उस नक्शे में उन्होंने एक पतली लाइन खींची – महाकाल मन्दिर के दक्षिणी द्वार से शुरू होकर, भाट गली के बीच से, फिर तेली गली के कोने वाली हलवाई की दुकान के पीछे से, फिर एक टूटी हुई धर्मशाला – जिसे आज *लखेर धर्मशाला* कहते हैं – और फिर सीधा शिप्रा के उस पार, जहाँ आज कोई नहीं जाता – अगस्त्य मुनि का पुराना आश्रम, जहाँ कहा जाता है अगस्त्य ने शिप्रा को दक्षिण लाने के लिए तप किया था।
यह मार्ग कोई आम मार्ग नहीं था। यह परिक्रमा मार्ग था, जो महाकाल से शुरू होकर अगस्त्य आश्रम तक जाता था, जहाँ से शिप्रा का पानी लाकर महाकाल का अभिषेक होता था। 18वीं सदी तक यह मार्ग खुला था।
अंग्रेजों को खबर मिली कि क्रान्तिकारी इसी मार्ग से भागकर शिप्रा पार चले जाते हैं, क्योंकि अंग्रेजी पुलिस को इस मार्ग का पता नहीं। 1931 में एक क्रांतिकारी – राजेंद्र नाथ लाहिड़ी के साथी – इसी मार्ग से भागे थे।
अंग्रेज कलेक्टर ने पण्डित जी को बुलाया – “यह मार्ग बन्द कर दो, यहाँ से क्रान्तिकारी भागते हैं।”
पण्डित जी ने कहा – “यह मार्ग बन्द नहीं हो सकता, यह आस्था का मार्ग है। इसे बन्द करोगे तो शिप्रा रूठ जाएगी।”
अंग्रेजों ने नहीं सुनी। 1932 की बरसात में, उन्होंने उस पगडंडी पर 12 फीट ऊँची दीवार बना दी। ईंट और चूने की दीवार, जिस पर लिखा – *”Trespassing is Prohibited”।*
मार्ग बन्द। नक्शे से भी हटा दिया। नए नक्शे छपे, उस मार्ग का नाम ही गायब।
पर कहानी कहती है – मार्ग आज भी है।
लोग कहते हैं, अमावस्या की रात को, जब शिप्रा में पानी कम होता है, तो दीवार के बीच एक दरार दिखती है, और उस दरार से दिये की रोशनी आती है।
मैंने 2023 में उसे देखा, अपनी आँखों से।यह स्वनुभव है।
मैं भाट गली वाले दिये की कहानी के लिए घूम रहा था, वही कहानी जहाँ 12 दिये जलते हैं। रात 11 बजे, अँधेरा था, लाइट नहीं थी, क्योंकि ट्रांसफार्मर खराब था। मैं भाट गली से निकल रहा था, हाथ में टॉर्च लिए।
तभी एक बूढ़ा मिला – धोती पहने, लाठी टेकते हुए। बोला – “बेटा, अगस्त्य आश्रम जाओगे?”
मैंने चौंककर कहा – “कहाँ है? वहाँ तो दीवार है।”
उसने उँगली से दिखाया – जहाँ दिन में दीवार थी, वहाँ एक छोटा सा रास्ता खुल गया, जैसे दो मकानों के बीच से किसी ने पर्दा हटा दिया हो। दिन में वहाँ सिर्फ कचरा दिखता है, बदबू आती है, पर रात में, उस समय, वहाँ एक पगडंडी दिखी, जिस पर छोटे-छोटे दिये जल रहे थे, हर 10 कदम पर एक दिया, जैसे किसी ने अभी-अभी जलाए हों। हवा नहीं थी, दिये टिमटिमा रहे थे।
मेरी टॉर्च बन्द हो गई। पर दियों की रोशनी काफी थी।
मैं उस पगडंडी पर चला। डर भी लग रहा था, और एक अजीब सुकून भी। पगडंडी पत्थरों की बनी थी, बहुत पुरानी, बीच में तुलसी उगी हुई। दोनों तरफ बेलपत्र के पेड़।
10 मिनट चला, मुश्किल से 400 मीटर, पर लगा जैसे 400 साल चल लिया हो। शिप्रा का किनारा आ गया, जहाँ एक छोटा सा टूटा आश्रम था, जिसमें एक शिवलिंग था, काला, पानी से घिसा हुआ, और वहाँ एक साधु बैठा था, आँखें बन्द किए।
आश्रम के बाहर मां शिप्रा बह रही थी, पर आवाज नहीं कर रही थी, बिल्कुल शान्त।
साधु ने आँख खोले बिना कहा – “बहुत दिन बाद कोई इस मार्ग से आया है, 7 महीने बाद।”
मैंने पूछा – “आपको कैसे पता चला?”
