Sshree Astro Vastu

अनंत चतुर्दशी : एक महत्वपूर्ण डोरक व्रत

तेरा आना, तेरा जाना? और हमारा यूँ ही दिखावा करना।

 

हम उसे लाए।
हमने उसे स्थापित किया।
हमने उसे नैवेद्य अर्पित किया।
हमने उसका विसर्जन कर दिया…

 

अनादि, अनंत वह एक है,
उसे भला कौन बना सकता है और कौन विसर्जित कर सकता है?

अनंत पीढ़ियाँ आईं, अनंत पीढ़ियाँ चली गईं।
वह फिर भी विद्यमान रहा।

समय कभी भला रुकेगा क्या?
वह कभी समाप्त नहीं होगा।

हमसे पहले भी वही एक था,
हमारे बाद भी वही एक रहेगा।

उसे भला किसी की आवश्यकता क्या है?

फिर यह उत्सव केवल दस दिनों का ही क्यों?
क्यों न इसे हर दिन मनाया जाए?

अपना आना, अपना जाना,
और इनके बीच का यह क्षणभंगुर जीवन…

क्यों न जीवन को ही उत्सव बना लिया जाए,
और उसे हर दिन अपने मन में बसाया जाए।

विचारों की सजावट की जाए।
मन में प्रेम की रोशनी जलाई जाए।
सत्य का नैवेद्य अर्पित किया जाए।
दया, क्षमा और शांति के फूल चढ़ाए जाएँ।

और सुंदर शब्दों की आरती उतारी जाए।

हर दिन का क्रोध, मोह और ईर्ष्या विसर्जित हो जाए।
आज की भावनाओं का हिसाब-किताब आज ही पूरा कर लिया जाए।

ऐसे उसे हर दिन क्यों न पूजा जाए?
हर दिन नए भाव से उसे अपने मन में जगाया जाए।
और जीवन का उत्सव हर दिन नए सिरे से मनाया जाए।

 

 

भारतीय व्रतों का अपना विधान है। प्रायश्चित से लेकर पुण्य अथवा मनोरथ की सिद्धि व्रतों के पालन के मूल में रही है। व्रतों की संख्‍या किसी के लिए तो गिन पाना बहुत मुश्किल है। व्रतराज, व्रतार्क जैसे निबंधकार के लिए भी यह संख्‍या अगणित रही, उसने करीब पंद्रह सौ व्रतों का उल्‍लेख किया है। कई बार लगता है कि तीन सौ पैंसठ दिनों में इतने व्रत कैसे आ जाते होंगे! एक जन्‍म भी कम पडता है, इन व्रतों के पालन के लिए। महिलाएं इसीलिए कहती हैं जितने सिर पर केश होते हैं, उतने ही व्रत करने होते हैं।

 

अनंत चतुर्दशी का व्रत अनंत के नाम पर किया जाता है। इसे अणत चौदस भी कहा जाता है। यह मूलत: नाग संस्‍कृति का परिचायक है। नाग संस्‍थान का वर्णन महा पुराणों, पुराणों और उपपुराणों, औप पुराणों में ही नहीं, बौद्ध और जैन ग्रंथों में भी मिलता है। ‘अनंत’ और कोई नहीं, नाग का ही नाम है जिसके फण अनंत हों किंतु जब से भगवान श्री नारायण की विशिष्ट मान्‍यता हुई, अनंत को उनका शयन, आसन स्‍वीकारा गया और यह व्रत अनंतशायी विष्‍णु के नाम हो गया।

 

मूलत: यह चौदह गांठ का डोरा बनाकर भुजा पर बांधने की परंपरा पर आधारित व्रत था। मध्यकालीन भविष्‍यपुराण के व्रतों में इस व्रत के विधान और फल को लिखा गया है। चौदस का दिन, चौदह गांठ वाला डोरा, चौदह साल तक करने का विधान और चौदह जनों को भोजन करवाने और फिर चौदह वस्तु देकर उद्यापन करने जैसी परंपरा… चौदह की संख्‍या हमारे यहां चौदह मनु, चौदह इंद्र, चौदह मर्यादा, चौदह भुवन, चौदह वर्ष आदि के साथ जुड़ी हुई है। कहीं न कहीं यह संख्‍यावाची व्रत भी है। तिथि में चौदस का अपना महत्व है और उसका प्रसार अरब और मिस्र तक भी रहा है। तिथियों की देवता के साथ संबद्धता अनेक पक्षों को लिए जैसा कि वराहमिहिर (587 ई.) ने समास संहिता के तिथि गुणाध्याय में माना है।

