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कुण्डली का विश्लेषण करते समय तीन महत्वपूर्ण तथ्यों को कभी नजरंदाज नहीं करना चाहिए

वह तीन तथ्य हैं
  1. जातक की मानसिक वृत्ति, 2. शारीरिक वृत्ति, और 3. आत्मिक वृत्ति ! वस्तुत: कोई भी जातक जीवन में तीन प्रकार से कर्म करता है, और तीन ही प्रकार की प्रकृति से प्रभावित भी होता है ! कुण्डली में इन तथ्यों को यह तीन वृत्तियाँ प्रकाशित करती हैं  —

 

1- शारीरिक वृत्ति, इस के लिए लग्न कुण्डली देखना चाहिए !

 2 – मानसिक वृत्ति, इसके लिए चन्द्र  कुण्डली देखना चाहिए !

 3 – आत्मिक वृत्ति इसके लिए सूर्य कुण्डली  देखना चाहिए !

इस नियम का समर्थन करते हुए वृहत पाराशर होरा शास्त्र में इन तीनों कुण्डलियों को एक स्थान पर अंकित किया गया है ! फलादेश के इस व्यवस्था को “सुदर्शन चक्र पद्धति” कहा गया है ! अत: सुदर्शन चक्र कुण्डली द्वारा उपरोक्त तीनों तथ्यों पर ध्यान देते हुए फलादेश करना चाहिए ! इन तीन नियमों के अलावा कुछ और भी महत्वपूर्ण तथ्यों जैसे – सभी ग्रहों की स्थिति, डिग्री, दृष्टि, गति, नवमांश और चलित की स्थिति आदि को भी अवश्य ही ध्यान में रखते हुए फलादेश करना चाहिए !

ज्योतिष शास्त्र मनुष्य को अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाता है, और अपरा तथा परा विद्याओं को जोड़ने वाले पुल की तरह कार्य करता है !

इस शास्त्र से हम जातक के प्रारब्ध के बारे में जान सकते हैं ! हर व्यक्ति का जन्म उसके संचित कर्मों के अनुसार ही होता है ! इन्हीं संचित कर्मों से ही इस जन्म के लिए प्रारब्ध बनता है ! इसी प्रारब्ध के अनुसार ही अगला जन्म होता है !

ज्योतिष शास्त्र जो खगोलीय चक्र के ज्ञान पर आधारित है, बेशक जातक के भविष्य कथन में बहुत अधिक सहायक सिद्ध नहीं होता है, परन्तु  इस शास्त्र के अतिरिक्त और इससे अधिक भविष्य जानने की विद्या भी मनुष्य के पास नहीं है ! वस्तुत: यह एक संभावनाओं का शास्त्र है ! ज्योतिष विज्ञान के माध्यम से जातक के लिए भविष्य में उपलब्ध संभावनाओं का पता अवश्य लगाया जा सकता है, और साथ-साथ कर्म भी करने पड़ते हैं, क्यों कि कर्म का अपना परिणाम (फल) होता है ! कुण्डली के ग्रह जो सूचना  देते हैं या कुण्डली जिन संभावनाओं का संकेत देती हैं,  यदि उसी दिशा में कर्म किये जायेंगे तो, परिणाम सकारात्मक या अनुकूल ही होते हैं ! अर्थात् प्रारब्ध (भाग्य) और कर्म दोनों मिलकर एक परिणाम प्रकट करते हैं ! कुण्डली प्रारब्ध (सम्भावना) हैं, और कर्म  कैसे  किये हैं, या किये जायेंगे ? दोनों का ज्ञान एक भविष्यवक्ता को होना चाहिए तभी वह ठीक-ठीक भविष्यवाणी कर सकता है ! इसी लिए भविष्यवाणी पूर्ण सत्यता से करना असम्भव तो नहीं पर काफी कठिन अवश्य  है ! जहां एक ओर कुण्डली में ग्रहों की स्थिति  दृष्टि, दशा, गोचर आदि के आधार पर भविष्यवाणी की जाती है, वहीं ज्योतिषी को अपने अंतर्ज्ञान तथा ईश्वरीय शक्ति का सहयोग भी महत्वपूर्ण है ! कुछ ज्योतिषी केवल कुण्डली से ही देख कर बता देते हैं तो  कुछ कुण्डली के प्रत्येक पहलू को अच्छी  तरह परख कर बताते हैं ! अलग-अलग ज्योतिषियों के भविष्य कथन में भी बहुत अंतर होता है, क्योंकि उनके अपने अनुभव व तरीके भी भिन्न-भिन्न होते हैं ! भविष्य कथन के व्यवहारिक पक्ष को देखें तो, कुछ बातों का ध्यान अवश्य रखना चाहिए जैसे –

