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पूर्णब्रह्म

नमस्कार…

हम अक्सर अपने आसपास रहने वाले लोगों के बारे में अपनी सीमित समझ और अनुभव के आधार पर राय बना लेते हैं। फिर उसी राय को अंतिम सत्य मानकर कभी-कभी उनका मज़ाक भी उड़ाते हैं। लेकिन जब हम किसी व्यक्ति को करीब से जानते हैं, तब एहसास होता है कि हमारी धारणा कितनी गलत थी।

इसलिए किसी के बारे में जल्दबाज़ी में मत बनाने के बजाय, उसे समझने का प्रयास करना अधिक उचित है। आज की यह कहानी भी ऐसे ही एक व्यक्ति की है, जो मन को गहराई तक छू जाती है।

शायद अगस्त 1980 का समय था। वी.जे.टी.आई. इंजीनियरिंग कॉलेज का परिणाम आए लगभग एक महीना हो चुका था। हमारे कॉलेज के प्लेसमेंट अधिकारी श्री देशपांडे सर प्रतिदिन पाँच-पाँच छात्रों को अलग-अलग कंपनियों में नौकरी के लिए भेजते थे।

उनकी सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि वे जिस भी कंपनी के पर्सनल मैनेजर से बात करते, छात्रों का ऐसा प्रभावशाली परिचय देते कि सामने वाला अधिकारी कुछ ही मिनटों में उस छात्र को अपनी कंपनी में नियुक्त करने का मन बना लेता।

इसके बाद मेनन नाम के क्लर्क उस कंपनी के नाम एक सिफारिश-पत्र टाइप करते, जिस पर देशपांडे सर के हस्ताक्षर होते। वह पत्र लेकर यदि छात्र कंपनी में पहुँच जाता, तो समझिए कि उसकी पहली नौकरी लगभग तय हो जाती थी।

तब नौकरी पाना इतना सरल हुआ करता था।

हालाँकि, प्रत्येक छात्र को केवल एक ही अवसर मिलता था।

जब मेरी बारी आई, तो मुझसे पूछा गया—

स्वदेशी मिल्स में जाओगे?”

ना कहने का प्रश्न ही नहीं था। मैंने तुरंत “हाँ” कह दिया।

देशपांडे सर ने सलाह दी—

सबसे पहले पर्सनल मैनेजर से मिलना और वहीं से अपना अपॉइंटमेंट लेटर भी लेकर आना।”

मैं पत्र लेकर स्वदेशी मिल्स पहुँचा। थोड़ी देर प्रतीक्षा कराने के बाद मुझे पर्सनल मैनेजर के पास भेजा गया। उन्होंने मुझे पहली तारीख से जॉइन करने का नियुक्ति-पत्र दिया। मेरी नियुक्ति जूनियर ऑफिसर के रूप में हुई थी।

अपॉइंटमेंट लेटर लेकर मैं वापस देशपांडे सर के पास गया। उन्हें प्रणाम किया और धन्यवाद देकर बाहर निकल आया।

स्वदेशी मिल्स का मुख्य प्रवेशद्वार बेहद विशाल था।

अंदर प्रवेश करते ही एक बड़ा-सा परिसर दिखाई देता था। गेट के पास टाइम-कीपिंग ऑफिस था और कुछ आगे जनरल मैनेजर का कार्यालय।

उस समय जनरल मैनेजर श्री खंबाटा थे—एक पारसी सज्जन।

पर्सनल मैनेजर श्री बत्तीवाला मुझे उनके कार्यालय में ले गए।

वह कमरा अत्यंत भव्य था। अंग्रेज़ों के समय का भारी-भरकम शीशम का फर्नीचर, लाल रंग का शानदार कालीन और वातावरण में फैली चंदन की हल्की सुगंध पूरे कमरे को एक अलग गरिमा दे रही थी।

सामने सफेद परिधान पहने, गोरे-चिट्टे, प्रभावशाली व्यक्तित्व वाले श्री खंबाटा बैठे थे।

उन्होंने निर्देश दिया कि मुझे मिल के प्रत्येक विभाग में दो-दो महीने का प्रशिक्षण दिया जाए और अंत में स्टोर्स एवं मेंटेनेंस विभाग में चार महीने का विशेष प्रशिक्षण कराया जाए।

उन्होंने मुझे शुभकामनाएँ दीं और हम बाहर आ गए।

स्वदेशी मिल्स टाटा समूह की कंपनी थी।

इसलिए वहाँ पारसी अधिकारियों का विशेष प्रभाव था। लगभग सत्तर प्रतिशत अधिकारी पारसी थे और बाकी तीस प्रतिशत अन्य समुदायों से थे। बॉम्बे डाइंग और टाटा मिल्स जैसी अन्य बड़ी मिलों में भी पारसी अधिकारियों का अच्छा-खासा दबदबा था।

