
यह शब्द फ़ारसी भाषा से आया है, जहाँ “ताह” या ‘तह’ का अर्थ “अंत” या “नीचे” है, और “रान” का अर्थ “पहाड़ का ढलान” है ।
जैसे हमारे हिमालय की तलहटी का भाग है । (शिवालिक)
तेहरान, ईरान की राजधानी है, और यह शहर अल्बोरज़ पहाड़ों की तलहटी में स्थित है, इसलिए यह नाम पड़ा है ।
*माउंट एवरेस्ट* जिसे स्थानीय रूप से सागरमाथा (नेपाल में) या चोमोलुंगमा (तिब्बत में) कहा जाता है, समुद्र तल से ऊपर दुनिया का सबसे ऊँचा पर्वत है। यह हिमालय के महालंगुर हिमाल उपश्रृंखला में स्थित है। चीन और नेपाल की सीमा इसके शिखर बिंदु से होकर गुजरती है। इसका आधिकारिक ऊँचाई (हिम स्तर सहित) 8,848.86 मीटर (29,031 फीट 6 इंच) है, जिसे 2020 में चीन और नेपाल के अधिकारियों ने मान्यता दी थी।
*#एक_संकल्प*
एक पर्वत शिखर है, ऊँचाई 29,028 फीट। हमारे पुराणों ने इसे *#गौरी_शंकर* कहा; क्योंकि हमारे पूर्वज मानते थे कि इस पर्वत के उतुंग शिखर पर महादेव अपनी पत्नी गौरी के साथ विचरण करते हैं।
इसी पर्वत को हमारे पूर्वजों ने *#सागर_माथा* भी कहा यानि अगर हम सागर की ओर से चलें और दृष्टि ऊपर करें तो इसी पर्वत के शिखर को हम देख पातें हैं (भाव रूप में) क्योंकि ये सबसे ऊँची है। जिस नेपाल पर हम आज कल चुट्कुले बना रहे हैं, उस नेपाल में इसे अब भी सागरमाथा ही कहा जाता है।
यह पर्वत शिखर प्रभु राम के पूर्वज राजा *सगर की भी तपःस्थली थी।*
स्वामी दयानंद सरस्वती जिस तिब्बत को मानव-सभ्यता की उदगम स्थली मानते हैं, उस तिब्बत के लोग इस पर्वत शिखर को #चोमोलुंगमा कहते हैं।
मगर हम लोग इसे क्या कहते हैं?
हम हिन्दू इस पर्वत शिखर को *”एवरेस्ट”* कहते हैं…
धन्य है हम और हमारी उदासीनता
क्यों कहते हैं?
क्योंकि सन 1852 में एक अंग्रेज सर्वेयर था ‘जॉर्ज एवरेस्ट”, उसने इसका एक नक्शा बनाया और हल्ला मचाया कि इस पर्वत की खोज उसने की है और इस झूठ को वो दुनिया भर में लेकर गया। सन 1865 में जब ये आदमी रिटायर होकर अपने देश इंग्लैंड जा रहा था तो उसके रिटायरमेंट फेयरवेल में बतौर तोहफ़ा उसके नाम पर इस शिखर का नाम #एवरेस्ट रख दिया गया।
और हम अभागे, धिम्मी लोग भी उसे सागरमाथा, गौरी-शंकर के नाम से पुकारना छोड़कर एवरेस्ट कहने लग गये।(हमारे पूर्वज कितने खुश होते होंगे, हमारी मानसिक गुलामगिरी को देख कर)
गुलामी के चिन्हों को उतारिये वरना हम स्वाभिमान से भरे हिन्दू कभी भी नहीं बन सकते। संकल्प करिये कि आज से लिखने में, बोलने में, चर्चा करने में हम इसे एवटेस्ट नहीं कहेंगे।
माउंट एवरेस्ट को गौरी शंकर शिखर
और अरब सागर को सिन्धु सागर कहना शुरू कीजिए।
एक आजादी ये भी।
पहाड़ों की कहानियाँ:
एक तस्वीर में सबसे ऊंची चोटी केदारनाथ, फिर भरतकुंट और किनारे मेरु पर्वत दिखाया गया था
सिर्फ उत्तराखंड में ही हिमालय की 600 चोटियां हैं, और करीब करीब सबके स्थानीय नाम हैं। ये अलग बात है कि अधिकांश स्थानीय जनता इन्हें नामों से नहीं पहचानती, पर पुराणों से लेकर लोक परंपराओं में अधिकांश चोटियों के हिन्दी या तिब्बती नाम हैं।
