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श्री राम अधिक अनुकरणीय हैं या श्री कृष्ण ?

अगर किसी वामपंथी से पूछेंगे, और यह शर्त रखेंगे कि बस चर्चा के लिए ही क्यों न हो, उसे इन  दो में से ही एक को चुनना है, तो मेरा ख़याल है कि वो श्री राम को चुनेगा.  क्या इस से वो राम भक्त साबित होगा ?

 

बिलकुल नहीं.

 

वो श्री राम पर पसंदगी इसलिए उतारेगा क्योंकि वो आप से कहेगा कि वे अनुकरणीय थे.  और इसके लिए उसका कारण होगा कि वे लांछन के प्रति बहुत ही संवेदनशील थे. एक धोबी ने आरोप क्या लगाया और उन्होंने सीता को त्याग दिया और उसके बाद भी अग्निदिव्य कराया. अपनी छवि साफ़ रखने के लिए वे आत्मक्लेश झेलते रहे,  नुकसान भी उठाते रहे.

 

श्री कृष्ण ने ऐसा कभी नहीं किया. कंस, शिशुपाल, कारण, जयद्रथ, जरासंध आदि के वध इसी के साक्ष्य हैं. वामपंथी इसीलिए श्री कृष्ण पर पसंदगी नहीं उतारेगा.  इस से आप का चॉइस साफ़ हो जाता है कि इन दो महानायकों से कौन अधिक अनुकरणीय है .  वैसे हमारे एक आदरणीय मित्र की सलाह है कि हमें उन बातों या व्यक्तियों से बचना चाहिए जिनकी वामीस्लामी प्रशंसा करते हैं.  मैं इस सलाह में मानता हूँ .

वैसे अनुकरण के लिए चीजें समय के सापेक्ष होती हैं. देश काल की मर्यादाएं में रहे, बाकी जो है सो…..

 

Edit :  कुछ पाठकों  के लिए यहीं साफ़ किये दे रहा हूँ कि यहाँ मैं मैं वाम पंथ पर लिख रहा हूँ, बात न प्रभु श्री राम की है न श्री कृष्ण की. आगे आगे स्पष्ट होता जाएगा. इस वक़्त आप को अगर बात समझ में नहीं आ रही हो तो क्षमा चाहता हूँ, वैसे और प्रबुद्ध जनों को समझ आ रही है यह अन्य कमैंट्स से साफ़ है.।

 

-आनंद राज्याध्यक्ष

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वामी स्वभावतः खल कामी होते हैं।

यहाँ ये ध्यान में लेकर चलें कि वर्तमान वामी ,खासकर भारतीय,  मुस्लिम-ईसाई-चीनी शक्तियों की बौद्धिक वैश्याएँ हैं। इनके अपने hidden agenda के तहत ही ये कोई बात समाज में फैलाते हैं। इसमें इनकी वैचारिक चालाकियाँ घृणित होते हुए भी काबिले तारीफ हैं।

 

अब इसी उदाहरण को लें, मैं भी कुछ वामियों से सुन चुका हूँ कि “भारत के लिए सही तो राम का दर्शन ही है”।

अब शब्दों की चालाकी देखिए..। “राम का दर्शन”…. कहने वाला कौन??? आपके सामने नास्तिकता ओढ़े वामास्तिक। आप सोचते हैं ,”अरे वाह! विरोधी भी श्रीराम को नहीं नकारते।”

 

आपके फूलते ही वह आँच हल्की सी तेज करेगा…. राम दर्शन की व्याख्या।

 

अब ये एक तीर आपके मानस में कई निशाने मारेगा। हजारों साल पहले के श्रीराम का असली व्यक्तित्व व कृतित्व जो १००० वर्ष की दासता में कुछ का कुछ हो गया,आपके चिंतन का आधार बनाया जाएगा।

 