धीरे-धीरे मैं अपने काम में रमने लगा।

रोज़ नए लोगों से परिचय होता, नई बातें सीखने को मिलतीं और काम का आनंद आने लगा।

लेकिन नौकरी के साथ-साथ मुझे एक बिल्कुल नई दुनिया देखने का अवसर भी मिला—

पारसी समाज की दुनिया।

उनकी जीवनशैली, पहनावा, खान-पान, व्यवहार—सब कुछ अलग था।

किसी का नाम बोमी था, किसी का डॉक्टर, कोई मेस्त्री, कोई राणा, कोई नेत्रावाला, तो कोई डाबू।

कुछ लोग बेहद सलीके से रहते, तो कुछ बिल्कुल बेपरवाह दिखाई देते। अधिकांश लोग सफेद कपड़े पहनते थे और बात करते समय हाथों का खूब इस्तेमाल करते थे।

लेकिन एक बात सभी में समान थी—

वे हमेशा प्रसन्न दिखाई देते थे।

स्वदेशी मिल्स में लगभग अस्सी अधिकारी और लगभग तीन हज़ार सात सौ कर्मचारी काम करते थे।

मिल का दो मंज़िला कैंटीन था। ऊपर का पूरा हिस्सा अधिकारियों के लिए आरक्षित था।

हमारे लिए अलग ऑफिसर्स मेस थी।

रोज़ मांसाहारी भोजन बनता था। सोमवार, गुरुवार, गणेश चतुर्थी या एकादशी जैसी किसी धार्मिक मान्यता का वहाँ कोई प्रभाव नहीं था।

केवल तीन रुपये के कूपन में भरपेट भोजन मिल जाता था।

उस समय यह किसी शाही व्यवस्था से कम नहीं लगता था।

विभिन्न विभागों में प्रशिक्षण लेते-लेते आखिरकार मैं स्टोर्स एंड मेंटेनेंस विभाग पहुँचा।

वहीं मेरी मुलाकात उस व्यक्ति से हुई…

जिसने जीवनभर के लिए मेरे सोचने का तरीका बदल दिया।

उनका नाम था—

आडी पिठावाला।

 

मैं सुबह-सुबह स्टोर्स एंड मेंटेनेंस विभाग पहुँचा। वहाँ विभाग के मैनेजर श्री आडी पिठावाला से मेरी पहली मुलाकात हुई।

हमने एक-दूसरे को गुड मॉर्निंग” कहा।

उन्होंने मेरा नाम पूछा। मैंने बताया—हेमंत।

वे मुस्कुराकर बोले—

ओह… यू आर दैट ‘हैंमण’!”

अपने पूरे जीवन में किसी ने मेरा नाम इस तरह नहीं पुकारा था। मैं थोड़ा चौंका।

वे हँसते हुए बोले—

यस… हैंमण! तुम मुझे बस ‘आडी’ कहो। नाम में क्या रखा है?”

पूरी मिल उन्हें आडी” कहकर ही बुलाती थी। छोटे से लेकर बड़े अधिकारी तक, हर कोई उन्हें नाम लेकर आवाज़ देता था। धीरे-धीरे मुझे भी उनकी यही पहचान स्वाभाविक लगने लगी।

आडी का व्यक्तित्व बड़ा विचित्र था।

लगभग पाँच फुट छह इंच का कद।

हमेशा सफेद कपड़े।

काले जूते।

पैंट का निचला हिस्सा आठ-दस इंच तक मोड़ा हुआ, जैसे पुराने राज कपूर की फिल्मों में दिखाई देता था।

शर्ट हमेशा पैंट के अंदर।

कमर में बेल्ट की जगह एक साधारण सूती डोरी बंधी रहती।

सुनहरी फ्रेम वाला चश्मा, जिसकी डंडियाँ काली थीं।

और सबसे अजीब बात…

स्टोररूम में प्रवेश करते समय वे हमेशा पीठ करके उल्टे कदमों से अंदर जाते थे।

पूरी मिल उनकी इस आदत पर हँसती थी।

लेकिन आडी को कभी कोई फर्क नहीं पड़ता था।

लोग उन्हें भले ही सनकी समझते हों, लेकिन उनके भीतर ऐसे गुण थे कि प्रबंधन उनकी हर विचित्र आदत को नज़रअंदाज़ कर देता था।