1843 ईस्वी तक दुनिया की सबसे ऊंची चोटी कंचनजंगा को माना जाता था। सर जार्ज एवरेस्ट के बाद ईस्ट इंडिया कंपनी ने एंड्रयू वाॅग को भारत का सर्वेयर जनरल नियुक्त किया। उस समय भारत के एक अत्यंत मेधावी गणितज्ञ *राधानाथ सिकदर* ने जो उस समय सन 1847 में सर्वे विभाग के मुख्य गणक थे, ने अपनी गणना में पाया, कि एक चोटी कंचनजंगा से भी ज्यादा ऊंची है। आश्चर्य की बात ये है कि जार्ज एवरेस्ट को तो छोड़िए, ये बात उनके उत्तराधिकारी एंड्रयू वाॅग को भी पता नहीं थी। पर स्थानीय लोगों को जो ज्ञान था, उसकी टांग तोड़ कर रख दी गई। तिब्बती इस चोटी को *”कोमुलंगमा”* कहते थे जिसका अर्थ था, दुनिया की मां। दार्जिलिंग में इसे *देवधूंगा* कहा जाता था, यानि देवताओं की जगह। नेपाली इसे सगरमाथा कहते थे, यानि सबों का मस्तक और हिन्दू इसे गौरीशंकर।
बस यहीं सफेद देवदूतों ने मौका ताड़ लिया। एंड्रयू ने इसे peak 15 कहा, और इंगलैंड की रायल ज्यॉग्रेफिकल सोसाइटी से निवेदन किया कि दुनिया की इस सबसे ऊंची चोटी का नाम पिछले सर्वेयर जनरल जार्ज एवरेस्ट के नाम पर रखा जाए। सर जार्ज एवरेस्ट ईमानदार आदमी रहे होंगे, तो उन्होंने इस नामकरण का विरोध किया, क्योंकि न तो उन्होंने ये चोटी ढूंढ़ी थी, न ही उन्हें अपने कार्यकाल में इसका कुछ पता था।
लेकिन उस समय नेपाल मे रहनेवाले एक अंग्रेज प्रकृतिवादी *ब्रायन हाउटन* ने एक अद्भुत तर्क रायल सोसाइटी के समक्ष प्रस्तुत किया। उसने बहुत मार्के की बात कही, जो गौर करने लायक है। “चूंकि “पीक 15 ” के बहुत सारे स्थानीय नाम हैं, इसीलिए इसको एक ही विशिष्ट नाम दिया जाए। सारे अंग्रेजों ने ये बात मान ली, और सारे नाम “कोमुलंगमा, देवधूंगा, सगरमाथा, गौरीशंकर ” सब किनारे हो गये, और दुनिया की सबसे ऊंची चोटी का नाम माउंट एवरेस्ट हो गया।
1866 में जब सर जार्ज एवरेस्ट की मृत्यु हुई, तो उन्हें नहीं पता था कि उन्होंने दुनिया की उस सबसे ऊंची चोटी को, कभी देखा भी था या नहीं।
✍️अब चलते हे थोड़े आकाश की ओर…
किसी वृत्त का केन्द्र एक के बदले दो नाभियों पर हो तो दीर्घवृत्त ( ellipse ) बनता है,उसे अण्डाकार ( oval ) कहना गलत है । अण्डा एक ओर पतला होता है,दीर्घवृत्त दोनों ओर एक समान होता है । भौतिकविज्ञान के अनुसार पृथ्वी की दीर्घवृत्तीय कक्षा की दो नाभियों में से एक पर सूर्य है और दूसरी नाभि पर कुछ नहीं है ।
सूर्यसिद्धान्त के अनुसार पृथ्वी की सतह पर स्थित मेरु पर्वत सूर्य सहित सम्पूर्ण सृष्टि का केन्द्र है जिसके चतुर्दिक सूर्यकक्षा का केन्द्र घूमता है तो सूर्य की वृत्ताकार कक्षा का दीर्घवृत्त में रूपान्तरण हो जाता है,परन्तु यह शुद्ध दीर्घवृत्त नहीं होता क्योंकि भूकेन्द्र के बदले मेरू केन्द्र है । इस विशेष वृत्त को मन्दवृत्त कहते हैं जो न तो गोल वृत्त है और न दीर्घवृत्त,किन्तु दीर्घवृत्त के निकट है ।
