
रास्ता रोज़ का ही क्यों न हो, आते-जाते हमारा ध्यान कुछ ख़ास चीज़ों पर पड़ ही जाता है। फिर चाहे वह रोज़ दिखने वाला पानी-पूरी वाला हो, झोपड़ी डालकर बैठा मोची हो, या फिर तिरछा उगा हुआ बरगद या नीम का पेड़… हमारा उनसे एक शब्द का भी संवाद नहीं होता, लेकिन देखने के बाद उनका वहाँ होना ज़रूरी सा लगता है।
मेरे भी आने-जाने के रास्ते में ऐसे दो-तीन पड़ाव हैं ही—पड़ाव क्या, मन की तसल्ली के लिए सहेजे गए बहाने! यानी, इसे पार कर लिया तो समझो घर इतना करीब आ गया, बस ऐसा सीधा-सादा हिसाब।
उन्हीं में से एक अहम पड़ाव यानी सरगम सोसायटी में महांबरे मैडम का घर!
मेरा इस घर से पुराना नाता है, क्योंकि स्कूली दिनों में मैं कुछ साल मैडम के पास ट्यूशन पढ़ने जाता था… “अरे, ज़रा जाकर मेरा बिजली का बिल भर आ”, “ज़रा किराने वाले को घर का सामान थमा आ”, “किराने वाले से नारियल बदलवा ला”—उनका अपना बेटा होते हुए भी ऐसे छोटे-मोटे फुटकर काम वे बिना किसी हिचकिचाहट के हम ट्यूशन आने वाले बच्चों से करवा लिया करती थीं।
हम भी कर देते थे। पर उसमें होशियार-कमज़ोर या अमीर-गरीब का कोई भेद नहीं होता था, यह एक अच्छी बात थी। लेकिन ‘मैडम का अपना बेटा होते हुए भी वह हमसे ये काम क्यों करवाती हैं?’—यह सवाल मन में ज़रूर उठता था।
माँ-बेटे के बीच कभी एक शब्द की भी बातचीत हुई हो, ऐसा याद नहीं आता।
बाहर के कमरे में लगातार ट्यूशन चलती रहती थी, इसलिए उस लड़के की आवाजाही अंदर ही अंदर रहती थी। वैसे वह हम सबसे थोड़ा बड़ा था; बाहर कभी मिलता तो बोलता नहीं था, पर पहचानी हुई मुस्कान ज़रूर दे देता था।
लेकिन घर के भीतर? नामुमकिन!
वह बहुत छोटी उम्र में ही खुद चाय बनाकर पीने लगा था। जिस उम्र में हमें गैस या चूल्हे के पास जाने की इजाज़त नहीं थी, बिना वजह माचिस हाथ में ले ली तो थप्पड़ पड़ जाता था, उस दौर में वह गर्म तवे पर मजे से अंडा फोड़ता और अपने हाथों से मिर्च काटता था। उधर उसकी यह तैयारी शुरू होती, इधर बाहर के कमरे में बैठी मैडम की भुनभुनाहट शुरू हो जाती। ऑमलेट की महक फैलती तो हम सिर्फ नज़रों ही नज़रों में एक-दूसरे को इशारा करते; मैडम के ध्यान में यह भी आ जाता, फिर किसी न किसी बहाने थप्पड़ या छड़ी पड़ ही जाती।
फिर भी, मैं मैडम को बुरा नहीं कहूँगा।
स्कूल छूटने के बाद कभी जाकर पता चला कि वह मैडम के पहले पति का बेटा था। माँ ने दोबारा शादी कर ली, इसलिए सातारा छोड़कर मुंबई आना पड़ा—इस बात का गुस्सा उस लड़के के मन में था। महांबरे मैडम के पति उसे गोद लेने को भी तैयार थे, लेकिन अल्हड़ अड़ियल उम्र, उस पर पुराने रिश्तेदारों का दखल!
