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कुछ लोग हर बार सही समय से केवल एक कदम पीछे क्यों रह जाते हैं l

क्या आपके साथ भी ऐसा होता है कि जीवन में सब कुछ ठीक दिखाई देता है लेकिन अंतिम समय पर परिस्थितियां बदल जाती हैं। क्या कभी ऐसा लगा कि सफलता आपके सामने खड़ी थी लेकिन किसी अदृश्य कारण से आपके हाथों से फिसल गई। क्या आपने यह भी अनुभव किया है कि वर्षों तक चला प्रेम संबंध अचानक समाप्त हो गया या विवाह तक पहुंचते पहुंचते किसी न किसी कारण रुक गया। क्या कभी मन में यह प्रश्न उठा कि आखिर मेरे साथ ही ऐसा बार बार क्यों होता है। यदि इन प्रश्नों में आपको अपने जीवन की झलक दिखाई देती है तो इन्हें केवल संयोग समझकर अनदेखा मत कीजिए क्योंकि वैदिक ज्योतिष इन घटनाओं को एक गहरे दृष्टिकोण से देखता है।।

वैदिक ज्योतिष के अनुसार इस सृष्टि में कोई भी घटना बिना कारण नहीं घटती। प्रत्येक सुख प्रत्येक विलंब प्रत्येक सफलता और प्रत्येक रुकावट के पीछे समय का एक निश्चित विधान कार्य करता है। मनुष्य केवल सामने दिखाई देने वाली घटना को देखता है लेकिन ज्योतिष उस अदृश्य समय को देखने का प्रयास करता है जो उन घटनाओं का संचालन कर रहा होता है। यही कारण है कि समान परिश्रम करने वाले दो व्यक्तियों में एक आगे निकल जाता है और दूसरा बार बार मंजिल से केवल एक कदम पहले रुक जाता है।।

 

अक्सर लोग कहते हैं कि मेरी किस्मत साथ नहीं देती, कुछ लोग ग्रहों को दोष देते हैं तो कुछ स्वयं को अभागा मान लेते हैं। वास्तव में ग्रह किसी मनुष्य के शत्रु नहीं होते। ग्रह केवल समय के संकेतक हैं। वे यह बताते हैं कि आपके पूर्वकृत कर्मों का कौन सा फल किस समय प्रकट होगा। इसलिए हर रुकावट को दुर्भाग्य समझ लेना भी उचित नहीं और हर सफलता को केवल भाग्य का परिणाम मान लेना भी उचित नहीं।।

 

जीवन में सफलता तब जन्म लेती है जब पुरुषार्थ समय और ग्रहों का संतुलन एक साथ स्थापित होता है। यदि पुरुषार्थ प्रबल है लेकिन समय अभी परिपक्व नहीं हुआ तो फल मिलने में विलंब होता है। यदि समय अनुकूल है लेकिन प्रयास अधूरे हैं तो अवसर सामने होकर भी स्थायी नहीं रहता। यही कारण है कि अनेक बार मनुष्य अपनी पूरी क्षमता के बाद भी प्रतीक्षा करता है और जब समय बदलता है तो वही कार्य सहजता से पूर्ण हो जाता है।।

 

ऐसे अनेक लोग देखने को मिलते हैं जिनका व्यापार वर्षों तक एक सीमित स्तर पर चलता रहता है। वे ईमानदारी से कार्य करते हैं व्यवहार उत्तम रखते हैं परिश्रम में कोई कमी नहीं छोड़ते फिर भी विस्तार नहीं हो पाता। अचानक एक समय ऐसा आता है जब वही व्यापार नई दिशा पकड़ लेता है और लोग कहते हैं कि इनका भाग्य खुल गया। वास्तव में भाग्य उसी दिन नहीं खुला था बल्कि उस दिन ग्रहों का समय कर्मों के साथ एक स्वर में आ गया था।।

 

