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आँगन से अपार्टमेंट तक: खोते हुए रिश्तों की कहानी

यह फोटो कई दिनों से वायरल हो रहा है और लोग इसे महिला सशक्तिकरण का प्रतीक बता रहे हैं।

लेकिन सच यह है कि यह सशक्तिकरण नहीं है, बल्कि व्यवस्था का असली चेहरा है — जहाँ एक माँ, ड्यूटी पर होने के बावजूद, अपने बच्चे को साथ लेकर घूम रही है, क्योंकि उसके पास न कोई खुला आँगन है और न ही दादा-दादी जैसे लोग जो उसका सहारा बन सकें।

पहले महिलाएँ घर का संचालन करती थीं और बुज़ुर्ग पोते-पोतियों की देखभाल करते थे। बच्चे मिट्टी में खेलते थे और आँगन में दौड़ते-भागते थे।

अब 400 वर्ग फुट के BHK तक सीमित “व्यक्तिगत जीवनशैली” को ही “महिला सशक्तिकरण” के रूप में प्रचारित किया जा रहा है।

यह फोटो शक्ति से ज़्यादा हमारी सामूहिक विफलता, हमारी धीरे-धीरे लुप्त होती संस्कृति और परिवार की कमजोर होती स्थिति तथा मजबूरी को दर्शाता है।

 
 हमने न जाने कितने रिश्तों का गला घोंट दिया… आओ, रिश्तों को फिर से सँवारें।

जिस स्त्री ने ‘नहीं’ कहा — और इतिहास बदल दिया

“एक महिला की अनदेखी दुनिया” कैलेंडर

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