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वराहं पूजयेद्देवं प्रारम्भे कृषिकर्मणि - विष्णुधर्मोत्तर

वराह और उनकी शक्ति वाराही के आयुधों में हल तथा मुसल भी हैं।

हल में *एकदंष्ट्र* ही तो होता है. !

यह कृषि-सभ्यता का अध्याय वाराह कल्प के आदि से चला आ रहा है।

एकदंष्ट्र से लेकर शतबाहु तक का उल्लेख

कृषि उपकरणों व कृषि की विधियों के विकास की गाथा है।

अवतारों में फिर आठवें अवतार बल-राम के हाथों में यही आयुध आते हैं, वे यमुना का संकर्षण करते हैं ताकि कृषि केवल इन्द्र के सहारे न रहे।

हाथों में हल होगा तो श्रम करना पड़ेगा, कृषि में श्रम की महत्ता है।

व्रतियों को कृषि-अन्न अर्थात् यज्ञफल से वञ्चित रखा गया है, उनके लिये समाधान है। समा धान,  समा चावल (जो कि चावल नहीं होते) , एक प्रकार की घास के बीज होते हैं जो बिना हल के उपयोग के उत्पन्न होते हैं. व्रतधारी व्रत में इसे ही खाते हैं, यह कदन्न की श्रेणी में आता है।

महावीर व्रती थे उन्होंने श्रम निषेध करते हुये कृषि-कर्म वर्जित कर दिया। महावीर के अनुयायियों को हल से उत्पन्न किये हुये अन्न का सेवन नहीं करना चाहिये।

✍🏻आगे और पढ़े…

 

भदई या कुआरी फ़सल तो कट चुकी, अब अगहनी के कटने की बारी है. अगहनी या जड़हन या चहोरा या सैंदी धान बोआ और रोपा दोनों किस्म का होता है. अगहनी धान को ही संस्कृत में शालि और रोपा अगहन को कलमशालि कहते हैं. जिस खेत में धान पैदा होता है, उसे धनहर, धनखर, धनकियारी कहते हैं.

 

धान की किस्में अनगिनत हैं. महीन या बारीक धान की कुछ मशहूर किस्मों के नाम इस प्रकार हैं- बासमती, कनकजीर, धनियां, तुलसीफूल, महाजोगिन, मर्चा, गौरिया, जूही बंगाल, बर्माभूसी, लालकेसर, रामजीरा, श्यामजीरा, काला नमक, बहरनी, राम अजवाइन, गोपालभोग, रामभोग, ठाकुरभोग, सुगापंखी, बतासफेनी, दूधगिलास, कमोदी, दौनाफूल, हंसराज, भाटाफूल, बांसफूल, कमोच, कनकचूर, गोकुलसार, श्रीमंजरी, मालदेही, लौंगचूरा, जलहोर. मोटे धानों की किस्मों के कुछ नाम ये हैं- करंगा, जगरनथिया, दूधराज, मेघनाद, राटिन, ललदेइया, गहुमा, गड़ेर, मुटुरी, नन्हिया, मनसरी, रमुनी सरिहन, सिलहट, बैतरनी, भेड़काबर, मुटुनी दोलंगी, मुड़रा, गजपत्ता, सेल्हा, जोंगा, कजरधर, दलगंजन, सौंदी. चबेना के काम आने वाले धान हैं अनन्दी और देवसार. नयी देसावरी किस्में तो नम्बरों से अधिकतर जानी जाती हैं. धान का नया पौधा सुई, रोपा जाने वाला बान, जड़ नेरुआ, बाली झंपा, कच्चा धान गदरा या गड़रा, तैयार धान सुरका, खड़े धान का चावल अरवा, उबाले का उसिना या भुजिया (भूनकर मुरमुरी, मुड़ी, लाई बनती है), भुना धान खील या लावा (लाजा) छिलका भूसी, भीतरी कोराई, टूटा चावल कन, बहुत टूटने वाला टुटहन, खुदिगर और पिसा चावल चौरठ कहा जाता है.

 

धान की कटनी या कटिया या लवनी कातिक के अंत में शुरू होकर पूस तक जाती है. जड़ से कटिया की प्रक्रिया जड़कट्टा, या जरछोरा बिलकुल ऊपर वाली बाली काटने की प्रक्रिया बलकट, टुंगनी, कटुई, पंगाई, नन्हकटनी या सिसकटनी कही जाती है. कभी-कभी लोग खेत तैयार न होने पर भी चराई या हईं के डर से भदरा या कचरा या गदरा ही काट लेते हैं. नवान्न के लिए समहुत (सुमुत) पहले काटा जाता है, मुहूर्त्त या साइत के रूप में. कटनी के लिए हंसुआ, पछरिया, बधरा, बधरिया, दाब, संगिया, चिलोही (ये सभी बड़े होते हैं) या हेसुली या कत्ता (छोटे) काम में आते हैं. दांतों वाला हंसिया दातें या कचिया कहा जाता है.