हमें लगता है कि वे रिश्तेदार हैं, लेकिन अक्सर वे बेमतलब का बखेड़ा ही खड़ा करते हैं। अपना अहंकार परे रखकर निस्वार्थ भाव से हमारा भला सोचने वाला कोई रिश्तेदार शायद ही कभी मिलता है।
हमने मैडम के पति को ज़्यादा देखा ही नहीं था।
देखा तो बस इतना कि मुँह में तुलसी का पत्ता रखा था और अधखुली आँखें थीं। वैसे जाने की उम्र तो नहीं दिखती थी, लेकिन वे चल बसे।
मैडम के रोने की आवाज़ आ रही थी; कोई ढाढ़स बँधाने वाला पास था भी या नहीं, कौन जाने?
सब अपने-अपने अंतिम संस्कार के नियम कड़ाई से निभाने में व्यस्त थे।
लेकिन मेरे ज़हन में वह दृश्य छप गया—जुटे हुए लोगों की भाव-भंगिमा, हर कोई इस बात में खुद को धन्य समझ रहा था कि उसे कितनी बारीकियाँ मालूम हैं।
लेकिन वहाँ भी वह लड़का दिखाई नहीं दिया।
शायद वह माँ के पास ही बैठा होगा, ऐसा सोचकर मैं अपने मन को समझा लेता हूँ।
पर तब से आते-जाते उनके घर की तरफ देखने की मुझे आदत सी पड़ गई।
उनके बेडरूम की बालकनी मेरे रोज़ के रास्ते की तरफ पड़ती थी… दरवाज़ा खुला देखता तो बेवजह राहत मिलती; दरवाज़े के बदले हुए पर्दों पर भी मन का ध्यान चला ही जाता—’चलो, मैडम ठीक हैं’, ऐसा लगता था।
फिर बीच में उनकी बालकनी की मुंडेर पर गुलाब के तीन गमले दिखाई दिए, तब तो सचमुच बहुत खुशी हुई। फिर मैडम कभी-कभार गुलाब के गमलों के पास कुछ न कुछ करती दिख जाती थीं। एक बार उनकी कैंची नीचे गिर गई।
ठीक उसी वक्त मैं सामने से गुज़र रहा था। मैंने कैंची गिरते हुए देखा।
बिल्कुल स्कूली बच्चे की तरह दौड़कर मैंने कैंची उन्हें थमा दी। उन्होंने ‘थैंक यू’ वगैरह कुछ नहीं कहा, लेकिन दिल से मुस्कुरा दीं—मुझे बहुत अच्छा लगा।
मैडम काफी थक चुकी थीं, मुझे अहसास हुआ। मैंने कहा, “अच्छा शौक है यह।”
वे बोलीं, “शौक कैसा रे, पड़ोसी घर छोड़कर चले गए; जाते-जाते ये गमले मेरे गले मढ़ गए। कहने लगे, आपके यहाँ धूप अच्छी आती है, रहने दीजिए।”
मैंने मन ही मन सोचा—गमले ज़्यादा दिन नहीं टिकेंगे।
हुआ भी वैसा ही। आते-जाते देखने की आदत थी, इसलिए गमले गायब हो गए, यह भी मेरे तुरंत ध्यान में आ गया।
ऐसा होते-होते अचानक बालकनी का दरवाज़ा बंद दिखने लगा।
ठीक किस दिन से दरवाज़ा बंद हुआ, यह कहा नहीं जा सकता था, इसलिए मन में एक अजीब सी बेचैनी बनी रही।
असल में मेरा भी अब किसी से ज़्यादा वास्ता नहीं रहा था, आत्मीयता की तो बात ही छोड़िए। फिर इस बंद दरवाज़े के बारे में किसी से पूछता भी तो कैसे?
ज़रा चार कदम चलकर उनके विंग में झाँक लेता तो पता चल जाता कि दरवाज़े पर ताला लटका है या नहीं। लेकिन फिर भी वह हिम्मत नहीं हो रही थी। हाँ, हिम्मत ही!
