
कुछ खाश मित्रों के आग्रह पर यह संकलन —
“विवाह मुहुर्त के निर्धारण में गुण दोष का विचार और निराकरण” इस विषय पर प्रस्तुत कर रहा हूँ ! आशा करता हूँ इससे आप सबकी जिज्ञासा का समाधान हो जायेगा !
“विवाह संस्कार मानव जीवन का एक प्रमुख और सर्वाधिक महत्वपूर्ण संस्कार है ! यह संस्कार शास्त्रों के द्वारा प्रतिपादित सिद्धांतों का पालन करते हुए विधि विधानपूर्वक शुभ अयन, शुभ माह, शुभ तिथि, शुभ दिन, शुभ योग शुभ करण, शुभ नक्षत्र एवं शुभ मुहूर्त में सम्पन्न करना चाहिए !”
“ज्योतिष शास्त्र के अनुसार वर और कन्या की जन्म कुण्डलियां मिलाकर किए जाने वाले विवाह के मुहूर्त में प्रमुख दोषों का विवेचन यहाँ प्रस्तुत किया जा रहा है !”
*सामान्य रूप से सभी शुभ कार्यों में यह 21 प्रमुख दोष वर्जित श्रेणी के होते हैं* :—
1 – पंचांग शुद्धि के अभाव से दोष !
2 – सूर्योदय-सूर्यास्त अपने स्थान के अक्षांश देशांतर का न लेने पर अशुद्ध समय का दोष !
3 – गुरु, शुक्रास्त होने पर महान दोष !
4 – देश धर्म के रीति रिवाज को छोड़कर आधुनिकता में दूसरे समाज की नकल व फिल्मी प्रथा अपनाने का दोष !
5 – संक्रांति परिवर्तन दिन का दोष !
6 – पाप षडवर्ग में लग्न होने का दोष !
7 – विवाह लग्न से छठे शुक्र व अष्टम में मंगल होने पर दोष !
8 – त्रिविध गणांत दोष !
9 – लग्न कारी योग !
10 – विसंगत चंद्रमा होने का दोष !
11 – वर-वधू की राशि से विवाह लग्न अष्टम होने पर दोष !
12 – विषघटी दोष !
13 – दुर्मुहूर्त दोष !
14 – पाप ग्रह वार दोष !
15 – लत्तादि दोष !
16 – ग्रहण नक्षत्र होने पर दोष !
17 – उल्पात नक्षत्र होने पर दोष !
18 – पाप विद्ध नक्षत्र का दोष !
19 – पापयुक्त नक्षत्र दोष !
20 – पाप नवमांश दोष, एवं
21 – क्रांतिसाम्य दोष (महापाप) !
*सूर्य_राशि* :-
विवाह मास सूर्य संक्रमण की मेष, वृष, मिथुन, वृश्चिक, मकर, कुंभ राशियों के चन्द्र मासों में विवाह उत्तमोत्तम होता है !( दिये गये मास चन्द्रमास नहीं हैं !)
*वर्जित_मास* :-
बरसात के चार मास जब सूर्य दक्षिणायण रहते हैं, और देवतागण शयन कर रहे होते हैं !इस प्रकार श्रावण, भाद्रपद, आश्विन एवं कार्तिक चन्द्र मास विवाह के लिए उत्तम नहीं होते हैं !
*अशुभ_तिथियाँ* :-
विवाह के लिएं द्वितीया, तृतीया, पंचमी, सप्तमी, दशमी, एकादशी एवं त्रयोदशी तिथियां उत्तमोत्तम होती हैं ! (कृष्णपक्ष) प्रतिपदा, षष्ठी, नवमी, द्वादशी एवं पूर्णिमा तिथियां विवाह के लिए मध्यम होती हैं ! शेष तिथियाँ चतुर्थी, अष्टमी, एकादशी, चतुर्दशी व अमावस्या विवाह हेतु शुभ नहीं होती हैं !
*वार* :-
विवाह के लिए अतिशुभ वार – सोमवार, बुधवार, गुरुवार एवं शुक्रवार विवाह के लिए उत्तमोत्तम हैं ! रविवार विवाह के लिए सामान्य होता हैं ! मंगलवार एवं शनिवार क्रूर ग्रहों के दिन होने की कारण अशुभ व त्याज्य होता है !
