधर्म, मोक्षधर्म और आपद्धर्म आदि का मूल्यवान उपदेश बड़े विस्तार के साथ दिया। इस उपदेश को सुनने से युधिष्ठिर के मन से ग्लानि और पश्‍चाताप दूर हो जाता है। यह उपदेश महाभारत के भीष्मस्वर्गारोहण पर्व में मिलता है।

 

ग्यारहवां संवाद

 

धृतराष्ट्र-विदुर संवाद :महाभारत’ की कथा के महत्वपूर्ण पात्र विदुर को कौरव-वंश की गाथा में विशेष स्थान प्राप्त है। विदुर हस्तिनापुर राज्‍य के शीर्ष स्‍तंभों में से एक अत्‍यंत नीतिपूर्ण, न्यायोचित सलाह देने वाले माने गए है।

 

हिन्दू ग्रंथों में दिए जीवन-जगत के व्यवहार में राजा और प्रजा के दायित्वों की विधिवत नीति की व्याख्या करने वाले महापुरुषों में महात्मा विदुर सुविख्यात हैं। उनकी विदुर-नीति वास्तव में महाभारत युद्ध से पूर्व युद्ध के परिणाम के प्रति शंकित हस्तिनापुर के महाराज धृतराष्ट्र के साथ उनका संवाद है।

 

वास्तव में महर्षि वेदव्यास रचित ‘महाभारत’ का उद्योग पर्व ‘विदुर नीति’ के रूप में वर्णित है। महाभारत में एक और जहां महत्वपूर्ण कृष्ण अर्जुन संवाद, यक्ष युधिष्‍ठिर संवाद, धृतराष्ट्र संजय संवाद, भीष्म युद्धिष्ठिर संवाद है तो दूसरी और धृतराष्ट और विदूर का महत्वपूर्ण संवाद भी वर्णित है। प्रत्येक हिन्दू को महाभारत पढ़ना चाहिए। इस घर में भी रखना चाहिए। जो यह कहता है कि महाभारत घर में रखने से महाभारत होती है वह मूर्ख, अज्ञानी या धूर्त व्यक्ति हिन्दुओं को अपने धर्म से दूर रखना चाहता होगा।

 

बारहवां संवाद

 

आदि शंकराचार्य-मंडन मिश्र संवाद :आदि शंकराचार्य देशभर के साधु-संतों और विद्वानों से शास्त्रार्थ करते करते अंत में प्रसिद्ध विद्वान मंडन मिश्र के गांव पहुंचे थे। यहां उन्होंने 42 दिनों तक लगातार हुए शास्त्रार्थ किया जिसकी निर्णायक थीं मंडन मिश्र की पत्नी भारती।

 

आदि शंकराचार्य और मंडन मिश्र के बीच जो संवाद हुआ उस संवाद की बहुत चर्चा होती है। हालांकि आदि शंकराचार्य ने मंडन को पराजित कर तो दिया, पर उनकी पत्नी के एक सवाल का जवाब नहीं दे पाए और अपनी हार मान ली।

 

हालांकि उपरोक्त के अलावा भी और भी हैं लेकिन यहां कुछ प्रमुख ही प्रस्तुत किए गए हैं।

 

संवाद :यक्ष और युद्धिष्ठिर के बीच हुए संवाद को यक्ष प्रश्न कहा जाता है। यक्ष और युधिष्ठिर के बीच जो संवाद हुआ है उसे जानने के बाद आप जरूर हैरान रह जाएंगे। यह अध्यात्म, दर्शन और धर्म से जुड़े प्रश्न ही नहीं है, यह आपकी जिंदगी से जुड़े प्रश्न भी है। आप भी अपने जीवन में कुछ प्रश्नों के उत्तर ढूंढ ही रहे होंगे।

 

‘यक्ष’ ने किए थे युधिष्ठिर से ये प्रश्न,,,,भारतीय इतिहास ग्रंथ महाभारत में ‘यक्ष-युधिष्ठिर संवाद’ नाम से एक बहु चर्चित प्रकरण है। संवाद का विस्तृत वर्णन वनपर्व के अध्याय 312 एवं 313 में दिया गया है। यक्ष ने युद्धिष्ठिर से लगभग 124 सवाल किए थे। यक्ष ने सवालों की झड़ी लगाकर युधिष्ठिर की परीक्षा ली।

 

 अनेकों प्रकार के प्रश्न उनके सामने रखे और उत्तरों से संतुष्ट हुए। अंत में यक्ष ने चार प्रश्न युधिष्ठिर के समक्ष रखे जिनका उत्तर देने के बाद ही उन्होंने मृत पांडवों (अर्जुन, भीम, नकुल और सहदेव) को जिंदा कर दिया था। यह सवाल जीवन, संसार, सृष्टि, ईश्‍वर, प्रकृति, नीति, ज्ञान, धर्म, स्त्री, बुराई आदि अनेकों विषयों के संबंधित थे।