हम उम्र का एक पड़ाव पार कर चुके हों और हमें दुनियादारी में घुल-मिलकर आम लोगों की तरह जीने की आदत पड़ चुकी हो, तो बिना ज़रूरत किसी जगह जाने के लिए भी हिम्मत जुटानी पड़ती है।
अकारण सवाल खड़े होने का एक काल्पनिक डर हमें जकड़ लेता है।
मुझे भी जकड़ लिया। फिर भी आते-जाते लगातार मैडम का घर बंद देखकर बेचैनी बढ़ती ही जा रही थी।
बेचैनी तब और बढ़ गई जब एक दिन घर लौटते वक्त चार कदम चलकर मैं उनके विंग तक गया। देखा तो ताला नहीं था; फूल की पुड़िया वाला अभी-अभी पुड़िया लटकाकर गया होगा।
वह मुझे गेट के बाहर ही दिख गया। मैंने उससे हिंदी में बात की—पहले फूल देने वाले अपनी ही भाषा के हुआ करते थे, आजकल इनसे भी हिंदी में ही बोलना पड़ता है।
मैंने पूछा, “वो ग्राउंड फ्लोर पर महांबरे जी के यहाँ आप ही फूल देते हो ना?”
वह बोला, “हाँ?”
मैंने पूछा, “वो हमारी टीचर थीं, कैसी हैं वो?”
कंधे उचकाते हुए वह बोला, “क्या मालूम? मैंने तो कभी देखा नहीं। पुड़िया का पैसा लेने सेठ आते हैं, उनको पता होगा।”
बात खत्म हो गई, उत्सुकता और बढ़ गई।
फिर उन्हीं की सोसायटी में रहने वाले सुर्वे से पूछा, “अरे, मैडम कैसी हैं रे?”
यह सवाल सुनकर उसे उनकी याद आई, “अरे हाँ यार! मैं तो बिल्कुल भूल ही गया था। पता नहीं, देखना पड़ेगा। छोड़ ना, तुझे क्या फिर से ट्यूशन जॉइन करनी है?” कहते हुए वह हँस पड़ा; मुझसे तो हँसते भी नहीं बना।
फिर एक दिन मैडम से सीधे मिलने वाली एक महिला मिल गई—उनकी बर्तन-झाड़ू करने वाली चंद्री की बेटी अर्चना।
मैंने उसे आवाज़ दी और पूछा, “मैडम कैसी हैं?”
“ठीक हैं,” वह बोली, “फ्रोज़न शोल्डर का दर्द लगा हुआ है, पर बाकी ठीक हैं। अस्सी साल पार कर चुकी हैं, उस हिसाब से काफी एक्टिव हैं।”
सुनकर तसल्ली हुई, लेकिन फिर उन्हें देखने की तड़प जाग उठी। ठीक हैं, तो दिखती क्यों नहीं? हमेशा दरवाज़ा बंद क्यों रखती हैं? फिर जाकर दरवाज़े पर खड़ा हुआ, घंटी बजाई—घंटी बंद थी। दरवाज़े पर दस्तक दी, कोई जवाब नहीं।
तभी अचानक याद आया कि उनकी रसोई का एक पिछला दरवाज़ा भी है।
उस वक्त मेरे पास फुर्सत थी; बात का आर-पार करना था, तो वक्त देना ही था।
मैं पिछले दरवाज़े की तरफ गया। पिछले दरवाज़े पर जाने का मतलब था पूरी इमारत का चक्कर काटकर जाना, बीच में एक संकरा सा छोटा गेट भी पार करना। पर सब पार करते हुए आखिरकार मैं पिछले दरवाज़े तक पहुँच ही गया।
देखा तो वहाँ एक छोटा सा लेकिन खूबसूरत फूलों का बगीचा खिला हुआ था।
पिछला दरवाज़ा पूरा खुला था, ढलते सूरज की किरणें बेडरूम के अंदर तक फैली हुई थीं, और दरवाज़े के पास आरामकुर्सी डालकर मैडम किताब पढ़ती बैठी थीं।
पहले से ज़्यादा थकी हुई थीं, ढलती उम्र के निशान अब और साफ़ झलक रहे थे, लेकिन फिर भी वे सलीकेदार लग रही थीं, बिल्कुल भी अस्त-व्यस्त नहीं।
मुझे सचमुच बहुत खुशी हुई, और मुझे देखकर मैडम को भी सुकून मिला—यह अलग से बताने की ज़रूरत नहीं थी।
“आओ, आओ,” कहते हुए उन्होंने हाथ में एक डायरी उठा ली। “इधर किधर?” उन्होंने रस्मी तौर पर पूछा।
मैंने कहा, “क्या मैडम? पूरी इमारत का चक्कर काटकर आपके दरवाज़े पर आया हूँ तो…” वे हँस पड़ीं।
और डायरी में मेरा नाम लिखने लगीं।
मैं हँसकर बोला, “मैडम, जब ट्यूशन पढ़ने आता था तब तो कभी अटेंडेंस नहीं ली, और आज हाज़िरी लगा रही हैं?”