*शुभ_नक्षत्र* :—
विवाह नक्षत्र रोहिणी, मृगशिरा, मघा, उत्तराफाल्गुनी, हस्त, स्वाती, अनुराधा, मूल, उत्तराषाढ़ा, उत्तराभाद्रपद एवं रेवती नक्षत्र विवाह के लिए उत्तमोत्तम हैं ! अश्विनी, चित्रा, श्रवण एवं धनिष्ठा नक्षत्र विवाह के लिए मध्यम हैं, केवल अपरिहार्य स्थिति में ही इन तिथियोंं में विवाह करना चाहिए !
भरणी, कृतिका, स्वाती, शतभिषा, आर्द्रा, पुनर्वसु, पुष्य, आश्लेषा, पूर्वाफाल्गुनी, पूर्वाषाढ़ा, पूर्वाभाद्रपद, ज्येष्ठा यह बारह नक्षत्र सर्वथा वर्जित श्रेणी अाते हैंं अतः यह त्याज्य हैं !
*योग* :-
#विवाह_के_शुभ_योग — प्रीति, आयुष्मान, सौभाग्य, शोभन, सुकर्मा, धृति, वृद्धि, ध्रुव, सिद्धि, वरीयान, शिव, सिद्ध, साध्य, शुभ, शुक्ल एवं ब्रह्म योग विवाह के लिए शुभ प्रशस्त हैं !
वहीं विष्कुम्भ, अतिगंड, शूल, गंड, व्याघात, वज्र, व्यतिपात, परिघ, वैधृति यह 9 नक्षत्रे अशुभ योग विवाह के दिन हों एवं सूर्य नक्षत्र से विवाह नक्षत्र विषम हो तो एकार्गल दोष होता है अतः उसको त्याग देना चाहिए !
*करण* :-
विवाह के लिए शुभ करण — बव, बालव, कौलव, तैतिल, गर और वणिज विवाह के लिए शुभ प्रशस्त हैं ! शकुनि, चतुष्पद, नाग एवं किंस्तुघ्न करण अन्य प्रकार के कोई दोष न होने पर ही विवाह के लिए सामान्य हैं अन्यथा नहीं ! विष्टि करण विवाह के लिए अनिष्टकारी है और सर्वथा त्याज्य है !
*अस्त_ग्रह* :-
गुरु-शुक्र अस्त विचार — गुरु और शुक्र ग्रह यदि अस्त चल रहे हों, तब उसे तारा डूबना कहते हैं ! इसलिए गुरु-शुक्र का अस्त काल विवाह मुहूर्त के लिए कतई उपयुक्त नहीं है, अन्य किसी प्रकार की शुभता व मुहूर्त होते हुए भी गुरु-शुक्र में से किसी के भी अस्त होने पर विवाह सम्पन्न हीं किया जा सकता है, अतः वह पूरी अवधि त्याज्य है !
*देवशयन* :-
देव शयन विचार जब सूर्य उत्तरायण होता है, उस काल को देवताओं का दिन माना जाता है और देवताओं के जागृत होने का समय होता है ! सूर्य के दक्षिणायण होने का समय देव शयन काल कहलाता है और विवाह के लिए त्याज्य होता है !
*सूर्य_उत्तरायण* :-
सूर्य उत्तरायण काल देवताओं का दिन माना जाता है ! मकर संक्रान्ति के प्रारम्भ होते ही सूर्य उत्तरायण हो जाते हैं और विवाह आदि सभी शुभ कार्य प्रारम्भ हो जाते हैं ! गुरु की दोनो राशियों धनु और मीन में सूर्य के संक्रमण का समय खरमास कहलाता है और किसी भी शुभ कार्य हेतु त्याज्य होता है !
*सूर्य_दक्षिणायण* :-
सूर्य दक्षिणायण काल देवताओं की रात्रि मानी जाती है ! यही काल देवताओं का शयन काल कहलाता है ! देव शयन काल विशेषतया हरि शयन काल में विवाह मुहूर्त त्याज्य होता है !
*विवाह लग्न के मुख्य 10 दोष*:-
*विवाह में विशेषतया लत्ता पातादि दोष* :—
विवाह लग्न में मुख्य रूप से 10 दोष वर्जित हैं, जो इस प्रकार हैं —
*“लत्ता, पात, युति, वेध, जामित्र, बाणपंचक, एकार्गल, उपग्रह, क्रांतिसाम्य व दग्धा !”*
इनमें वेध व क्रांतिसाम्य अति गंभीर दोष हैं, अतः विवाह लग्न में किसी भी दशा में इनका त्याग अवश्य करना चाहिए !
*1 -लत्ता_दोष :
लत्ता दोष एक गम्भीर दोष है जिसका सर्वथा त्याग करना चाहिए ! इसकी दो स्थितियां होती हैं !
