
सबसे पहले ग्रीष्म अयनांत क्या है ये जानते हैं –
हर साल 21 जून को ग्रीष्म अयनांत या संक्रांति (Summer Solstice) होती है। उत्तरी गोलार्द्ध में इस दिन रात की तुलना में दिन अधिक बड़ा होता है, साथ ही यह वर्ष का भी सबसे बड़ा दिन होता है। शीतकालीन अयनांत या संक्रांति 21 या 22 दिसंबर को होती है, इस तिथि को दिन की तुलना में रात अधिक बड़ी होती है। आखिर क्या कारण है कि दिन और रात रोज़ बराबर नहीं होते हैं?
क्या है कारण दिन और रात की अवधि में अंतर का?
इस प्रश्न का स्पष्टीकरण पृथ्वी के झुकाव में निहित है क्योंकि हमारी पृथ्वी की धुरी 23.5 डिग्री के कोण पर झुकी हुई है।
पृथ्वी के घूर्णन और कक्षा जैसे कारकों के साथ यह झुकाव संयुक्त रूप से वर्ष के विभिन्न दिनों में किसी भी स्थान पर पड़ने वाली सूर्य की रोशनी की अवधि में विविधता का कारण बनता है।
पृथ्वी के अक्ष पर यह झुकाव विभिन्न मौसमों के लिये भी ज़िम्मेदार है।
दिन तथा रात
पृथ्वी का जो भाग सूर्य के सामने पड़ता है वहाँ पर दिन होता है। पृथ्वी के घूर्णन के साथ यह स्थिति परिवर्तित होती रहती और इसी कारण जो स्थान सूर्य की रोशनी की विपरीत दिशा में होता हैं वहाँ रात होती है।
भूमध्य रेखा पर दिन और रात दोनों बराबर होते हैं। जैसे-जैसे ध्रुवों की ओर बढ़ते जाते हैं, दिन और रात की अवधि के बीच का अंतर भी बढ़ता जाता है।
ग्रीष्म ऋतु के दौरान दोनों गोलार्द्धों के ध्रुवीय भागों पर महीनों तक 24 घंटे सूर्य का प्रकाश पड़ता है जिससे वहाँ लगातार छः महीने तक दिन होता है, इसके विपरीत सर्दियों के दौरान इन क्षेत्रों में महीनों तक अंधेरा व्याप्त रहता है।
मुख्य अक्षांश
अक्षांश भूमध्य रेखा से किसी स्थान की दूरी का एक मापक है। पृथ्वी का झुकाव कुछ परिचित काल्पनिक रेखाओं को परिभाषित करने में मदद करता है, यह झुकाव संक्रांति को निर्धारित करने के लिये भी महत्त्वपूर्ण हैं।
23.5 डिग्री अक्षांश (झुकाव के समान) पर भूमध्य रेखा के उत्तर और दक्षिण में क्रमशः कर्क और मकर रेखाएँ हैं।
66.5 डिग्री उत्तर और दक्षिण में क्रमशः उत्तर और दक्षिण ध्रुव वृत्त स्थित हैं। भूमध्य रेखा से 66.5 डिग्री से अधिक अक्षांश पर (किसी भी दिशा में) दिन या रात लगातार बने रहते हैं।
अयनांत या संक्रांति
प्रत्येक उष्णकटिबंध पर, वर्ष में एक बार दोपहर के समय सूर्य का प्रकाश लम्बवत् पड़ता है।
जब यह कर्क रेखा के उष्णकटिबंध पर होता है, तो उत्तरी गोलार्द्ध में इसे ग्रीष्मकालीन संक्रांति के नाम से जाना जाता है।
मकर रेखा के उष्णकटिबंध में होने पर पर शीतकालीन संक्रांति होती है। भूमध्य रेखा पर सूर्य इन दोनों तिथियों को लम्बवत् होता है।
