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आंवला नौमी

भारतीय संस्कृति में पुत्र प्राप्ति को विशेष महत्व दिया जाता है। कहा जाता है कि पुत्र कुल का नाम रौशन करते हैं। यहां रौशन से भाव प्रसिद्ध होना नहीं है अपितु भाव यह है कि पुत्र से ही किसी के वंश का पता चल सकता है।

 

स्त्री में गुणसूत्र xx होते है और पुरुष में xy होते है । इनकी सन्तति में माना की पुत्र हुआ (xy गुणसूत्र). इस पुत्र में y गुणसूत्र पिता से ही आया यह तो निश्चित ही है क्यूँकी माता में तो y गुणसूत्र होता ही नही! और यदि पुत्री हुई तो (xx गुणसूत्र). यह गुणसूत्र पुत्री में माता व् पिता दोनों से आते है ।

 

यदि पुत्री है तो 50% पिता और 50% माता का सम्मिलन है।

यदि पुत्र है तो 95% पिता और 5% माता का सम्मिलन है।

 फिर यदि पुत्री की पुत्री हुई तो वह डीएनए 50% का 50% रह जायेगा, फिर यदि उसके भी पुत्री हुई तो उस 25% का 50% डीएनए रह जायेगा, इस तरह से पांचवी पीढ़ी मेंपुत्री जन्म में यह % घटकर 1% रह जायेगा।अर्थात, पुरुष कुल के गुण समाप्त प्राय: हो जायेंगे।

 जब पुत्र होता है तो पुत्र का गुणसूत्र पिता के गुणसूत्रों का 95% गुणों को अनुवांशिकी में ग्रहण करता है और माता का 5% (जो कि किन्हीं परिस्थितियों में एक% से कम भी हो सकता है) डीएनए ग्रहण करता है, और यही क्रम अनवरत चलता रहता है, जिस कारण वंश के गुण कभी खत्म नहीं होते।

 इसीलिये, अपने ही अंश को पित्तर जन्मों जन्म तक आशीर्वाद देते रहते हैं भाव वह अंश पीढ़ी दर पीढ़ी मजबूत होता जाता है तथा संतान पीढ़ी दर पीढ़ी शक्त होती रहती है और दिन प्रतिदिन उन्नति करती है।

चतुर्मास में ब्रह्मचर्य धारण करने के बाद जब देव उठनी एकादशी से पति पत्नी का आपसी मिलन होता है, उस से पहले पति में y गुणों को मजबूत करने की प्रथा है जिसके लिए हमारे ग्रंथों में विभिन्न क्रियाएं बताई हुई हैं। कार्तिक मास में शुक्ल पक्ष की नौमी को आमले के पेड़ की पूजा का विधान भी उन में से एक है।

 

 xx गुणसूत्र के जोड़े में एक x गुणसूत्र पिता से तथा दूसरा x गुणसूत्र माता से आता है. तथा इन दोनों गुणसूत्रों का संयोग एक गांठ सी रचना बना लेता है जिसे Crossover कहा जाता है ।

वैदिक+ गोत्र प्रणाली, गुणसूत्र पर आधारित है अथवा y गुणसूत्र का पता करने का एक माध्यम है। उदहारण के लिए यदि किसी व्यक्ति का गोत्र कश्यप है तो उस व्यक्ति में विधमान y गुणसूत्र कश्यप ऋषि से आया है या कश्यप ऋषि उस y गुणसूत्र के मूल है

 

  1. xx गुणसूत्र अर्थात पुत्री!

 

  1. xy गुणसूत्र अर्थात पुत्र!

 

पुत्र में y गुणसूत्र केवल पिता से ही आना संभव है क्यूँकी माता में y गुणसूत्र है ही नही । और दोनों गुणसूत्र अ-समान होने के कारन पूर्ण Crossover नही होता केवल 5 % तक ही होता है । और 95 % y गुणसूत्र ज्यों का त्यों (intact) ही रहता है ।

 

तो महत्त्वपूर्ण y गुणसूत्र हुआ । क्यूँकी y गुणसूत्र के विषय में हम निश्चिंत है कि यह पुत्र में केवल पिता से ही आया है। इस y गुणसूत्र को शक्तिशाली बनाने की विधि हमारे शास्त्रों में भली भांति समझाई गई है। जिस में से कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष नौमी को आमले के पेड़ की पूजा करना भी एक है। इस दिन आमले के नीचे बैठ कर “ॐ धात्रेय: नमः:” मंत्र का जाप करते हुए आमले के पेड़ की जड़ में दूध डालते हैं, उस से जो रसायनिक क्रिया होती है वह पुरुषों में y गुण को सशक्त करती है।

चूँकि y गुणसूत्र स्त्रियों में नही होता यही कारन है की विवाह के पश्चात स्त्रियों को उसके पति के गोत्र से जोड़ दिया जाता है। वैदिक/ हिन्दू संस्कृति में एक ही गोत्र में विवाह वर्जित होने का मुख्य कारण  यह है की एक ही गोत्र से होने के कारण वह पुरुष व् स्त्री भाई बहिन कहलाये क्यूँकी उनका पूर्वज एक ही है । इस लिए हमारी संस्कृति में रक्त की शुद्धता को महत्व दिया जाता है ताकि शुद्ध सगोत्र में शादी न हो। यदि शादियां सगोत्र होती चली जाती हैं तो रक्त की शुद्धता समाप्त हो जाती है जिस के कारण भावी वंश उत्तरोत्तर कमजोर होती जाती है।

 

आज की आनुवंशिक विज्ञान के अनुसार भी यदि सामान गुणसूत्रों वाले दो व्यक्तियों में विवाह हो तो उनकी सन्तति आनुवंशिक विकारों के साथ उत्पन्न होगी। ऐसे दंपत्तियों की संतान में एक सी विचारधारा, पसंद, व्यवहार आदि में कोई नयापन नहीं होता। ऐसे बच्चों में रचनात्मकता का अभाव होता है। विज्ञान द्वारा भी इस संबंध में यही बात कही गई है कि सगौत्र शादी करने पर अधिकांश ऐसे दंपत्ति की संतानों में अनुवांशिक दोष अर्थात् मानसिक विकलांगता, अपंगता, गंभीर रोग आदि जन्मजात ही पाए जाते हैं। शास्त्रों के अनुसार इन्हीं कारणों से सगौत्र विवाह पर प्रतिबंध लगाया था।

आंवला नौमी पूजा की प्रथा से यह प्रत्यक्ष होता है कि हमारे पूर्वजों ने ऐसी प्रथाएं चलाईं जिस से सूर्य के आरोही होने के पश्चात जैसे जैसे सूर्य अपने उच्च स्थान की ओर बढ़ता है वैसे वैसे मनुष्य के शरीर के तत्व रूपी देव भी सशक्त होने के कारण उनको पुत्र प्राप्ति के लिए मार्गदर्शन दिया जाता है।

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