. विवाह का दिन निर्धारण करते समय लत्तादोष का ध्यान रखा जाना आवश्यक होता है ! लत्तादोष का निर्धारण नक्षत्र एवं ग्रहों की स्थिति से होता है ! जैसा कि लत्ता नाम से स्पष्ट है, इसका आशय ग्रहों की लात से होता है !
1 – सूर्य जिस नक्षत्र पर होता है उससे आगे के बारहवें नक्षत्र पर, मंगल तीसरे पर, शनि आठवें पर एवं गुरु छठवें नक्षत्र पर लात मारता है ! अतः वह नक्षत्र लत्ता दोष से पीड़ित होते हैं !
2 – ठीक इसी प्रकार कुछ ग्रह अपने से पिछले नक्षत्र पर लात मारते हैं जैसे बुध सातवें नक्षत्र पर, राहु नौवें, चन्द्र बाईसवें, शुक्र पांच नक्षत्र पर पिछलत्ती मारता है !
राहु वक्री होने के कारण इसकी गणना अगले नक्षत्र को मानकर ही की जाती है ! लत्तादोष में विवाह के नक्षत्र से गणना कर नक्षत्रों में स्थित ग्रहों का विवेचन कर उनकी लत्ता का निर्धारण किया जाता है ! वैसे तो सभी ग्रहों की लत्ता को अशुभ माना जाता है किन्तु कुछ विद्वान केवल पाप व क्रूर ग्रहों की लत्ता को ही त्याज़्य मानते हैं ! अत: विवाह का मुहूर्त निकालते समय लत्तादोष का विवेचन अवश्य करना चाहिए !
*2 – पात_दोष :–
पात का अर्थ है गिरना या अंत होना ! सूर्य जिस नक्षत्र में हो उसी नक्षत्र में यदि फेरों का समय आ जाए तो पात दोष होता है ! मघा, आश्लेषा, चित्रा, अनुराधा, रेवती और श्रवण यह 6 पातकी नक्षत्र हैं ! यह सभी सूर्य के संयोग से पतित हो जाते हैं ! इसके अतिरिक्त साध्य, हर्षण, शूल, वैधृत, व्यतिपात व गंड इन योगों का अंत यदि विवाह के दिन के नक्षत्र में हो रहा हो, तब पात दोष होता है ! इसे चण्डायुध दोष भी कहते हैं ! यह प्रायः सभी शुभ कार्यों में वर्जित होता है अतः इनका ध्यान रखना व लग्न की गणना के समय ऐसी स्थिति होने पर त्याज्य कर देने में ही भलाई होती है !
*3 -युति_दोष:—
विवाह नक्षत्र में पाप ग्रह का विचरण या युति हो, तब युति दोष होता है ! सूर्य, मंगल, शनि, राहु और केतु पाप ग्रह हैं ! यदि चंद्र षडवर्ग में श्रेष्ठ, उच्च, स्वक्षेत्री या मित्र हो, तब युति दोष का परिहार हो जाता है ! शुभ ग्रहों में बुध और गुरु यदि चंद्र के नक्षत्र में हों और मित्र राशि में हों, तो भी युति दोष नहीं माना जाता ! शुक्र की युति को शुभ माना गया है, इसका दोष नहीं लगता है !
*4 – वेध_दोष :—
विवाह नक्षत्र का जिस नक्षत्र में वेध हो, उसमें कोई क्रूर या पाप ग्रह चल रहा हो, तो वेध दोष होता है ओर उसके 12 वें नक्षत्र को सूर्य, तीसरे को मंगल, छठे को बृहस्पति और आठवें को शनि लात मारता है !
दूसरी स्थिति में बायीं ओर के सातवें नक्षत्र को बुध, नौवें को राहु, पांचवें को शुक्र और 22 वें को पूर्ण चंद्र लात मारता है ! इसका फल इस प्रकार है ! पंचशलाका चक्र में एक रेखा पर पड़ने वाले निम्न नक्षत्रों में ग्रह होने से नक्षत्रों का परस्पर वेध हो जाता है :-
अतः इन जोड़ियों मेंं से किसी एक में ग्रह के होने पर दूसरा वेधग्रस्त हो जाता है !
यदि विवाह नक्षत्र में शुभ ग्रह का वेध हो तब ‘पादवेध’ अथवा चरणवेध ही होता है ! पादवेध में पूरा नक्षत्र दूषित नहीं होता, सिर्फ वह एक चरण ही दूषित होता है ! यदि नक्षत्र के चतुर्थ चरण पर ग्रह हो, तो सामने वाले नक्षत्र के प्रथम चरण पर वेध होगा ! यदि ग्रह द्वितीय चरण पर हो, तो सामने वाले नक्षत्र के तृतीय चरण पर वेध होगा !
