
वैदिक ज्योतिष में षष्ठ भाव को रोग, ऋण, शत्रु, विवाद, सेवा और संघर्ष का भाव माना गया है। इसलिए षष्ठेश का अन्य भावेशों के साथ परिवर्तन योग बनने पर उसके फल संबंधित भाव के विषयों पर पड़ते हैं। इन योगों का फल केवल एक ग्रह या एक भाव देखकर नहीं कहा जाना चाहिए; लग्न, ग्रहबल, दृष्टि, युति, नवांश तथा दशा-अन्तर्दशा को भी साथ में देखना आवश्यक है।
षष्ठेश-सप्तमेश परिवर्तन योग
जब षष्ठेश और सप्तमेश का परिवर्तन योग बनता है, तो वैवाहिक जीवन में संघर्ष और उतार-चढ़ाव की संभावना बढ़ सकती है। सप्तम भाव जीवनसाथी और विवाह का प्रतिनिधित्व करता है, जबकि षष्ठ भाव विवाद, मतभेद, ऋण और शत्रुता का।
ऐसी स्थिति में जीवनसाथी के साथ विचारों का टकराव, छोटी-छोटी बातों पर विवाद, वैवाहिक तनाव अथवा एक-दूसरे से असंतोष देखने को मिल सकता है। कभी-कभी जीवनसाथी स्वयं समस्या का कारण न होकर परिस्थितियां और पारिवारिक विवाद वैवाहिक सुख को प्रभावित करते हैं।
यदि शुभ ग्रहों की दृष्टि हो, ग्रह बलवान हों और नवांश कुंडली मजबूत हो, तो इन कठिनाइयों में काफी कमी आ सकती है।
षष्ठेश-अष्टमेश परिवर्तन योग
षष्ठेश और अष्टमेश का परिवर्तन योग विपरीत राजयोग की श्रेणी में विचार किया जा सकता है, विशेषकर तब जब अन्य आवश्यक योग भी इसकी पुष्टि करते हों।
ऐसा व्यक्ति संघर्षों और कठिन परिस्थितियों से निकलकर जीवन में भौतिक उपलब्धियां प्राप्त कर सकता है। विरोधियों पर विजय पाने की क्षमता बढ़ सकती है तथा संकटों से उबरने का सामर्थ्य मिलता है।
लेकिन षष्ठ और अष्टम दोनों ही चुनौतीपूर्ण भाव होने के कारण स्वास्थ्य और मानसिक तनाव के विषय में सावधानी आवश्यक रहती है। वास्तविक फल ग्रहों की शक्ति और दशा के अनुसार बदलता है।
षष्ठेश-नवमेश परिवर्तन योग
षष्ठेश और नवमेश का परिवर्तन धर्म, भाग्य, पिता, गुरु और लंबी यात्राओं से जुड़े विषयों में संघर्ष का संकेत दे सकता है।
ऐसी स्थिति में व्यक्ति की धार्मिक मान्यताओं में उतार-चढ़ाव आ सकता है। पिता के स्वास्थ्य अथवा पिता के साथ संबंधों में परेशानी देखने को मिल सकती है। यात्राओं में अपेक्षित सुख न मिलना या यात्रा के कारण खर्च और तनाव बढ़ना भी संभव है।
विदेश अथवा दूरस्थ स्थानों से जुड़े व्यापार में भी सावधानी आवश्यक होती है। हालांकि केवल इस योग के आधार पर विदेशी व्यापार में निश्चित हानि कहना उचित नहीं होगा।
षष्ठेश-दशमेश परिवर्तन योग
जब षष्ठेश और दशमेश का परिवर्तन होता है, तो नौकरी, सेवा, व्यवसाय और कर्मक्षेत्र में संघर्ष की स्थिति बन सकती है।
व्यक्ति को सफलता प्राप्त करने के लिए अधिक मेहनत करनी पड़ सकती है। विरोध, प्रतिस्पर्धा और कार्यस्थल के विवाद जीवन का हिस्सा बन सकते हैं।
इसके बावजूद षष्ठ भाव सेवा और प्रतिस्पर्धा का भाव होने के कारण व्यक्ति संघर्ष करते हुए ऊंचा उठ सकता है। मेहनत और प्रतिस्पर्धा के माध्यम से लाभ प्राप्त करने की क्षमता रहती है।
