
आज रविवार है। भारतीय सैनिकों के शौर्य को नमन करने का हमारा दिन।
‘Once a soldier is always a soldier’ — यह कहावत प्रचलित है।
एक बार जब देशप्रेम रक्त में घुल जाता है, तो देशरक्षा के सिवा और कुछ सूझता ही नहीं। इसके लिए वे किसी भी कठिन परीक्षा का सामना करने को सदैव तैयार रहते हैं, चाहे परिस्थितियाँ कैसी भी हों।
आज की यह शौर्यगाथा पढ़कर इसकी अनुभूति अवश्य होगी और हमारे सैनिकों के प्रति गर्व का भाव मन में उमड़ आएगा।
लेकिन आजकल के कुछ राजनीतिक नेता सैनिकों के प्रति कैसी भावनाएँ रखते हैं, यह हम समाचारों में देख ही रहे हैं। जिनका रणभूमि से दूर-दूर तक कोई संबंध नहीं रहा, वे वातानुकूलित कमरों में बैठकर जीवन का आनंद लेते हुए सैनिकों पर अपने अपरिपक्व विचार थोपते हैं। इससे भी अधिक दुःखद यह है कि कुछ व्यक्ति या विचारधाराएँ ऐसे लोगों का विरोध करने के बजाय उनका समर्थन करती हैं। यह देखकर सचमुच दया आती है।
परंतु “तुझे आहे तुजपाशी…” (जो तेरा है वह तेरे पास ही रहेगा) कहकर छोड़ देना ही शायद हमारे हाथ में है। खैर।
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दिसंबर, 1971।
कई महीनों से “होगा-होगा” कहकर चर्चित भारत–पाक युद्ध का बिगुल आखिरकार बज उठा।
1968 में सेना में भर्ती होने के बाद उन्हें जो रेजिमेंट मिली, वह थी द डेक्कन हॉर्स। उनकी पिछली दो-तीन पीढ़ियाँ भी इसी रेजिमेंट से लड़ी थीं। इस बार भी यह रेजिमेंट युद्धक्षेत्र के बिल्कुल समीप तैनात थी।
नव-नियुक्त अधिकारियों की भुजाएँ फड़क रही थीं। युद्ध में शौर्य दिखाने का उत्साह था!
लेकिन इस युवा सैन्य अधिकारी के इस आनंद पर मानो थोड़ा पानी फिर गया।
नवंबर का महीना था। उन्हें महाराष्ट्र के अहिल्यानगर (पूर्व में अहमदनगर) में स्थापित होने वाले एक सैन्य केंद्र की ड्यूटी पर भेजा गया।
मेजर आर.डी. लॉ वहाँ प्रमुख थे और उनके साथ सेकंड-इन-कमांड के रूप में कैप्टन ए.के. भाटिया थे।
हमारे कथानायक को यहाँ लेफ्टिनेंट के रूप में जिम्मेदारी सौंपी गई।
कुछ दिनों के टैंक विशेष प्रशिक्षण के बाद, 13 नवंबर 1971 को राजस्थान सीमा पर जाने के आदेश मिलते ही हमारे नायक अत्यंत प्रसन्न हो गए।
भव्य विदाई समारोह हुआ। “Charge of the Light Brigade” सैन्य गीत बजाया जा रहा था, जिससे वातावरण रोमांच से भर गया था।
युद्ध पर जाने का आनंद तो था, लेकिन विदा करने के लिए घर का कोई सदस्य वहाँ नहीं था—इसका थोड़ा दुःख भी था।
हालाँकि, एक अन्य युवा अधिकारी किशोर बडबडे साहब के परिवारजन विशेष रूप से पुणे से अहमदनगर आए थे। दुर्भाग्यवश, यह उनकी आखिरी मुलाकात सिद्ध हुई।
पाँचवें दिन यह टैंक रेजिमेंट जोधपुर–पोखरण पहुँची और तय हुआ कि उन्हें जैसलमेर के लोंगेवाला में युद्ध में भाग लेने भेजा जाएगा।
तब तक युद्ध अभ्यास ज़ोरों पर था। टैंकों को पूरी तरह तैयार किया जा रहा था। अब बस आदेश का इंतज़ार था।
लेकिन हमारे कथानायक के इस युद्ध-संकल्प में एक बड़ी बाधा आ गई।
पेट की गंभीर बीमारी ने अचानक भयानक रूप ले लिया।
चिकित्सकीय जाँच के बाद उन्हें जोधपुर के सैन्य अस्पताल में भर्ती करना पड़ा।
यह बात इस वीर को बिल्कुल स्वीकार नहीं थी, लेकिन वरिष्ठ अधिकारियों ने सख़्त मना कर दिया।
अनिच्छा से उन्होंने आदेश माना और इलाज के लिए अस्पताल में भर्ती हो गए।
पर पूरा ध्यान युद्धभूमि पर ही था।
इसी बीच समाचार आया—पाकिस्तानी टैंक भारतीय सीमा में घुस आए हैं!
लोंगेवाला के पास ज़ोरदार संघर्ष चल रहा है…
“हमारे लोग युद्ध में हैं और मैं यहाँ अस्पताल में!”
यह बात उन्हें बिल्कुल स्वीकार नहीं थी।
उन्होंने मन ही मन निश्चय किया—
अस्पताल के सभी लोगों की नज़र बचाकर मरीज का वस्त्र उतारा,
सैन्य वर्दी पहनी,
और बिना किसी को बताए अस्पताल से निकल पड़े!
मरीज के गायब होते ही हड़कंप मच गया।
यह समझ लिया गया कि संबंधित सैन्य अधिकारी युद्ध के समय सेना छोड़कर भाग गया है।
वैसी रिपोर्ट भी तैयार हो गई!