भविष्‍यपुराण में पांडवों की कहानियों के साथ कौंडिन्‍य मुनि की कथा है और उसमें दान की महिमा बताई गई है।रुचिकर प्रसंग इस तरह दिया गया है :

जब पाण्डव जुएं में अपना सारा राज-पाट हारकर वन में कष्ट भोग रहे थे, तब भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें अनन्त चतुर्दशी का व्रत करने की सलाह दी थी।

 

धर्मराज युधिष्ठिर ने अपने भाइयों तथा द्रौपदी के साथ पूरे विधि-विधान से यह व्रत किया तथा अनन्तसूत्र धारण किया। अनन्तचतुर्दशी-व्रत के प्रभाव से पाण्डव सब संकटों से मुक्त हो गए। कहा गया है कि व्रत-विधान-व्रतकर्ता प्रात: स्नान करके व्रत का संकल्प करें। शास्त्रों में यद्यपि व्रत का संकल्प एवं पूजन किसी पवित्र नदी या सरोवर के तट पर करने का विधान है, तथापि ऐसा संभव न हो सकने की स्थिति में घर में पूजागृह की स्वच्छ भूमि पर कलश स्थापित करें। कलश पर शेषनाग की शैय्यापर लेटे भगवान विष्णु की मूर्ति  अथवा चित्र को रखें। उनके समक्ष चौदह ग्रंथियों (गांठों) से युक्त अनन्तसूत्र (डोरा) रखें।

 

इसके बाद “ॐ अनन्तायनम:” मंत्र से भगवान विष्णु तथा अनंतसूत्र की षोडशोपचार-विधिसे पूजा करें। पूजन के उपरांत अनन्तसूत्र को मंत्र पढकर पुरुष अपने दाहिने हाथ और स्त्री बाएं हाथ में बांध लें-

 

*अनंन्तसागर महासमुद्रे मग्नान्समभ्युद्धर वासुदेव।अनंतरूपे विनियोजितात्माह्यनन्तरूपाय नमो नमस्ते॥*

 

अनंतसूत्र बांध लेने के पश्चात किसी ब्राह्मण को नैवेद्य (भोग) में निवेदित पकवान देकर स्वयं सपरिवार प्रसाद ग्रहण करें। पूजा के बाद व्रत-कथा को पढें या सुनें :

 

कथा का सार-संक्षेप यह है-

सत्ययुग में सुमन्तु नाम के एक मुनि थे। उनकी पुत्री शीला अपने नाम के अनुरूप अत्यंत सुशील थी। सुमन्तु मुनि ने उस कन्या का विवाह कौण्डिन्यमुनि से किया। कौण्डिन्यमुनि अपनी पत्नी शीला को लेकर जब ससुराल से घर वापस लौट रहे थे, तब रास्ते में नदी के किनारे कुछ स्त्रियां अनन्त भगवान की पूजा करते दिखाई पडीं। शीला ने अनन्त-व्रत का माहात्म्य जानकर उन स्त्रियों के साथ अनंत भगवान का पूजन करके अनन्तसूत्र बांध लिया। इसके फलस्वरूप थोडे ही दिनों में उसका घर धन-धान्य से पूर्ण हो गया।

 

एक दिन कौण्डिन्य मुनि की दृष्टि अपनी पत्नी के बाएं हाथ में बंधे अनन्तसूत्र पर पडी, जिसे देखकर वह भ्रमित हो गए और उन्होंने पूछा-क्या तुमने मुझे वश में करने के लिए यह सूत्र बांधा है? शीला ने विनम्रतापूर्वक उत्तर दिया-जी नहीं, यह अनंत भगवान का पवित्र सूत्र है। परंतु ऐश्वर्य के मद में अंधे हो चुके कौण्डिन्य ने अपनी पत्नी की सही बात को भी गलत समझा और अनन्तसूत्रको जादू-मंतर वाला वशीकरण करने का डोरा समझकर तोड दिया तथा उसे आग में डालकर जला दिया। इस जघन्य कर्म का परिणाम भी शीघ्र ही सामने आ गया। उनकी सारी संपत्ति नष्ट हो गई।