“दियों से। जब कोई सच्चे मन से आता है, तो दिये खुद जल जाते हैं।”
मैंने पूछा – “यह मार्ग सबको क्यों नहीं दिखता? गूगल मैप पर क्यों नहीं है?”
साधु मुस्कुराया, बोला – “क्योंकि यह नक्शे का नहीं, *नीयत का मार्ग है।* जो शिप्रा से कुछ माँगने नहीं, शिप्रा को कुछ देने जाता है, उसे ही दिखता है। जो सेल्फी लेने जाता है, उसे दीवार दिखती है, जो प्रार्थना करने जाता है, उसे मार्ग दिखता है। गूगल आँख से देखता है, यह मार्ग मन से दिखता है।”
“यह आश्रम?”
“यह अगस्त्य का आश्रम है। यहाँ अगस्त्य ने शिप्रा को रोककर कहा था – तू यहीं रहेगी, उज्जैन को पवित्र करेगी। शिप्रा ने कहा – मैं रहूँगी, पर मेरा मार्ग गुप्त रहेगा, सिर्फ उसे दिखेगा जो प्यासा नहीं, प्यास बुझाने वाला होगा।”
मैं वहाँ 20 मिनट बैठा। साधु ने मुझे चरणामृत दिया – शिप्रा का पानी, तुलसी के साथ।
“जाओ, पर किसी को बताना मत कि मार्ग कहाँ है, पर बताना कि मार्ग कैसे दिखता है।”
मैं वापस आया, उसी पगडंडी से। जैसे ही भाट गली में कदम रखा, पीछे देखा – दीवार वापस। कोई पगडंडी नहीं, कोई दिया नहीं। सिर्फ कचरा और बदबू।
सुबह फिर गया, दिन में, वहाँ दीवार थी, कोई मार्ग नहीं। मैंने ईंटें गिनीं, 12 फीट ऊँची, 1932 की ही लगती थीं।
मैंने कई लोगों को वहाँ ले जाकर दिखाने की कोशिश की – मेरे दोस्त, सहपाठी इंजीनियर, पत्रकार, एक प्रोफेसर – किसी को नहीं दिखा। सबने कहा – “यहाँ तो दीवार है, तुम पागल हो गए हो।”
पर एक बार एक 8 साल की बच्ची, गुड़िया, जो भाट गली में रहती थी, जिसके पिता दिये बनाते हैं, उसने कहा – “भैया, यह रहा रास्ता, आप इस तरफ से क्यों नहीं जा रहे?”
मैंने देखा, उसे दिख रहा था। वह उँगली से ठीक वही पगडंडी दिखा रही थी, जो मैंने रात में देखी थी।
उसकी माँ ने कहा – “इसे रोज दिखता है, यह कहती है, यहाँ से बूढ़े बाबा आते हैं, इसे टॉफी देते हैं। हम तो इसे डाँटते हैं, झूठ बोलती है।”
तब समझ आया – यह मार्ग बच्चों को, बूढ़ों को, और उन्हें दिखता है, जिनपर कृपा हो,
जिनका मन साफ है, जिनमें लालच नहीं। गूगल मैप को नहीं दिखता, क्योंकि गूगल मैप आँख से देखता है, मन से नहीं। सरकार को नहीं दिखता, क्योंकि सरकार कागज से देखती है।
मैंने आर्काइव में जाकर 1932 वाला असली नक्शा देखा। वहाँ वह मार्ग आज भी है, पतली लाइन में, नोट लिखा है – “This path is not for revenue purposes, it is for pilgrimage, it disappears when not needed.”