पैतृक संपत्ति या पारिवारिक संसाधनों के मामले में भी उतार-चढ़ाव हो सकता है, विशेषकर यदि धन और संपत्ति से संबंधित अन्य भाव भी पीड़ित हों।
षष्ठेश-एकादशेश परिवर्तन योग
षष्ठेश और एकादशेश का परिवर्तन आय और लाभ के विषय में मिश्रित परिणाम दे सकता है।
व्यक्ति नौकरी, सेवा या अपने परिश्रम के माध्यम से नियमित आय प्राप्त कर सकता है। प्रतिस्पर्धा और मेहनत से लाभ कमाने की क्षमता रहती है।
लेकिन मित्रों, बड़े भाई-बहनों अथवा सामाजिक संबंधों में मतभेद और तनाव की स्थिति बन सकती है। लाभ प्राप्त करने के लिए संघर्ष करना पड़ सकता है।
यदि एकादश भाव और उसका स्वामी मजबूत हों, तो यही योग व्यक्ति को कठिन प्रतिस्पर्धा के बीच आर्थिक लाभ प्राप्त करने की क्षमता भी दे सकता है।
षष्ठेश-द्वादशेश परिवर्तन योग
षष्ठेश और द्वादशेश का परिवर्तन भी विपरीत राजयोग के रूप में देखा जाता है, यदि कुंडली की अन्य परिस्थितियां उसका समर्थन करें।
इस योग में व्यक्ति जीवन में ऋण, खर्च, संघर्ष और विदेश से जुड़े अनुभवों से गुजर सकता है। कभी-कभी बड़े खर्चों अथवा परिस्थितियों के कारण ऋण लेने की आवश्यकता पड़ सकती है।
विदेश यात्रा, विदेश में नौकरी अथवा दूरस्थ स्थानों से संबंध बनने की संभावना भी बढ़ सकती है।
यह योग पूरी तरह नकारात्मक नहीं है। कई बार व्यक्ति कठिन परिस्थितियों और विरोधों से लड़कर आगे बढ़ता है तथा विपरीत परिस्थितियां ही उसकी सफलता का माध्यम बन जाती हैं।
षष्ठ भाव में ग्रह और स्वास्थ्य संबंधी ज्योतिषीय संकेत
षष्ठ भाव को रोग भाव कहा गया है। यहां स्थित ग्रह शरीर के किसी विशेष क्षेत्र अथवा स्वास्थ्य संबंधी प्रवृत्ति का संकेत दे सकते हैं। लेकिन किसी भी रोग का निश्चित निर्णय केवल जन्मकुंडली के आधार पर नहीं किया जाना चाहिए। वास्तविक स्वास्थ्य समस्या होने पर चिकित्सकीय जांच आवश्यक है।
सूर्य षष्ठ भाव में
यदि सूर्य षष्ठ भाव में स्थित होकर पीड़ित या निर्बल हो, तो परंपरागत ज्योतिष में सिरदर्द, शरीर में गर्मी, रक्तचाप से संबंधित प्रवृत्तियां, त्वचा संबंधी समस्या अथवा बार-बार होने वाले संक्रमण जैसी स्वास्थ्य-संवेदनशीलताओं के संकेत माने जाते हैं।
इनका प्रभाव विशेष रूप से सूर्य की दशा-अन्तर्दशा या षष्ठेश की दशा में अधिक सक्रिय हो सकता है।
चन्द्रमा षष्ठ भाव में
निर्बल या पीड़ित चन्द्रमा षष्ठ भाव में हो तो पाचन तंत्र, पेट की गड़बड़ी, अपच तथा शरीर में द्रव-संतुलन से संबंधित समस्याओं की प्रवृत्ति मानी जाती है।
चन्द्रमा मन का भी कारक है, इसलिए मानसिक तनाव का प्रभाव स्वास्थ्य पर पड़ने की संभावना भी देखी जाती है।
मंगल षष्ठ भाव में
पीड़ित मंगल षष्ठ भाव में हो तो परंपरागत ज्योतिष में चोट, सूजन, शरीर में गर्मी, मांसपेशियों से संबंधित परेशानी, त्वचा संबंधी विकार तथा रक्त से जुड़ी समस्याओं की प्रवृत्ति मानी जाती है।