 

दीन-हीन स्थिति में जीवन-यापन करने में विवश हो जाने पर कौण्डिन्य ऋषि ने अपने अपराध का प्रायश्चित करने का निर्णय लिया। वे अनन्त भगवान से क्षमा मांगने हेतु वन में चले गए। उन्हें रास्ते में जो मिलता वे उससे अनन्तदेव का पता पूछते जाते थे। बहुत खोजने पर भी कौण्डिन्यमुनि को जब अनन्त भगवान का साक्षात्कार नहीं हुआ, तब वे निराश होकर प्राण त्यागने को उद्यत हुए। तभी एक वृद्ध ब्राह्मण ने आकर उन्हें आत्महत्या करने से रोक दिया और एक गुफामें ले जाकर चतुर्भुज अनन्तदेव का दर्शन कराया।

 

भगवान ने मुनि से कहा- तुमने जो अनन्तसूत्र का तिरस्कार किया है, यह सब उसी का फल है। इसके प्रायश्चित हेतु तुम चौदह वर्ष तक निरंतर अनन्त-व्रत का पालन करो। इस व्रत का अनुष्ठान पूरा हो जाने पर तुम्हारी नष्ट हुई सम्पत्ति तुम्हें पुन:प्राप्त हो जाएगी और तुम पूर्ववत् सुखी-समृद्ध हो जाओगे। कौण्डिन्य मुनि ने इस आज्ञा को सहर्ष स्वीकार कर लिया। भगवान ने आगे कहा- *जीव अपने पूर्ववत् दुष्कर्मो का फल ही दुर्गति के रूप में भोगता है।*

मनुष्य जन्म-जन्मांतर के पातकों के कारण अनेक कष्ट पाता है। अनन्त-व्रत के सविधि पालन से पाप नष्ट होते हैं तथा सुख-शांति प्राप्त होती है। कौण्डिन्यमुनि ने चौदह वर्ष तक अनन्त-व्रत का नियमपूर्वक पालन करके खोई हुई समृद्धि को पुन:प्राप्त कर लिया…।

 

कुल मिलाकर यह व्रत पश्चिमी भारत के उस मरुकांतार क्षेत्र से संबंद्ध रहा है जहां पानी कम था, आश्‍चर्य कि वे अनंत को कैसे जानते थे। विदिशा से लेकर माध्‍यमिका तक कभी नागों का वर्चस्‍व था, इसलिए चित्‍तौड के पास मिले 8वीं सदी के पुठौली अभिलेख में कहा गया है समुद्र मंथन से थके हुए मातोली सर्पराज ने इधर आश्रय लिया था…।

 

✍️अनंत चतुर्दशी की बधाई…

 

 

*स्तेनः सुरापो गुरुतल्पगामी

मित्रध्रुगेते निष्कृतेर्यान्ति शुद्धिम् ।व्यक्तमव्यक्तं वा विधृतं विष्णुलिङ्गं * त्यजन्नशुद्ध्येदखिलैरात्मभासा ॥*(In bold)

 

चोर, सुरापान करने वाला, गुरुतल्पगामी, मित्रद्रोही, इन सबकी शुद्धि सम्भव है किन्तु व्यक्त एवं अव्यक्त स्वरूप विष्णुलिङ्ग को त्यागने वाला किसी भी तरह से पवित्र नहीं हो सकता है॥

 

दो शब्द ध्यान देने योग्य हैं।

 

एक तो गुरुतल्पगामी,

 

और दूसरा विष्णुलिङ्ग!

 

प्रथम दूसरे शब्द की बात!

 

लिङ्ग सामान्यतया शिव से संयुक्त शब्द है। फिर यह विष्णुलिङ्ग क्या है?