सबसे बड़ी बात—

वे पूर्णतः ईमानदार थे।

स्टोर्स जैसे विभाग में ईमानदारी किसी पुरस्कार से कम नहीं होती। जहाँ लाखों रुपये का सामान हो, वहाँ छोटी-सी बेईमानी भी भारी नुकसान पहुँचा सकती है।

इसलिए प्रबंधन ऐसे विभाग की ज़िम्मेदारी केवल उसी व्यक्ति को देता था जिस पर उसे पूरा भरोसा हो।

और आडी उस भरोसे पर पूरी तरह खरे उतरते थे।

मशीनों और उनके स्पेयर पार्ट्स का उन्हें अद्भुत ज्ञान था।

उस समय कोई कंप्यूटर नहीं थे। सारा रिकॉर्ड हाथ से लिखा जाता था।

इसलिए साफ-सुथरी लिखावट और व्यवस्थित काम करने की आदत बहुत महत्वपूर्ण मानी जाती थी।

ये दोनों गुण आडी में कूट-कूटकर भरे थे।

उन्नीस-बाई-बारह नंबर के एक छोटे से स्क्रू से लेकर सबसे महँगे क्रैंकशाफ्ट तक—स्टोर में कौन-सी चीज़ किस खाने में रखी है, यह उन्हें ज़ुबानी याद रहता था।

उन्होंने अपने पूरे कार्यकाल में शायद ही कभी छुट्टी ली हो।

लोग मज़ाक उड़ाते—

आडी घर इसलिए नहीं जाते क्योंकि उनकी पत्नी उन्हें खाना नहीं देती। इसलिए रोज़ मिल में ही पेट भरने आते हैं।”

लेकिन ऐसी बातों का उन पर कभी कोई असर नहीं पड़ता था।

उन दिनों दादर (खोदादाद सर्कल) से मिल तक कंपनी की बस चलती थी, जिसमें अधिकांश अधिकारी आते-जाते थे।

लेकिन आडी कभी उस बस में नहीं बैठते।

वे अपनी पुरानी, काले रंग की 918 सीसी मॉरिस माइनर कार से आते थे।

यही वह मशहूर कार थी, जिसे बाद में स्वतंत्र भारत में बेबी हिंदुस्तान” के नाम से जाना गया।

आडी की दिनचर्या बिल्कुल घड़ी की तरह नियमित थी।

यदि सुबह सात बजे की ड्यूटी होती, तो वे ठीक छह बजे अपनी मॉरिस माइनर कार लेकर मिल पहुँच जाते।

उनकी कार में हमेशा दो बड़े स्टील के डिब्बे, दो बड़े कलछुल और दो खाकी रंग के थैले रखे रहते।

मिल पहुँचते ही वे उन डिब्बों को कैंटीन प्रभारी श्री सावंत के पास जमा कर देते और सीधे अपने विभाग की ओर निकल जाते।

स्टोर का ताला खोलते…

और हमेशा की तरह…

पीठ करके उल्टे कदमों से भीतर प्रवेश करते।

इसके बाद उनके क्लर्क और ऑफिस बॉय अंदर आते और फिर सुबह सात बजे से दोपहर दो बजे तक आडी बिना रुके काम में डूबे रहते।

ठीक दो बजे वे विभाग बंद करते।

सभी चाबियाँ सुरक्षित रखकर लेबर विभाग में जमा करते।

फिर भोजन करने कैंटीन पहुँचते।

उस समय तक लगभग सभी अधिकारी भोजन करके जा चुके होते।

कैंटीन में सबसे आखिर तक केवल दो लोग बचते—

कैंटीन प्रभारी श्री सावंत…

और आडी।

भोजन समाप्त होने के बाद कैंटीन बंद कर दी जाती।

जाते समय कैंटीन के कर्मचारी सुबह जमा किए गए वही दोनों डिब्बे और खाकी के थैले वापस आडी को दे देते।

वे उन्हें बड़े प्यार से अपनी कार में रखते।

उनके चेहरे पर उस समय जो खुशी दिखाई देती…

वह किसी छोटे बच्चे को अपना मनपसंद खिलौना मिलने जैसी होती।

लेकिन…

मुझे समझ नहीं आता था…

इन डिब्बों में ऐसा क्या होता था?

मेरे मन में कई दिनों से एक सवाल था—

आखिर आडी रोज़ उन दो डिब्बों में क्या भरकर घर ले जाते हैं?