मार्च में इसे वसंत विषुव और अगस्त में शरद ऋतु विषुव के नाम से जाना जाता है।
पूरी पृथ्वी पर ये दो दिन ऐसे हैं जब दिन और रात बराबर अवधि के होते हैं। भूमध्य रेखा पर दिन और रात हमेशा बराबर होते हैं।
इस वर्ष ग्रीष्म अयनांत 21 जून सोमवार के दिन जब कि भुवन भाष्कर उत्तरी गोलार्द्ध में अपने सर्वोच्च स्तर पर प्रखरतम स्थिति में होंगे, अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस मनाने का शुभारंभ होगा। इस दिन शुक्ल पक्ष की पंचमी होगी।
इसके आधिकारिक चिह्न का वर्णन ऐसा बताया गया है:
जुड़े हाथ वैयक्तिक चेतना का वैश्विक चेतना से योग, शरीर और मस्तिष्क एवं मनुष्य और प्रकृति में आदर्श संतुलन और स्वास्थ्य और नैरोग्य के प्रति समेकित सम्पूर्ण पद्धति के प्रतीक हैं। भूरी पत्तियाँ पृथ्वी, हरी पत्तियाँ प्रकृति, नीला रंग जल तत्त्व, कांति अग्नि तत्त्व और सूर्य ऊर्जा एवं प्रेरणा को अभिव्यक्त करते हैं। यह चिह्न मानवता के बीच सामंजस्य और शांति को दर्शाता है जो कि योग का सत्त्व है।
प्रतीकों के साथ एक समस्या रही है। आधुनिक समय में जब हम प्राचीन पद्धति से जुड़ा कोई आयोजन करते हैं तो अवचेतन में युगों युगों से अनवरत प्रवाही संस्कार और सूचनायें सामने आ जाते हैं। समानतायें अपना अवगुंठन हटा देती हैं।
कभी अरब पठार से ले कर भारत तक इस धरती पर मिलते जुलते संस्कारों वाली सभ्यतायें जीवित थीं। इन सभ्यताओं में मातृपूजा का भी प्रचलन था। तीन देवियों के रूप में यदि मिस्र में मुत, वाड्जेट और बस्त थीं तो एशियाई अरब में उज़्ज़, अल-मनात और अल-लात। भारतीय सारस्वत सभ्यता की तीन देवियाँ थीं इळा, भारती और सरस्वती जिन्हें ऋग्वैदिक आप्री मंत्रों में सभी ऋषि कुलों ने पुकारा और सम्मान दिया।
वाड्जेट निचले मिस्र की भूमि से जुड़ी देवी थीं जिनकी संगति भारती और अरबी उज़्ज़ से लगाई जा सकती है। भूमि को धारण करने वाले भारतीय शेषनाग की तरह ये भी सर्पों से जुड़ी उन के द्वारा भी अभिव्यक्त होती थीं। इस देवी से जुड़े आयोजनों में महत्त्वपूर्ण था ग्रीष्म अयनांत 21 जून का आयोजन जब कि पृथ्वी पर रक्षक दृष्टि रखने वाले रा देवता सूर्य अपने चरम पर होते। सूर्य के पुत्र देवता होरस की आँख का प्रतीक वाड्जेट से जुड़ा था, माँ की आँख सब पर दया दृष्टि रखती थी। साथ ही उनके लिये चन्द्रमास की पाँचवी तिथि का पाँचवा घंटा आरक्षित था। नहीं पता कि योग दिवस के कर्ता धर्ता इन तथ्यों से अवगत हैं या नहीं। कुछ भी हो संयोग बड़बोले हैं! आधिकारिक चिह्न और होरस की आँख में समानता देखिये। कथित पुराने संसार का दीर्घवृत्तीय मानचित्र योगाभ्यास करते मनुष्य के दीर्घवृत्तीय लम्बवत सिर और हाथों के घेरे से जुड़ होरस की आँख सा हो जाता है!