इसी प्रकार कई लोगों के जीवन में प्रेम का संबंध बहुत गहरा होता है। वर्षों तक साथ चलता है। दोनों एक दूसरे के बिना जीवन की कल्पना भी नहीं करते। परिवार भी धीरे धीरे सहमत होने लगता है। विवाह की चर्चा प्रारंभ होती है और अचानक ऐसा मोड़ आता है कि संबंध टूट जाता है। दोनों अलग हो जाते हैं और समझ ही नहीं पाते कि इतनी मजबूत डोर एक ही क्षण में कैसे टूट गई। केवल भावनाओं के आधार पर इसका उत्तर नहीं मिल सकता। वैदिक ज्योतिष इस स्थिति में पंचम भाव सप्तम भाव शुक्र गुरु चंद्रमा नक्षत्रों के स्वामी वर्तमान महादशा अंतरदशा गोचर तथा नवांश कुंडली का सूक्ष्म अध्ययन करता है। अनेक बार प्रेम का योग होता है लेकिन विवाह का समय नहीं होता। कई बार विवाह का योग होता है लेकिन दोनों व्यक्तियों का समय एक दूसरे से मेल नहीं खाता। कभी परिवार बाधा बनता है तो कभी परिस्थितियां। और कई बार ऐसा भी होता है कि प्रकृति उस संबंध को आगे बढ़ाना ही नहीं चाहती क्योंकि भविष्य में उससे अधिक कष्ट जुड़ा होता है जिसे मनुष्य उस समय देख नहीं पाता।यही कारण है कि प्रत्येक प्रेम विवाह में परिवर्तित नहीं होता और प्रत्येक असफल प्रेम दुर्भाग्य नहीं होता। समय बीतने के बाद अनेक लोग स्वयं स्वीकार करते हैं कि जो उस समय टूट गया था वही आगे चलकर उनके जीवन के लिए उचित सिद्ध हुआ। उस समय जो पीड़ा थी वही बाद में संरक्षण बन गई।।

जन्मकुंडली का सबसे महत्वपूर्ण आधार लग्न और लग्नेश हैं। यही जीवन की दिशा निर्धारित करते हैं। चंद्रमा मन की स्थिरता और निर्णय क्षमता का प्रतिनिधित्व करता है। सूर्य आत्मबल देता है। शनि धैर्य की परीक्षा लेते हैं। गुरु उचित समय आने पर मार्ग खोलते हैं। बुध बुद्धि और निर्णय को संतुलित करता है। शुक्र संबंधों में मधुरता लाता है। मंगल संघर्ष करने की शक्ति देता है। राहु और केतु मनुष्य को उन अनुभवों से परिचित कराते हैं, जिनसे उसका आंतरिक विकास होता है। परंतु केवल ग्रहों को देखकर निर्णय नहीं किया जा सकता। ग्रह किस नक्षत्र में स्थित है, उसका स्वामी कितना समर्थ है, ग्रह को कितना षड्बल प्राप्त है दिग्बल कैसा है ,अष्टकवर्ग क्या संकेत दे रहा है, नवांश में ग्रहों की स्थिति कैसी है, वर्तमान महादशा और अंतरदशा किस दिशा में ले जा रही है, इन सभी बातों का संयुक्त अध्ययन ही वास्तविक वैदिक ज्योतिष कहलाता है।।

 

अनेक बार जातक पूछता है कि मेरी कुंडली में शुभ योग भी हैं फिर भी संघर्ष क्यों है??इसका उत्तर यही है कि प्रत्येक योग का अपना जागरण काल होता है। कोई भी शुभ योग अपने समय से पहले पूर्ण फल नहीं देता। प्रकृति के प्रत्येक नियम में परिपक्वता आवश्यक है और मनुष्य भी उसी नियम का भाग है।।

 