एक दिन संयोग से मुझे इसका उत्तर मिल ही गया।

उस शनिवार शाम मुझे दादर जाना था। मैंने सोचा, मिल से ही निकल जाऊँगा।

लेकिन उस दिन कंपनी की बस पूरी तरह भरी हुई थी।

आडी ने मुझे देखते ही कहा—

हैंमण… मेरे गाड़ी में बैठ जाओ।”

मैंने उनकी कार से जाने का निश्चय किया।

तभी स्पिनिंग मैनेजर श्री धनवड़े हँसते हुए बोले—

हेमंत, आडी की गाड़ी में बैठने से पहले रेनकोट पहन लेना!”

सब लोग हँस पड़े।

शाम को मैं आडी के साथ उनकी मॉरिस माइनर में बैठ गया।

पीछे की सीट पर रोज़ की तरह वही दो स्टील के डिब्बे और खाकी के दो थैले रखे थे।

आडी बहुत आराम और कुशलता से गाड़ी चला रहे थे।

गाड़ी चुनाभट्टी, सायन सर्कल और महेश्वरी उद्यान पार करती हुई फाइव गार्डन पहुँच गई।

वहीं पारसी कॉलोनी में आडी रहते थे।

लेकिन उन्होंने अपनी बिल्डिंग के सामने गाड़ी नहीं रोकी।

उससे पहले ही एक मोड़ पर कार रोक दी।

वहाँ एक व्यक्ति दो बड़ी परातें हाथ में लिए खड़ा था।

शायद वह उनका नौकर था।

उसने तुरंत कार का पिछला दरवाज़ा खोला।

मैं भी आडी के साथ नीचे उतर गया।

और…

जो दृश्य मैंने देखा…

उसे मैं जीवन भर नहीं भूल सका।

करीब पंद्रह-बीस गरीब बच्चे बड़ी अनुशासन से कतार में खड़े थे।

आडी ने मिल से लाए गए पहले डिब्बे का ढक्कन खोला।

उसमें अधिकारियों की प्लेटों से बचा हुआ लेकिन खाने योग्य भोजन था—

रोटी…

चावल…

सब्ज़ी…

पुलाव…

पूडिंग…

पापड़…

और न जाने क्या-क्या।

आडी अपने हाथों से वह भोजन उन बच्चों के कटोरों में परोसने लगे।

वे हर बच्चे को नाम से पुकारते—

बिल्लू… कैसे हो?”

अरे मुथ्थू… काला कौवा कहाँ है?”

एक लड़की बोली—

पीछे खड़ा है।”

फिर उन्होंने सलीम, झोरी और बाकी बच्चों का भी हाल पूछा।

इतने में दो साल का एक नन्हा बच्चा, हाथ में छोटा-सा कटोरा लिए आगे आया।

आडी ने प्यार से उसके कटोरे में भी खाना परोसा।

उसी समय मेरी नज़र उनके नौकर पर पड़ी।

उसने ज़मीन पर दोनों बड़ी परातें रखीं।

फिर दूसरे डिब्बे में रखा बचा हुआ मांसाहारी भोजन—

चिकन बिरयानी…

मटन बिरयानी…

हड्डियाँ…

और बाकी सब…

दोनों परातों में उड़ेल दिया।

कुछ ही क्षणों में चारों दिशाओं से दस-पंद्रह आवारा कुत्ते दौड़ते हुए आ गए।

कुछ ही मिनटों में उन्होंने पूरा भोजन साफ़ कर दिया।

उधर…

आडी बच्चों को अपने हाथों से खाना खिला रहे थे।

उनके चेहरे पर ऐसी खुशी थी…

जैसी शायद किसी भक्त को भगवान के दर्शन करके होती है।

मैं उन्हें देखता ही रह गया।

उनके चेहरे पर न कोई दिखावा था…

न दान देने का अहंकार…

बस एक अद्भुत संतोष।

ऐसा संतोष…

जो केवल किसी भूखे का पेट भरने से मिलता है।

उस क्षण मुझे पहली बार समझ आया कि लोग उन्हें कितना गलत समझते रहे थे।

भोजन बाँटने के बाद आडी मुझे अपने घर ले गए।

छह कमरों का बड़ा और बेहद सलीके से सजाया हुआ घर।

हर चीज़ उनकी उत्कृष्ट रुचि का परिचय दे रही थी।

उन्होंने कहा—

बैठो… दो मिनट।”

कुछ ही देर में वे कपड़े बदलकर आए।

अब उन्होंने सफेद ढीला पायजामा और बिना बाँहों वाली सफेद बनियान पहन रखी थी।

हमने साथ बैठकर कॉफ़ी पी।

मैं लौटने ही वाला था कि उन्होंने कहा—

एक मिनट…”

