
भारत की लोकसंस्कृति शिवमय है । पूरब से पश्चिम और उत्तर से दक्षिण , प्रत्येक जनपद में शिव की कीर्ति है , प्रत्येक जनजाति के गीत और कहानियों में कहीं न कहीं , किसी न किसी रूप में “बं बं हर-हर” का नाद है । भूतपिशाच आदि गणों को साथ लेकर हिमालय के घर की ओर बरात लेकर जा रहे हों , अथवा दक्ष के यज्ञ का विध्वंस करने की मुद्रा में हों ,वे प्रलय के समय का तांडव-नृत्य कर रहे हों , या कामदेव का संहार करने के लिए तीसरा नेत्र खोला हो ,वे भस्मासुर को वरदान दे कर स्वयं ही चक्कर में पड़ गये हों या भगीरथ के आग्रह को स्वीकार करके गंगा के अवतरण के लिए संनद्ध हों , वे श्मशान पर चिता-भस्म लपेटे हुए हों या कैलाश पर साधना -तपस्या में लीन हों , वे गौरा-पार्वती के संग अपने नादिया पर बैठे हुए लोकभ्रमण कर रहे हों , अथवा किसी किसान की सूखी धरती पर शंख बजा कर मेघों को संकेत दे रहे हों , वे प्रलयंकर हों अथवा मृत्युंजय हों , वे वेद की परंपरा के रुद्र हों अथवा अवैदिक-परंपरा के अघोर हों , वे अर्द्ध नारीश्वर हों अथवा हरिहर हों , इसमें तनिक संशय नहीं कि
प्रत्येक रूप में शिव शिव ही हैं । यों तो मिथकशास्त्र का *”समुद्र-मंथन”* सभ्यता के सोपान की कहानी है , किन्तु समुद्र-मंथन से निकले अमृत की बूँद को पाने के लिए संघर्ष हुआ , लेकिन जो जहर निकला उसे स्वीकार करने को कोई भी तैयार नहीं हुआ । कौन होता ? उस विष को कंठ में धारण करने वाला शिव के अतिरिक्त और कौन हो सकता था ?
देशकाल में शिव का इतना विस्तार है कि हिमालय की दुर्गम पर्वत -श्रृंखलाओं पर अमरनाथ , केदारनाथ और कुमाऊँ के बागेश्वर जागेश्वर विभाण्डेश्वर, पिनाकेश्वर, भीमेश्वर, हंतेश्वर डंडेश्वर से लेकर तमिलनाडु के रामेश्वर तक । झारखंड के वैद्यनाथ , उज्जैन के महाकाल , सौराष्ट्र के सोमनाथ ,नर्मदा नदी के तट पर ओंकारेश्वर , नासिक गोदावरी नदी के किनारे त्र्यम्बकेश्वर, आंध्र प्रदेश के कर्नूल श्रीशैलम में मल्लिकार्जुन , गुजरात में नागेश्वर , महाराष्ट्र की सह्याद्रि -पर्वत- श्रृंखला पर भीमशंकर और घृष्णेश्वर , शिव के त्रिशूल पर बसी काशी में विश्वनाथ ,बंगाल में दक्षिणेश्वर, उन्मत्त-भैरव तारकनाथ,केरल के अन्तिमहाकालन,आन्ध्र के श्रीवैंकटेश्वर,गोआ के श्रीमंगेश, महाराष्ट्र के बालुकेश्वर,कुरुक्षेत्र के स्थाण्वीश्वर , भारत के कंकर-कंकर में शंकर का भाव बसा हुआ है ।चिदम्बरम में नटराज,तिरुवण्णामलै: जहां पार्वती ने शिव का सान्निद्ध्य प्राप्त करने के लिये तप किया था। नेपाल के पशुपतिनाथ और तिब्बत के कैलास -पर्वत के बिना तो शिव की कथा भी कैसे पूरी होगी? *संक्षेपमें भारत शिव-रूप है !*
स्थान-स्थान पर हजार-हजार किंवदन्तियाँ शिव से जुड़ी हुई हैं उदाहरण के लिए मणिकर्ण की कहानी है । कुल्लूघाटी के पास मणिकर्ण है ! वहाँ धरती से खौलते हुए पानी का एक सोता निकलता है ! उस कुंड में दाल और चावल की पोटली पाँच मिनट में पक कर तैयार हो जाती है ! उस स्थान पर प्रो . रमेशकुन्तल मेघ ने एक मिथक -कथा सुनी थी कि इस इलावर्त में शिव-शिवा विहार कर रहे थे ! शिव ने शोभा -पान के लिए उमा के मुख पर झूलती हुई लट को उँगलियों से हटाया , लज्जा में त्रिभंग हुई पार्वती की नथ [नाक का आभूषण ] का मणि नदी में गिर गयी! बहुत खोज की किन्तु नहीं मिल सकी ! शिव ने ध्यान लगाया , वह मणि तो शेष नाग ने धारण कर ली थी ! शिव ने त्रिशूल बेधा तब शेषनाग ने मणि लौटा दी ! तभी से पार्वती नदी तीन दिशाओं में बँट गयी ! यह जगह मणिकर्ण नाम से प्रख्यात हो गयी ।