यदि आपके जीवन में भी बार बार एक जैसी समस्याएं उत्पन्न हो रही हैं। हर कार्य अंतिम समय पर रुक जाता है। संबंध बनते बनते टूट जाते हैं। प्रेम विवाह तक नहीं पहुंच पाता। आर्थिक स्थिति बार बार बिगड़ जाती है। मानसिक अशांति लंबे समय से बनी हुई है या बार बार एक ही प्रकार की बाधा सामने आ रही है तो केवल अनुमान लगाकर निर्णय मत लीजिए। ऐसे समय में उचित यही रहेगा कि किसी अनुभवी और विद्वान वैदिक ज्योतिषाचार्य से अपनी संपूर्ण जन्मकुंडली का गहन अध्ययन अवश्य कराएं। कई बार एक सही परामर्श वर्षों की भटकन समाप्त कर देता है, क्योंकि समस्या वहां नहीं होती जहां हमें दिखाई देती है बल्कि उसका मूल कारण कहीं अधिक गहराई में छिपा होता है।।

 

जीवन में देर होना असफलता का प्रमाण नहीं है और रुक जाना अंत नहीं होता। समय जब तक मनुष्य को योग्य नहीं बना देता तब तक वह उसे मंजिल के द्वार पर ठहराए रखता है। लेकिन जब पुरुषार्थ कर्म और कालचक्र एक ही दिशा में प्रवाहित होने लगते हैं तब वर्षों से बंद दिखाई देने वाले मार्ग भी अपने आप खुलने लगते हैं। इसलिए यदि आज आपको ऐसा लग रहा है कि आप हर बार मंजिल से केवल एक कदम पीछे रह जाते हैं तो निराश होने के स्थान पर अपने समय को समझने का प्रयास कीजिए क्योंकि वैदिक ज्योतिष का सबसे बड़ा संदेश यही है कि सही समय पर मिला हुआ फल ही स्थायी सुख और वास्तविक सफलता का आधार बनता है ।।

 

*कुछ लोग हमारे जीवन में केवल कुछ समय के लिए ही क्यों आते हैं* जबकि उनका प्रभाव पूरी उम्र हमारे साथ रहता है।

 

बरसों बाद वह अपनी पुरानी डायरी के पन्ने पलट रहा था। एक सूखा हुआ गुलाब आज भी उसी पन्ने में सुरक्षित रखा था। उसे देखकर उसके चेहरे पर हल्की सी मुस्कान आई और उसी क्षण उसकी आंखें भी नम हो गईं। उसे उस व्यक्ति का चेहरा अब ठीक से याद नहीं था लेकिन यह आज भी याद था कि उसके जाने के बाद वह पहले जैसा कभी नहीं रहा। तभी उसके मन में एक प्रश्न उठा। यदि कुछ लोगों को एक दिन चले ही जाना होता है तो फिर ईश्वर उन्हें हमारे जीवन में भेजते ही क्यों हैं।।

 

शायद यह प्रश्न केवल उसी का नहीं था। हमारे जीवन में भी कभी न कभी कोई ऐसा व्यक्ति अवश्य आता है जो कुछ समय के लिए साथ चलता है लेकिन उसके जाने के बाद हमारी सोच हमारे निर्णय और कभी कभी हमारा पूरा जीवन बदल जाता है। उस समय हम केवल बिछड़ने का दुःख देखते हैं लेकिन यह नहीं समझ पाते कि उस मिलन का वास्तविक उद्देश्य क्या था। यहीं से वैदिक ज्योतिष एक अत्यंत गहरे रहस्य की ओर संकेत करता है।।

 