मैडम बोलीं, “अरे, तेरी यह अभी की मौजूदगी मेरे लिए असली है।”
“मतलब?”
“मतलब? मतलब क्या बताऊँ… पिछले एक साल से मेरा यह प्रयोग चल रहा है।”
“प्रयोग?”
“हाँ! प्रयोग ही तो है। पिछले एक साल से मैंने खुद को दुनिया से काट लिया है! अकेलेपन के मेरे ऊपर हावी होने से पहले, मैंने ही उस पर काबू पा लिया। मैंने सोचा—
चल, किस्मत ने अकेलापन दिया है तो हम भी अपनी किस्मत आज़माते हैं, इसलिए अगला दरवाज़ा बंद कर रखा है। जो मुझे ढूँढते हुए रास्ता मोड़कर पिछले दरवाज़े तक आएगा, उसी की मेरे जीवन में सच्ची मौजूदगी मानी जाएगी। बाकी सब तो घड़ी-दो-घड़ी के मुसाफ़िर हैं।”
“निभ जाती है ऐसी ज़िंदगी?” मैंने पूछा।
“मैंने निभा ली। और कुछ हद तक अपने लिए मैं कामयाब भी रही हूँ। मैं विरक्त नहीं हुई, लेकिन अब आसक्त भी नहीं रही। पूरी तरह मुँह मोड़कर भी जो सामने आ जाए, उसे अपना मान लेने का तय किया है।
इसलिए सुबह साढ़े चार बजे उठती हूँ, जूते पहनकर सोसायटी के कभी पाँच तो कभी सात चक्कर लगाती हूँ। बाउंड्री के पास झुककर दूधवाले से दूध ले लेती हूँ; पहले कभी इस शॉर्टकट के बारे में सोचा ही नहीं था। गरमा-गरम दूध की दो कप चाय पीकर खुद में ही तृप्त हो जाती हूँ। फिर नहा-धोकर पूजा-पाठ… सच में, पूजा में बहुत अच्छा वक्त कट जाता है। लगता है कि मंदिर में विराजे ये सारे भगवान मुझ पर ही निर्भर हैं—मैं नहलाऊँगी तो साफ़ होंगे, मैं भोग लगाऊँगी तो इनका पेट भरेगा, मैं फूल चढ़ाऊँगी तो इन्हें याद आएगा कि ये भगवान हैं, मैं दीया जलाऊँगी तो इन्हें उजाला मिलेगा, वरना अंधेरे में ही बैठना पड़ेगा!