यह ध्यान रखना होगा कि आज का मिस्र कथित अंतिम मजहब का अनुयायी है और यह भी कि मजहब से पहले के समय का संग-ए-मूसा काला पत्थर आज भी पूजनीय है। उस पत्थर के वर्तमान रूप की होरस की आँख से समानता उल्लेखनीय है।
जिस तरह से मिस्र के लिये दिन से जुड़ी देवी वाड्जेट महत्त्वपूर्ण थी वैसे ही एशियाई अरबों के लिये रात में सबसे चमकीले शुक्र की रूप देवी उज़्ज़। उनके अनुयायी नेबाती जन हर वर्ष एक बार काबा की तीर्थयात्रा करते जहाँ यह पत्थर स्थापित था। वहाँ श्वेत, रक्त और अन्य रंगों के पत्थर भी स्थापित थे जिनका सम्बन्ध अन्य देव देवियों से था और उनमें देवी उज़्ज़ का पत्थर अत्-ताइफ भी था। आठवीं हिज़री में स्वघोषित अंतिम दूत ने खालिद इब्न अल-वालिद को भेज कर देवी उज़्ज़ मन्दिर नष्ट करवा दिया। काबा की 360 देव प्रतिमाओं में से एक संग-ए-मूसा को छोड़ सभी नष्ट कर दिये गये। उस एक पत्थर को छोड़ देने के पीछे व्यवसायिक, धार्मिक और राजनैतिक कारण भी थे।
कथित अंतिम मजहब ने स्वयं द्वारा पारिभाषित कुछ एक को छोड़ कर किसी अन्य के लिये किसी भी तरह के सम्मान या पूजा भाव का निषेध किया है। मूर्तिपूजा और प्रतीकों के प्रति उनकी भयावह हिंसायुक्त घृणा सबको पता है। अब यदि कोई चिह्न अनजाने ही सही उन मूलों से जुड़ता हो जो कि उन्हें अपने हिंस्र, विनाशी और नैषधिक परिपाटियों से युक्त इतिहास की स्मृति दिलाते हों तो विश्व के इस सबसे कट्टर और जड़ मत के अनुयायियों के लिये उसे या उससे जुड़े किसी आयोजन को स्वीकारना लगभग असम्भव ही होगा। यदि कुछ स्वीकार कर रहे हैं और समय के स्वस्थ प्रवाह के साथ चलने को तैयार हैं तो उनका समुचित स्वागत होना चाहिये साथ ही जड़मतियों के लिये सहानुभूति और प्रार्थना भी *– तमसो मा ज्योतिर्गमय।*
क्या आपने जो योग किया उस में ऐसे भर्गो ज्योति को देखा ???
🌑🌒🌓🌔🌕🌖🌗🌘
समा के दो अवसर आते हैं
चैत्र से सत्रारम्भ क्योंकि एक सम स्थित यहीं बनती है। यह कृषकों से जुड़ा हुआ सत्र है।
दूसरी सम स्थिति आश्विन मास में होती है, तब भी नवसंवत् का आरम्भ होता है। यह व्यापारिक सत्र है।
राजकर्म का संवत्सर वर्षाकाल से आरम्भ होता है, शैक्षणिक सत्रारम्भ भी तभी से किया जाता रहा है।
विषुव-दिवस पर शङ्कु या दण्ड से छायासाधन करके भी देखना चाहिये।
दिन-रात सम हो रहे हैं।
समत्वं योग उच्यते।
तिथेश्च श्रीकरं प्रोक्तं ।
वारादायुष्यवर्धनम् ।।
नक्षत्राद्धरते पापं ।
योगाद्रोग निवारणम् ।।
करणात्कार्यसिद्धिस्स्यात् ।
पञ्चाङ्गफलमुत्तमम् ।।
तिथि सम्पत्ति कारक है।
वार आयुष्य वर्धक है।
नक्षत्र पापों का हरण करते हैं।
योग रोगों के निवारक हैं
और करण कार्य सिद्धि कारक होते हैं।
✍🏻 आगे बाकी है
दिन के हाथों में फक़त एक सुलगता सूरज
…………
बचपन में जब छत पर सोते थे तो सूर्योदय के आसपास गंगाजी के कछार की ओर से मंद मंद समीर बहती थी। रात भर उमस और गर्मी से बार बार टूटती नींद के बाद ठंडी हवा के कारण उस समय बड़ी गहरी नींद आती। और ऐन उसी समय दादी जगा देती। कहती, “देखो कितने लोग तो गंगा नहाकर लौट रहे हैं। सूर्य देवता सिर पर खड़े हैं। और तुम बिस्तर पर पड़े हो। उठो।”