विवाह मुहूर्त में पादवेध के काल का ही त्याग करना चाहिए, संपूर्ण नक्षत्र का नहीं ! पापग्रहों द्वारा भोगकर छोड़े हुए नक्षत्र को यदि चंद्र भोग ले, तद नक्षत्र शुद्ध होकर वेध दोष दूर हो जाता है ! वेध दोष होने पर यह बुरे परिणाम देखने को मिलते हैं :—
*‘रवि वेधे च वैधव्यं, पुत्रशोको भवेत कुजे !’
शनि वेधे मृत संततिः, राहु वेधे व्यभिचारणी !!”
अर्थात सूर्य के वेध में विवाह करने से कन्या विधवा हो जाती है और मंगल वेध में विवाह करने से पुत्रशोक होता है ! शनि के वेध में विवाह करने से मृतसंतान उत्पन्न होती है तथा राहु के वेध होने से स्त्री व्यभिचारिणी हो जाती है ! अतः लग्न में इसका परित्याग अवश्य ही करना चाहिए !
*5 – यामित्र_दोष :—
विवाह नक्षत्र से 14 वें नक्षत्र पर कोई ग्रह हो, तो यामित्र या जामित्र दोष लगता है ! जामित्र अर्थात सप्तम स्थान !
यदि विवाह के समय चंद्र या लग्न से सप्तम भाव में कोई ग्रह हो, तब भी यह दोष होता है ! अतः सप्तम स्थान की शुद्धि आवश्यक होती है !
पूर्ण चंद्र, बुध, गुरु और शुक्र के होने पर जामित्र शुभ तथा पाप ग्रहों के होने पर अशुभ फलदायक होता है ! सप्तम अशुभ ग्रह व्याधि और वैधव्य का कारक होता है !
*6 – बाण_पंचक_दोष :—
संक्रांति के व्यतीत दिनों (लगभग 16 दिन) में 4 जोड़कर 9 का भाग देने पर शेष 5 रहे तो मृत्यु पंचक दोष होता है !
यदि गतांश में 6 जोड़कर 9 का भाग देने पर 5 शेष बचे, तब रोग पंचक, 3 जोड़कर 9 का भाग देने पर 5 शेष बचे, तब अग्नि पंचक, यदि 1 जोड़कर 9 का भाग देने पर 5 शेष बचे, तब राज पंचक और यदि 8 जोड़कर 9 का भाग देने पर 5 शेष बचे, तथ चोर पंचक दोष होता है ! यदि शेष 5 नहीं रहे, तो बाण दोष नहीं होगा ! यदि रविवार को रोग पंचक लगे तब सोमवार को राज पंचक, मंगल को अग्नि पंचक, शुक्र को चोर पंचक और शनि को मृत्यु पंचक होता है ! ये सभी दोष विवाह में वर्जित हैं ! रोग और चोर पंचक रात्रि में, राज और अग्नि पंचक दिन में और दोनों की संधि में मृत्यु पंचक वर्जित है ! मृत्यु पंचक को छोड़ कर 4 पंचकों में दोष का निर्वाह हो जाता है ! लेकिन मृत्यु पंचक सर्वथा वर्जित है ! इसमें विवाह नहीं करना चाहिए !
*7 – एकार्गल_दोष :–
विष्कुम्भ, अतिगण्ड, शूल, गण्ड, व्याघातण् वज्र, व्यतिपात, परिघ, वैधृति ये अशुभ योग विवाह के दिन हों तथा सूर्य नक्षत्र से विवाह नक्षत्र विषम हो तो एकार्गल दोष होता है ! इसमें नक्षत्र गणना 28 मानकर की जाती है ! इस दोष में खोड़ी (ऽ) लगती है दोष नहीं हो तो रेखा (।) लगाते हैं !
*8 – उपग्रह_दोष : —
सूर्य नक्षत्र से विवाह नक्षत्र तक गणना में 5, 7, 8, 10, 14, 15, 18, 19, 21, 22, 23, 24 या 25वें नक्षत्र में कोई ग्रह आए, तब उपग्रह दोष होता है !