 

चौथा संवाद

 

लक्ष्मण और रावण संवाद :प्रभु श्रीराम के तीर से जब रावण मरणासन्न अवस्था में हो गया, तब श्रीराम ने लक्ष्मण से उसके पास जाकर शिक्षा लेने को कहा। श्रीराम की यह बात सुनकर लक्ष्मण चकित रह गए।

 

भगवान श्रीराम ने लक्ष्‍मण से कहा कि इस संसार में नीति, राजनीति और शक्ति का महान पंडित रावण अब विदा हो रहा है, तुम उसके पास जाओ और उससे जीवन की कुछ ऐसी शिक्षा ले लो जो और कोई नहीं दे सकता।

 

श्रीराम की बात मानकर लक्ष्मण मरणासन्न अवस्था में पड़े रावण के नजदीक सिर के पास जाकर खड़े हो गए, लेकिन रावण ने कुछ नहीं कहा। लक्ष्मण ने लौटकर प्रभु श्रीराम से कहा कि वे तो कुछ बोलते ही नहीं। तब श्रीराम ने कहा यदि किसी से ज्ञान प्राप्त करना है तो उसके चरणों के पास हाथ जोड़कर खड़े होना चाहिए, न कि सिर के पास। श्रीराम ने लक्ष्मण से कहा, जाओ और रावण के चरणों के पास बैठो। यह बात सुनकर लक्ष्मण इस बार रावण के चरणों में जाकर बैठ गए। रावण ने लक्ष्मण को जो सीख दी उसे सभी जानते हैं।

 

पांचवां संवाद

 

अंगद और रावण के बीच संवाद :गोस्वामी तुलसीदास कृत महाकाव्य श्रीरामचरितमानस के लंकाकांड में बालि पुत्र अंगद रावण की सभा में रावण को सीख देते हुए बताते हैं कि कौन-से ऐसे 14 दुर्गुण है जिसके होने से मनुष्य मृतक के समान माना जाता है।

 

अंगद-रावण के बीच जो संवाद हुआ था वह बहुत ही रोचक था उसे पढ़ने और उसकी व्याख्या जानेने से व्यक्ति को अपने जीवन की स्थिति के बारे में बहुत कुछ ज्ञान हो जाता है।

 

छठा संवाद

 

यमराज-नचिकेता संवाद :वाजश्रवसपुत्र नचिकेता और मृत्यु के देवता यमराज के बीच जो संवाद होता है वह विश्‍व का प्रथम दार्शनिक संवाद माना जा सकता है। वाजश्रवस अपने पुत्र को क्रोधवा यमराज को दान कर देते हैं। नचिकेता तब यमलोक पहुंच जाते हैं।

 

यमलोक में उसे वक्त यमदूत नचिकेता से कहते हैं कि यमराज इस वक्त नहीं है। तब नचिकेता तीन दिन तक यमराज की प्रतिक्षा करते हैं। यमपुरी के द्वार पर बैठा नचिकेता बीती बातें सोच रहा था। उसे इस बात का संतोष था कि वह पिता की आज्ञा का पालन कर रहा था। लगातार तीन दिन तक वह यमपुरी के बाहर बैठा यमराज की प्रतीक्षा करता रहा। तीसरे दिन जब यमराज आए तो वे नचिकेता को देखकर चौंके।

 

जब उन्हें उसके बारे में मालूम हुआ तो वे भी आश्चर्यचकित रह गए। अंत में उन्होंने नचिकेता को अपने कक्ष में बुला भेजा। यमराज के कक्ष में पहुंचते ही नचिकेता ने उन्हें प्रणाम किया। उस समय उसके चेहरे पर अपूर्व तेज था। उसे देखकर यमराज बोले- ‘वत्स, मैं तुम्हारी पितृभक्ति और दृढ़ निश्चय से बहुत प्रसन्न हुआ। तुम मुझसे कोई भी तीन वरदान मांग सकते हो।’

 

 सातवां संवाद

 

शिव-पार्वती संवाद :रामायण या रामचरित के बालकांड में शिव-पार्वती संवाद का वर्णन मिलता है। ‘गायत्री-मंजरी’ में भी ‘शिव-पार्वती संवाद’ आता है। हम इस संवाद की बात नहीं कर रहे हैं। भारत के कश्मीर राज्य में अमरनाथ नामक गुफा है जहां जून माह में बाबा अमरनाथ के दर्शन करने के लिए हजारों हिन्दू जाते हैं। दरअसल, यह गुफा शिव और पार्वती संवाद की साक्षी है। यहां भगवान शिव ने माता पार्वती को ‘रहस्यमयी ज्ञान’ की शिक्षा दी थी। इस ज्ञान को विज्ञान भैरव तंत्र में संग्रहित किया गया है।