बाकी सारे काम-काज एक संस्था को सौंप दिए हैं, उनके लोग आकर मेरे सारे बिल वगैरह भर देते हैं। गुज़ारे भर के लिए बहुत पैसा है, तुम्हारा जीएसटी वगैरह मुझे डरा नहीं सकता। पेट के जाए बेटे ने जब मुँह मोड़ लिया, तो मैंने पूरी दुनिया से मुँह मोड़ने की इजाज़त खुद को दे दी।
और मैंने भी पिछला दरवाज़ा खुला रखकर दुनिया को पीठ के पीछे समेट लिया है।
चंद्री और अर्चना को पूरा मेहनताना देती हूँ, वे दोनों जो भी काम हो कर देती हैं, पर मैं ज़्यादा काम बताती ही नहीं। अधिकतर काम अपने खुद ही निपटा लेती हूँ। एक बार सुबह टहलने के बाद रात को फिर सोसायटी के तीन-चार चक्कर लगाती हूँ, तब कोई साथ चाहिए होता है। अर्चना इसलिए नहीं आती कि मैं पैसे देती हूँ, बल्कि उसे सचमुच मेरी फ़िक्र होती है इसलिए आती है। टीवी सीरियल देखना बिल्कुल बंद कर दिया, तो लगा जैसे खुद को आज़ाद कर लिया हो; बेवजह सिर का दर्द मोल लेना!”—कहते हुए मैडम उठने लगीं।
मैंने फ़िक्र से पूछा, “क्या चाहिए?” उन्होंने इशारे से ‘कुछ नहीं’ कहते हुए मुस्कुराकर कहा, “बैठ, तेरे लिए चाय बनाती हूँ।”
मैंने संकोच से कहा, “रहने दीजिए मैडम, क्या ज़रूरत है बेकार में।”
वे उत्साह से बोलीं, “अरे पी ले, मैं भी शाम की चाय तभी पीती हूँ जब कोई साथ हो। कल ही संस्था के लोगों ने गेहूँ के टोस्ट भेजे हैं, पचने में हल्के और कुरकुरे।”
ऐसा कहकर वे उठीं, कटोरी में सूजी का एक लड्डू निकालकर रखा और मुझसे बोलीं, “जाते वक्त याद से खा लेना।”
मैडम जैसे ही उठीं, मैंने उनकी डायरी उठा ली।
सौ पन्नों की डायरी थी, लेकिन पहला पन्ना भी पूरा नहीं भरा था—मुश्किल से छह-सात नाम लिखे थे।
मुझे अंदर से बहुत अफ़सोस हुआ—हमारे बीच का ही, रोज़ दिखने वाला कोई इंसान अचानक गायब हो जाता है, और हमें उसकी सुध लेने की भी ज़रूरत महसूस नहीं होती?
मैं अपने ही ख्यालों में खोया था कि मैडम चाय लेकर आ गईं। कप मेरे सामने रखते हुए फुर्ती से मुझसे डायरी वापस ली और बोलीं, “अरे बाबा, बहुत ज़रूरी डायरी है यह।”
“क्यों?” मैंने पूछा।
वे हँसते हुए बोलीं, “जब जाऊँगी, तब के लिए संस्था के लोगों से कह रखा है—इस डायरी में जिनके नाम दर्ज होंगे, उन्हें मेरे अंतिम दर्शन के लिए बुलाना। वक्त होगा तो आ जाएँगे, लेकिन जो भी आएँगे, वे इस घर से अपनी पसंद की कोई भी चीज़ ले जा सकते हैं। घर तो मैं संस्था को ही देने वाली हूँ, क्योंकि उनका काम दिन-ब-दिन बढ़ रहा है और उनके पास जगह की कमी है।”
फिर उन्होंने और भी बहुत सी बातें कीं, लेकिन डायरी में एक नाम और बढ़ जाने की खुशी वे अपने चेहरे पर छिपा नहीं पाईं।
एक ही वाकया क्या आपने कभी दो अलग-अलग लोगों के मुँह से सुना है?
वह बेहद भावुक कर देने वाला अनुभव होता है। मैंने यह मार्मिक अनुभव खुद जिया है।
जो बात शुभांगी ने अपनी आँखें पोंछते हुए मुझे बताई थी, वही बात कुछ समय बाद कुणाल ने भी भरे गले से मुझे सुनाई। और दोनों ही बार मेरा गला रुँध गया था।