अलकनन्दा शिवालक -पर्वतश्रेणी शिव का जटाजूट ही तो है,उसी ने तो गंगा को संभाला था!हिमालय पार्वती का पिता है,शिव का विवाह हिमालय के आंगन में ही हुआ था ,किन्तु लोक -सरस्वती कहती है कि पार्वती ने शिव पर जो चावल उछाले ,उनमें से सात चावल सात रंग की बालू बन कर कन्याकुमारी में बिखर गये।
तमिलनाडु में अय्यनार देवता शास्ता के रूप में जाने जाते हैं ।अरकोट क्षेत्र में “अय्यनार “की कहानी पद्मासुरन (जिसे पुराण-कथाओं में भस्मासुर के नाम से जाना जाता है) की कहानी से संबंधित है , जिसे शिव ने वरदान दिया था कि वह जिस किसी के भी सिर पर हाथ रखेगा , वह भस्म हो जायेगा , पद्मासुरन शिव के ही मस्तक पर हाथ रखने को उद्यत हुआ, तब महाविष्णु मोहिनी के रूप में प्रकट हुए। मोहिनी के सम्मोहन से असुर ने अपने ही सिर पर हाथ रखा और भस्म हो गया । अब शिव विष्णु को मोहिनी के रूप में देखना चाहते हैं। तो लोककहानी ने बतलाया कि मोहिनी को देख कर शिव उत्तेजित हुए , स्खलित हो गए । शिव का वीर्य धरती पर न गिरे इसलिए मोहिनी ने वह अपने हाथ में ले लिया , उससे अय्यनार का जन्म हुआ। तेलुगु में उनका नाम पोटुराजू है और वे उन गांवों में पीठासीन रेणुका देवी के भाई हैं। मिथक-कहानी यह है कि पोटा राजू ने अम्मा द्वारा मारे गए राक्षसों का रक्तपान किया था।राजस्थान में “गवरी ” आदिवासी भीलों का आदिम नृत्यानुष्ठान है ,जिसके मूल में आदिदेव महादेव शंकर और भस्मासुर का यही आख्यान वर्णित है।गवरी का नायक राईबूड़िया है ।
पुराणों में शिव की कथाएं हैं किन्तु वहाँ मुनिगण और शिव के बीच एक सांस्कृतिक- संघर्ष दिखाई देता है । महादेव नग्न – वेश में नवीन तापस का रूप धारण करके मुनियों के तपोवन में आये (वामनपुराण ४३ अध्याय ५१ , ६२ श्लोक ) । मुनि-पत्नियों ने उन्हें घेर लिया (वही, ६३-६९ श्लोक) । मुनिगण अपने ही आश्रम में मुनि-पत्नियों की ऐसी अभव्य कामातुरता देखकर ‘मारो, मारो’ कहकर काठ ,पाषाण आदि लेकर दौड़ पड़े : *क्षोभं विलोक्य मुनय आश्रमे तु स्वयोषिताम् ।हन्यतामिति सम्भाष्य काष्ठपाषाण -पाणयः ।[वामनपुराण ४३ अध्याय ७० )*
यह कहकर उन्होंने शिवके भीषण ऊर्ध्वलिंगको निपातित किया – पातयन्ति स्म देवस्य लिंगमूर्ध्वं विभीषणम् । (वही, ७१ ) बादमें मुनियोंके मनमें भी भयका संचार हुआ । ब्रह्मा आदि ने उन्हें समझाया बुझाया और अन्त में मुनि-पत्नियों की एकान्त अभिलषित शिवपूजा प्रवर्तित हुई ![वामन अध्याय ४३-४४]
कूर्मपुराण में भी ऐसी ही कथा है । मुनिगण मारे क्रोध के शिवको अतिशय निष्ठुर वाक्य से भर्त्सना करने और अभिशाप देने लगे : *अतीव परुषं वाक्यं रूपं वा प्रोचुर्कपर्दिनम् । शेपुश्च शापैर्वविधैर्मायया तस्य मोहिताः। (कूर्म० ३७, २२)* किन्तु अरुन्धतीने वात्सल्य भाव से शिवकी अर्चना की। ऋषिगण – शिवको ‘यष्टि-मुष्टिप्रहार’ या लाठी और घूँसेकी चोट करते हुए बोले- ‘तू यह लिंग उत्पाटन कर महादेवको वही करना पड़ा। पर बाद में इन्हीं मुनियोंको इसी शिव-लिंगकी पूजा स्वीकार करनेको बाध्य होना पड़ा !