*9 – क्रांतिसाम्य_दोष : —
जब स्पष्ट चंद्रक्रांति सूर्य क्रांति के बिल्कुल समान हो तब क्रांतिसाम्य दोष होता है ! एक ही अयन में स्पष्ट चंद्र व सूर्य का योग 360 अंश पर क्रांतिसाम्य होने पर वैधृति नामक महापात होता है ! विभिन्न अयन में स्पष्ट चंद्र व सूर्य का योग 180 अंश पर क्रांतिसाम्य होने पर यह व्यतिपात संज्ञक होता है ! क्रांतिसाम्य काल का निर्धारण गणित विधि से सिद्धांतोक्त पाताध्यायों के अनुसार किया जाता है !
साधारण तौर पर मेष-सिंह, वृष-मकर, तुला-कुंभ, कन्या-मीन, कर्क-वृश्चिक और धनु-मिथुन इन राशि युग्मों में, एक में सूर्य व एक में चंद्र हो, तो क्रांतिसाम्य दोष संभावित होता है ! क्रांतिसाम्य दोष शुभ कार्यों में सभी शुभ गुणों को नष्ट कर देता है ! विवाह पटल के अनुसार शस्त्र से कटा, अग्नि में जला या सर्प के विषदंश से पीड़ित व्यक्ति तो जीवित बच सकता है, किंतु क्रांतिसाम्य में विवाह करने पर वर-वधू दोनों ही जीवित नहीं रहते ! अतः लग्न शुभ (शुद्ध) होने पर भी उक्त दोषों (क्रांतिसाम्य, वेधदोष) में विवाह नहीं करना चाहिए ! सूक्ष्म क्रांति साम्य (महापात) की गणित गणना होती है ! इसमें सभी शुभ कार्य वजिर्त हैं !!
*10 – दग्धा तिथि :—
सूर्य राशि से तिथि को वर्जित माना गया है !
नीचे दिए गए तिथि चक्र में जिस माह के सूर्य के नीचे जो तिथि लिखी गई है, वह दग्धा तिथि मानी जाती है ! इसमें विवाहादि शुभ कार्य वर्जित हैं !
विशेष रूप से त्याज्य चार दोष विवाह लग्न में निम्नोक्त 4 दोष भी त्याज्य हैं :–
*मर्म वेध* :—
लग्न में पाप ग्रह होने से मर्म वेध होता है !
*कंटक दोष* :-
त्रिकोण में पाप ग्रह होने से कंटक दोष होता है !
*शल्य दोष* :-
चतुर्थ और दशम में पाप ग्रह होने से शल्य दोष होता है !
*छिद्र दोष* :-
सप्तम भाव में पाप ग्रह होने से छिद्र दोष होता है ! ज्येष्ठा विचार ज्येष्ठ मास में उत्पन्न व्यक्ति का ज्येष्ठा नक्षत्र हो तो ज्येष्ठ मास में विवाह वर्जित होता है ! वर और कन्या दोनों का जन्म ज्येष्ठ मास में हुआ हो, तो इस स्थिति में भी ज्येष्ठ मास में विवाह वर्जित है ! विवाह के समय तीन ज्येष्ठों का एक साथ होना वर्जित है ! दो या चार या छह ज्येष्ठा होने से विवाह हो सकता है !
*सिंह-गुरु वर्जित :–
सिंह राशि में गुरु हो तो विवाह वर्जित होता है ! लेकिन मेष का सूर्य रहे तो सिंह के गुरु में विवाह हो सकता है !
*होलाष्टक :—
फाल्गुन मास के शुक्लपक्ष में होलिका दहन से 8 दिन पहले अर्थात् शुक्लाष्टमी से पूर्णिमा तक होलाष्टक रहते हैं, इस समय विवाह वर्जित होता है ! होलकाष्टक काल में शतरुद्रा, विपाशा, इरावती और तीनों पुष्कर को छोड़कर शेष सर्वत्र शुभ हैं, इसलिए इन स्थानों के अतिरिक्त सर्वत्र विवाहादि शुभ कार्य हो सकते हैं !
इसके अतिरिक्त कुछ अन्य प्रमुख दोषों का फल इस प्रकार हैं :—
व्यतिपात में विवाह होने पर मृत्यु और वंश नाश की संभावना रहती है !
गंडांत में विवाह होने पर मृत्यु, वज्र में विवाह होने पर अग्निदाह, गंड में रोग होता हैं !
विवाह में लग्न शुद्धि :—
दिन और रात के 24 घंटों में 12 राशियों के 12 लग्न होते हैं ! सभी मुहूर्तों में लग्न की सर्वाधिक प्रधानता होती है ! विवाह आदि शुभ कार्यों में लग्न का शोधन गंभीरता से किया जाता है ! विवाह हेतु वृष, मिथुन, कन्या, तुला, धनु लग्न शुभ कहे गए हैं, इन लग्नों में विवाह उत्तम फलदायी होता है ! अलग-अलग भावों में स्थित ग्रह विवाह लग्न हेतु अशुभ होते हैं !