सूर्य का आकार अत्यधिक बड़ा और भारी होने के कारण सौरमण्डल का केन्द्र सूर्य को मानना उचित प्रतीत होता है,परन्तु सम्पूर्ण सृष्टि का केन्द्र मेरु पर हो तो सूर्य उस केन्द्र को टस−मस नहीं कर सकता । सूर्यसिद्धान्त के मेरुकेन्द्रिक सिद्धान्त को आधुनिक वैज्ञानिक बकवास मानते हैं किन्तु भौतिकवादी पूर्वाग्रह एवं ज्योतिष के विरुद्ध चर्च के विद्वेष के कारण सूर्यसिद्धान्त का खण्डन करने में बेईमानी करते हैं ।
ईमानदारी तो तब होती जब सौरमण्डल से बाहर किसी सितारे की तुलना में पर्यवेक्षण करके तथ्यों के आधार पर सिद्ध करते कि सूर्य ही ग्रहकक्षाओं का केन्द्र है । किन्तु इसमें समस्या यह है कि सबसे निकटवर्ती तारा भी पृथ्वी से सूर्य की भौतिक दूरी (1 AU) की तुलना में २⋅७ लाख गुणा अधिक दूर है जिस कारण पैरालक्स द्वारा उस तारे की दूरी मापते समय जितनी त्रुटि होती है वह 1 AU से बहुत ही अधिक है । दूरस्थ तारों के मामले में त्रुटि और भी बढ़ जाती है । नेट पर खोजेंगे तो खगोलविदों का कथन मिलेगा कि तारों की दूरी मापने में औसतन १०% की त्रुटि होती है । पास के तारे में कम त्रुटि होती है । यदि सबसे पास वाले तारे की दूरी मापने में केवल १% की भी त्रुटि हो तो वह 1 AU से २७०० गुणा अधिक होगी!अतः वैज्ञानिकों के पास यह सिद्ध करने का कोई *“वैज्ञानिक” साधन नहीं है कि ग्रहकक्षाओं का केन्द्र सूर्य है अथवा पृथ्वी पर स्थित मेरु ।*
भूकेन्द्र को ग्रहकक्षाओं का केन्द्र मानना रोमन चर्च की मूर्खता थी जिसने सूर्यसिद्धान्त को चुरा तो लिया किन्तु मेरुकेन्द्रिक सिद्धान्त चर्च के माथे में नहीं घुसा । टॉलेमी की पुस्तक टेट्राबिब्लॉस के आधिकारिक अंग्रेजी अनुवाद के दूसरे पृष्ठ की पादटिप्पणी में पाँच सौ वर्ष पहले के रोमन चर्च के खगोलविज्ञान का विस्तार से वर्णन है जो उस काल के एक बिशप ने लिखा था । बिचारे बिशप को नहीं पता था कि वह जो कुछ लिख रहा था वह परम्परा से प्राप्त *सूर्यसिद्धान्तीय ग्रह−ज्यामिति थी ।* ऐतिहासिक खगोलविज्ञान के विशेषज्ञों को यह बात पता है,अतः उनका विशेष कोप सूर्यसिद्धान्त पर ही रहता है । जबतक पृथ्वी पर ईसाई चर्च का अस्तित्व है,तबतक सूर्यसिद्धान्त की निष्पक्ष जाँच सम्भव नहीं ।
छोटी सी पृथ्वी भौतिकवादियों के लिये तुच्छ है,इतनी छोटी पृथ्वी समूची सृष्टि का केन्द्र कैसे हो सकती है!भौतिकवादियों के पास इस अकाट्य तथ्य की कोई काट नहीं है कि विशाल सृष्टि में नन्ही सी पृथ्वी के सिवा और कहीं भी जीवन नहीं,अतः पृथ्वी पर जीवन के लिये ही सृष्टि बनी । परन्तु भौतिकविदों का कहना है कि जीव से सरोकार तो जीववैज्ञानिकों को है,भौतिकी के सिलेबस में “जीवन” नहीं हैं । यह दूसरी बात है कि जीवविज्ञान में भी जीव के केवल भौतिक शरीर के बारे में ही पढ़ाया जाता है । “जीव”,उसके विधाता,जीव के कर्मफल,कर्मफलों का कालविधान बताने वाला *ज्योतिषशास्त्र*,कर्मफलों को सुधारने वाला वैदिक धर्म,आदि तो आधुनिक विषविद्यालयों में घुस ही नहीं सकते । संस्कृत के नाम पर भी जो विषविद्यालय बनते हैं उनमें भी वैदिक विद्याओं को भौतिकवदी असुरों द्वारा ही पढ़ाया जाता है जो रात−दिन जपते रहते हैं कि “हे इन्द्र,यजमान को लूटकर हमारी तिजोरियाँ भर दो”!