वैदिक ज्योतिष के अनुसार प्रत्येक मिलन केवल वर्तमान जीवन की घटना नहीं होता। अनेक संबंध पूर्व जन्म के संस्कारों प्रारब्ध कर्मों और अधूरे कर्म बंधनों के कारण जीवन में प्रवेश करते हैं। जन्मकुंडली का पंचम भाव पूर्व संस्कारों का संकेत देता है। सप्तम भाव केवल विवाह का नहीं बल्कि जीवन के महत्वपूर्ण संबंधों का भी दर्पण है। नवम भाव ईश्वरीय कृपा और प्रारब्ध का आधार है। एकादश भाव मिलने वाले लोगों और उनसे प्राप्त होने वाले लाभ अथवा अनुभव का संकेत देता है। राहु और केतु कई बार ऐसे लोगों से मिलाते हैं जिनसे आत्मा का कोई अधूरा अध्याय जुड़ा होता है। नक्षत्र और उनके स्वामी उस संबंध की सूक्ष्म प्रकृति को प्रकट करते हैं जबकि महादशा अंतरदशा और गोचर यह निश्चित करते हैं कि वह व्यक्ति जीवन में कब आएगा और उसका प्रभाव किस रूप में दिखाई देगा। नवांश कुंडली संबंधों की वास्तविक गहराई को समझने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है तथा षड्बल और अष्टकवर्ग यह बताते हैं कि वह संबंध स्थिरता देगा परिवर्तन देगा अथवा केवल जीवन का एक महत्वपूर्ण अनुभव बनकर रह जाएगा।।

 

इसी कारण प्रत्येक संबंध का उद्देश्य समान नहीं होता। कोई व्यक्ति हमारे जीवन में अवसर बनकर आता है। कोई चेतावनी बनकर। कोई हमारे आत्मविश्वास को जगाता है। कोई हमारे भीतर छिपे अहंकार को तोड़ता है। कोई हमें धैर्य का मूल्य सिखाता है तो कोई सही और गलत व्यक्ति की पहचान करा जाता है। कई बार जिस व्यक्ति के कारण हम सबसे अधिक टूटते हैं वही अनजाने में हमें सबसे अधिक मजबूत भी बना जाता है। वैदिक ज्योतिष ऐसे प्रत्येक मिलन को केवल भावना की दृष्टि से नहीं देखता बल्कि उसे कालचक्र का एक निश्चित उद्देश्य मानता है।।

 

इसीलिए केवल यह पूछना पर्याप्त नहीं कि वह व्यक्ति मेरे जीवन से चला क्यों गया। उससे भी अधिक महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि उसके आने से मेरे भीतर क्या बदल गया। यदि इस प्रश्न का उत्तर मिल जाए तो बहुत सी पीड़ाएं स्वयं शांत होने लगती हैं। क्योंकि तब समझ में आता है कि प्रत्येक संबंध जीवनभर साथ निभाने के लिए नहीं आता। कुछ संबंध आत्मा को परिपक्व बनाने के लिए आते हैं और अपना कार्य पूर्ण होते ही समय उन्हें आगे बढ़ा देता है।।

 

यदि आपके जीवन में भी कोई ऐसा व्यक्ति आया था जिसके जाने के बाद जीवन की दिशा बदल गई। यदि किसी मुलाकात ने आपकी सोच बदल दी। यदि किसी बिछड़ने ने आपको पहले से अधिक मजबूत बना दिया। यदि कोई संबंध आज भी बिना किसी कारण स्मृतियों में जीवित है तो उसे केवल संयोग मत मानिए। संभव है वह कालचक्र का एक ऐसा अध्याय रहा हो जिसे आपकी जन्मकुंडली ने बहुत पहले ही स्वीकार कर लिया था। इसलिए यदि जीवन में संबंधों का बनना बिगड़ना बार बार एक जैसी परिस्थितियां उत्पन्न कर रहा है या किसी विशेष संबंध को लेकर मन में वर्षों से प्रश्न हैं तो किसी अनुभवी और विद्वान वैदिक ज्योतिषाचार्य से अपनी संपूर्ण जन्मकुंडली का गहन अध्ययन अवश्य कराइए। कई बार उत्तर वर्तमान में नहीं मिलता बल्कि दशाओं नक्षत्रों ग्रहों और प्रारब्ध के उस सूक्ष्म रहस्य में छिपा होता है जिसे समझ लेने के बाद शिकायतें कम होने लगती हैं और जीवन को देखने की दृष्टि बदल जाती है।।

 