इसमें जानबूझकर उन प्रक्षेपणों की चर्चा बार बार होगी जो विवादित हैं। जैसे सीता का त्याग और शंबूक के कानों में वेदश्रवण के अपराध में पिघला सीसा डलवाना। और साथ में टिप्पणी संलग्न की जाएगी कि “उस वक्त राजनीति में ब्राह्मणवाद हावी था इसलिए राम को ऐसे अप्रिय निर्णय लेने पड़े।”

ब्राह्मणवाद के चर्चे मात्र से दलित गधे चरने चले आएंगे और बेवकूफ सनातनी बेकार ही कुंठित होंगे।

 

फिर राम की मर्यादा रक्षा पर वामीकुटिलता सम्मत प्रवचन देकर आपको समझाया जाएगा कि जिहादी नक्सली अगर राम के समय होते तो राम इनके साथ होते।

वंचितों शोषितों के राम।

 

फिर आपके भेजे में ठूँसा जाएगा कि असली रामभक्त संविधान के दायरे में रहेगा। अपना नुकसान हो तब भी मर्यादा नहीं त्यागेगा। संघियों ने राम को विकृत कर दिया है।

 

अब इनके शब्दजाल से आप अपने आप को व्याख्यायित करने लगेंगे।

 

स्वभावतः कृष्ण की Practical Approach पर ध्यान ही नहीं जाएगा और इनके रामदर्शन रूपी वामदर्शन के विष से समाज को भेड़दशा में भेड़ियों के सन्मुख धकेले जाने पर आप एक झूठा आत्मसुख अनुभव करेंगे और नष्ट होने के लिए तैयार रहेंगे।

 

मैं कहूँगा राम को चुनें पर समग्रता से। राम ने असुरों के समूल नाश की विकट प्रतिज्ञा पर अपना जीवन केंद्रित किया था जिसकी वामी कभी भी चर्चा नहीं करते।

आप उस पर ध्यान रखें।

 

#अज्ञेय

 

Anand Rajadhyaksha जी ने एक बहुत ही सार्थक प्रश्न उठाया है कि कर्ण का महिमामंडन मूल महाभारत में भी है या बाद के आधुनिक वामपंथी साहित्य का आरोपण है?

यह प्रश्न कर्ण ही नहीं, रावण और महिषासुर जैसे खलनायकों के पहले प्रतिनायक और बाद में महानायक चित्रित किये जाने की प्रक्रिया पर भी लागू होता है. इससे भी महत्वपूर्ण बात एक और है जो आनंद जी ने ही कुछ दिनों पहले कही थी – वामपंथियों को परिभाषित करने वाला रंग लाल नहीं, “ग्रे” है. वे “ग्रे” के अलग अलग शेड्स की आड़ में अपना कालापन छुपाते आये हैं. इसीलिए रावण और कर्ण के चरित्रों में व्याप्त “ग्रे” के शेड्स वामियों को बहुत प्रिय रहे.

कर्ण के चरित्र का पहला स्वर्णिम चित्रण जब मैंने पढ़ा था तो मैं कुल 5-6 साल का था (हाँ, मैं इस मामले में थोड़ा एब्नॉर्मल था). पहली पुस्तक थी केदारनाथ मिश्र प्रभात का प्रबंध काव्य “कर्ण”. मुझे याद है यह बड़े भैया के इंटरमीडिएट के कोर्स में चलती थी शायद. दूसरी थी रश्मिरथी, यह भी मंझले भैया के कोर्स की किताबों में चलती थी, और मैंने इसे लगभग कंठस्थ कर लिया था जब मैं तीसरी या अधिक से अधिक चौथी कक्षा में पढ़ता था. ध्यान रहे ये दोनों किताबें कोर्स में थीं…इसी वजह से घर पर सहज सुलभ थीं और मुझे पढ़ने को असमय ही मिल गईं. पर तबतक मुझे महाभारत की मूल कथा के बारे में कोई पुस्तक नहीं मिली थी. तो मेरे लिए महाभारत का मूल चरित्र एक समय कर्ण ही रहा, कृष्ण नहीं.