वैदिक ज्योतिष और उसके खगोलशास्त्र का प्रमाण नक्षत्रों का ऐन्द्रिक पर्यवेक्षण नहीं बल्कि फलादेश की जाँच है जो भौतिकवादियों को पसन्द नहीं । नक्षत्रों का ऐन्द्रिक पर्यवेक्षण करने वालों को मनुस्मृति,महाभारत आदि में “नक्षत्रसूचक” कहा गया जिनकी गिनती “चाण्डाल” में थी,अर्थात् शूद्र से भी बाहर । *शूद्र वर्णव्यवस्था के अन्दर थे,अतः सवर्ण थे ।* उनको सवर्ण नहीं मानना मैकॉलेवादियों की खोज है जिन्होंने चाण्डालों और शूद्रों को एक ही वर्ग में डालकर ऐसा भ्रम फैलाया ।
मैकॉलेवादी लोगों का ही पूरे विश्व पर आधिपत्य है । *अतः सूर्यसिद्धान्त अथवा वैदिक यज्ञ की वैज्ञानिक जाँच सम्भव नहीं ।*
न तो वे सही जाँच करेंगे,और न ही उनको अधिकार है । ईश्वरीय विद्यायें असुरों को नहीं दी जा सकती । असुर ऐसी विद्याओं का कैसा दुरुपयोग करते हैं यह तो प्राचीन साहित्य में भरा पड़ा है । असुरों को मेरु पर्वत का पता बतायेंगे तो वे मानेंगे ही नहीं,और यदि मान भी लेंगे तो वहाँ परमाणु बम फोड़ने चले जायेंगे क्योंकि शास्त्र में उल्लेख है कि मेरुशिखर पर देवताओं का वास है ।
चीनी भाषा में माँ को माँ कहते हैं । अंग्रेजों के चाकरों की किताबों ने मुझे सिखाया कि चीन की सबसे महत्वपूर्ण नदी का नाम ह्वांग-हो है । जब इंटरनेट के माध्यम से मैंने उसका वास्तविक उच्चारण पता किया तो “ग्वङ्गो” निकला, अर्थात “गङ्गा” का अपभ्रंश !
अन्तर्राष्ट्रीय फोनेटिक अल्फाबेट IPA में Mekong के नाम
#Names =
Thai: mɛ̂ː náːm kʰǒːŋ = संक्षेप में mɛ̂ː kʰǒːŋ मैखाँग्
Lao: mɛː nâːm kʰɔːŋ = संक्षेप में nâːm kʰɔːŋ मैखाँग्
Tai Lue: nâːm mɛː kʰɔ̌ːŋ = संक्षेप में nâːm kʰɔ̌ːŋ मैखाँग्
Khmer: meːkɔ = tɔnlei meikɔŋ मैकाँग्
Burmese: mɛ́ɡàʊɰ̃ mjɪ̰ʔ मेगाग्ँ
Shan: nâm.kʰɔ̌ŋ तथा nâm.mɛ.kʰɔ̌ŋ मैखाँग्
Chinese: Méigōng hé. मेगाँग् हे
Vietnamese: ʂə̄wŋm mē kə̄wŋm मे काऊँगम्
चीनी नदी हवाँग−हो का भी यही उच्चारण है और पूर्वकाल में याँगत्से−क्याँग का भी यही नाम था = माँ गंगो)
✍️कुछ समझें???
