
कार्यक्रम शुरू हुआ… त्योहारों का मौसम शुरू होते ही जगह-जगह ऐसे कार्यक्रमों का आयोजन होने लगता है। वाद-विवाद, नाटक, नृत्य और ऐसी कई कलाओं को निखारने वाला मंच मिलने लगता है।
मैं एक सोसायटी के कार्यक्रम की बात कर रहा हूँ। बाल-नाटक शुरू हुआ… विषय था, “अ स ल”… यह कैसा शीर्षक? इसका क्या मतलब? मन में विचार आया कि शायद स्पेलिंग में कोई गलती हो गई होगी। केवल कौतूहलवश मैं वह नाटक देखने लगा… और नन्हे कलाकारों द्वारा प्रस्तुत एक अत्यंत सुंदर और मन को छू लेने वाला कलात्मक अनुभव मुझे देखने को मिला, जो हमेशा मेरी स्मृति में रहेगा।
कहानी कुछ ऐसी थी… कि तीन देवियाँ—यानी अन्नपूर्णा, सरस्वती और लक्ष्मी—स्वर्ग में आपस में बातचीत कर रही हैं। उन्हें लगता है कि एक बार पृथ्वी पर चलना चाहिए, एक चक्कर लगाकर आना चाहिए। इसलिए वे वेश बदलकर एक घर पहुँचती हैं। इस काम के लिए वे एक आम मध्यमवर्गीय व्यक्ति का घर चुनती हैं। फिर वहाँ उन्हें जो अनुभव होते हैं, उन्हीं की जीवंत प्रस्तुति इस छोटे से नाटक का सार थी।
दिखाया गया कि तीनों वेश बदलकर उस घर पहुँचती हैं। एक मध्यमवर्गीय व्यक्ति के फ़्लैट का दृश्य अपने नेपथ्य (मंच-सज्जा) से साकार करना… इसके लिए उस छोटे नेपथ्यकार की दाद देनी ही पड़ेगी। घर के दरवाज़े पर ही फैला हुआ चप्पलों का ढेर, और वहाँ से लेकर बालकनी में सूखते कपड़े तक—इतना यथार्थवादी दृश्य खड़ा करने में वह नन्हा मंच-सज्जाकार पूरी तरह सफल रहा।
नाटक में एक काल्पनिक दृश्य दिखाया गया कि ये तीनों उस व्यक्ति के घर पहुँचती हैं। यानी वहाँ जाने की वजह आदि का ज़्यादा विचार किए बिना ही उन्हें अंदर प्रवेश मिल जाता है, और यहीं से यह नाटक सही मायने में शुरू होता है।
घर में एक छोटा परिवार है। इन तीनों को बैठाने के बाद, काफ़ी देर तक ये तीनों ही हॉल में अकेली बैठी रहीं। माँ रसोई में, पिता को कोई फ़ोन आया तो वे फ़ोन पर व्यस्त, और बच्चे बेडरूम में… “मेहमानों को कुछ देर हॉल में अकेले बैठने की आदत डाल लेनी चाहिए”—यह बदलते युग का पहला सबक था। यह एक सबक है, यह बैकग्राउंड में आ रही सूत्रधार की आवाज़ से साफ़ समझ आ रहा था।
“चाय पिएँगे क्या?”—मेज़बान की ओर से सवाल आया। “हाँ, चलेगी”—वे कहतीं, उससे पहले ही मेज़बान बोले, “मतलब, हमारी तो अभी-अभी हुई है… आपको चाहिए तो बनाने को कहता हूँ।” यह बात सुनते ही तीनों ने चाय के लिए मना कर दिया। पीछे से सूत्रधार की आवाज़ आई—”आधुनिक युग का आतिथ्य सत्कार… दूसरा सबक।”
सरस्वती माँ के मन में यह जानने का बड़ा कौतूहल था कि इस घर में नई शिक्षा या ज्ञान को क्या महत्व दिया जाता है। लेकिन कुल मिलाकर घर के सभी लोग कुछ नया सीखने के बजाय AI के ज़रिए सब कुछ झटपट और रेडीमेड करने की फ़िराक में दिखे। अब क्या, सब कुछ तो आसान हो गया है… बटन दबाया नहीं कि जो चाहिए वह सामने! दिमाग पर ज़ोर डालने की तो ज़रूरत ही नहीं रही। किताबें पढ़ना वगैरह तो अब बीते ज़माने की बात हो गई। आप बस विषय बताइए… रेडीमेड जानकारी के महाजाल (इंटरनेट) से मनचाहा मुद्दा मनचाहे तरीके से सामने आ जाता है। सीखने और मनन-चिंतन की अब कोई ज़रूरत ही नहीं बची। पिताजी और इस बीच रसोई से बाहर आ चुकी माँ आपस में बातें कर रहे थे। ‘व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी’ नाम से शुरू हुई नई व्यवस्था कितनी प्रभावशाली है, इस पर भी खूब चर्चा चल पड़ी। कुल मिलाकर, उस घर में सरस्वती का वजूद कितना है यह समझ आने पर सरस्वती माँ चुपचाप एक कोने में जाकर बैठ गईं।
लक्ष्मी माँ को घर में काफ़ी हद तक स्थिरता और संपन्नता महसूस हो रही थी। बातचीत चल ही रही थी कि तभी बेडरूम से बेटी बाहर आई और अपने पिता से पाँच हज़ार रुपये माँगने लगी। “किसलिए?” पूछने पर उसने कहा, “आज दोस्तों के साथ फ़लाँ-फ़लाँ जगह पार्टी है। वैसे तो शायद ज़्यादा ही लगेंगे, पर अगर और ज़रूरत पड़ी तो मैं आपको G-Pay करने के लिए कह दूँगी।” इतना कहकर वह पैसे लेकर चली गई।