 

शिव ने अपनी अर्धांगिनी पार्वती को मोक्ष हेतु अमरनाथ की गुफा में जो ज्ञान दिया, उस ज्ञान की आज अनेकानेक शाखाएं हो चली हैं। वह ज्ञानयोग और तंत्र के मूल सूत्रों में शामिल है। ‘विज्ञान भैरव तंत्र’ एक ऐसा ग्रंथ है जिसमें भगवान शिव द्वारा पार्वती को बताए गए 112 ध्यान सूत्रों का संकलन है।

 

अमरनाथ के अमृत वचन :शिव द्वारा मां पार्वती को जो ज्ञान दिया गया, वह बहुत ही गूढ़-गंभीर तथा रहस्य से भरा ज्ञान था। उस ज्ञान की आज अनेकानेक शाखाएं हो चली हैं। वह ज्ञानयोग और तंत्र के मूल सूत्रों में शामिल है। ‘विज्ञान भैरव तंत्र’ एक ऐसा ग्रंथ है जिसमें भगवान शिव द्वारा पार्वती को बताए गए 112 ध्यान सूत्रों का संकलन है।

 

योगशास्त्र के प्रवर्तक भगवान शिव के ‘‍विज्ञान भैरव तंत्र’ और ‘शिव संहिता’ में उनकी संपूर्ण शिक्षा और दीक्षा समाई हुई है। तंत्र के अनेक ग्रंथों में उनकी शिक्षा का विस्तार हुआ है। भगवान शिव के योग को तंत्र या वामयोग कहते हैं। इसी की एक शाखा हठयोग की है। भगवान शिव कहते हैं- ‘वामो मार्ग: परमगहनो योगितामप्यगम्य:’ अर्थात वाम मार्ग अत्यंत गहन है और योगियों के लिए भी अगम्य है। मेरुतंत्र

 

आठवां संवाद-

 

याज्ञवल्क्यजी-गार्गी संवाद :वृहदारण्यक उपनिषद् में दोनों के बीच हुए संवाद का उल्लेख मिलता है। राजा जनक अपने राज्य में शास्त्रार्थ का आयोजन करते रहते थे। जो भी शास्त्रार्थ में जीत जाता था वह सोने से लदी गाएं ले जाता था। एक बार के आयोजन में याज्ञवल्क्यजी को भी निमंत्रण मिला था। तब याज्ञवल्क्यजी ने शास्त्रार्थ से पहले ही अपने एक शिष्य से कहा बेटा! इन गौओं को अपने यहां हांक ले चलो।

 

ऐसे में सभी ऋषि क्रुद्ध होकर उनसे शास्त्रार्थ करने लगे। याज्ञवल्क्यजी ने सबके प्रश्नों का यथाविधि उत्तर दिया और सभी को संतुष्ट कर दिया। उस सभा में ब्रह्मवादिनी गार्गी भी बुलायी गयी थी। सबके पश्चात् याज्ञवल्क्यजी से शास्त्रार्थ करने वे उठी। दोनों के बीच जो शास्त्रार्थ हुआ। गार्गी ने याज्ञवल्क्यजी से कई प्रश्न किए। अंत में याज्ञवल्क्य ने कहा- गार्गी! अब इससे आगे मत पूछो।

 

 इसके बाद महर्षि याज्ञवक्ल्यजी ने यथार्थ सुख वेदान्ततत्त्‍‌व समझाया, जिसे सुनकर गार्गी परम सन्तुष्ट हुई और सब ऋषियों से बोली-भगवन्! याज्ञवल्क्य यथार्थ में सच्चे ब्रह्मज्ञानी हैं। गौएं ले जाने का जो उन्होंने साहस किया वह उचित ही था।

 

 नौवां संवाद

 

काक भुशुण्डी-गरुड़जी संवाद :काक भुशुण्‍डी ने पक्षीराज गरुड़जी को राम की कथा पहले ही सुना दी थी। इसका वर्णन हमें रामायण और रामचरित मानस में मिलता है। शिवजी माता पार्वती से कहते हैं कि इससे पहले यह सुंदर कथा काक भुशुण्डी ने गरुड़जी से कही थी।

 

रामचरित मानस में काकभुशुण्डी ने अपने जन्म की पूर्वकथा और कलि महिमा का वर्णन किया है। इसका उल्लेख रामचरित मानस में मिलता है।