संदीप और शुभांगी की शादी में मैं मौजूद था। संदीप की तमन्ना थी कि शुभांगी को गाजे-बाजे के साथ, यानी बारात निकालकर घर ले जाए। लेकिन गली के मुहाने पर ही मैरिज हॉल था! बारात निकालने का क्या तुक? इसलिए उसने कह दिया था, “कोई बात नहीं। जब पहली बेटी होगी, तो उसे बाजे-गाजे के साथ घर लाऊँगा।”
लेकिन वह संयोग नहीं बना। शादी को पाँच-छह साल बीत गए, पर कोई किलकारी नहीं गूँजी। और वह दौर ऐसा था कि ज़िंदगी की पटकथा समाज पहले से तय कर देता था; उस हिसाब से पहले दो सालों में ही बात बन जानी चाहिए थी। पर वैसा नहीं हुआ।
संदीप का बड़ा भाई इशारों-इशारों में सुझाने लगा था—”तू मेरे छोटे बेटे को गोद ले ले।” लेकिन दिल से उन दोनों को यह बात जँच नहीं रही थी, उन्हें अपना खुद का बच्चा चाहिए था।
हमने भी कहा, “अगर दिल से नहीं लगता तो किसी के दबाव में मत आओ। लेकिन जब दिल गवाही दे, तो बच्चा ज़रूर गोद लेने का सोचना।”
सास भी पीछे पड़ी रहती थीं, “जेठ इतना कह रहा है तो शार्दुल को गोद ले लो ना। अभी छोटा ही तो है। ज़रा लाड़-प्यार दोगे तो घुलने-मिलने में देर नहीं लगेगी।” प्यार तो था ही, लेकिन गोद लेने की इच्छा नहीं हो रही थी।
तभी एक पारिवारिक समारोह में उनके कानों में कुणाल की दास्तान पड़ी। मुश्किल से महीने भर का मासूम था कि उसके माँ-बाप चल बसे थे। बुआ संभाल रही थी, लेकिन उससे ‘यह’ ज़िम्मेदारी उठाई नहीं जा रही थी। फिर जिसने यह बात बताई थी, उसी के साथ ये दोनों कुणाल को देखने एक पुरानी टूटी-फूटी चॉल में गए।
बच्चे को देखते ही शुभांगी की आँखों से आँसू छलक पड़े। शुभांगी ने बच्चे को सीने से लगाया तो देखा कि वह तेज़ बुखार से तप रहा था, छाती भी जकड़ी हुई थी। सारा भरोसा बस घरेलू नुस्खों पर टिका था।
कुल मिलाकर हालात देखकर साफ था कि बुआ से यह सब नहीं संभलने वाला। दोनों ने कहा, “गोद लेने के कानूनी कागज़ात बाद में करवा लेंगे, लेकिन हम बच्चे को अभी ले जा रहे हैं।” बुआ ने भी कोई मीन-मेख नहीं निकाली। उसने संदीप और शुभांगी को देखते ही भाँप लिया था कि इन दोनों के हाथों में उसके भतीजे का भविष्य सुरक्षित और उज्ज्वल है।
संदीप ने कुणाल को उठाया और सीधे चौबल के नर्सिंग होम में भर्ती कराया। डॉक्टर चौबल ने कहा, “अगर दो दिन और देर कर देते, तो बच्चा हाथ से निकल जाता।”
लेकिन संयोग अच्छा था। बच्चा बच गया। शुभांगी की गोद में समा गया। गोद लेने की सारी कानूनी औपचारिकताएँ पूरी हो गईं। संदीप के घरवालों ने जानबूझकर कोई उत्साह नहीं दिखाया, वे बेरुखे ही बने रहे।
कुणाल के घर आते ही शुभांगी ने अपनी सोने जैसी नौकरी छोड़ दी। सबने उसे पागल कहा, लेकिन कुणाल की ममता में वह सचमुच पागल हो चुकी थी। संदीप सी.ए. था और उसकी प्रैक्टिस बहुत अच्छी चल रही थी, इसलिए पैसों की कोई चिंता नहीं थी। और जब मनचाही चीज़ें होने लगती हैं, तो सब अच्छा ही होता चला जाता है—वैसा ही हुआ।
कुणाल चार साल का हुआ और शुभांगी गर्भवती हो गई। इसके बाद सास का बर्ताव ही बदल गया। शुभांगी की सेहत की फ़िक्र का बहाना बनाकर वे मीठी-मीठी बातें करके कुणाल को शुभांगी से दूर रखने की कोशिश करने लगीं। दोनों की सतर्कता की वजह से वे ज़्यादा कामयाब तो नहीं हो पाईं, लेकिन शुभांगी को उनकी नीयत समझ में आ चुकी थी।