आप दिनकर को कहीं से भी वामपंथी नहीं कह सकते. पर वामपंथियों के बारे में कहा ना, उन्हें ग्रे के शेड्स पसंद हैं…तो उन्होंने भी दिनकर की लेखनी में वाम के शेड्स ढूंढ लिए और उसे पाठ्यक्रम में स्थान दे दिया. तब उनके पास अपना वामपंथी कूड़ाघर था नहीं तो वे दिनकर और निराला की कविताओं में वामपंथ के शेड्स खोजकर उसे प्रोमोट करते थे. निराला की “भिक्षुक” और “तोड़ती पत्थर” पाठ्यक्रमों में स्थान पाती थी पर “राम की शक्ति-पूजा” का नाम सुने बिना बड़े हो गए.

अपना ही उदाहरण दूँगा…15, 16, 17 वर्ष की अवस्था में मैं भी वामपंथी था…जैसा हर किशोर थोड़ा या ज्यादा होता ही है. धीरे धीरे इसके दुष्प्रभाव से निकल रहा था जब अध्ययन का क्षेत्र थोड़ा व्यापक हुआ. तब 22-23 वर्ष की अवस्था में मैंने एक काव्य-नाटिका लिखी थी – रावण. करीब 30 मिनट का यह नाटक पूरी तरह छन्द जैसे काव्य में था, भाषा पूरी तरह संस्कृतनिष्ठ हिंदी थी…तत्सम…एक भी शब्द मूल की दृष्टि से अशुद्ध नहीं था. पर था यह रावण का महिमामंडन या कम से कम जस्टिफिकेशन. क्योंकि तब तक मेरे मानस पर ऐसा कोई बौद्धिक प्रभाव आया ही नहीं था कि मैं राम के चरित्र में रम सकूँ…यह रावण का महिमामंडन मेरी वामपंथी प्रवृतियों का प्रभाव था जो जाते जाते ही गया…

राजनीतिक वामपंथ और बौद्धिक वामपंथ में एक बहुत ही सूक्ष्म पर मूलभूत अंतर है. राजनीतिक वामपंथ जहाँ एक संकरा पन्थ है…उससे जरा सा भी विचलन स्वीकार्य नहीं है…पर बौद्धिक वामपंथ एक पंथ नहीं है, एक मैदान है…एक मैग्नेटिक या ग्रेविटेशनल फील्ड जैसा है…आप उसके केंद्र में नहीं भी होते हैं, केंद्र से दूर भी होते हैं तो भी आप उसके फील्ड में कहीं ना कहीं होते हैं. तो वे अपने एजेंडा के हिसाब से सांकृत्यायन में, अज्ञेय में, निराला में या दिनकर तक में वामपंथी संभावनाएं तलाश कर उनका प्रयोजन के अनुसार उपयोग कर लेते हैं…

 

कम्युनिस्टों का एक प्रिय सवाल होता है, क्या इस से गरीब को रोटी मिलेगी ? आज चाहे भारत के मंगलयान की बात हो, बुलेट ट्रेन की बात हो, नदियों को जोड़ने की बात हो या सड़कों का जाल बनाने की बात हो, उनका पहला सवाल होता है कि क्या इस से गरीब को रोटी मिलेगी ? सवाल ये है कि ये सड़कें बनाएगा कौन ? किसने नदियों को जोड़ा ? बुलेट ट्रेन चलाने और उसके राख रखाव के लिए मजदूर, कर्मचारी-इंजिनियर कहाँ से आयेंगे ? क्या वो हम लोग ही नहीं होंगे ? क्या वो भारत का ही बेरोजगार नहीं होगा जो नौकरी की तलाश में निकला है और इन परियोजनाओं में काम करेगा ? जब हमारे ही लोग इन योजनाओं में काम करेंगे तो सवाल है कि ये सब हमें रोटी कैसे नहीं दे रहे !