 

धान काटकर खेत में मूठों, पूलों या गुट्ठों में बटोर कर पांती-पांती रखे जाते हैं. सूख जाने पर इन्हें गतार या रस्सी से बांधा जाता है, चार मुट्ठे का पांजा होता है जिसे जगह-जगह औल्हा, अदांसा, आहुल, अंटिया और पसही कहते हैं, चार पांजों का एक बोझा होता है, सोलह बोझे की सोरही, इक्कीस की इकैसी, 16 सोरही का सोरहा. बोझ एक के ऊपर एक सरिया कर (सहेज कर) खलिहान में रखे हैं. इसे डांठ, गांज, जांगी, बांही भी कहते हैं. खलिहान छीला जाता है, बराबर किया जाता है, लीपा जाता है, तब उसमें डांठ रखा जाता है. खलिहान में अनाज अलग करने के लिए फैलाई फ़सल पैर या लांक कहलाती है. इसके बीच में एक मेह होता है. मेह के पास वाला (अर्थात् जिसे सबसे कम दूरी घूमनी होती है) मेंहिया कहा जाता है और सबसे बाहर वाला अगदाई या पागड़ा या पागड़िया या आगिल कहा जाता है. बैलों के गले में पड़ी रस्सी गैनी में फंसी हुई बड़ी रस्सी दांवरी या दौंरी कही जाती है. ऊपर अच्छी तरह टूट जाने पर नीचे वाली पैर या लांक उलटी जाती है या उखाड़ी जाती है, इसी को तरपैरी करना कहते हैं. दांव घूमते समय बैल जो डांठ इधर-उधर कर देते हैं, उसको किसान सोकी से बैलों के पैरों के नीचे डालता चलता है, यह प्रक्रिया पागड़ मारना है. अच्छी तरह रुंदा हुआ डांठ खुरदायां हुआ डांठ कहा जाता है.

 

अनाज़ की इकट्ठी रास को सिली, टाल, गल्ला, ढेरी या खम्हार भी कहते हैं, इसमें अभी कुछ-न-कुछ पयाल मिला होता है, इसकी ओसौनी शुरू होती है. जो भूसा उड़कर निकलता है, उसे पम्मी, भौंटा, पांकी कहते हैं, इसके बाद अधभरी या पइया अनाज़ निकलता है. भारी अनाज बीच में राशि के रूप में इकट्ठा होता जाता है, दूर बिखर जाने वाला अनाज अगवार या पछुआ हलवाहों का हिस्सा होता है. रास बटोरने के लिए फरई या अखइन काम में लाये जाते हैं. रास के ढेर पर झाडू (सुनैती या सरेती) फेरा जाता है. (छबड़ा की जाती है). रास चद्दर, जाजिम, पाल आदि से ढककर दबा दी जाती है. रास के साथ खेत की मिट्टी का एक ढेला (स्याबड़ < सीतावर्त्त) भी आता है. कुछ अनाज दान के लिए अलग रखा जाता है. उसको भी स्याबड़ी कहते हैं, इसी में से नाई, पुरोहित, बढ़ई या पवनी को किसान अपनी सालाना जजमानी भी अदा करता है. हर किस्म के धान की मोजर (मंजरी) इकट्ठी करके उसकी बंदनवार आंगन में चारों ओर तानी जाती है.

 

क्या किसी और संस्कृति में यह विविधता , और यह ज्ञान हो तो बताना…

 

चावल का जिक्र किसी भी बाइबिल में नहीं आता, ईजिप्ट की सभ्यता भी इसका जिक्र नहीं करती। पश्चिम की ओर पहली बार इसे सिकंदर लेकर गया और अरस्तु ने इसका जिक्र “ओरीज़ोन” नाम से किया है। नील की घाटी में तो पहली बार 639 AD के लगभग इसकी खेती का जिक्र मिलता है। ध्यान देने लायक है कि पश्चिम में डिस्कवरी और इन्वेंशन दो अलग अलग शब्द हैं और दोनों काम की मान्यता है। दूसरी तरफ भारत में अविष्कार की महत्ता तो है, लेकिन अगर पहले से पता नहीं था और किसी ने सिर्फ ढूंढ निकाला हो तो खोज के लिए कोई विशेष सम्मान नहीं मिलता।