इस संदर्भ में एक संक्षिप्त विवरण नीचे की सारणी में दी गई है ! इनमें से कुछ ग्रहों की पूजा कराकर लग्न शुद्धि की जा सकती है ! इनकी शांति के उपरांत विवाह में तथा दाम्पत्य जीवन में बाधाएं नहीं आतीं !
विवाह लग्न में शुभ ग्रह केंद्र, त्रिकोण या द्वितीय, द्वादश में हों और पाप ग्रह भाव 3, 6 या 11 में स्थित हों तो शुभफल देते हैं ! लग्न (प्रथम भाव) से षष्ठ में शुक्र व अष्टम में मंगल अशुभ होता है ! सप्तम भाव ग्रह रहित हो, विवाह लग्न से चंद्र, 6, 8 या 12वें भाव में न हों तब लग्न शुभ होता है !
*लग्न भंग* :—
मुहूर्त चिंतामणि के अनुसार यदि किसी व्यक्ति के लग्न के व्यय भाव में शनि हो, तो उस लग्न में विवाह नहीं करना चाहिए ! दशम में मंगल, तृतीय में शुक्र, लग्न में चंद्र या पाप ग्रह हो, अथवा यदि लग्नेश, सूर्य, चंद्र छठे भाव में हों अथवा चंद्र, लग्न का स्वामी या कोई शुभ ग्रह आठवें भाव में हो अथवा सप्तम भाव में कोई भी ग्रह हो, तो लग्न भंग होता है !
विवाह लग्न में कन्या, मिथुन, धनु का पूर्वार्ध नवांश शुभ होता है, बशर्ते ये अंतिम नवांश में न हो ! उक्त राशियों का नवांश हो, तो दम्पति को पुत्र, धन व सौभाग्य की प्रप्ति होती है ! वर और कन्या की जन्म राशियों या लग्नों से अष्टम या द्वादश भाव का नवांश यदि अनेक गुणों से युक्त हो तो त्याज्य है !
श्री रामदैवज्ञ के अनुसार, लग्न का स्वामी लग्न में स्थित हो या उसे देखता हो, अथवा नवांश का स्वामी नवांश में स्थित हो या उसे देखता हो, तो वह वर को शुभफल प्रदान करता है ! इसी प्रकार नवांश का सप्तमेश सप्तम भाव को देखता हो, तो वधू के लिए शुभ फलदायक होता है !
पापकर्तरी दोष एवं परिहार :—
विवाह लग्न से दूसरे या 12वें भाव में यदि पाप ग्रह हो, तो पापकर्तरी दोष होता है, जो कैंची की तरह दोनों ओर से लग्न की शुभता को काटता है ! लग्न से द्वितीय स्थान में पापग्रह वक्री और द्वादश में पाप ग्रह मार्गी हो, तो यह दोष महाकर्तरी होता है, इसका सर्वथा त्याग करना चाहिए ! लग्न में बलवान शुभग्रह हो, तो कर्तरी दोष भंग हो जाता है ! केंद्र या त्रिकोण में गुरु, शुक्र या बुध हो, या कर्तरीकारक ग्रह नीचस्थ अथवा शत्रुक्षेत्री हो, तो कर्तरी दोष होता है !
*पंगु, अंध, बधिर लग्न :—
तुला और वृश्चिक दिन में तथा धनु एवं मकर रात्रि में बधिर (बहरी) होते हैं ! बधिर लग्न में विवाह करने से जीवन दुखमय होता है ! मेष, वृष और सिंह दिन में तथा मिथुन, कर्क और कन्या रात्रि में अंधे होते हैं ! दिन में कुंभ एवं रात्रि में मीन लग्न पंगु (विकलांग) होता है ! पंगु लग्न में विवाह होने पर धन का नाश होता है ! दिवा अंध लग्न में कन्या विधवा हो जाती है, जबकि रात्रि अंध लग्न संतान के लिए मृत्युकारक होता है ! इसलिए इन दोषपूर्ण लग्नों से बचना चाहिए ! किंतु, यदि लग्न का स्वामी या गुरु लग्न को देखता हो, तो पंगु, बधिर आदि लग्न दोष नहीं होते हैं ! त्रिबल शुद्धि विचार वर व कन्या की जन्मराशि से सूर्य, चंद्र व गुरु का गोचर नाम त्रिबल विचार है ! विवाह मुहूर्त के दिनों में से जिस दिन त्रिबल शुद्धि बन जाए, उसी दिन विवाह निश्चय करके बता देना चाहिए !