 

खुद अम्बेडकर कहते हैं कि गरीब-मजदूर, कामगार वर्ग को रोटी से आगे सोचने ही ना देना एक धूर्तता है | उन्हें कम से कम रूसो की सोशल कॉन्ट्रैक्ट, मार्क्स का कम्युनिस्ट मैनिफेस्टो, पोप लियो (तेरहवें) का एनसाइक्लीकल ऑन द कंडीशन्स ऑफ़ लेबर, और जॉन स्टुअर्ट मिल की ऑन लिबर्टी (Rousseau’s Social Contract, Marx’s Communist Manifesto, Pope Leo XIII’s Encyclical on the conditions of labour, John Stuart’s Mill on liberty) खुद पढ़नी चाहिए | सिर्फ रोटी नहीं जनता को अपने सामाजिक, राजनैतिक हकों के लिए भी जागरूक होना होगा | जब तक ऐसा नहीं होता, राजवंश धोखे से उनके हाथ से सत्ता हथियाते रहेंगे |

 

अगर आपने ये किताबें नहीं पढ़ी हैं तो इन्हें इन्टरनेट से मुफ्त डाउनलोड कीजिये और पढ़िए | किसी और के सिखाये सेकंड हैण्ड ज्ञान के भरोसे मत रहिये | खुद पढ़िए |

 

निम्न में से कौन सी बात सही है और कौन सी गलत ?

 

  1. कर्ण को द्रोणाचार्य ने शिक्षा देने से मना कर दिया था और फिर उसने परशुराम जी से शिक्षा ग्रहण की |

 

  1. कर्ण सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर था |

 

  1. अहिंसा परमो धर्म, धर्म हिंसा तथैव च – अनुशासन पर्व, महाभारत

 

  1. लक्ष्मण जी ने रावण की मृत्यु के समय, रावण से शिक्षा ली थी |

 

  1. जननी धर्म भूमिश्च, स्वर्गादपि गरियसी – वाल्मीकि रामायण

 

(पहले अपना उत्तर कमेन्ट में लिख दें, फिर आगे पढ़े)

 

ऊपर चार पांच सन्दर्भ दिये हुए हैं, वाल्मीकि  रामायाण और महाभारत से | इनमें से कौन कौन से सन्दर्भ सही हैं और कौन कौन से सन्दर्भ गलत हैं ? क्या आप जानते हैं ?  आपको क्या लगता है, कितने लोगों को, ऊपर की 5 बातों में से १, 2, 3, 4 या पाँचों बातों सही लगती होंगी !!

 

जबकि सच ये है कि उपरोक्त में से एक भी बात सही नहीं है | शास्त्रोक्त नहीं है | पर हम इनमें से बहुत सी बातों को या तो सही मानते आ रहे हैं या हमारे जानने वालों में बहुत से लोग, इनको सही मानते हैं ! जबकि पूरी वाल्मीकि रामायण में कहीं भी जननी धर्म भूमिश्च नहीं है, ये वाक्य सर्वप्रथम एक नाटक (रामलीला टाइप, रामलीला नहीं) में प्रयोग किया गया था पर इतना प्रसिद्ध हुआ कि लोगों को लगा कि वाल्मीकि रामायण में से लिया गया | इसी प्रकार, वाल्मीकि रामायण, यहाँ तक कि तुलसी रामचरित मानस तक में लक्ष्मण जी को रामचंद्र जी ने रावण के पास कोई ज्ञान लेने नहीं भेजा |

 

इसी प्रकार आप पूरी महाभारत ऊपर से लेकर नीचे तक खंगाल लीजिये, उसमें कहीं भी आपको धर्म हिंसा तथैव च वाली पंक्ति नहीं मिलेगी |

 