शिवपुराणके धर्मसंहिताके दसवें अध्यायमें है कि शिव ही आदि देवता हैं ब्रह्मा और विष्णुको उनके लिंगका आदि मूल अन्वेषण करने जाकर हार माननी पड़ी (१६-२१)। देवदारु वन में शिव विहार करने लगे (७८-७९)। मुनिपत्नियाँ काम-मोहित होकर नाना-विध अश्लील आचरण करने लगीं ! (११२-१२८) शिव ने उनकी अभिलाषा पूरी की (१५८)। मुनिगण काममोहिता पत्नियों को सम्हालने में व्यस्त हुए ! [१६०]पर पत्नियाँ मानी नहीं ! मुनि-पत्नियों ने शिव को कामार्त होकर ग्रहण किया था। [१७८] भृगु के शापसे शिवका लिंग भूतलमें पतित हुआ (१८७) | भृगु
धर्म और नीतिकी दुहाई देने लगे (१८८-१९२)। अन्तमें मुनिगण शिवलिंगकी पूजा करनेको बाध्य हुए (२०३-२०७ ) ।
यही कथा स्कन्दपुराण, महेश्वरखंड, पष्ठाध्याय में है और यह एक ही कथा लिंगपुराण (पूर्वभाग ३७ , अध्याय, ३३-५० ) में भी है । वायुपुराणके महेश्वरखण्ड में शिवकी कथा कही गई है। नागरखण्ड के शुरू में भी वही कथा है। आनर्तदेश के मुनिजनाश्रय वनमें किस प्रकार भगवान शंकर नग्न वेश में पहुँचे (१-१२), किस प्रकार मुनि-पत्नियों का आचरण शिष्टताकी सीमा पार कर गया (१३-१७ ), मुनिगण सब देखकर क्रुद्ध होकर बोले—रे पाप, तूने चूंकि हमारे आश्रमको विडम्बित किया है, इसलिए तेरा लिंग अभी यह भूपतित होवे *-यस्मात्पापत्वयास्माकं आश्रमोऽयं विडम्बितः । तस्माल्लिंगं पतत्वाशु तवैव वसुधातले।(पद्मपुराण, नागरखण्ड १-२०)* किन्तु यहाँ भी मुनियोंको झुकना पड़ा। जगत्में नाना उत्पात उपस्थित हुए ( २३-२४), देवतागण भीत हुए और धीरे-धीरे शिव-पूजा स्वीकार कर ली गई।
मुनि और मुनि पत्नियों के बीच यह केवल सांस्कृतिक द्वंद्व ही नहीं है,आचार्य सेन यहाँ रेखांकित करते हैं कि मुनि आर्य हैं और मुनिपत्नियाँ आर्येतर परिवारों से आयी हैं।
दक्ष-यज्ञमें शिवके साथ दक्षका विरोध वस्तुत: आर्य वेदाचारके साथ आर्येतर शिवोपासनाका विरोध ही है !दक्षके यज्ञमें शिव नहीं बुलाये गये, और शिवहीन यज्ञ भूत-प्रेत-प्रमथादि द्वारा विध्वस्त हुआ , इसी से समझा जा सकता है कि शिव उस समय तक आर्येतर-जातियों के देवता थे !शिव किरातवेशी, शिवानी , शबरी-मूर्ति, शिव शबर -पूजित थे , ये सब कथाएँ नाना पुराणोंमें नाना भाव से मिलती हैं।
कालिकापुराण में वसंत -जन्म का उल्लेख है कि शिव के मन में कामविकार पैदा करने के उद्देश्य से देवताओं ने काम को शिव के पास भेजा तो कामदेव शिव के तेज से घबरा गया – अकेला कैसे जाऊं?तब ब्रह्मा ने वसन्त का सृजन किया।वसन्त काम का सहज- सखा है।शिव की क्रोधाग्नि से जब काम भस्म हो गया ,तब कामदेव की पत्नी रति पार्वती के पास जाकर विलाप करने लगी।पार्वती तो करुणा हैं,उन्होंने भगवान शिव को उसकी व्यथा सुनाई,तब शिव ने कहा कि *जगदिदमनंगो विजयते।* अर्थात काम अशरीरी होकर भी समस्त विश्व के मन को मथ कर विजय प्राप्त करेगा।वसंतपंचमी काम के पुनर्जीवन का दिन है।
उमा शिव को पाने के लिये तपस्या कर रही थी।स्वयं शिव एक बूढेबाबा का वेश धारण करके आगये -किसे पाना चाहती हो? शिव को ?अरे वह, जो भिक्षुक है?भयंकर है?श्मशान वासी है? चिताभस्म धारण करता है?अनार्य है?उमा को क्रोध आया, अरे बाबा, क्या बोलते हो?अकिंचन: सन् प्रभव: स सम्पदां।अकिंचन होते हुए भी वे समस्त ऐश्वर्य का मूल हैं।अमंगल वेश होते हुए वे समस्त मंगल के कारण हैं।