अंग्रेज समझ गए थे, यह मार्ग ईंट से बन्द नहीं होता।
आज भी वह नक्शा मेरे पास है, उसकी फोटोकॉपी। मैं उसे देखता हूँ, और वह पतली लाइन देखता हूँ – *भाट गली से अगस्त्य आश्रम मार्ग।*
जब भी उज्जैन रहता हु, अमावस्या पर रहता हु,मैं अमावस्या को रात 11 बजे वहाँ जाता हूँ। कभी-कभी मार्ग दिखता है, कभी दीवार। जिस दिन मन में कोई माँग नहीं होती, सिर्फ देने की भावना होती है – कि चलो शिप्रा के किनारे दिया जला आऊँ – उस दिन मार्ग दिखता है।
पिछली बार, अमावस्या को मैं एक दिया लेकर गया, शिप्रा किनारे जलाया, और वापस आया। पीछे देखा तो 5-6 दिये और जल रहे थे, जो मैंने नहीं जलाए थे। मतलब कोई और भी आया था, उस मार्ग से।
उज्जैन के पुराने नक्शे में दिखाया गया वह मार्ग, जो आज भी केवल कुछ लोगों को दिखाई देता है, असल में कोई गली नहीं, एक परख है – कि क्या तुम आज भी उन रास्तों पर चल सकते हो, जो नक्शे पर नहीं, दिल पर बने हैं। जो गूगल पर नहीं, परम्परा पर बने हैं।
यदि तुम उज्जैन जाओ, भाट गली में जाओ, और वहाँ दीवार देखो, तो समझना मार्ग बन्द नहीं, तुम्हारी नजर बन्द है। आँख बन्द करो, मन खोलो, शिप्रा का नाम लो, और फिर देखो – शायद दो ईंटों के बीच से एक रोशनी आए, एक दिया जले, और एक मार्ग खुले, जो सिर्फ तुम्हारे लिए है।
और यदि खुले, तो चुपचाप चले जाना, किसी को बताना मत, क्योंकि बताते ही वह फिर दीवार बन जाएगा।
भारत ऐसे अनगिनत रहस्यों से भरा है। हम पूछना भूल गए
*श्रद्धावान लभते ज्ञानम* लिखा है भगवद्गीता में। हमारी समस्या यह है, अंग्रेज हमे अंगूठा चूसने सिखा गए, और हम ताउम्र चूसते रहेंगे
आपका क्या ख्याल है??
जय बाबा महाकाल ❤️
देव को मानें या न मानें,
इस झंझट में मैं नहीं पड़ता,
हमारी मान्यता के बिना भी
देव का कुछ नहीं रुकता..!
जिन्हें देव चाहिए,
उनके लिए वह सांस है,
जिन्हें देव नहीं चाहिए,
उनके लिए वह भ्रम है,
आस्तिक-नास्तिक के विवाद में
मैं कभी नहीं पड़ता,
हमारी मान्यता के बिना भी
देव का कुछ नहीं रुकता..!
हार लेकर कभी
मैं कतार में खड़ा नहीं होता,
आधा किलो पेड़े की रिश्वत
मैं देव को कभी नहीं देता,
जो दुनिया को भर-भरकर देता है,
उसे मैं कभी कुछ नहीं देता,
हमारी मान्यता के बिना भी
देव का कुछ नहीं रुकता..!
जो होना ही है,
वह कभी टलता नहीं,
चारपाई पर बैठकर
कोई भी हरि प्रसन्न नहीं होता,
इसलिए मैं कभी
देव को बंधक बनाकर नहीं रखता,
हमारी मान्यता के बिना भी
देव का कुछ नहीं रुकता..!
देव कभी केवल मंदिर में नहीं होता…
वह खेतों में मेहनत करता है,
वह सीमा पर लड़ता है,
वह कभी आनंदवन में होता है,
कभी हेमलकसा में होता है,
देव स्कूल में पढ़ाता है,
वह आंगनवाड़ी में बच्चों के साथ खेलता है,
वह अस्पताल में सेवा और देखभाल करता है,
इसलिए…
इन सबके भीतर बसे देव को मैं कभी नकारता नहीं,
हमारी मान्यता के बिना भी
देव का कुछ नहीं रुकता..!
— कुसुमाग्रज