 

इस वजह से पश्चिमी देशों के वास्को डी गामा और कोलंबस जैसों को समुद्री रास्ते ढूँढने के लिए अविष्कारक के बदले खोजी की मान्यता मिलती है लेकिन भारत जिसने पूरी दुनियां को चावल की खेती सिखाई उसे स्वीकारने में भारतीय लोगों को ही हिचक होने लगती है। कैंसर के जिक्र के साथ जब पंजाब का जिक्र किया था तो ये नहीं बताया था कि पंजाब सिर्फ भारत का 17% गेहूं ही नहीं उपजाता, करीब 11% धान की पैदावार भी यहीं होती है। किसी सभ्यता-संस्कृति में किसी चीज़ का महत्व उसके लिए मौजूद पर्यायवाची शब्दों में भी दिखता है। जैसे भारत में सूर्य के कई पर्यायवाची सूरज, अरुण, दिनकर जैसे मिलेंगे, सन (Sun) के लिए उतने नहीं मिलते।

 

भारतीय संस्कृति में खेत से धान आता है, बाजार से चावल लाते हैं और पका कर भात परोसा जाता है। शादियों में दुल्हन अपने पीछे परिवार पर, धान छिड़कती विदा होती है जो प्रतीकात्मक रूप से कहता है तुम धान की तरह ही एकजुट रहना, टूटना मत। तुलसी के पत्ते भले गणेश जी की पूजा से हटाने पड़ें, लेकिन किसी भी पूजा में से अक्षत (चावल) हटाना, तांत्रिक विधानों में भी नामुमकिन सा दिखेगा। विश्व भर में धान जंगली रूप में उगता था, लेकिन इसकी खेती का काम केवल भारत से ही शुरू हुआ। अफ्रीका में भी धान की खेती जावा के रास्ते करीब 3500 साल पहले पहुंची। अमेरिका-रूस वगैरह के लिए तो ये 1400-1700 के लगभग, हाल की ही चीज़ है।

 

जापान में ये तीन हज़ार साल पहले शायद कोरिया या चीन के रास्ते पहुँच गया था। वो संस्कृति को महत्व देते हैं, भारत की तरह नकारते नहीं, इसलिए उनका नए साल का निशान धान के पुआल से बांटी रस्सी होती है। धान की खेती के सदियों पुराने प्रमाण क्यों मिल जाते हैं ? क्योंकि इसे सड़ाने के लिए मिट्टी-पानी-हवा तीनों चाहिए। लगातार हमले झेलते भारत के लिए इस वजह से भी ये महत्वपूर्ण रहा। किसान मिट्टी की कोठियों में इसे जमीन में गहरे गाड़ कर भाग जाते और सेनाओं के लौटने पर वापस आकर धान निकाल सकते थे। पुराने चावल का मोल बढ़ता ही था, घटता भी नहीं था। हड़प्पा (लोथल और रंगपुर, गुजरात) जैसी सभ्यताओं के युग से भी दबे धान खुदाई में निकल आये हैं।

 

नाम के महत्व पर ध्यान देने से भी इतिहास खुलता है। जैसे चावल के लिए लैटिन शब्द ओरीज़ा (Oryza) और अंग्रेजी शब्द राइस (Rice) दोनों तमिल शब्द “अरिसी” से निकलते हैं। अरब व्यापारी जब अरिसी अपने साथ ले गए तो उसे अल-रूज़ और अररुज़ बना दिया। यही स्पेनिश में पहुंचते पहुँचते अर्रोज़ हो गया और ग्रीक में ओरिज़ा बन गया। इटालियन में ये रिसो (Riso), in हो गया, फ़्रांसिसी में रिज़ (Riz)और लगभग ऐसा ही जर्मन में रेइज़ (Reis) बन गया। संस्कृत में धान को व्रीहि कहते हैं ये तेलगु में जाकर वारी हुआ, अफ्रीका के पूर्वी हिस्सों में इसे वैरी (Vary) बुलाया जाता है। फारसी (ईरान की भाषा) में जो ब्रिन्ज (Brinz) कहा जाता है वो भी इसी से आया है।

 