शैव-उपासना की परंपरा किस प्रकार श्रीकृष्ण में सम्मिलित हो रही है , इसका उदाहरण एक लोकगीत है , हालांकि यह गीत सूरदास के जमाने में भी प्रचलित रहा होगा । क्योंकि सूरसागर में यह पद है – *मैं जोगी जस गाया रे बाला* । कृष्ण ने जन्म लिया है , यह खबर सुन कर कैलास -पर्वत से चल कर शिव गोकुल [गोप-बस्ती] में आकर अलख जगाते हैं । ब्रज की गोपियां जाकर जसोदा से कहती हैं – देखौ री एक बाला जोगी द्वार तिहारे आया है री । अरी जसोदा , आज तो तेरे दरबाजे पर एक जोगी आया है । शरीर में भभूत रमी है , बडी-बडी जटा है, माथे पर चन्द्रमा है , गले में नाग लटका है । कंचनथाल में भिक्षा सजा कर मैया जसोदा दरबाजे पर आई , जोगी बोला – ना चहिये तेरी दौलत दुनियां ना चहिये धन माया है री , अपने गुपाल जी कौ दरस कराय दे , जा कारन जोगी आया है री । तू मोतियों की माला ले , कंचन थार ले ! जोगी , ऐसी जिद क्यों करता है ? तुझे देख कर मेरा लाल डर जायेगा । मैया , हमारी भिक्षा तो गोपालजी का दर्शन करना है। मैया तो डर रही थी । जोगी दरबाजे से लौटा किन्तु लाला का रोना शुरू हो गया । चुप ही न हो। थाली बजायी , नजर उतारी , दूध से लगाया पर लाला तो चुप नहीं हो रहा । रोता ही जा रहा है । क्या करूं ? अरी मैया , यह तो उस जोगी का ही कुछ चेटक है । उसे बुलवाओ। जोगी तो गोकुल [गोप-बस्ती]के ही पास धूनीकुंड पर बैठा था । गोपी ने कहा > चल रे जोगी , नन्दभवन में जसुदा तोहि बुलाबै । जोगी आया । जोगी ने नन्दलाला को गोद में लिया तो लाला किलकने लगा > *बिथा भई सब दूर बदन की किलक उठे नंदलाला।* जसोदा जोगी से बिनती करने लगी – अरे जोगी , तू तो हमारे ब्रज में ही बस जा , तू तो चेटक वाला है > जब जब मेरौ लाला रोबै तब-तब दरसन दीजै ।’
चोरों में शिव की कथा इस प्रकार से है कि -चोर घंटा उतारने को शिव-विग्रह पर चढा ,बस इसी बात पर खुश हो गये कि तैने तो अपने को ही अर्पित कर दिया।कुछ बुरा-बुरा तो जैसे उनके मन में आता ही नहीं!बोले > वत्स, वरं ब्रूहि ! वर मांगो!!हम बडे प्रसन्न हैं ।
इन्हीं बातों को देख कर तुलसी कहते हैं > *बाबरौ राबरौ नाह भवानी!!मां अन्नपूर्णा, तुम्हारा नाह तो एकदम बाबला है!*
महादेव का वेश दिगम्बर या बाघम्बर,,नरमुंड माला,हाथ में कपाल आखेट युग की आदिम सभ्यता का प्रतीक है। कई मूर्तियों में शिव को मूंछों वाला दिखलाया गया है।
लाँगुरिया गीतों में वीर-भाव के साथ ही माधुर्य और वात्सल्य भी है ।लकुलीश -भैरव ही लांगूल भैरव हैं ।अनेक स्तुतियों में शिव को लकुलीश कहा गया है ।लकुलीश को शिव का अवतार माना गया ।ऐसी प्रतिमाएं भी हैं ,जिनमें शिव लकुट धारण किये हैं ।
शिवरात्रि- व्रत के दूसरे दिन पारणा होता है , और ब्रज में यह परंपरा है कि बम्भोले [जोगी] को आदरपूर्वक बुलवाया जाता है । रोली चावल से उसके खप्पर की पूजा की जाती है ।उसे मूँग-भात – झोर [कढी ] रोटी से जिमाया जाता है । फिर माँ- दादी कहती हैं – सिंगी बजा ! जोगी अपने गले में लटकी हुई सिंगी को बजाता है ।बाहर खेल रहे बच्चों -किशोर-किशोरियों को मालूम पड़ जाता है कि इस घर में जोगी आया है तो वे पौरी के किबाड़ बन्द कर लेते हैं । जोगी से पूछते हैं – अपने गुरु का नाम बताओ । वह औघड़नाथ जैसे कुछ नाम बतलाता है । उसके नाथ- नामों को सुन कर किबाड़ खोल दिये जाते हैं और वह किसी दूसरे घर का पूज्य बन जाता है ।जब हम इस परंपरा पर ध्यान देते हैं तो शिवरात्रि से और शिव-पूजा की परंपरा से जुड़ा हुआ जोगी-संस्कृति का एक सूत्र मिल जाता है ।इन नाथ -योगियों का शैव-परंपरा से अभिन्न -संबंध है ।ये नाथ-जोगी ही शिवरात्रि-जागरण के पुरोहित हैं और ये ही शिवरात्रि को “शिव-व्यावला -गाथा ” का गायन करते हैं ।
यदि लोकवार्ता का कोई अध्येता भारत के लोकमानस का अध्ययन करना चाहता है तो उसे “भोलानाथ” से स्पष्ट कोई दूसरा सूत्र-ग्रन्थ नहीं मिल सकता ।सचाई तो यह है कि शिव को छोड कर भारत के लोकमानस का कोई भी अध्ययन पूरा हो ही नहीं सकता है ?
शिव भारत का लोकमन हैं ।वह आर्य भी है ,अनार्य भी है , वह द्रविड भी है , वह कोलकिरात भी है ।वह क्या नहीं है ?वह जितना देवों का है उतना ही असुरों का है ।शिव भारतीयता की मूर्तिमान व्याख्या हैं । इससे बडी एकात्मता कहां मिलेगी ?