 

नारदजी की आज्ञा से जब भगवान राम को नागपाश से छुड़ाकर गरुड़जी पुन: अपने धाम लौट रहे होते हैं तब उनके मन में शंका उत्पन्न होती है कि यह कैसे भगवान जो एक तुच्छ राक्षस द्वारा फेंके गए नागपाश से ही बंध गए? इस शंका समाधान के लिए वे नारद से पूछते हैं। नारदजी उन्हें ब्रह्मा के पास भेज देते हैं। ब्रह्माजी उन्हें शिवजी के पास भेज देते हैं। तब शिवजी ने कहा भगवान की माया बताना मुश्‍किल है। एक पक्षी ही एक पक्षी को समझा सकता है अत: तुम काक भिशुण्डी के पास जाओ। काक भुशुण्डी और गरुड़जी के बीच जो संवाद होता है वह अतुलनीय है।

 

दसवां संवाद

 

युधिष्ठिर-भीष्म संवाद :अंतिम वक्त में पितामह भीष्म ने युधिष्ठिर को समझाया धर्म का मर्म। क्या कहा भीष्म ने युधिष्ठिर से जब वे तीरों की शैया पर लेटे हुए थे?

 

भीष्म यद्यपि शरशय्या पर पड़े हुए थे फिर भी उन्होंने श्रीकृष्ण के कहने से युद्ध के बाद युधिष्ठिर का शोक दूर करने के लिए राजधर्म, मोक्षधर्म और आपद्धर्म आदि का मूल्यवान उपदेश बड़े विस्तार के साथ दिया। इस उपदेश को सुनने से युधिष्ठिर के मन से ग्लानि और पश्‍चाताप दूर हो जाता है। यह उपदेश महाभारत के भीष्मस्वर्गारोहण पर्व में मिलता है।

 

ग्यारहवां संवाद

 

धृतराष्ट्र-विदुर संवाद :महाभारत’ की कथा के महत्वपूर्ण पात्र विदुर को कौरव-वंश की गाथा में विशेष स्थान प्राप्त है। विदुर हस्तिनापुर राज्‍य के शीर्ष स्‍तंभों में से एक अत्‍यंत नीतिपूर्ण, न्यायोचित सलाह देने वाले माने गए है।

 

हिन्दू ग्रंथों में दिए जीवन-जगत के व्यवहार में राजा और प्रजा के दायित्वों की विधिवत नीति की व्याख्या करने वाले महापुरुषों में महात्मा विदुर सुविख्यात हैं। उनकी विदुर-नीति वास्तव में महाभारत युद्ध से पूर्व युद्ध के परिणाम के प्रति शंकित हस्तिनापुर के महाराज धृतराष्ट्र के साथ उनका संवाद है।

 

वास्तव में महर्षि वेदव्यास रचित ‘महाभारत’ का उद्योग पर्व ‘विदुर नीति’ के रूप में वर्णित है। महाभारत में एक और जहां महत्वपूर्ण कृष्ण अर्जुन संवाद, यक्ष युधिष्‍ठिर संवाद, धृतराष्ट्र संजय संवाद, भीष्म युद्धिष्ठिर संवाद है तो दूसरी और धृतराष्ट और विदूर का महत्वपूर्ण संवाद भी वर्णित है। प्रत्येक हिन्दू को महाभारत पढ़ना चाहिए। इस घर में भी रखना चाहिए। जो यह कहता है कि महाभारत घर में रखने से महाभारत होती है वह मूर्ख, अज्ञानी या धूर्त व्यक्ति हिन्दुओं को अपने धर्म से दूर रखना चाहता होगा।

 

बारहवां संवाद

 

आदि शंकराचार्य-मंडन मिश्र संवाद :आदि शंकराचार्य देशभर के साधु-संतों और विद्वानों से शास्त्रार्थ करते करते अंत में प्रसिद्ध विद्वान मंडन मिश्र के गांव पहुंचे थे। यहां उन्होंने 42 दिनों तक लगातार हुए शास्त्रार्थ किया जिसकी निर्णायक थीं मंडन मिश्र की पत्नी भारती।

 

आदि शंकराचार्य और मंडन मिश्र के बीच जो संवाद हुआ उस संवाद की बहुत चर्चा होती है। हालांकि आदि शंकराचार्य ने मंडन को पराजित कर तो दिया, पर उनकी पत्नी के एक सवाल का जवाब नहीं दे पाए और अपनी हार मान ली।

 

हालांकि उपरोक्त के अलावा भी और भी हैं लेकिन यहां कुछ प्रमुख ही प्रस्तुत किए गए हैं।

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