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काले वस्त्र में बंधी खड़ी साकर: प्रकाश-भौतिकी और आयुर्वेद का गुप्त सोम-प्रयोग

शरद पूर्णिमा पर सामान्यतः लोग खीर या चांदी के पात्र का विधान जानते हैं, लेकिन आश्विन पूर्णिमा की रात्रि में काले सूती वस्त्र में बंधी धागे वाली खड़ी साकर (मिश्री) को खुले आकाश के नीचे चांदनी में रखने का प्रयोग आयुर्वेद और रसशास्त्र का अत्यंत गोपनीय और चमत्कारी ‘ऊर्जा संचयन’ प्रयोग है।

बाहर से यह एक सरल टोटका या घरेलू नुस्खा लग सकता है, परंतु इसके पीछे गहरा भौतिकीय और त्रिदोषीय विज्ञान कार्य करता है:

 

  1. काले वर्ण का अवशोषण सिद्धांत (Black Body Radiation & Absorption)

प्रकृति का नियम है कि श्वेत वर्ण प्रकाश और तरंगों को परावर्तित (reflect) कर देता है, जबकि कृष्ण (काला) वर्ण ऊर्जा का सर्वोत्तम अवशोषक (Perfect Absorber) होता है।

 * शरद पूर्णिमा की रात्रि में चंद्रमा की रश्मियाँ तीव्र औषधीय, विद्युत-चुंबकीय और सूक्ष्म ‘सोम’ तरंगों से युक्त होती हैं।

 * जब मिश्री को काले वस्त्र में बांधा जाता है, तो वह काला कपड़ा चांदनी से बरसने वाली सूक्ष्म शीत तरंगों और परा-ऊर्जा (lunar vibrations) को बाहर छिटकने नहीं देता। वह वातावरण की इस विशिष्ट ऊर्जा को खींचकर भीतर की ओर संघनित (concentrate) करता है।

  1. खड़ी साकर: प्राकृतिक क्रिस्टल जालक (Crystal Lattice Matrix)

आयुर्वेद में रिफाइंड चीनी नहीं, बल्कि धागे वाली शुद्ध खड़ी साकर (मिश्री) को औषधि माना गया है:

 * स्फटिक संरचना: मिश्री रासायनिक रूप से एक व्यवस्थित क्रिस्टल लैटिस (Crystal Lattice) है। विज्ञान और स्फटिक-तंत्र दोनों यह स्वीकार करते हैं कि क्रिस्टल किसी भी सूक्ष्म ऊर्जा, फ्रीक्वेंसी और कंपन को सोखकर अपने भीतर ‘स्टोर’ (प्रोग्राम) करने की सबसे सटीक क्षमता रखते हैं।

 * शीतवीर्य गुण: मिश्री का मूल स्वभाव मधुर, स्निग्ध और प्राकृतिक रूप से शीतवीर्य (cooling) है।

 * जब काले आवरण के माध्यम से छनकर चंद्रमा की किरणें और ओस की शीतलता इस क्रिस्टल जालक पर रात भर पड़ती हैं, तो मिश्री का प्रत्येक कण उस औषधीय ऊर्जा से ‘चार्ज’ (potentize) हो जाता है।

 

  1. यह ‘परम पित्त शामक’ क्यों बन जाती है?

आयुर्वेद का अकाट्य सिद्धांत है—‘शरदि पित्त प्रकोपः’। वर्षा ऋतु में जमा हुआ पित्त शरद ऋतु की तीखी धूप में उबलने लगता है, जिससे एसिडिटी, रक्त विकार, अल्सर, अनिद्रा, त्वचा में जलन और मानसिक बेचैनी (चिड़चिड़ापन) चरम पर होती है।

 * इस रात्रि में सिद्ध हुई यह साकर साधारण मीठा न रहकर ‘सोम-रसायन’ में रूपांतरित हो जाती है।

 * काले वस्त्र ने जिस तीव्र शीत ऊर्जा को रात भर इसके केंद्र में केंद्रित किया, वह शरीर में प्रविष्ट होते ही रक्त और आमाशय की बढ़ी हुई ऊष्मा (Excess Internal Heat) को जड़ से शांत करती है।

 * यह यकृत (Liver) की गर्मी को खींचकर बाहर करती है और शरीर के दाह को तुरंत बुझाती है।

  1. प्रयोग की सटीक विधि

 * सामग्री: आप की आवश्यकता अनुसार शुद्ध धागे वाली खड़ी साकर (मिश्री) और एक शुद्ध, बिना किसी  साफ काला सूती (cotton) कपड़ा।

 * प्रक्रिया: मिश्री को काले कपड़े में बांधकर एक पोटली बना लें। इसे शरद पूर्णिमा की रात्रि में खुले आकाश के नीचे किसी स्वच्छ, ऊंचे स्थान पर (जैसे छत या बालकनी) ऐसे रखें जहाँ पूरी रात सीधी चांदनी पड़ती रहे।

 * संग्रह: सूर्योदय से पूर्व इस पोटली को उठाकर किसी कांच के जार में सुरक्षित रख लें।

 * सेवन विधि: इस साकर का एक छोटा टुकड़ा प्रतिदिन प्रातः खाली पेट चूसें या सौंफ के साथ इसका चूर्ण बनाकर ताजे जल के साथ लें।

यह प्रयोग प्रमाण है कि हमारे ऋषियों ने ऊर्जा के अवशोषण (Absorption), क्रिस्टल प्रोग्रामिंग और ऋतुचर्या के संतुलन को कितने सहज व्यावहारिक सूत्र में पिरो दिया था।

शरद पूर्णिमा यानि कोजागिरी पूर्णिमा।

शरद पूर्णिमा और आयुर्वेद

शरद पूर्णिमा

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