ये प्रश्न पूछने का समय है कि जब ऐसा कुछ लिखा नहीं है तो हमने या फेसबुक पर उपलब्ध लाखों लोगों ने इस बकवास को क्यों शास्त्रों के नाम पर ग्रहण कर लिया ? – क्यों ? इसका उत्तर है – कि हम अपने शास्त्रों को त्याग चुके हैं | हमने अपने ही शास्त्रों को पढना छोड़ दिया है, उनका चिंतन और मनन तो बहुत दूर की बात है |

 

पर क्या आपको ये भी पता है कि ऐसे समुचित प्रयास किये जा रहे हैं, संगठित प्रयास किये जा रहे हैं कि आपको आपके शास्त्रों के ही बारे में भ्रमित किया जा सके |  रोज लाखों कहानियाँ बन रही हैं, जिनमें आपके शास्त्रों के ही पात्रों यथा कृष्णजी, रामचंद्र जी, पांडव आदि के बारे में मनगढ़ंत बातें लिखी जा रही हैं | कोई व्हात्सप्प पर भेज रहा है कि भीष्म को   मारना पाप था और रामचंद्र जी का बाली को छिपकर मारना पाप था… कोई लिख रहा है कि वेदों में अश्लीलता है तो कोई सोशल मिडिया पर शेयर कर रहा है कि कबीर ही वेदों में वर्णित भगवान् है और कोई लिखता है कि कृष्ण जी को कर्ण बहुत पसंद थे तो कोई लिखता है कि रावण बहुत ही अच्छा था क्योंकि उसने सीताजी को छुआ भी नहीं !!! इन सभी बातों का हम समय समय पर खंडन करते रहते हैं लेकिन हमारा खंडन कितने लोगों तक पहुचता होगा ? जब कि सोशल मिडिया, व्हात्सप्प में इस प्रकार की झूठी बातें रोज शेयर की जाती हैं |

 

ऐसा भी क्यों किया जा रहा है ? …क्यों ? – इसका उत्तर है ताकि हमें, जो पहले से ही अपने शास्त्रों से दूर हैं, उनको और भ्रमित किया जा सके, उनको धर्म के नाम पर और बरगलाया जा सके और जब उनको कहीं पर, कोई टोक दे कि भाई ये गलत है तो वो पलट कर ये न माने कि अच्छा गलत है बल्कि पलट कर ये कहे कि अरे यार पता ही नहीं चलता कि किस शास्त्र में क्या सही है और क्या गलत है ? (बिना पढ़े ही), कोई कुछ बताता है और कोई कुछ (यहाँ भी सुनी सुनाई बातों में ही उसे समस्या है पर फिर भी शास्त्र नहीं पढता और नहीं जानने वाले के पास जाता और व्हात्सप्प पर आई पोस्ट का ही बचाव  करता है) , सब फालतू बातें हैं | जितने मुंह उतनी बातें |

 

आखिर ऊपर की दोनों बातो के पीछे क्या कारण है ? शास्त्रों का समुचित ज्ञान न होना | भ्रमित वही होगा, जिसे कुछ पता ही न होगा अथवा जिसकी जानकारी कम होगी | बच्चो को कैसे बहका लिया जाता है ? क्योंकि उनको भी सही गलत की अधिक जानकारी नहीं होती है | ऐसे ही आप जैसे लोगों को बहकाना बहुत आसान है, अपने ही ग्रंथो और शास्त्रों को, जिनको हमारे ऋषि, हमारे कल्याण के लिए लिख गए, उनसे दूर, बहुत दूर किया जा सकता है |

 

सोचिये, जब हम इतनी छोटी छोटी बातों पर भ्रमित हो जाते हैं, शास्त्रों के समुचित अध्ययन के अभाव में, तो “धर्म क्या है ?” – क्या ये संभव है कि ये बात हमें सही सही पता हो !!! जबकि हमने किसी शास्त्र/ग्रन्थ का अध्ययन न किया हो (हो सकता है गीता या रामचरित मानस पढ़ी हो, लेकिन क्या धर्म को जानने के लिए, मात्र ये दो ग्रन्थ बहुत हैं ? गीता को पढ़ तो लेते हैं पर क्या समझ भी लेते हैं ? गीता को समझना कोई बच्चो का खेल नहीं है अतः यदि आपने गीता पढ़ ली है तो ये न समझें कि आपने समझ भी ली है)

 

धर्म सूक्ष्म है, धर्म गूढ़ है, जब ये शास्त्रों में विविध स्थानों पर लिखा हुआ है तो क्या उस धर्म को एक पंक्ति में बांधना संभव है ?