लोकमानस की वह विराट भावसंपदा शिव की मंगलमूर्ति में समाहित है ।भारत के वे सभी कबीले उनके बराती हैं ।भारत की समस्त विविधताऎं और अनेकताएं की , समस्त भेद और भिन्नताएं शिव में आकर एकरस एकाकार हो जाती हैं ! शिव के यहां न कोई जातिभेद है न वर्णभेद ?छूआछूत का भाव उसकी देहरी को भी नहीं लांघ सका ।शिव से बडा अघोरी भी कौन है ? शिव से बडा कोई वैष्णव है क्या ? वैष्णवानां यथा शंभु :। वह विष्णु में ऐसा रमा कि हरिहर हो गया और शक्ति में ऐसा रमा कि अर्धांगीश्वर हो गया । उससे बडा सर्वहारा कौन है ?भारत के आम-आदमी को देखिये और फिर शिव को देखिये ! कितना भोला है , कितना सरल-सहज है ,किन्तु प्रलयंकर भी वही है । लेकिन यह लोक जहर ही तो पीता है । शिव की भांति विश्वंभर भी है ।
भारत के इतिहास में अनेक जातियों का उल्लेख मिलता है यक्ष,राक्षस,पिशाच,गन्धर्व,किरात, किन्नर,नाग, निषाद,देव ,असुर आदि।उनसे भी पहले कबीला-युग में गणगोत्रों की विविधता मिलती है! ध्यान देने की बात यह है कि राक्षसराज रावण भी शिव का उपासक है,यक्षराज कुबेर भी शिव का उपासक है,शिव का किरात-रूप तो पुराण-प्रसिद्ध है ही, पिशाच मांसाहारी थे ,किन्तु वे भी शिव के ही उपासक हैं।महादेव के गण हैं।
महादेव की बरात का कुनबा प्रागैतिहासिक- भारत के गणगोत्रों का कुनबा है।हस्तिगणगोत्र का देव गणेश ,मूषक,नागजाति का देव सर्प,चन्द्र-उपासकों का चन्द्र,नन्दीगण,मयूरगण,गंगा आदि कितने ही देव महादेव में समाये हुए हैं?इनमें से एक एक देव तत्त्व पर स्वतंत्र शोध की जा सकती है।नंदी की आकृति सिंधु घाटी की सभ्यता में इतिहास ने देखी थी।
तीन लोक बस्ती में बसाये आप बसे वीराने में ।श्मशानवासी है ।वह विषपायी है । सबको अमृत बांट कर वह जहर पी जाता है ।”
देश के भिन्न-भिन्न लोगों ने शिव के रूप में अपने को ही खोजा है,अपने को ही पाया है??
लोकगीतकार कहता है कि मैं बालबच्चेदार आदमी हूँ ,मुझे तो बालबच्चेदार भगवान ही चाहिये ।
दलित-महिलाऎं शिवजी का एक गीत गा रही थीं, उसका सारांश है कि एक दिन पार्वती ने शिवजी से कहा कि -“हमें चूडियां पहनाओ!” शिवजी बोले – हमारे पास पैसा ही नहीं है,चूडियां कहां से लायें? पार्वती ने कहा कि -” सारे जगत में तुम्हारी साख है,कहीं से उधार मिल जायेगा! “शिवजी बोले -हमारे पास न गांव है, न घर,न खेत, हमें कौन उधार देगा? अच्छा, तो तुम्हारे पास चिलम के लिये तो पैसा है?चूडियों के लिये पैसा नहीं है?नन्दी को गिरवी रख दो, हमें चूडियां पहनाओ ,इस पर शिवजी नाराज हो गये ।”देखो ,इसी के बल पर तो मैं नौखंडी धरती पर विचरण करता हूं,इसका नाम मत लेना! ” शिव-पार्वती की समस्या परिवार की वैसी ही समस्या है । पैसे की कमी है , शिवजी के पास बीड़ी पीने के लिए पैसा नहीं है ।
वैसे तो पुराणों में शिवकथाओं का विस्तार समुद्र की तरह है,फिरभी जनपदों में शिव-कथा-चक्र वाचिक-परंपरा में निरन्तर प्रवाहित हो रहा है।आदि-वासियों में अपनी-अपनी जातियों की उत्पत्ति को शिव से जोडा जाता है। उदाहरण : एक दिन शिव वन में विचरण कर रहे थे।वे एक लता पर मुग्ध हो गये। लता से विवाह कर लिया।काले रंग का पुत्र जनमा।बडा हुआ। उसने शिव के नन्दी को खूब मारा। शिव ने नाराज होकर उसे घर से निकाल दिया। कोलभील इसी पुत्र की सन्तान हैं।चम्बा और भरमौर का एक प्रसिद्ध गीत है “सिव कैलासों के वासी, धौलीधारों के राजा संकर संकट हरणा…….। भरमौर में हिमालयी जनजाति गद्दी अपने को शिव का ही रूप मानती है – धूड़ अर्थात शिव एक आम आदमी की तरह पहाड़ी दर पहाड़ी घूमता है और पार्वती उसे नदी नालों में ढूंढती है- *”रिड़ियां तां रिड़ियां धूडू बोला नहठदा, नाले ता खोहले गौरां तोपदी।”*
