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कुण्डली की बलवान और कमजोर स्थिति

कुण्डली के केंद्र त्रिकोण भाव शुभ स्थान होते हैं, यह सुख देने वाले, सौभाग्य को बढ़ाने वाले, स्थाई सफलता देने वाले, जातक के जीवन को कई तरह से समृद्ध बनाने वाले भाव होते हैं ! जब अधिकांश ग्रह केंद्र त्रिकोण में स्थित होते हैं तब कुण्डली बलशाली बन जाती है ! जितने अधिक से अधिक शुभ योग केंद्र त्रिकोण भाव में बनते हैं, कुण्डली उसी के अनुसार बली हो जाती है, क्योंकि इन भावो में अधिकांश ग्रहो के बैठने से ग्रहो को बल मिलता है सहयोग मिलता है जो भी शुभ योग केंद्र त्रिकोण भाव में बनता है वह अपने बल के अनुसार पूर्ण शुभ फल देने में सक्षम होता है, क्योंकि केंद्र त्रिकोण भाव किसी भी फल का विस्तार करने वाले भाव हैं ! जब ग्रह इन भावो में स्थित हो जाते हैं तब अपने आप में ही शुभ फल देने में सक्षम हो जाते हैं ! केंद्र त्रिकोण भाव में बैठने वाले ग्रहो में 6, 8, 12 भाव का स्वामी नही होना चाहिए, क्योंकि इन भावो के स्वामियों की स्थिति विपरीत फल देने वाली होती है अतः इन भावो के स्वामी कोई भी ग्रह हों केंद्र या त्रिकोण में शुभ फल की हानि करते हैं ! केंद्र त्रिकोण में किसी एक भाव में भी कम से कम 2 या 2 से ज्यादा पाप ग्रह एक साथ किसी एक भाव में होने पर शुभ फल नही दे सकते हैं !

                                                                                                                                                                                               कुण्डली के केंद्र त्रिकोण भाव में किसी भी ग्रह का न होना कुण्डली की सबसे निर्बल स्थिति होती है, क्योंकि इन भावो में अनुकूल ग्रहो का न होना शुभ फलो की हानि करके जीवन में संघर्ष को बढ़ाता है ! केंद्र त्रिकोण भाव में ग्रह स्थित न होकर अधिकांश ग्रह त्रिक भाव 6, 8, 12 या 3 भाव में होना शुभ नही होता है ! दूसरे एवं 11वें भाव में अनुकूल ग्रह होने से धन-सौभाग्य की वृद्धि होती है, लेकिन इसमें भी कोई न कोई अनुकूल ग्रह केंद्र स्थान में अवश्य होना चाहिए यदि लग्न का स्वामी ही बली केंद्र या त्रिकोण भाव में हो तब भी कुण्डली संघर्ष कराने के बाद अनुकूल फल देने में सक्षम हो जाती हैं ! ऐसे में अन्य ग्रह जो केंद्र त्रिकोण से बाहर हैं उनका शुभ योग मे होना आवश्यक होता है ! केंद्र त्रिकोण खाली होने और बाहरी भावो में ग्रहो के स्थित होने का मतलब है जीवन में मेहनत परिश्रम का बढ़ जाना क्योंकि ग्रहो को केंद्र त्रिकोण के आलावा बाहरी स्थानों में सहयोग नही मिल पाता  है !  6, 8, 12 भाव के स्वामियों का इन्ही भावो में होना शुभ नहीं होता है चाहे इन भावो के स्वामी शुभ ग्रह ही क्यों न हों, केंद्र त्रिकोण भाव में स्थित हो जाने पर भी शुभ नहीं हो जाते न ही शुभ फल देने में सक्षम होते है !

 

कुण्डली में केंद्र त्रिकोण भावो के खाली होने पर कुण्डली में बनने वाले योगकारक ग्रहो को बल देना चाहिए, लग्न के स्वामी को बल देना चाहिए ! इन योगकारक ग्रहों और लग्नेश का रत्न किसी विद्वान् ज्योतिषी से सलह लेकर पहनना चाहिए ! चंद्रमा, चन्द्र राशि के स्वामी कमजोर हों तो इनको बली करने के उपाय करने से कुण्डली को बल मिलता है जिससे केंद्र त्रिकोण भाव खाली होने पर भी ग्रह फल देने में कुछ सक्षम बन सकते हैं ! केंद्र त्रिकोण भाव खाली होने के साथ यदि कुण्डली के त्रिक भाव या अन्य किसी भाव में राजयोग बन रहा हो तब कुछ संघर्ष के बाद सफलता निश्चित मिलती है, राजयोग का लाभ मिलता है !

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