समय कभी किसी से कुछ छीनता नहीं। वह केवल उतना ही अपने पास रखता है जितनी देर उसकी आवश्यकता होती है। जब उसका उद्देश्य पूरा हो जाता है तब वह लोगों को भी आगे बढ़ा देता है और हमें भी। शायद इसी का नाम कालचक्र है और शायद यही वैदिक ज्योतिष का सबसे शांत और सबसे गहरा संदेश भी है ।।

 

*बार बार वही घटना आपके जीवन में क्यों लौट आती है जबकि लोग बदल जाते हैं।*

 

कभी आपने शांत होकर अपने जीवन को पीछे मुड़कर देखा है। बचपन से लेकर आज तक कितने लोग आए और चले गए। मित्र बदले। संबंध बदले। कार्यस्थल बदले। घर बदले। नगर बदले। समय भी बदल गया। फिर भी यदि ध्यान से देखेंगे तो पाएँगे कि कुछ घटनाएँ आज भी वैसी ही हैं जैसी वर्षों पहले थीं। किसी का विश्वास बार बार टूटता है। किसी को हर बार आर्थिक हानि उठानी पड़ती है। कोई हर बार सफलता के द्वार तक पहुँचकर लौट आता है। किसी का वैवाहिक जीवन बार बार एक जैसी कठिनाइयों से घिर जाता है। तब मन में प्रश्न उठता है कि जब सब कुछ बदल गया तो यह एक जैसी परिस्थिति बार बार क्यों लौट आती है। वैदिक ज्योतिष का उत्तर अत्यन्त गहन है। वह कहती है कि जीवन में कोई भी घटना बिना कारण बार बार नहीं घटती। जब कोई अनुभव बार बार लौटता है तो उसके पीछे जन्मकुण्डली में स्थित ग्रहों का कोई संकेत अवश्य होता है।।

 

जन्मकुण्डली केवल भविष्य बताने का साधन नहीं है। यह मनुष्य के जीवन का सूक्ष्म मानचित्र है। प्रत्येक ग्रह केवल शुभ या अशुभ फल नहीं देता बल्कि जीवन का एक विशेष पाठ भी पढ़ाता है। जब तक वह पाठ पूरा नहीं होता तब तक ग्रह परिस्थितियों का रूप बदलते रहते हैं किन्तु अनुभव वही रहने देते हैं। यही कारण है कि व्यक्ति सोचता है कि इस बार सब कुछ अलग होगा किन्तु कुछ समय बाद वही संघर्ष फिर उसके सामने खड़ा मिल जाता है। बाहर से देखने पर लगता है कि कारण सामने वाला व्यक्ति है जबकि अनेक बार कारण जन्मकुण्डली में बैठा हुआ ग्रहयोग होता है।।

 

यदि किसी जातक का सप्तम भाव पीड़ित हो अथवा उस पर शनि राहु या मंगल का गहरा प्रभाव हो तो केवल विवाह ही प्रभावित नहीं होता बल्कि विश्वास भी बार बार परीक्षा में पड़ता है। ऐसा व्यक्ति हर नए संबंध से यही आशा करता है कि अब जीवन बदल जाएगा। प्रारम्भ में सब कुछ अच्छा भी दिखाई देता है किन्तु कुछ समय बाद वही दूरी वही मनमुटाव वही टूटन फिर सामने आ जाती है। इसका अर्थ यह नहीं कि संसार में सभी लोग एक जैसे हैं। इसका अर्थ यह है कि ग्रह बार बार उसी अनुभव के माध्यम से जातक को धैर्य विवेक और सही चयन का पाठ पढ़ा रहे हैं। इसी प्रकार यदि दशम भाव पीड़ित हो तो नौकरी बदलने से कुछ समय राहत मिल सकती है किन्तु स्थिरता नहीं आती। यदि चन्द्रमा अशांत हो तो घर बदल लेने से भी मन को शांति नहीं मिलती। यदि द्वितीय भाव दुर्बल हो तो धन आता भी है और किसी न किसी कारण से चला भी जाता है। यदि षष्ठ भाव अधिक सक्रिय हो तो विरोध और विवाद बिना बुलाए जीवन का भाग बन जाते हैं। यह सब संयोग नहीं होता बल्कि ग्रहों के संकेत होते हैं।।