एक दिन पार्वती भील-कन्या का रूप धारण करके नाचने लगीं!महादेव उस रूप पर मोहित हो गये और वे भी भील-कन्या के साथ नाचने लगे!शिव ने भील-कन्या से प्रणयदान मांगा! भील-कन्या ने उन्हें खूब नचाया,छकाया और कहा कि >> मुझे पत्नी बनाओ तो रतिदान करूं!महादेव बोले > ठीक है!भील-कन्या बोली >लेकिन मैं पार्वती के साथ नहीं रहूंगी!शिव बोले> उसे तो मैं पीहर भेज दूंगा। अब पार्वती अपने असली रूप में आगयीं, बोली > देख लिया तुम्हारे प्यार का ढोंग!!अब मैं तो पीहर जा रही हूं! शिव अपनी जटाओं से पार्वती के पैर पोंछने लगे और उन्हें मना कर घर लाये।यह राजस्थान के भील-अंचल की कथा है।
किसान की कहानी है कि शिवजी किसान हैं ।ऊँचा सा गाँव और हराभरा खेत । एक सुकुमार काला हिरण आता है ।गेंहूँ के पौधों को चरने लगता है ।गौरा पार्वती कहती हैं -नाथ ! देखो ,तुम्हारी आँखों के ही सामने तुम्हारी फसल नष्ट हो रही है ।हे भोले शिव ! अपना बाण साधो । हिरण को मारो ।भोलानाथ उस सुकुमार काले हिरण को देखते हैं सोचते हैं कि इसके भी तो परिवार होगा ।वे कहते हैं > पार्वती , मेरी माँ भी इसी हिरण की तरह साँवली हैं ।मेरी बहन भी इसी हिरण की तरह सुकुमार है , मैं इसे कैसे मारूँ ?
एक बार भगवान शंकर ने लोगों को नाना प्रकार के पाप करते हुए देखा,तो कोप किया.और निश्चय कर लिया कि जब तक लोग पाप करना नही छोड़ेंगे , तब तक मैं शंख नही बजाऊंगा ।भगवानशंकर ने शंख नही बजाया ,शंख नही बजा, तो बादलों ने वर्षा नहीं की ।वर्षा नहीं हुई, तो पृथ्वी पर अकाल पड़ गया ।क्लेश, संताप और दुखों की कोई सीमा नहीं रही ।दुनियां ने खूब प्रायश्चित किया , पर शंकर ने शंख नहीं बजाया ।एक दिन शंकर- पार्वती आकाश मार्ग से जा रहे थे .उन्होंने देखा कि जेठ की दोपहरी में एक किसान अपना खेत जोत रहा था.पसीने से सराबोर लेकिन अपनी धुन में मगन ।शंकर- पार्वती विमान से उतरे – आये और बोले ,” पागल किसान !पानी बरसे तो बरसों बीत गये , तू सूखी कठोर धरती को जोत कर बेकार मेहनत कर रहा है ?”
किसान बोला “सो तो बात ठीक है ,मगर हल चलाने का अभ्यास कहीं भूल न जाऊं । यदि हल चलाना भूल गया तो वर्षा से भी क्या होगा ? इसलिये अभ्यास बनाये रखता हूं !”किसान के बोल भगवान शंकर के कलेजे को पार कर गये ।वे सोचने लगे कि – मुझे भी शंख बजाये बरसों बीत गये हो गए , कहीं मेरा भी अभ्यास तो नहीं छूट गया ??भगवान शंकर ने झोली में से शंख निकाला और फूंक लगायी ।बादलों को संकेत मिल गया ।घटाएं घुमड़ने लगीं चारों ओर जलमयी – जलमयी हो गयी ।
पार्वती किसान पत्नी हैं ,कहती हैं-ईसर, दुनियां को धंधे से लगाने की जिम्मेदारी है, हल हांकना ही होगा।महादेव बहुत सी समस्या बतलाते हैं ,बैल कहाँ से आवेगा ,रास कहाँ से मिलेगी,बीज कहाँ मिलेगा, आदि।पार्वती सब का समाधान बतलाती हैं और खेती के लिए प्रेरित करती हैं-
*(महादेव हल हाँकौ ईसर !
हल हाँकौ महादेव हल हाँकौ ईसर !
दुनियाँ ने धन्धे लगाय दीजो जी !
भोलोड़ा पारबती थे बोल नीं जाणो
बैल कठा सूँ मँगावस्याँ जी
नंदी मँगावो भोला महादेव
जणी रो बैल बनावस्याँ जी
भोलोड़ा पारबती थे बोल नीं जाणो
रास कठा सूँ मँगावस्याँ जी
साँपाँ रा सोंदरा मेलाबो भोला महादेव
जणी रा रास बणावस्याँ जी
भोलोड़ा पारबती थे बोल नीं जाणो
बीज कठाँ सूँ मँगावस्याँ जी
समन्दा रा मोती मँगावो भोला महादेव
जणी रा बीज बणावस्याँ जी ।*) (In bold)
महादेव की कथा घर गृहस्थ की वैसी ही कथा है-
एक दिन पार्वती ने ईसर से कहा कि -मेरी सहेली ने तिलक बनवाया है,मुझे भी तिलक बनवाओ! ईसर बोले >तमें सांवला तिलक नहीं ओपसी जी! तुम्हारी सहेली तो गोरी है,तुम सांवली हो!गौरी रूठ कर पिता हिमालय के यहां चलदी।ईसर ने देखा कि घर में गौरा नहीं है तो गौरा को ढूंडते हुए ईसर भी चल दिये।सबसे पूछने लगे > तुमने कहीं गौरा को देखा है?राजकुमार से पूछा,बुढिया से पूछा और फूलपत्ती तोडती हुई बालिकाओं से पूछा!