सूर्य का एक नाम है “मित्र”। खेलने के लिए मित्र आपको बुलाता। घर के द्वार खडे़ होकर। आप बाहर नहीं आये तो मित्र आपके बिस्तर, आपके सिराहने तक चला आता है।
सूर्य भी बस ऐसा ही है। निरंतर चलता रहता है। विष्णु पुराण में एक कुम्हार के चाक की परिकल्पना की गयी है । इस चाक पर सूर्य घूमता रहता है। कभी चाक की नाभि के समीप । कभी धुर बाहर।
सूर्य आज चलते हुए कर्क रेखा के ठीक ऊपर पहुंच गया। अंग्रेजी में इसे Summer solstice कहते हैं। sol का अर्थ लैटिन में होता है सूर्य और Sistere का अर्थ है ठहर जाना। ठिठक जाना।
ऊपर चाक का उदाहरण आया है। आपने बचपन में साइकिल यदि चलाई हो तो आपको मालूम होगा कि क ई बार पहिया गोल नहीं घूमता। उसमें लहक आ जाती है।
बस ऐसी ही है हमारी धरती माता। बरसों से हमारा बोझ उठाये इसकी कमर झुक गयी है। यह झुकी कमर से अपनी धुरी पर नाचती रहती है अनवरत। नाचते नाचते दो स्थिति ऐसी आती हैं कि यह सूर्य के समक्ष अधिकतम झुकती है। एक बार उत्तरी गोलार्ध में दूसरी बार दक्षिणी गोलार्ध में। झुकाव का कोण होता है २३°२६’।
उत्तरी गोलार्ध में जिस दिन धरती मैया बोझ से सबसे ज्यादा झुकी होती है, सूरज देवता उस दिन सबसे ज्यादा तने होते हैं। ठिठके होते हैं। उत्तरी गोलार्ध में उनका सर्वाधिक प्रकाश होता है। इसी कारण आज के दिन को सबसे बड़ा दिन कहते है।
“रात को रो रो सुब्ह किया और दिन को ज्यूँ त्यूँ शाम किया”। गर्मी में चाहे जो कर लो दिन कटने का नाम नहीं लेता। खैर, धरती माता 21 जून तक आकर अपनी सारी सामर्थ्य से सूरज के ताप को झेलती है। निशब्द। पर आज से दिन छोटे होने लगेंगे।
21 जून अंतरराष्ट्रीय योग दिवस है। आज योग करिए पर सूर्य नमस्कार भी करिए। क्योंकि आज ठिठका हुआ सूर्य कल चलेगा। दक्षिणी गोलार्ध की ओर। हमारे शास्त्रों में माना जाता है कि दक्षिणी गोलार्ध में अगस्त्य प्राण की अधिकता है। इसीलिए दक्षिणी गोलार्ध में पानी अधिक है। उत्तर में वशिष्ट प्राण की प्रधानता है। इसलिए यहां सूखा भूभाग अधिक है।
बहरहाल, अब से दिन काटने की चिंता कम करिए। “दिन तो गुजर जाएगा..क्या होगा जब रात हुई।”
मैथिली की एक कहावत होती है “सियान कुकुर कहुं पोस मानै” | इसका मतलब होता है की कुत्ता जब एक बार बड़ा हो जाये तो उसे पालतू नहीं बनाया जा सकता | दरअसल ये तब कहा जाता है जब बचपन से आपने किसी बच्चे को छुट्टा सांड हो जाने दिया हो और बड़े होने पर उसे अनुशासन सिखाने की कोशिश कर रहे हों |
योग के साथ भी ऐसा ही है | कुछ लोग शोर मचाएंगे ही, उन्हें जाने देना चाहिए | बाकि जो जवान लोग हैं उनकी सीखने की तमन्ना भी होती है और उन्हें फ़ायदे भी समझ आते हैं | कूढ़मगजों को जाने देना चाहिए |
✍🏻 आगे और बाकी है
एक अपनी-सी बात
*
योग दिवस पर पूरी दुनिया योगानुयायी के रूप में आगे आई। कौन पीछे रहा??