कन्या के लिए गुरुबल व वर के लिए सूर्यबल का विचार और चंद्रबल का विचार दोनों के लिए करना चाहिए ! सूर्य, चंद्र और गुरु की शुद्धि होने पर ही विवाह शुभ होता है !
*वरस्य भास्कर बलं :-
विवाह के समय वर के लिए सूर्य का बलवान और शुभ होना अति आवश्यक है ! सूर्य के बलवान होने से दाम्पत्य जीवन में पति का पत्नी पर प्रभाव व नियंत्रण रहता है ! दोनों में वैचारिक सामंजस्य रहता है एवं जीवन के कठिन समय में संघर्ष करने की क्षमता भी सूर्य से प्राप्त होती है ! सूर्य की शुभता से संपूर्ण वैवाहिक जीवन सुखमय होता है !
विवाह के समय वर की जन्म राशि से तीसरे, छठे, 10वें और 11वें भाव में सूर्य का गोचर श्रेष्ठ किंतु चौथे, आठवें और 12वें भाव में अनिष्टकारी होने के कारण त्याज्य है ! पहले, दूसरे, पांचवें, सातवें और नौवें भाव का सूर्य पूजनीय है अर्थात विवाह से पहले सूर्य की पूजा व लाल दान करने से ही विवाह शुभ हो जाता है ! इनमें पहले और सातवें स्थान का सूर्य वर द्वारा विशेष पूज्य माना गया है !
दाम्पत्य जीवन में वर के वर्चस्व के लिए यह आवश्यक है कि सूर्य के उत्तरायण काल, शुक्ल पक्ष व दिवा लग्न में ही विवाह किया जाय, दिवा लग्न में भी अभिजित मुहूर्त सर्वश्रेष्ठ होता है ! सूर्य जिस राशि में हों उससे चतुर्थ राशि का लग्न अभिजित लग्न कहलाता है ! यह स्थानीय मध्याह्न काल (दोपहर) में पड़ता है ! स्थानीय समयानुसार प्रतिदिन, दिन के 12 बजने से 24 मिनट पूर्व 24 मिनट पश्चात तक 48 मिनट का अभिजित मुहूर्त होता है ! उत्तम जाति ब्राह्मण व क्षत्रियों के लिए यह विवाह लग्न श्रेष्ठ कही गया है !
दक्षिण भारतीय ब्राह्मण अभिजित लग्न में ही विवाह करते हैं और यही कारण है कि उत्तर भारतीयों की अपेक्षा उनका वैवाहिक जीवन अधिक सफल रहता है ! जन्मगत जाति के आधार पर ही नहीं बल्कि जन्म नक्षत्र के अनुसार यदि वर का वर्ण ब्राह्मण या क्षत्रिय हो, तो भी अभिजित लग्न में ही विवाह शुभफलदायी होता है !
विवाह लग्न में सूर्य यदि एकादश भाव में हो, तो यह सोने में सुहागा होता है ! विवाह हेतु अन्य लग्न शुद्धि न हो सके, तो अभिजित मुहूर्त या लग्न में विवाह सभी वर्गों के लिए शुभ होता है !
*कन्यायां गुरोर्बलं* :-
कन्या के दाम्पत्य सुख व पति भाव का कारक गुरु है, इसलिए गुरु की शुद्धि में कन्या का विवाह शुभ होता है ! कन्या की जन्म राशि से दूसरे, पांचवें, सातवें, नौवें या 11वें में स्थित गुरु विवाह हेतु शुभ माना जाता है, क्योंकि इन स्थानों में गुरु बलवान होता है ! पहले, तीसरे, छठे या 10वें में स्थित गुरु मध्यम होता है, जो पूजा से शुभ हो जाता है !
कन्या से पीला वस्त्र, चावल, बेसन के लड्डू दान करा कर विवाह करना चाहिए ! चौथे, आठवें या 12वें में स्थित गुरु अशुभ होता हैं, यह पूजा से भी शुभ नहीं हो सकता है ! अतः कन्या की जन्म राशि से चौथे, आठवें या 12वें में स्थित गुरु विवाह हेतु वर्जित है !
इन स्थानों में गुरु का गोचर वैधव्यप्रद होता है — मिथुन या कन्या राशि में हो, तो कन्या की हानि होती है ! कर्क या मकर राशि में हो, तो कन्या के लिए दुखदायी होता है ! किंतु उक्त स्थानों में स्वराशि या परमोच्च हो, तो शुभ होता है !