बालिकाओं ने पूछा > गौरी किस उनहारे की?सांवला रंग और झिलमिल राखडी पहने हैं!हां,उस मढी में बैठी है।ईसर मढी में पंहुचे ।गौरी बोली – मेरी मढी में मत आओ,काले पड जाओगे! मैं काली, मेरी मां काली और मेरा बाप भी काला ।
महादेव मनाने लगे-“नहीं गौरा, तुम तो इतनी गोरी हो! तुमको श्रीलंका से सोना लाऊंगा,श्रीसागर से मोती लाऊंगा और तिलक बनवाऊंगा।सारी सहेली तुम्हें तिलक पहनाएंगी।”
भोलानाथ गौरापार्वती के साथ नादिया पर बैठे भ्रमण करते रहते हैं,सबकी सुधबुध लेते रहते हैं। जहां भी किसी का दुख दीख जाता है, गौरा ठहर जाती हैं,शिव से कहती हैं >>>*नाथ,इसका दुख दूर करो। शिव कहते हैं >गौरा,यह तो विधि का विधान है,कर्मफल है, इसमें तो मैं कुछ भी नहीं कर सकता। नाथ, विधि का विधान तुम जानो परंतु जब तक इसका दुख दूर नहीं होगा, मैं पानी नहीं पीऊंगी। बहुत बात होती हैं , पर गौरा तो करुणा हैं, अंतमें शिव के लिये विधि के विधान को बदलना पडता है।
भगवती पार्वती ने देखा कि लोग गंगा -स्नान के लिए आये चले जा रहे हैं , आये चले जा रहे हैं , आये ही चले जा रहे हैं । उन्होंने भगवान शिव से पूछा–” इतने लोग जो गंगास्नान करने के लिए आ रहे हैं ,तो क्या इन सभी के पाप-ताप समाप्त हो जाएंगे? पाप करने वाले के लिए दंड और पुण्य करने वाले के लिए पुण्य फल का जो विधि का विधान है ,वह मिट जाएगा ? भगवान भोलेनाथ बोले कि “नहीं ,ऐसी बात नहीं है । पार्वती ने पूछा तो कृपानाथ , फिर क्या बात है ? भगवान शिव बोले -गौरा ,तुम स्वयं ही चल करके देखो ।शिव और गौरा दोनों गंगा घाट की ओर चल दिये । भगवान शिव ने एक कोढ़ी का वेष बना लिया , कुष्ठ रोग उनके शरीर से पसीने की तरह निकल रहा था, चारों ओर मक्खियां भिनभिना रही थीं , गंदगी थी ।तो वहां जो इतने लोग, इतने लोग ,गंगा- स्नान के लिए आ रहे थे, शिव को देखते तो घृणा और ग्लानि से नजर बचाने की कोशिश करते और गौरा को भर -नजर देखते और देखते ही चले जाते । किसी किसी ने तो व्यंग्य भी किया , किसी – किसी ने कहा–” अरे तू किस के पीछे पड़ी हुई है, चल मेरे साथ चल।” इस प्रकार की अनेक फब्तियां लोग कर रहे थे । तो हजारों की भीड़ चली -चली जा रही थी ।
महादेव जंगल में जाते हैं। गौरा शिव से साथ चलने की जिद करती हैं। वहां गौरा को प्यास लगती है,वे जलाशय पर जाती हैं, जहां सिर पर मटकी रख कर महिलाऎं आ रही हैं ,जा रही हैं, नहा रही हैं,कहानी कह रही हैं।गौरा पूछती हैं -आज क्या है?महिलाएं कहती हैं कि – तू परदेसिन है क्या? यह भी नहीं जानती कि आज गणगौर है ? १६ गुना छिरक कर दान किये जाते हैं, अपने सुहाग के निमित्त! गौरा मिट्टी के गुना बना कर बुढिया को दान करती हैं।महादेवजी ने नाद में सुहाग घोर दिया और सभी महिलाओं को छींटे लगाये किन्तु ऊंचीजात की बैयरबानी सजबज कें देर से आयीं ,सुहाग निभट गयौ?महादेव जी ने उंगरिया चीर के दोबारा सुहाग घोरा किसी को कमती छींटा लगे किसी को आधेअधूरे !जिनको आधेअधूरे छींट लगे उनका सुहाग भी आधा-अधूरा ।