यह बहुत बड़ा अपराध था।
6 दिसंबर 1971।
उन्होंने जोधपुर से बाहर जाने वाली सड़क पकड़ी।
एक तिपहिया वाहन मिला।
फिर बस, और आगे जाकर जैसलमेर जाने वाली ट्रेन पकड़ी।
दोपहर तक वे जैसलमेर पहुँच गए।
रेलवे स्टेशन पर तैनात सैन्य अधिकारी ने उन्हें एक आर्मी ट्रक में बैठाया, जो सीधे लोंगेवाला पोस्ट पहुँचा।
वहाँ भीषण युद्ध हो चुका था।
कई सैन्य वाहन और टैंक जले हुए पड़े थे।
एक पाकिस्तानी टैंक अभी भी जल रहा था…
जब वे उस टैंक के पास खड़े थे, तभी कैप्टन अर्जुन सिंह ने उन्हें देखा।
वे आश्चर्यचकित रह गए।
पूरी कहानी सुनने के बाद उन्होंने पूछा—
“तुम्हारी यूनिट कहाँ है?”
इस पर उनके पास कोई उत्तर नहीं था। युद्ध की अफरातफरी में संपर्क साधना कठिन था।
जी.एस. बावा साहब ने उन्हें जैसलमेर के रेगिस्तान में स्थित एक जल-भराव स्थान तक जाने वाले ट्रक में कैप्टन ए.एस. क्लेयर के साथ बैठा दिया।
इस ट्रक में एक बंदी पाकिस्तानी सैनिक भी था।
वे सीमा के अग्रिम क्षेत्र में तैनात 12 इन्फैंट्री डिवीजन के मुख्यालय पहुँचे।
वहाँ मेजर जनरल आर.के. खंबाटा और ब्रिगेडियर ई.एन. रामदास थे।
अस्पताल से भागकर युद्ध में पहुँचे इस अधिकारी के साहस की उन्होंने सराहना की।
उन्हें आगे बढ़ रही गोरखा राइफल्स के साथ जाने की व्यवस्था की गई।
यहाँ तक कि पकड़े गए एक पाकिस्तानी टैंक को चलाने का अवसर भी मिला!
निर्धारित स्थान पर पहुँचने के बाद, गोरखा राइफल्स के वरिष्ठ अधिकारी ने उनके साथ दो जवान दिए और उनके स्क्वाड्रन को खोजने भेजा।
शाम हो चुकी थी।
जैसे ही वे तीनों एक गन पोज़िशन पर पहुँचे, सतर्क पहरेदार ने उन्हें हिरासत में ले लिया।
लेकिन पहचान पत्र होने के कारण वे बच गए।
वहाँ ड्यूटी पर मौजूद कैप्टन एच.सी. हुडा ने उन्हें पहचान लिया—वे उनके परिवार को जानते थे।
रात वहीं ठहरे, सुबह नाश्ते के बाद आगे जाने की अनुमति मिली।
कुछ ही समय में उन्हें अपने स्क्वाड्रन के पाँच वाहन दिखाई दिए।
अत्यंत आनंद हुआ!
मानो बिछड़ा हुआ बछड़ा फिर से झुंड में लौट आया हो।
उन्होंने एक टैंक संभाला और आगे बढ़े।
इसी दौरान पाकिस्तानी विमानों ने उनके काफिले पर हमला कर दिया।
हमले को सफलतापूर्वक नाकाम कर दिया गया!
मेजर लॉ वायरलेस पर संदेश भेज रहे थे, तभी इन्हीं साहब ने “रेडी” कहकर उत्तर दिया।
आवाज़ सुनते ही मेजर लॉ चौंक गए—
“यह तो अस्पताल में भर्ती था… यहाँ कैसे पहुँचा?”
मेजर लॉ ने कहा—
“इतना बड़ा हमला निपटाने के बाद मुझसे मिलो!”
हमला पूरी तरह सफल रहा।
कार्रवाई उत्कृष्ट थी।
मेजर लॉ के सामने उन्होंने पूरी घटना बताई।
मिलिट्री हॉस्पिटल से संपर्क किया गया और लेफ्टिनेंट वेद प्रकाश दहिया पर लगाया गया “सेना से पलायन” का आरोप वापस लेने की व्यवस्था की गई।
अस्पताल से डिस्चार्ज प्रमाणपत्र बनवाया गया—
लिखा गया कि मरीज ठीक होकर युद्ध में शामिल हो गया है!
इसके बाद दहिया साहब ने कई दिनों तक चली सभी सैन्य कार्रवाइयों में अग्रिम पंक्ति में रहकर वीरता से भाग लिया।
टैंकों के साथ वे पाकिस्तानी क्षेत्र में 54 किलोमीटर अंदर तक घुस गए।
इसी दौरान कुमाऊँ बटालियन में तैनात अपने सगे भाई—कैप्टन वाई.ई.एस. दहिया से उनकी मुलाकात हुई।
दोनों भाइयों ने मिलकर पाकिस्तानी सेना पर हमले के अभियानों में हिस्सा लिया।
कैप्टन वाई.ई.एस. दहिया को “Mention-in-Dispatch” से सम्मानित किया गया।
जोधपुर के अस्पताल से भागकर सीधे युद्धभूमि में पहुँचकर भारत माता की रक्षा के लिए प्राणों की बाज़ी लगाने वाले दहिया साहब की यह कहानी अत्यंत रोमांचक और प्रेरणादायक है।
ऐसे ही बहादुर सैनिकों के कारण हमारा देश सुरक्षित हाथों में है।
जय हिंद।