 

विष्णु शब्द की उत्पत्ति मुख्यतः विष धातु से हुई है। निरुक्त १२/१८ में यास्काचार्य ने मुख्य रूप से विष् धातु को ही व्याप्ति के अर्थ में लेते हुए उससे विष्णु शब्द को निष्पन्न बताया है। वैकल्पिक रूप से भी विष् धातु को प्रवेश के अर्थ में ही लिया गया है, क्योंकि वह विभु होने से सर्वत्र प्रवेश किया हुआ होता है। आदि शंकराचार्य ने भी अपने विष्णुसहस्रनाम-भाष्य में विष्णु शब्द का अर्थ मुख्यतः व्यापक ही माना है, और उसकी व्युत्पत्ति के रूप में स्पष्ट लिखा है कि व्याप्ति अर्थ के वाचक नुक् प्रत्ययान्त विष् धातु का रूप विष्णु बनता है। विष्णु पुराण में कहा गया है उस महात्मा की शक्ति इस सम्पूर्ण विश्व में प्रवेश किये हुए है इसलिए वह विष्णु कहलाता है, क्योंकि विष् धातु का अर्थ प्रवेश करना है। ऐसा ही ऋग्वेद के प्रमुख भाष्यकारों, आचार्य सायण, श्रीपाद दामोदर सातवलेकर और महर्षि दयानन्द सरस्वती जैसे विद्वानों ने भी माना है। इससे स्पष्ट है कि विष्णु शब्द विष् धातु से निष्पन्न है और उसका अर्थ व्यापनयुक्त यानि सर्वव्यापक है।

 

और लिङ्ग का अर्थ है – पारिभाषिक चिह्न!

 

अतः सर्वव्यापकता के पारिभाषिक चिह्न से च्युत होने वाला ही विष्णुलिङ्गं त्यजन् है। वह, जिसने ऋत का त्याग किया, क्रतु का त्याग किया, सनातन अनुशासन सूत्रों के प्रतिकूल आचरण किया वह विष्णुलिङ्गं त्यजन् है।

 

अब प्रथम विचारणीय शब्द – गुरुतल्पगामी!

 

इस शब्द का एक रूढ़ अर्थ है गुरु -पत्नी गमन।

 

अर्थ रूढ़ है, समीचीन नहीं।

 

गुरुतल्पगामी का अर्थ है गुरु की शय्या पर जाने वाला।

 

शय्या पर जाना मात्र सम्भोग हेतु नहीं होता, शयन हेतु भी होता है, विश्राम, गुरु द्रोह हेतु भी होता है।

 

और गुरु का अर्थ है वह, जो अन्धकार से प्रकाश की ओर ले जाये। वैसे इस शब्द का रूढ़ अर्थ है श्रेष्ठ, या भारी!

 

तो रूढ़ एवं वास्तविक दोनों अर्थों से, जो आपका अज्ञान निरसित करे वह तो गुरु है ही,

 

गुरु वह भी है जो आयु में, पद में, ज्ञान में, और वर्ण-व्यवस्था तो अब घृणित मानी जाने लगी है किन्तु वर्णाश्रम के अनुसार भी जो श्रेष्ठ वर्ण का हो।

 

आयु में, पद में, ज्ञान में, और वर्ण में जो श्रेष्ठ हो उसकी शय्या पर शयन या विश्राम भी गुरुतल्पगमन ही है। नहीं करना चाहिये!

 

अपने वरिष्ठ की आसन्दी पर, कुर्सी पर बैठना, इसी कारण असभ्यता मानी जाती है।क्या आप को आध्यात्मिक जगत की ऊंचाई पहुंचाने वाले ब्रम्हणिष्ठ गुरु मिल गए…?

 

✍️अनन्त चतुर्दशी की हार्दिक शुभकामनायें।

अनंत चतुर्दशी और गणेश विसर्जन की हार्दिक शुभकामनाए

आप सभी लोगों से निवेदन है कि हमारी पोस्ट अधिक से अधिक शेयर करें जिससे अधिक से अधिक लोगों को पोस्ट पढ़कर फायदा मिले |
Share This Article
error: Content is protected !!
×