सिंह राशि के नवांश में गुरु हो, तो विवाह नहीं करना चाहिए ! कन्या के विवाह हेतु गुरु शुद्धि का इतना गहन विचार तो उस समय किया जाता था जब उसका विवाह दस वर्ष या इससे भी कम की आयु में होता था !
आजकल तो कन्या का विवाह सोलह वर्ष के बाद ही होता है ! इस उम्र तक वह कन्या नहीं रहती, वह तो रजस्वला होकर युवती हो जाती है ! इसलिए गुरुबल शुद्धि रहने पर भी पूजा देकर लड़की का विवाह कराना शास्त्रसम्मत है ! ऐसे में विवाह लग्न शुद्धि के लिए चंद्रबल देखना ही अनिवार्य है !
*विवाहे चंद्रबलं* :-
श्री बादरायण के अनुसार गुरु और शुक्र के बाल्य दोष में कन्या का और वृद्धत्व दोष में पुरुष का विनाश होता है ! गुरु अस्त हो तो पति का, शुक्रास्त हो, तो कन्या का तथा चंद्रास्त हो, तो दोनों का अनिष्ट होता है ! अतः विवाह के समय वर और कन्या दोनों के लिए चंद्रबल शुद्धि आवश्यक है ! चंद्र का गोचर दोनों की जन्म राशियों से तीसरे, छठे, सातवें, 10वें या 11वें भाव में शुभ (उत्तम) होता है ! पहले, दूसरे, पांचवें, नौवें या 12वें में चंद्रमा पूज्य है ! चौथे, आठवें या 12वें स्थान का चंद्र दोनों के लिए अशुभ होता है ! विवाह पटल के अनुसार चौथा और 12वां चंद्र ही अशुभ होने के कारण त्याज्य है !
एकार्गलादि विवाह संबंधी दोष चंद्र एवं सूर्य के बलयुक्त होने के कारण नष्ट हो जाते हैं, अर्थात् दोनों उच्चस्थ या मित्र क्षेत्री होकर विवाह लग्न में बैठे हो, तो समस्त दोष दूर हो जाते हैं ! चंद्र बुध के साथ शुभ और गुरु के साथ सुखदायक होता है !
विवाह लग्न में चंद्र की निम्नलिखित युतिस्थितियां दोषपूर्ण होती हैं, इनका त्याग करना चाहिए !
*सूर्य-चंद्र की युति –
यह युति त्रिक भाव में होने पर दंपति को दारिद्र्य दुख देती है !
*चंद्र-मंगल की युति –
इस युति के फलस्वरूप दाम्प्त्य दरिद्रता में व्यतीत होत है, अतः त्याज्य है !
*चंद्र-शुक्र की युति –
इस युति के फलस्वरूप पति पराई स्त्री से प्रेम करता है, अर्थात् पत्नी को सौतन का दुख झेलना पड़ता है ! यही स्थिति पत्नी के लिए भी बनती है !
*चंद्र-शनि की युति –
चन्द्र-शनि की युति निर्धन बनाता है और वैराग्य की तरफ प्रेरित कर देता है !
चंद्र-राहु की युति –
राहु से युत चंद्र कलहकारी होता है !
*चंद्र-केतु की युति –
यह युति कष्ट प्रदान करती है ! इसके अतिरिक्त यदि विवाह लग्न में चंद्र दो पाप ग्रहों से युत हो तो मृत्यु का कारक होता है ! विवाह में गोधूलि विचार भी किया जाना चाहिए क्योंकि इसमें सभी दोष त्याज्य हैं !
ऎसी मान्यता है कि शनि जो काल का प्रतीक है, समय का निर्णय करता है और बृहस्पति विवाह के लिए आशीर्वाद देता है ! इस प्रकार मंगल जो पौरूष, साहस व पराक्रम का प्रतीक है, उसका भी विवाह संबंधित भाव व ग्रहों के ऊपर से विवाह की तिथि की 6 मास की अवधि के गोचर में विचरण होना चाहिए अथवा गोचर से दृष्टि होनी चाहिए ! विवाह का समय निश्चित करने के लिए अष्टकवर्ग विधि का प्रयोग किया जाता है !
“उपरोक्त सभी दोषों को दूर करने हेतु विवाह लग्न, वर कन्या के जन्म नक्षत्र दिन, तिथि, करण, योग, गोचर नक्षत्र, युति सूर्यबल, चन्द्रबल, गुरुबल, वेध आदि का एक चार्ट बनाकर प्रत्येक दोष का निराकरण बारी बारी से कर लेना चाहिए !”