मंगल की स्थिति गंभीर हो तो शल्यचिकित्सा या चोट से संबंधित योगों पर भी विचार किया जाता है।
बुध षष्ठ भाव में
पीड़ित बुध तंत्रिका तंत्र, मानसिक तनाव, अत्यधिक चिंता, चिड़चिड़ापन, त्वचा तथा श्वसन संबंधी संवेदनशीलताओं की ओर संकेत कर सकता है।
सिरदर्द, हाथ-पैरों में असहजता अथवा तनाव के कारण उत्पन्न होने वाली शारीरिक शिकायतों पर भी विचार किया जाता है।
गुरु षष्ठ भाव में
पीड़ित या निर्बल गुरु होने पर परंपरागत ज्योतिष में यकृत, पाचन तंत्र, पेट तथा शरीर में वसा या चयापचय से संबंधित समस्याओं की संभावना देखी जाती है।
गुरु का संबंध शरीर में पोषण और वृद्धि से होने के कारण उसकी स्थिति का मूल्यांकन विशेष सावधानी से किया जाता है।
शुक्र षष्ठ भाव में
निर्बल या पीड़ित शुक्र को परंपरागत ज्योतिष में मूत्र-जनन तंत्र, गुर्दे तथा प्रजनन संबंधी स्वास्थ्य-संवेदनशीलताओं से जोड़ा जाता है।
ऐसे फल बताते समय शुक्र की राशि, नवांश, युति और उस पर पड़ने वाली दृष्टियों को अवश्य देखना चाहिए।
शनि षष्ठ भाव में
पीड़ित शनि होने पर दीर्घकालिक या बार-बार परेशान करने वाली स्वास्थ्य समस्याओं की प्रवृत्ति मानी जाती है। पारंपरिक ग्रंथों में शनि को वात, जोड़ों, हड्डियों और स्नायु संबंधी विषयों से जोड़ा गया है।
इसलिए गठिया, जोड़ों में जकड़न या लंबे समय तक चलने वाली शारीरिक परेशानी के संकेतों का विचार किया जाता है।
राहु षष्ठ भाव में
राहु षष्ठ भाव में कई परिस्थितियों में शत्रु और रोगों पर विजय देने वाला भी माना जाता है, इसलिए इसे केवल रोगकारक मानना उचित नहीं है।
यदि राहु पीड़ित हो अथवा स्वास्थ्य संबंधी अन्य योगों से जुड़ा हो, तो रहस्यमय, बार-बार लौटने वाली या स्पष्ट कारण समझने में कठिन स्वास्थ्य समस्याओं की प्रवृत्ति देखी जा सकती है।
केतु षष्ठ भाव में
केतु को त्वचा, घाव, एलर्जी, खुजली तथा अचानक उत्पन्न होने वाली शारीरिक परेशानियों से जोड़ा जाता है। पीड़ित होने पर त्वचा संबंधी संवेदनशीलता अथवा अस्पष्ट स्वास्थ्य शिकायतों की संभावना पर विचार किया जाता है।
दशा-अन्तर्दशा का महत्व
किसी ग्रह के षष्ठ भाव में स्थित होने मात्र से उसके बताए गए फल निश्चित रूप से नहीं मिलते। रोग या स्वास्थ्य संबंधी फल की सक्रियता देखने के लिए विशेष रूप से—
षष्ठेश की महादशा-अन्तर्दशा, षष्ठ भाव में स्थित ग्रह की दशा, षष्ठ भाव पर ग्रहों की दृष्टि, अष्टम और द्वादश भाव की स्थिति, लग्न एवं लग्नेश का बल तथा नवांश कुंडली
का समग्र अध्ययन किया जाना चाहिए।
इसलिए कुंडली में षष्ठ भाव को देखकर भयभीत होने के बजाय यह देखना अधिक महत्वपूर्ण है कि व्यक्ति की रोग-प्रतिरोधक क्षमता, लग्न, लग्नेश और शुभ ग्रहों का संरक्षण कितना मजबूत है।
ज्योतिषीय संकेत संभावनाएं बताते हैं, चिकित्सकीय निदान नहीं। किसी भी वास्तविक स्वास्थ्य समस्या में योग्य चिकित्सक की सलाह और जांच को प्राथमिकता देनी चाहिए।