मगर, आसनों के बाद यूं ही बैठने की बजाय मेरा त्राटक-सा ध्यान इस योग की परंपरा पर गया। लगा कि यह इस देश की सुदीर्घ परंपरा है। विरासत है और इसको इतना अहम माना गया कि लगभग सभी पुराणकारों ने इसको महत्व दिया है। न केवल पुराण बल्कि उप और औप पुराणों में भी नाना नामों से योग के विविध पक्षों पर प्रकाश डाला गया है। वायुपुराण ने एक जगह षडांगयोग व दूसरी जगह अष्टांग योग को लिखा है, शिवधर्मोत्तर ने षडांग योग को लिखा है और *अजपाजप* को भी योगांग स्वीकारा है…।
बात केवल उसके अंगों की ही नहीं है, बात है कि योग की इतनी विराट सत्ता रही है कि वह दर्शन का योग ही नहीं, पुराणों में योग, निबंध ग्रंथों में योग, पद्धति साहित्य में योग, संहिताओं और आचारशास्त्र में योग… यदि इस दिशा में संपादन और अनुवाद का सिलसिला आरंभ हो जाए तो भारत के पास सौ से अधिक योग शास्त्र की पूंजी हो जाए। कई संतों, महापुरुषों ने भी योग साधना पर पर्याप्त लिखा है। स्वामी ब्रह्मानंद की ‘योग गीता’ पर तो मैंने कुछ समय पहले काम किया ही था। ‘पतजंलि गीता’ पर कार्य अभी शेष है।
बस, आप में से कुछ मित्रों का संकल्प हो तो योग शास्त्रों पर भी बहुत काम हो सकता है। बिल्कुल वैसे ही जैसे मैंने स्थापत्य और शिल्पशास्त्र के लिए संकल्प किया है।
हमें इस बात पर आत्माभिमान
होना चाहिए कि
भारत के पास योग जैसे विषय पर
100 से अधिक संस्कृत ग्रन्थ हैं!
योग साधना नागों के पास थी!
यायावरों ने तिब्बत,
रोम और मिस्र तक को प्रभावित किया :
पवन, पानी, पावक, पृथ्वी और पटल (आकाश) से
जुड़ी प्राणवान क्रियाओं से!
योग की साधना जीवात्मा का पुनर्जन्म तय करती है; अच्छा कुल और अच्छा शिक्षक देती है! गीता ने
इस सच को स्थापित किया
और लौ पर त्राटक जैसी
साधना को समझाया!
राजयोग,
गानयोग,
जपयोग,
ध्यानयोग,
मुद्रायोग,
हठयोग,
क्रियायोग और अनेक अलग विषय!
कुछ अभ्यास में तो कुछ ग्रंथों में आत्मसात्!
1 दर्शन और 100 दृष्टियां !
लगभग 2000 साल की अवधि!
योग वेद!
😲
इस विषय का सच में बड़ा महत्त्व रहा है!
📖
*योग दिवस की बधाई!*
*योग दिवस : प्रेरक दिवस*
देश में गांव-गांव योग की अलख जगाने में नाथ योगियों की बड़ी भूमिका रही। हठयोग से ही सही, संसार को असार सिद्ध कर वे स्वयं सिद्ध, वचन सिद्ध हुए और नगर, पुर, गांव गांव सिद्ध आसन, सिद्ध पीठ स्थापित हुए। हजारों भारतीय बस्तियां इसके प्रमाण सहेजे हुए हैं। कंधार तक अनेक नगर, किले- कोट, गढ़-गढ़ियां, मठ- मठियां, मन्दिर- मालिए, धूणियां और धूणे नाथ योगियों के थरपे हैं और सब छोर साधक तपे हैं…।
( गांव-गांव गोरख : नगर-नगर नाथ)