साठ दिन में पकने वाला साठी चावल इतने समय से भारत में महत्वपूर्ण है कि चाणक्य के अर्थशास्त्र में भी उसका जिक्र आता है। गौतम बुद्ध के पिता का नाम शुद्धोधन भी धान से आता है और बुद्ध को ज्ञान प्राप्ति के समय भी सुजाता के खीर खिलाने का जिक्र आता है। एक किस्सा ये भी है कि गौतम बुद्ध के एक शिष्य को किसी साधू का पता चला जो अपने तलवों पर कोई लेप लगाते, और लेप लगते ही हवा में उड़कर गायब हो जाते। बुद्ध के शिष्य नागार्जुन भी उनके पास जा पहुंचे और शिष्य बनकर चोरी छिपे ये विधि सीखने लगे। एक दिन उन्होंने चुपके से साधू की गैरमौजूदगी में लेप बनाने की कोशिश शुरू कर दी।

 

लेप तैयार हुआ तो तलवों पर लगाया और उड़ चले, लेकिन उड़ते ही वो गायब होने के बदले जमीन पर आ गिरे। चोट लगी लेकिन नागार्जुन ने पुनः प्रयास किया। गुरु जबतक वापस आते तबतक कई बार गिरकर नागार्जुन खूब खरोंच और नील पड़वा चुके थे। साधू ने लौटकर उन्हें इस हाल में देखा तो घबराते हुए पूछा कि ये क्या हुआ ? नागार्जुन ने शर्मिंदा होते आने का असली कारण और अपनी चोरी बताई। साधू ने उनका लेप सूंघकर देखा और हंसकर कहा बेटा बाकी सब तुमने ठीक किया है, बस इसमें साठी चावल नहीं मिलाये। मिलाते तो लेप बिलकुल सही बन जाता !

 

सिर्फ किस्से-कहानियों में धान-चावल नहीं है, धान-चावल की नस्लों को सहेजने के लिए एक जीन बैंक भी है। अपनी ही संस्कृति पर शर्मिंदा होते भारत में नहीं है ये इंटरनेशनल राइस रिसर्च इंस्टिट्यूट (IRRI) फिल्लिपिंस में है। फिल्लिपिंस का ही बनाउ (Banaue) चावल की खेती के लिए आठवें आश्चर्य की तरह देखा जाता है। यहाँ 26000 स्क्वायर किलोमीटर के इलाके में चावल के खेत हैं। ये टेरेस फार्मिंग जैसी जगह है, पहाड़ी के अलग अलग स्तर पर, कुछ खेत तो समुद्र तल से 3000 फीट की ऊंचाई पर भी हैं। इनमें से कुछ खेत हजारों साल पुराने हैं और सड़ती वनस्पति को लेकर पहाड़ी से बहते पानी से एक ही बार में खेतों में सिंचाई और खाद डालने, दोनों का काम हो जाता है।

 

इस आठवें अजूबे के साथ नौवां अजूबा ये है कि भारत में जहाँ चावल की खेती 16000 से 19000 साल पुरानी परम्परा होती है, वो अपनी परंपरा को अपना कहने की हिम्मत नहीं जुटा पाता ! कृषि पर शर्माने के बदले उसे भी स्वीकारने की जरूरत तो है ही।

(भारत क्या है इसकी जानकारी सिर्फ अपने तक सीमित रखना है, या मित्र परिवार  को भी बताना है ,यह आपका अपना  निर्णय है…)

✍️फिर मिलते है….

हमारे पूर्वजों ने जिस पद्धति से खेती की, माटी को उपजाऊ बनाने के लिए गोवंश का उपयोग किया, वो हम आधुनिकता में भूल गए,।

आज जिस खेत में हम धान के खेत में  बोरिया की बोरिया यूरिया छिड़क रहे हे,

केवल १ चम्मच पानी में घुल कर पी पावोगे?

पी कर जी पावोगे??

आधुनिकता और हरित क्रांति के आड़ में, हम जहर खा रहे हे..जहर खिला रहे हे

भारत कैंसर का गढ़ यू ही थोड़ा बन रहा है

 

हमारी आंखे होते भी हम अंधे और

हमारा दिमाग रहते भी

हम ए क्या कर रहे हे..

ना इस पर कोई कृषि विद्या पीठ, न कोई कॉलेज इस पर प्रकाश डाल रहा है, न ही कोई काम

भगवान वराह प्रत्येक तंत्र की काट हैं

वराह पुराण से पितृदोष ( पितृऋण ) और कालसर्प दोष  उतारने का सबसे सुलभ मार्ग

आप सभी लोगों से निवेदन है कि हमारी पोस्ट अधिक से अधिक शेयर करें जिससे अधिक से अधिक लोगों को पोस्ट पढ़कर फायदा मिले |
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