“पापा, दशहरा पास आ गया है… आप मुझे iPhone दिलाने वाले थे ना? मैंने पूरी रिसर्च कर ली है। फ़ेस्टिवल ऑफ़र में सिर्फ़ नब्बे हज़ार में मिल रहा है। ले ही लेते हैं, इससे सस्ता तो मुझे नहीं लगता फिर मिलेगा।” पिताजी ने हामी में सिर हिलाया, और लड़का खुशी से नाचने लगा। नाटक में उस लड़के की उम्र तेरहवीं कक्षा की थी—यानी लगभग उन्नीस साल।
शाम के करीब सात बज चुके थे। बच्चों की माँ ने मंदिर में दीया जलाया। नाटक में लक्ष्मी माता के चेहरे पर एक सूक्ष्म सा संतोष दिखा। लेकिन उसी समय घर के बाकी तीन सदस्यों के मौजूद होने के बावजूद, उन्हें महसूस हुआ कि दीये को प्रणाम करना केवल औपचारिकता बनकर रह गया है। जहाँ लक्ष्मी माँ को ‘शुभंकरोति’ (संध्या वंदना) सुनने की उम्मीद थी, ठीक उसी समय ‘सैराट’ फ़िल्म के ‘झिंगाट’ गाने की रिंगटोन बज उठी। पीछे से सूत्रधार के शब्द गूँजे— “शाम की संध्या-आरती… पहले से कुछ बदली-बदली सी…”
“चलिए, सब मिलकर डिनर करते हैं”—घरवालों ने तीनों माताओं से आग्रह किया। “नहीं-नहीं, आप क्यों तकलीफ़ कर रहे हैं?” माताओं ने कहा। “अरे, इसमें कैसी तकलीफ़? पंद्रह मिनट में सब आ जाएगा!” …और वाकई, सब कुछ आ भी गया।
थालियाँ परोसी गईं… किसी अजीब से कंटेनर से निकला लाल रंग का पानी, जिसे सब ‘मनचाऊ सूप’ कह रहे थे, वह उन्हें दिया गया। साथ ही गाढ़ी ग्रेवी में डूबे हुए पत्तागोभी के कुछ गोले, जिनमें लंबी डंडी लगी थी—और जिसे ‘वेज लॉलीपॉप’ कहा जा रहा था—उनकी थाली में परोसे गए। फिर कुछ देर बाद नारंगी रंग के चावलों ने दस्तक दी… साथ ही अजीबोगरीब नामों वाली तरह-तरह की चटनियाँ भी थीं। आखिर में मीठे के तौर पर ‘वॉफ़ल’ नाम की कोई चीज़ सामने आई। यह सब शांति से देख रही और भीतर से पूरी तरह व्यथित अन्नपूर्णा माता कुछ नहीं बोल रही थीं। पौष्टिक भोजन का यह नया रूप उनकी आँखों के ठीक सामने घटित हो रहा था। घर में कभी अन्न-धन की कमी न हो, इसके लिए जिसकी पूजा की जाती है, वही अन्नपूर्णा आज अन्न-धान्य से भरे ऐसे घरों को अपनी आँखों से देख रही थी। पीछे से फिर सूत्रधार की आवाज़ आई—”संपन्न घरों में पौष्टिक भोजन के नए रूप…”
कुल मिलाकर, पृथ्वी पर इस आतिथ्य को स्वीकार कर ‘अ’ यानी अन्नपूर्णा, ‘स’ यानी सरस्वती माता और ‘ल’ यानी लक्ष्मी माता फिर से स्वर्ग की ओर प्रस्थान करती हैं। जाते समय तीनों आपस में कोई बात नहीं करतीं; वे पूरी तरह स्तब्ध और शांत थीं।
और पीछे से सूत्रधार की आवाज़ आती है… “बदलते युग की ‘अ स ल’… जहाँ असलियत (अस्सलपन) खोती जा रही है, और परिभाषाएँ बदल रही हैं…”
नाटक समाप्त हुआ। बच्चों द्वारा प्रस्तुत यह एक अत्यंत सुंदर रचना थी। यथार्थवादी लेखन और वैसा ही निर्देशन। आधुनिक युग में ‘असल’ से ‘अ स ल’ तक का यह सफ़र महज़ दस-पंद्रह मिनट में पेश करने वाले इन बच्चों की जितनी तारीफ़ की जाए, कम है।
आँखों से भ्रम का पर्दा हटा देने वाला यह छोटा सा नाटक लंबे समय तक याद रहेगा, इसमें कोई संदेह नहीं।
असल देकर हम नकल ले रहे हैं, और नकल में जी रहे हैं…
सोचने वाली बात है कि हमने अपनी ज़मीनी हक़ीक़त, अपने संस्कार और अपनी सहजता (असलियत) को खोकर यह कैसी बनावटी और सतही ज़िंदगी (नकल) अपना ली है? सुविधा के नाम पर हमने अपनों का सान्निध्य खो दिया, ज्ञान के नाम पर चिंतन छोड़ केवल सूचनाओं के मोहताज हो गए, और तृप्ति देने वाले सादे अन्न की जगह डिब्बाबंद दिखावे को अपना लिया। हम आधुनिक तो बन रहे हैं, पर भीतर से खोखले होते जा रहे हैं।
ज़रूर कुछ तो गलत हो रहा है… असल में कमी कहाँ रह गई, यह हमें खोजना ही होगा। ज़रा सोचिए, क्या हम भी इसी दौड़ का हिस्सा तो नहीं बन गए?