 

1 – देश काल और परिस्थिति !
2 – चलित कुण्डली !
3 – नवमांश कुण्डली !
4 – राजयोग, दशा व गोचर का समन्वय !
5 – ग्रह और भाव का षड्बल !
6 – नीच भंग राजयोग !
7 – वक्रीग्रह !
8 – स्तंभित ग्रह !
9 – शनि शुक्र दशा का विचित्र नियम !
10 – ग्रहों का दृष्टि सम्बंध !
11 – ग्रहों का परस्पर परिवर्तन योग (विनिमय) !
12 – काल सर्प योग !
13 – पंचमहापुरुष योग !
14 – पुरुष जातक या स्त्री जातक में अंतर !
15 – कारक ग्रहों का महत्व ! तथा
16 – राजयोगों का भंग होना !

1 – भविष्यवक्ता को देश, काल, स्थान व परिस्थितियों के अनुसार ही भविष्य कथन करना चाहिए ! हर देश/समाज व्यक्ति विशेष की संस्कृति, वैभव, समृद्धि आदि अलग-अलग होते हैं, इस का ध्यान रख कर ही कुण्डली देखना चाहिए ! किसी धनाढ्य व्यक्ति की कुण्डली का लक्ष्मी योग या राजयोग उसे अरबपति बना देगा, जबकि गरीब व्यक्ति की कुण्डली का वही योग उसे  लखपति ही  बना पाएगा !

इसी प्रकार सामाजिक स्थिति और संस्कृति भी भविष्य कथन में महत्वपूर्ण है, क्योंकि विदेश में सप्तम भाव में यदि पाप ग्रह स्थित हों और किसी भी शुभ ग्रह की दृष्टि न हो तब तलाक की भविष्यवाणी काफी सही सिद्ध होगी ! पर भारत में इस विषय पर काफी सोच समझ कर बोलना चाहिए, क्योंकि अब भी भारतीय लोग तलाक के बारे में नहीं सोचते हैं !

2 – कुण्डली में चलित भाव का महत्व :

कुंडली का आकलन करते हुए चलित को अवश्य देखना चाहिए, क्योंकि लग्न कुण्डली  में ग्रह त्रिकोण या केंद्र में होते हुए भी यदि चलित में षष्टम, अष्टम या द्वादश में चले जायेंगे तब फलादेश में बहुत अंतर हो जायेगा, और उसमें न्यूनता आ जाएगी ! इसी प्रकार अष्टम या द्वादश में स्थित शुभ ग्रह सप्तम या केंद्र में आ जाएं तब, फल की शुभता में वृद्धि होती है ! लग्न कुण्डली में ग्रह  उसी भाव के फल देता है, जिसमें कि चलित में जाता है !

3 – नवमांश का महत्त्व :

जन्मकुडली के साथ-साथ नवमांश कुण्डली  को देखना भी आवश्यक है ! सप्तम भाव के अतिरिक्त अन्य ग्रहों की नवमांश में स्थिति जैसे उच्च, नीच, स्वगृही या मूलत्रिकोण आदि को देखने से कुण्डली के ग्रहों के बल का ज्ञान  हो जाता है, जिससे फलादेश में बहुत अधिक सहायता मिलती है !

4 – ग्रह बल :

फलादेश करते हुए ग्रह बल का ध्यान रखना भी आवश्यक होता है, क्योंकि कई बार कुण्डली में योग होते हुए भी ग्रह के हीन बली  होने से योग फलीभूत नहीं होता, और भविष्य कथन प्रभावित हो जाता है, जैसे- अनेक बार ऐसी कुण्डली देखने को मिलती है, जिसे देख कर कहा नहीं जा सकता कि विवाह नहीं  होगा ! विवाह कारक ग्रह की स्थिति अच्छी होते हुए भी विवाह नहीं होता, क्योंकि कलत्र कारक ग्रह शुक्र/गुरु सप्तमेश होकर कहीं भी शून्य अंश में हों, शुभ ग्रह की दृष्टि में न हो, पाप ग्रह की दृष्टि या युति में हाें, अथवा पापकर्तरी योग से पीड़ित हों तब, विवाह की सम्भावना कम हो जाती है !