समय आने पर शुभांगी को बेटा हुआ। दोनों को बेटी की उम्मीद थी, लेकिन बेटा होने की खुशी भी कम नहीं थी।
सास “यह मेरा असली पोता है” जैसी बातें बघारने लगी थीं, लेकिन सही वक्त पर उन्हें चुप कराने की हिम्मत संदीप दिखा देता था। फिर भी कुणाल के लिए शुभांगी का दिल और भी ज़्यादा संवेदनशील हो उठता था। ‘कोई कैसा भी बर्ताव करे, पर मेरे प्यार में कोई कमी या फ़र्क नहीं आना चाहिए’—यही धुन उसके मन पर सवार थी।
कुणाल को छोटे बच्चे से बहुत लगाव था, और छोटा बच्चा भी अपने भैया का लाडला था। भैया को देखते ही वह खिलखिला उठता, हाथ-पाँव मारकर ऐसी किलकारियाँ मारता कि सास का सिर भन्ना जाता।
लेकिन सास एक बात का खास ख्याल रखती थीं—जब भी शुभांगी छोटे को दूध पिलाने बैठती, वे कुणाल को वहाँ बिल्कुल फटकने नहीं देती थीं।
शुभांगी को यह बात समझने में थोड़ा वक्त लगा, लेकिन जब समझ आया तो उसे गहरा सदमा पहुँचा।
‘अश्वत्थामा की माँ ने दूध न होने पर अपने बच्चे को सत्तू के आटे में पानी मिलाकर दूध कहकर पिलाया था। हमने भी मिल्क पाउडर पानी में घोलकर कुणाल को पिलाया था। लेकिन अश्वत्थामा कभी न कभी तो माँ की छाती से लगकर उसका दूध पिया ही होगा; मेरे बच्चे की किस्मत में तो वह भी नहीं रहा। दोनों में फर्क बस इतना ही तो…’
यह पागलों जैसी लगने वाली टीस वह किसी से कह भी नहीं सकती थी। लेकिन एक दिन वह संयोग भी आ ही गया।
कुणाल के मोंटेसरी स्कूल की छुट्टी थी। शुभांगी कपिल को दूध पिला रही थी, इसलिए सास चालाकी से कुणाल को बाहर लेकर बैठी थीं। लेकिन उनकी नज़र बचाकर कुणाल अंदर आ ही गया।
सीने से चिपके कपिल को देखकर कुणाल को बड़ा कौतुक हुआ। “माँ, तू क्या कर रही है?” उसने बच्चों वाले भोलेपन से पूछा।
“बच्चे को दूध पिला रही हूँ,” शुभांगी ने सहज भाव से कहा।
“तेरे पास दूध है?” उसने दोबारा पूछा।
शुभांगी हँसकर बोली, “भगवान जी छोटे बच्चे के लिए दूध भेजते हैं। तुम जैसे प्यारे-प्यारे अच्छे बच्चे भगवान जी ही तो देते हैं ना? फिर जब तक वे बच्चे बड़े नहीं हो जाते, भगवान जी ही उनके लिए दूध भेजते हैं।”
कुणाल खुद ही कुछ सोचने लगा। ठीक उसी वक्त सास उसके पीछे-पीछे अंदर आ गईं। “अरे बदमाश, मेरी नज़र बचाकर अंदर आ गया?”—ऊपर से लाड़ जताते हुए वे गुस्से में उसे खींचने लगीं। लेकिन कुणाल अपनी जगह से हिला तक नहीं, क्योंकि उसे एक ज़रूरी सवाल पूछना था।
सास सुनने को तैयार नहीं थीं और कुणाल हटने को तैयार नहीं था। शुभांगी ने कहा था कि वह उसके लिए एक निर्णायक पल था। सास का मान रखने से ज़्यादा कुणाल के मन को संभालना उसे ज़रूरी लगा। और उसी आवेग में, अपनी आवाज़ में दृढ़ता लाते हुए शुभांगी ने कहा, “माँ जी, छोड़िए उसे! वह मुझसे कुछ बात कर रहा है ना?”
सास झल्ला उठीं, “जो मर्ज़ी आए करो!”—बड़बड़ाते हुए बाहर निकल गईं।
फिर बेहद लाड़ से सोए हुए बच्चे को नीचे लिटाकर, उसी स्नेह भरे स्वर में उसने कुणाल से पूछा, “बोल ना मनु, क्या पूछना था?”
और थोड़ा सा शर्माते हुए, थोड़ा लाड़ में आकर कुणाल ने पूछा, “मैं जब छोटा बच्चा था, तब भी भगवान जी ने दूध भेजा था क्या?”