शिव पार्वती के संग चौपड खेल रहे थे , शर्त लगी कि जो हारेगा , उसे कहानी सुनानी होगी , ऐसी कहानी , जो किसी ने भी न सुनी हो ! शिव ” बाजी” हार गये ।अब शिव को पार्वती से ऐसी कहानी कहनी थी , जो किसी ने भी न सुनी हो । शिव ने कहानी प्रारंभ की , प्रवेश वर्जित था, क्योंकि अन्तरंग कहानी थी, किन्तु शिव के गण तो शिव के ही गण ही ठहरे । एक गण ने न केवल वह अन्तरंग कहानी छिप कर सुन ली , अपितु पार्वती की एक सखी को भी सुना दी ।पार्वती की सखी ने वह कहानी पार्वती को सुना दी । पार्वती ने कुपित हो कर शिव से कहा कि – आपने तो छल किया , वह कहानी तो सभी ने सुन रक्खी है !शिव ने ध्यान किया और जान लिया कि अमुक गण ने छिप कर कहानी सुनी थी । शिव ने गण को शाप दिया कि – जाओ , मनुष्य-योनि में जन्म लो ! उसने शापोद्धार के लिये याचना की तब शिव ने कहा कि -यह कहानी किसी अभिशप्त शिव-दास [गण] को सुनाओगे , तब तुम्हारा शापोद्धार होगा । गण मनुष्य-योनि में आकर वन में शापग्रस्त शिव-दास को कहानी सुनाता है । ” बृहत्कथा”वही कथा है ।
मानवशास्त्रियों ने संसार की आदिमजातियों का अध्ययन करने के बाद यह निष्कर्ष दिया है कि भावावेग की अभिव्यक्ति का सबसे पहला मानव-प्रयत्न नृत्य ही था ! नृत्य के रूप भले ही आज बदल गये हैं किन्तु किसी न किसी रूप में नृत्य सभ्य से सभ्य मानव-समुदाय के सामूहिकजीवन का अंग है ! अपने को भूल जाने का एक प्रयास ! अपने को भूल जाना कोई मामूली बात नहीं है । अपनी इसी मन:स्थिति में मनुष्य किसी अज्ञात लोक के सामने हो पाता है ! इसीलिए नृत्य एक आनुष्ठानिक प्रक्रिया भी है ! अनुष्ठान है । शिव का तांडव नृत्य हो , उमा का लास्य-नृत्य हो , नटराज का नृत्य हो ,या काली का वह नृत्य हो , जो शव-रूप के वक्ष पर हो रहा है !कालरात्रि और नियति-नृत्य का बड़ा अद्भुत वर्णन योगवासिष्ठ में है !
महान् कलाविद श्री आनन्द कुमार कुमारस्वाम्री ने एक महत्त्वपूर्ण पुस्तक लिखी है ” दि डांस औफ शिव “।इस पुस्तक में नटराज-प्रतिमा के संबंध में वे लिखते हैं कि जिन ऋषियों ने यह परिकल्पना की, उन्होंने वास्तविक सत्य की प्रतिमा को प्रस्तुत किया ! जीवन की जटिलताओं की कुंजी तैयार की । उनकी कल्पनाशक्ति ,विचारशक्ति और सहृदयता कितनी विशाल और अद्भुत थी ! वास्तव में नटराज-प्रतिमा का अभिप्राय दिशा और काल का विस्तार है !डमरू और अग्नि दृश्य-परिवर्तन के प्रतीक हैं , ब्रह्मा का दिन और रात ! ब्रह्मा की रात में प्रकृति बीज रूप में है , शिव की इच्छा के बिना वह प्रकृति नहीं नाचती ! शिव जब समाधि से जगते हैं ,उनका नृत्य जगाने वाले शब्दों को तरंगित करता है तब प्रकृति भी चतुर्दिक् प्रभामंडल के रूप में प्रकट होकर नाचने लगती है ।
नृत्य करता हुआ शिव ही प्रलयकाल में संहारक बन कर प्रकृति को विश्राम देता है ! यह दर्शन का भी सार है और काव्य है , कला है ! यही विज्ञान का सत्य है ! नटराज केवल सत्य ही नहीं हैं , प्रेम भी हैं क्योंकि करुणा वृष्टि करना उनके नृत्य का प्रयोजन है !
बिहार राष्ट्र भाषा परिषद से श्रीशिवपूजन सहाय के जमाने मे एक महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ “शैवमत” नाम से प्रकाशित हुआ था ।उसमें कापालिकों , पाशुपतों , लकुलीशों , नाथों , अघोरियों और अन्य शैवों की परंपरा और सिद्धान्तों का बहुत गहरा विवेचन है ।शिव के स्वरूप को और भारत की संस्कृति के वैविध्य को समझने के लिये बहुत आवश्यक ग्रन्थ है ।शिव एक दार्शनिक अवधारणा भी है ।महादेव-
शिव की कथा के विस्तार का कोई और छोर नहीं, लेकिन एक वाक्य में कहूँ तो वह कथा भारत के लोकजीवन के सुख दुख, घर परिवार कुनबे की कहानी है ,उतनी ही पुरानी और उतनी ही नयी। न कभी महादेव ने लोकजीवन का साथ छोड़ा और न लोकजीवन ही कभी महादेव को भूला।भारत के लोकजीवन के क्रमविकास के साथ ही महादेव की अवधारणा के क्रमविकास को पहचाना जा सकता है।
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फिर मिलते हैं