5 – स्थान परिवर्तन का राजयोग तथा  दशाफल का विचित्र नियम :

कालिदास द्वारा रचित उत्तरकालामृत के अनुसार शुक्र और शनि यदि दोनों उच्च, स्वक्षेत्री तथा वर्गोत्तम होकर बलवान स्थिति में हों, तब एक दूसरे की महादशा तथा अंतर्दशा में खराब फल देते हैं ! लेकिन दोनों में से एक बलवान और दूसरा बलहीन हो तब अपने योग का फल देते हैं !

6 – नीच भंग राज योग :

भविष्य कथन करते हुए नीच ग्रह और उच्च ग्रह का विचार अवश्य किया जाता है ! उसमें भी नीच भंग राज योग का ध्यान रखना चाहिए ! यदि नीच ग्रह का उच्चनाथ केन्द्र में हो तब नीच ग्रह का नीच भंग हो जाता है, और वह नीच जैसा फल न देकर सामान्य फल देता है ! इसी प्रकार नीच ग्रह यदि वक्री हो जाए तब, उच्च ग्रह के समान फल देने लगता है, और उच्च ग्रह वक्री हो जाए तब, वह अपने बल में क्षीण हो जाता है, और अपेक्षित फल नही दे पाता !

7 – स्तम्भित ग्रह :

गुरु बलवान होने के बाद भी यदि स्तम्भित होता है तब, भी अच्छा फल नहीं देता है ! कभी-कभी ग्रह मार्गी से वक्री अथवा वक्री से मार्गी होते समय कुछ समय के लिए स्तम्भित हो जाते हैं !

8 – राजयोग का भंग होना :

वैसे तो हर एक कुण्डली में अनेक राजयोग बनते हैं, परंतु बहुत से राजयोग दूसरे अरिष्ट योगों द्वारा भंग हो जाते हैं, अथवा बहुत कमजोर स्थिति में होते हैं, इसीलिये उन राजयोगों का फल जातक को मिल नहीं पाता, इसलिये कुण्डली का विश्लेषण करते समय राजयोग और उनको भंग करने वाले योगों, दोनों पर बराबर ध्यान देना चाहिए ! अनेक मामलों में ज्योतिषी जातक की  कुण्डली में राजयोग देखकर जातक को सम्बंधित ग्रह की दशा में राजयोग तो बता देता है, परंतु राजयोगों को भंग करने वाले योगों पर ध्यान नहीं देते हैं, जिसका परिणाम यह होता है, कि जातक बहुत प्रसन्न हो जाता है, परंतु सम्बंधित ग्रह की दशा आने पर जब राजयोग जैसा परिणाम नहीं मिलता तब उसे बहुत निराशा होती है, साथ ही ज्योतिष तथा ज्योतिषीयों पर से उसका विश्वास भी उठ जाता है !

9 – वक्री ग्रह :

वक्री ग्रहों के सम्बध मे ‘उत्तरकालामृत’ में कहा  गया है कि –

 

“वक्री स्वोच्चबलश्च वक्रसहितो मध्यं बलं तुङ्गभे !
वक्री नीचबलः स्वनीचभवने वक्रीबलं तुङ्गजम् !!
उच्चस्थेन युतोऽर्धवीर्यमिति चेन्नीचे तु शून्यं बलं !
मित्रैः पापवर्गैः शुभै रिपुरवर्गैर्युक्तोऽपि चार्ध   बलम् !!
 

अर्थात- वक्री ग्रह अपनी उच्च राशिगत होने के समतुल्य फल प्रदान करता है ! कोई ग्रह जो वक्री ग्रह से संयुक्त हो उसके प्रभाव मे मध्यम स्तर की वृद्धि होती है ! उच्च राशिगत कोई ग्रह वक्री हो तब, वह नीच राशिगत होने का फल प्रदान करता है ! इसी प्रकार जब कोई नीच राशिगत ग्रह वक्री हो जाय तब वह अपनी उच्च राशि में स्थित होने का फल प्रदान करता है ! इसी प्रकार यदि कोई उच्च राशिगत ग्रह नवमांश मे नीच राशिगत हो जाय तब नीच राशि का फल प्रदान करेगा ! कोई शुभ अथवा पाप ग्रह यदि नीच राशिगत हो परन्तु नवमांश मे अपनी उच्च राशि में स्थित हो जाय तो वह उच्च राशि का ही फल प्रदान करता है !

जो लोग अपनी बुद्धि को एकाग्रचित्त रखते हुए इन सभी परिस्थितियों पर ध्यान देकर बिना किसी चूक के विश्लेषण करते हैं, निश्चित मानिए कि वह जातक के बारे में अधिक स्पष्टता से सटीक भविष्य कथन व जीवनवृत्ति के तथ्य बताने में सफल रहते हैं !

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