सवाल बिल्कुल वाजिब था।
उसे अपनी गोद में बैठाते हुए शुभांगी बोली, “अरे, तू तो अभी भी हमारा बच्चा ही है। पर अब तू बड़ा भैया बन गया है ना? जब तू इतना सा नन्हा था, तब तेरे लिए भी भगवान जी दूध भेजते ही थे।”
शुभांगी बताती है कि यह सुनकर उसका बच्चा खुशी से झूम उठा था।
उसके मन की बात ताड़कर शुभांगी ने ही पूछा, “तुझे याद नहीं है क्या?”
वह झेंप गया। उस पल वह बहुत प्यारा लग रहा था, साक्षात यशोदा का कान्हा ही जैसे!
रहा न गया तो शुभांगी ने खुद ही पूछ लिया, “तुझे भगवान जी का भेजा हुआ दूध पीना है क्या?”
“पर वो तो छोटे बच्चे के लिए भेजा है ना?”—एकदम मासूम सा सवाल।
“तो तू कौन है? मेरा ही तो बच्चा है। और तुम दोनों कितने भी बड़े हो जाओ, मेरे लिए तो हमेशा मेरे बच्चे ही रहोगे।”
कुणाल को क्या समझ आया, क्या महसूस हुआ, कौन जाने? लेकिन वह उससे इस तरह लिपट गया कि शुभांगी की छाती से दोबारा दूध उतर आया; संभालते-संभालते उसका गाउन भीग गया। उसके जीवन का वह सबसे पावन क्षण था; उसने तुरंत अपने बच्चे को वैसे ही सीने से लगा लिया।
यही प्रसंग बाद में कुणाल मुझे बता रहा था—”कच्चे जमे दही के पानी जैसा उस दूध का स्वाद था। तब दादी ने आकर माँ को बहुत खरी-खोटी सुनाई थी, और चाचा के घर चली गई थीं। फिर जब वे बीमार पड़ीं, तो चाचा उन्हें यहीं छोड़ गए।
तब तक मैं काफी बड़ा हो चुका था।
मेरे जनेऊ (उपनयन संस्कार) के वक्त ही पापा ने मुझे प्यार से समझा दिया था कि तू हमारा ही बेटा है। हम ही तेरे माता-पिता हैं, लेकिन फिर भी तुझे जन्म देने वाली माँ कोई और थी। वह भगवान जी के पास चली गई, इसलिए तू हमें मिल गया।
तब कपिल मेरे गले लगकर फूट-फूट कर रोया था—’तू मेरा ही बड़ा भाई है, तू ही मेरा दादा है’ कहे जा रहा था। लेकिन मेरा मन ज़रा भी विचलित नहीं हुआ। माँ के उस दूध ने मुझे आत्मबल दिया था। ‘मैंने अपने दोनों बच्चों को अपना दूध पिलाया है’—माँ का यह सुकून ही मेरे जीने की असली ताकत बन गया।
इसीलिए मैं भी पापा की तरह सी.ए. बना, और पहले ही प्रयास में पास हुआ। कपिल को डबिंग में दिलचस्पी थी; स्कूल के दिनों से ही उसके करियर की शुरुआत हो चुकी थी। उसे लाना-ले जाना और उसके सारे आर्थिक लेन-देन बहुत पहले से ही मैं संभालने लगा था।
दादी की भी आखिरी वक्त तक सेवा की। उनके लिए रोज़ व्यंकटेश स्तोत्र पढ़ना पड़ता था; वे बोल नहीं पाती थीं, लेकिन सुनते-सुनते होंठ हिलाती थीं, बस उतना ही जवाब देती थीं। आखिरकार उन्होंने दम भी मेरी ही गोद में तोड़ा।
अब हम दोनों भाइयों की शादी तय हो चुकी है, वह भी दो सगी बहनों से।
यह सगापन और अपनापन मुझे माँ से ही विरासत में मिला है।
फिर भी, कुणाल को यह नहीं पता कि उसकी एक सगी बुआ भी है, और उनके बिखरते हुए संसार को समय-समय पर सहारा शुभांगी और संदीप ने ही दिया है।”