अफ्रीका में विषुवत पर सबसे ऊंचे पर्वत को प्राचीन भारतीय ग्रन्थों में मेरु कहा गया है *(जिसका एक छोड़ उत्तर ध्रुव में सुमेरु तथा दक्षिण ध्रुव में कुमेरु कहा जाता था, बीच में विषुवत पर मेरु था)।*
अंग्रेजों ने इसका नाम बदलकर माउण्ट केन्या कर दिया, यद्यपि “किनयन-गिरी” कुछ ही दक्षिण तंजानिआ में है । माउण्ट केन्या की तलहटी में आज भी मेरु नाम का नगर है जो मेरु प्रान्त की राजधानी है और वहाँ की भाषा का नाम भी मेरु है । आजकल उन्हें ईसाई बनाने में मिशनरियाँ बहुत सक्रिय हैं । किन्तु संस्कृत का अफ्रीका से चीन तक के सम्बन्धों को छुपाकर यूरोप वाले हमें सिखाते हैं कि आर्य पूर्वी यूरोप और द्रविड़ भूमधसागरीय तटवर्ती क्षेत्रों से आये, ऑस्ट्रेलॉयड और नेग्रिटो अफ्रीका से आये, तथा मंगोलॉयड चीन-मंगोलिया से आये, जैसे भारत मनुष्य की उत्पत्ति के लायक था ही नहीं । सच्चाई उल्टी है : भारत संसार का एकमात्र देश है जहां संसार की सभी नस्लें हैं, दूसरे किसी देश में सारी नस्लें क्यों नहीं गयी ? माउण्ट एवेरेस्ट से बहुत ऊंचा है मेरु, बशर्ते भूकेन्द्र से दूरी को पैमाना माने, न कि काल्पनिक समुद्रतल से (प्रमाण नीचे है)। भूव्यास हर जगह एक समान नहीं है, अतः समुद्रतल एक जैसा नहीं है । पुराणकारों का गणित अंग्रेजों से बेहतर था । ग्रीक लोगों ने ईसा से तीन सौ वर्ष पहले जाना कि पृथ्वी गोल है, जबकि “भूगोल” शब्द उससे बहुत पुराना है और प्राचीन ग्रन्थों में है ।
एक उदाहरण प्रस्तुत है :-
महाभारत में वेद व्यास जी ने लिखा है कि जब जरासन्ध ने मथुरा पर अपनी (तन्त्र द्वारा सिद्ध) गदा फेंकी तो वह मथुरा के बगल में मगध की राजधानी गिरिव्रज से 99 योजन दूर जाकर गिरी । परम्परागत पञ्चाङ्गकारों द्वारा सर्वमान्य और वराहमिहिर द्वारा सर्वोत्तम माने गए सूर्यसिद्धान्त के अनुसार भूव्यास 1600 योजन का है । गूगल अर्थ द्वारा गिरिव्रज और मथुरा के अक्षांशों का औसत निकालकर फल का कोज्या (कोसाइन) ज्ञात करें और उसे विषुवतीय अर्धव्यास से गुणित करें, इष्टस्थानीय भू-व्यासार्ध प्राप्त होगा । इसे मथुरा और गिरिव्रज के रेखांशों (Longitudes) के अन्तर से गुणित करें, फल 98.54 योजन मिलेगा, जो पूर्णांक में 99 योजन है । इसका अर्थ यह है कि व्यास जी ने पृथ्वी को गोल मानकर उपरोक्त गणित किया था । गौतम बुद्ध के काल में मगध की राजधानी राजगीर थी, गिरिव्रज तो महाभारत के मूल कथानक के काल की प्रागैतिहासिक राजधानी थी । ऐतिहासिक युग में योजन का मान बढ़ गया था, विभिन्न ऐतिहासिक ग्रन्थों में भूपरिधि सूर्यसिद्धान्तीय मान 5026.5 योजन के स्थान पर केवल 3200 योजन बतायी गयी । अतः स्पष्ट है कि वेद व्यास जी का गणित पूर्णतया शुद्ध था और अतिप्राचीन था । अब बतलाएं, क्या पृथ्वी के गोल होने और पृथ्वी के व्यास की खोज ग्रीक लोगों ने ईसापूर्व तीसरी शताब्दी में की ?