 

१. परोपकार ही धर्म है |

  1. अहिंसा परमो धर्म ही धर्म है |
  2. मानवता ही धर्म है |
  3. जिसको धारण किया जाए, वही धर्म है |

5, यज्ञ करना ही धर्म है |

  1. जो जिसका स्वभाव है, वही उसका धर्म है |

7 दान ही धर्म है |

  1. किसी को पीड़ा न पहुचाना ही धर्म है |

 

ऐसी अनेकों परिभाषाएं मुझे पिछले कुछ दिनों में ज्ञान के रूप में प्राप्त हो चुकी हैं … पर ये तो 8 अलग अलग परिभाषाएं हो गयी ??? कौन सी सही है ? कौन सी गलत है ? कोई क्यों सही है ? क्या हमने ये परिभाषाएं किसी शास्त्र से पढ़ी हैं ? यदि हाँ तो किसी दुसरे ग्रन्थ में जब उसके विपरीत बात पढने को मिली तो हमने क्या उस पर मंथन किया कि वहां तो ये लिखा है और यहाँ ये ? या सभी जगह इनमें से एक ही परिभाषा किसी शास्त्र में लिखी है ? नहीं !!! सब जगह अलग अलग बातें हैं ! फिर कैसे सही बात को जाना जाए कि “धर्म क्या है ?”

 

ये चिन्तन का समय है, ये मंथन का समय है, ये अपने धर्म की रक्षा करने का समय है क्योंकि उसे समूह बना कर, भ्रष्ट किया जा रहा है, हमको सोशल मिडिया के द्वारा हमारे ही शास्त्रों से और धर्म से अलग किया जा रहा है | यदि हमें अब भी प्रयास नहीं किये तो फिर ये मंचाधीश लोग, ऐसी आलतू फालतू परिभाषाएं बना बना कर, हमको हमारे ही शास्त्रों से दूर कर देंगे … धीरे धीरे हमारी आने वाली पीढ़ी, हमारे ही धर्म से, शास्त्रों से, ऋषियों के दिव्य ज्ञान विरत हो जायेगी !!! कारण आप होंगे क्योंकि आपने, अपने समय पर कुछ नहीं किया ! स्वयं कोई प्रयास नहीं किया धर्म को, शास्त्रों के, ग्रंथो के अध्ययन का और उनके बारे में सत्य जानने का |

 

 अपने धर्म के बारे में जानने का प्रयास कीजिए  । इसके बाद आपको, कोई धर्म के नाम पर भ्रमित नहीं कर पायेगा क्योंकि धर्म के असली स्वरूप को जानने के बाद, आप तुरंत सोशल मिडिया पर धर्म के नाम पर फैला रहे झूठ को पकड लेंगे | भ्रम से बाहर आने का एक ही रास्ता है – उस विषय के बारे में पूरी जानकारी प्राप्त कर ली जाए | आपके पास वो मौका है | वो भी घर बैठ है | बाद में थ्री इडियट का डायलॉग याद आएगा कि मौका था, हमें पता भी था… पर हम चूक गए |

 

शत्रुघ्न

भारत का पुरातन कृषि शास्त्र – सीता नवमी विशेष

माता सीता की अपार शक्ति — वाल्मीकि रामायण के अनसुने रहस्य

आप सभी लोगों से निवेदन है कि हमारी पोस्ट अधिक से अधिक शेयर करें जिससे अधिक से अधिक लोगों को पोस्ट पढ़कर फायदा मिले |
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