और कमरे का पर्दा हटाकर मुझे अपनी पत्नी से मिलवाया।

यह मेरे लिए दूसरा बड़ा झटका था।

उनकी पत्नी व्हीलचेयर पर बैठी थीं।

कमर से नीचे उनका पूरा शरीर निष्क्रिय था।

शायद वे जीवन भर चल नहीं सकती थीं।

उसी क्षण मुझे समझ में आ गया कि लोग क्यों कहते थे—

आडी की पत्नी उन्हें खाना नहीं देती…”

असलियत बिल्कुल अलग थी।

वे अपनी पत्नी की सेवा भी करते थे…

और हर दिन दर्जनों भूखे बच्चों और जानवरों का पेट भी भरते थे।

लोग केवल उनका अजीब पहनावा देखते थे…

उनकी उल्टी चाल देखते थे…

उनकी सनक पर हँसते थे…

लेकिन उनके भीतर छिपे उस विशाल इंसान को कभी नहीं देख पाए।

समय बीतता गया।

कुछ ही महीनों बाद मुझे दूसरी कंपनी में इससे भी बेहतर नौकरी मिल गई। लगभग ढाई महीने बाद मैं अपना अनुभव प्रमाण-पत्र (Experience Certificate) लेने के लिए एक बार फिर स्वदेशी मिल्स पहुँचा।

पुराने साथियों से मिलकर बहुत अच्छा लगा।

वापस लौटते समय अचानक मन में आया—

चलो, आडी से भी मिलता चलूँ।”

मैं स्टोर्स एंड मेंटेनेंस विभाग पहुँचा।

लेकिन…

आडी की कुर्सी पर कोई और बैठा था।

वे थे—बिलिमोरिया, जो अपने तेज़ और कड़क स्वभाव के लिए जाने जाते थे।

मैंने उनसे पूछा—

आडी कहाँ हैं?”

उन्होंने बिल्कुल सपाट स्वर में कहा—

आडी उड़ गया।”

एक पल के लिए मैं कुछ समझ ही नहीं पाया।

तभी आडी के क्लर्क, जना दांडेकर, मेरे पास आए और धीमे स्वर में बोले—

पिछले महीने आडी को हार्ट अटैक आया… और उनका निधन हो गया।”

उन्होंने आगे बताया—

उस दिन भी सब कुछ हमेशा की तरह ही हुआ था।

शाम को उन्होंने पहले गरीब बच्चों को अपने हाथों से खाना खिलाया।

फिर कुत्तों के लिए भोजन रखा।

सबको प्यार से विदा किया।

इसके बाद अपनी मॉरिस माइनर कार में बैठ गए।

लेकिन…

घर पहुँचने से पहले ही…

कार के भीतर ही उन्हें दिल का दौरा पड़ा।

स्टीयरिंग पर सिर टिकाए…

वे हमेशा के लिए सो गए।

आडी के जाने के बाद भी…

लगभग पंद्रह दिनों तक…

हर शाम…

वे छोटे-छोटे बच्चे अपने कटोरे लेकर उसी जगह आते रहे।

शायद उन्हें उम्मीद थी—

आज नहीं तो कल…

आडी आएँगे।

वे सड़क के आवारा कुत्ते भी रोज़ उसी स्थान पर कुछ देर मंडराते…

फिर मायूस होकर लौट जाते।

उन्हें समझ नहीं आता था कि…

जिस हाथ ने रोज़ उन्हें भोजन दिया…

वह हाथ अब हमेशा के लिए रुक चुका है।

आडी ने मेरे मन पर ऐसा प्रभाव छोड़ा…

जो आज तक मिट नहीं पाया।

उन बच्चों के लिए…

वे सचमुच अन्नपूर्णा थे।

और उन बेघर कुत्तों के लिए भी…

वे किसी देवदूत से कम नहीं थे।

आज भी…

जब किसी शादी, दावत या बुफे में लोगों को प्लेटों में ढेर सारा खाना छोड़ते देखता हूँ…

तो मुझे सबसे पहले आडी का चेहरा याद आता है।

ऐसा लगता है…

कि फेंका गया हर निवाला…

किसी भूखे इंसान के मुँह से छिना हुआ है।

किसी बेसहारा बच्चे का हक़ है।

किसी भूखे जीव का भोजन है।

इसलिए…

जितनी भूख हो…

उतना ही भोजन लें।

अन्न का सम्मान करें।

भोजन की बर्बादी करें।

क्योंकि…

जिस थाली से हम बिना सोचे-समझे खाना फेंक देते हैं,

उसी भोजन के लिए दुनिया में न जाने कितने लोग और कितने बेजुबान जीव रोज़ तरसते हैं।

भोजन की बर्बादी: एक गंभीर समस्या

फूड फैक्टरी

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