माउण्ट एवरेस्ट का अक्षांश है 27:59 । विषुवतीय एवं ध्रुवीय भूव्यासार्धों में अन्तर है 21772 मीटर , अतः माउण्ट एवरेस्ट के अक्षांश पर भूव्यासार्ध का मान विषुवत पर स्थित मेरु पर्वत के पास के भूव्यासार्ध से 6769 मीटर कम है, जबकि माउण्ट एवरेस्ट की समुद्रतलीय ऊँचाई मेरु की समुद्रतलीय ऊँचाई से 3649 मीटर अधिक है । फलस्वरूप भूकेन्द्र से मेरु-शिखर की ऊँचाई भूकेन्द्र से एवरेस्ट-शिखर की ऊँचाई की तुलना में 3120 मीटर अधिक है , दोनों में कोई तुलना ही नहीं है ! पृथ्वी के महाद्वीपीय भार का विषुवतीय केन्द्र पर्वतराज महामेरु ही है जो पृथ्वी के घूर्णन पर जायरोस्कोपिक नियन्त्रण रखता है और सम्पात-पुरस्सरण (precession of equinoxes) का भी केन्द्र है (न्यूटन ने प्रिन्सिपिया में विषुवतीय अफ्रीका के पर्वतीय उभार को पृथ्वी के घूर्णन का जायरोस्कोपिक नियन्त्रक बताया था) । पुराणकारों का गणित अंग्रेजों से बेहतर था न !
फिर भी अंग्रेजों ने मेरु पर्वत नाम बदलकर माउण्ट केन्या कर दिया और पौराणिक गणित को कपोरकल्पित घोषित कर दिया ! मेरुपर्वत की सबसे बड़ी विशेषता है कि चारों ओर के धरातल की तुलना में यदि ऊँचाई मापी जाय तो यह संसार का सबसे ऊँचा पर्वत है, सपाट धरातल पर पाँच किलोमीटर ऊँचा पिरामिड है जिसकी नक़ल में मिश्र के पिरामिड बनते थे और दक्षिण सूडान में प्रागैतिहासिक मेरु साम्राज्य था (माउण्ट एवरेस्ट आसपास के धरातल से केवल 300 मीटर ऊँचा है)।
ग्रीक लोगों ने प्राचीन सभ्यताओं के सारे ज्ञान का जो थोड़ा सा हिस्सा समझा उसे अपने नाम से लिखकर सिकन्दरिया के विशाल पुस्तकालय में आग लगा दी और विरोधियों को मौत के घाट उतार दिया । सिकन्दर तो इतना क्रूर था कि अपने बाप फिलिप को पटककर चाकू भिरा दिया था, गुरुभाई कैलीस्थीनीज (प्राचीन ग्रीक में उच्चारण “कालीस्थानी”, ग्रीक में अन्तिम “स” का उच्चारण नहीं होता था) को सूली पर टाँग दिया, और भारत में दिगम्बर साधु महात्मा दाण्डायण को जबरन पकड़ लाने के लिए सिपाहियों को भेजा लेकिन सिपाहियों ने हिम्मत नहीं की तब स्वयं गया, मेगास्थनीज (“महास्थानी”) ने दाण्डायण को “दमदमी” लिखा !
हमारे इतिहासकार भी इन बातों पर ध्यान नहीं देते, उन्हें रामायण, महाभारत और पुराणों में ज्ञान की कोई बात नहीं दिखती, जबकि भारतीय संस्कृति इन्हीं ग्रन्थों पर आश्रित रही है ; वेद कितने लोग पढ़कर अर्थ लगा सकते हैं ? रामायण, महाभारत और पुराणों के माध्यम से ही वैदिक धर्म और संस्कृति बची हुई है जिसे मिटाने में हमारे “सेक्युलर” बुद्धिजीवी रात-दिन परिश्रम करते रहते हैं । एक भी “सेक्युलर” बुद्धिजीवी को संस्कृत भाषा का भी ज्ञान नहीं है, उनके विदेशी आका जो लिखते हैं उसे ये लोग तोते की तरह दुहराते रहते हैं । कोई बहस करे तो उसे *इतिहास का भगवाकरण कहकर चिल्ल-पों मचाते हैं, शराफत से शास्त्रार्थ भी नहीं करते ।*
असत्य और अनाचार को सहना अधर्म है, सहिष्णुता नहीं । सहिष्णुता है सत्य की ओर जाने वाले अपने मार्ग से भिन्न दूसरे सत्य मार्गों को सहन करना , सभी सच्चे पन्थों का सर्वपन्थ-समभाव की भावना से आदर करते हुए अपने पन्थ पर चलना ।
✍🏻फिर मिलते है…