 

बहुत से लोग पूछते हैं कि यदि ग्रह ऐसा कर रहे हैं तो फिर यह घटना हर समय क्यों नहीं होती। इसका उत्तर महादशा अंतरदशा और गोचर में छिपा हुआ है। जन्मकुण्डली में जो योग बने होते हैं वे बीज के समान होते हैं। महादशा उन्हें जागृत करती है। अंतरदशा उन्हें गति देती है और गोचर उस समय को चुनता है जब वह बीज फल बनकर जीवन में प्रकट होता है। इसलिए कई बार दस या पंद्रह वर्ष पहले घटी हुई घटना किसी नए रूप में फिर सामने आ जाती है। व्यक्ति बदल जाता है स्थान बदल जाता है समय बदल जाता है किन्तु अनुभव वैसा ही रहता है क्योंकि ग्रह अभी भी उसी अधूरे अध्याय को पूरा करवाना चाहते हैं। शनि धैर्य और कर्म की परीक्षा लेते हैं। राहु मोह और भ्रम के माध्यम से विवेक को परखते हैं। केतु आसक्ति को तोड़कर आत्मबल जगाते हैं। मंगल आवेश को संयम में बदलना सिखाते हैं। बुध विचारों को स्पष्ट करते हैं। शुक्र संबंधों का मूल्य समझाते हैं। गुरु धर्म और सद्बुद्धि का प्रकाश देते हैं। सूर्य आत्मसम्मान का बोध कराते हैं और चन्द्रमा मन को स्थिर बनाना सिखाते हैं। इसलिए ग्रह शत्रु नहीं होते। वे जीवन के मौन शिक्षक होते हैं।।

 

यही कारण है कि केवल घर बदल देने से भाग्य नहीं बदलता। केवल नौकरी बदल देने से सफलता निश्चित नहीं हो जाती। केवल संबंध बदल लेने से सुख की प्राप्ति नहीं होती। जब तक मनुष्य अपने कर्म अपने स्वभाव और अपनी जन्मकुण्डली के संकेतों को नहीं समझता तब तक जीवन एक ही प्रश्न को अलग अलग रूपों में उसके सामने रखता रहता है। यदि आपके जीवन में भी वर्षों से एक ही प्रकार की घटना बार बार लौट रही है तो उसे सामान्य संयोग मानकर अनदेखा मत कीजिए। किसी अनुभवी और गहन अध्ययन करने वाले वैदिक ज्योतिषाचार्य से अपनी जन्मकुण्डली का सूक्ष्म परीक्षण अवश्य कराइए। प्रत्येक ग्रह की पीड़ा का स्वरूप अलग होता है इसलिए उसका समाधान भी अलग होता है। किस ग्रह को बल देना है। किस ग्रह की शांति आवश्यक है। कौन सा मंत्र आपके लिए उपयुक्त है। कौन सा दान उचित है। कौन सी साधना कब फलदायी होगी। यह निर्णय जन्मकुण्डली का गहन अध्ययन करने वाला विद्वान ही कर सकता है। केवल सामान्य उपाय या सुनी सुनाई बातों से प्रत्येक व्यक्ति को समान फल नहीं मिल सकता।।

 

अंत में केवल एक बात स्मरण रखिए। जीवन किसी को दण्ड देने के लिए एक जैसी घटनाएँ नहीं दोहराता। वह तब तक वही परिस्थिति भेजता है जब तक मनुष्य उस अनुभव का वास्तविक अर्थ नहीं समझ लेता। जिस दिन भीतर की दृष्टि बदल जाती है उसी दिन बाहर की दिशा भी बदलने लगती है। यही वैदिक ज्योतिष का वह गूढ़ सत्य है जिसे समझ लेने के बाद मनुष्य लोगों को नहीं बल्कि अपने ग्रहों के संकेतों को पढ़ना सीख जाता है और वहीं से उसके भाग्य का नया अध्याय प्रारम्भ होता है।।

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