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77 साल बाद भी ठेले पर इलाज: बाबू लोहार की कहानी

77 साल की आज़ादी के बाद भी अगर किसी बुजुर्ग को अपनी बीमार पत्नी के इलाज के लिए ठेले पर बैठाकर सैकड़ों किलोमीटर पैडल मारना पड़े, तो यह सवाल खुद-ब-खुद उठता है—क्या हम सच में आज़ाद हो पाए हैं?

ओडिशा के 70 वर्षीय बाबू लोहार की कहानी सिर्फ एक इंसान की मजबूरी नहीं, बल्कि हमारे सिस्टम पर लगा एक कठोर सवाल है। जब उनकी पत्नी ज्योति लोहार को लकवा मार गया और बेहतर इलाज के लिए कटक के एससीबी मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल रेफर किया गया, तब बाबू के पास न एंबुलेंस का पैसा था, न किसी वाहन का इंतज़ाम। ऐसे में उन्होंने अपनी रोज़ी-रोटी बने ठेले को ही पत्नी की ज़िंदगी बचाने का सहारा बना लिया।

कड़कड़ाती ठंड, घना कोहरा और 70 साल की थकी हुई देह—इन सबके बावजूद बाबू ने पत्नी को ठेले पर लिटाया, पुराने गद्दे बिछाए और भगवान का नाम लेते हुए संबलपुर से कटक तक करीब 300 किलोमीटर का सफर खुद पैडल मारकर पूरा किया। रोज़ लगभग 30 किलोमीटर चलते, रात में सड़क किनारे दुकानों के पास रुक जाते। जेब खाली थी, लेकिन हौसला अटूट।

बाबू कहते हैं,
मेरी जिंदगी में दो ही प्यार हैं—एक मेरी पत्नी और दूसरा मेरा ठेला। मैं दोनों को छोड़ नहीं सकता।”

करीब 9 दिनों की कठिन यात्रा के बाद वे पत्नी को अस्पताल पहुंचा पाए। वहां लगभग दो महीने तक इलाज चला। इलाज पूरा होने के बाद 19 जनवरी को बाबू ने उसी ठेले पर पत्नी को बिठाकर घर लौटने का सफर शुरू कर दिया।

लेकिन मुश्किलें यहीं खत्म नहीं हुईं। टांगी इलाके में एक वाहन ठेले से टकरा गया, जिससे ज्योति सड़क पर गिर पड़ीं और सिर में चोट लग गई। बाबू ने हिम्मत नहीं हारी। तुरंत उन्हें नज़दीकी सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र पहुंचाया गया, जहां इलाज हुआ और रात ठहरने की व्यवस्था भी की गई। अगले दिन वे फिर से उसी जिद के साथ आगे बढ़ पड़े।

रास्ते में पुलिस ने वाहन की व्यवस्था कराने की पेशकश की, लेकिन बाबू ने विनम्रता से मना कर दिया। उन्होंने सिर्फ खाने की मदद स्वीकार की। बाबू की आंखों में आंसू हैं, लेकिन चेहरे पर सुकून। वे कहते हैं,
मेरी ज्योति मेरी दुनिया है। जब तक सांस है, मैं उसे खुद घर ले जाऊंगा।”

बाबू लोहार की यह यात्रा सिर्फ 600 किलोमीटर की दूरी नहीं है। यह उस प्यार, संघर्ष और सच्चाई की कहानी है, जो हमारे विकास, योजनाओं और दावों पर एक गहरा सवाल खड़ा करती है।
आज भी अगर इलाज तक पहुंचने के लिए इंसान को ठेला चलाना पड़े, तो यह सिर्फ एक कहानी नहीं—यह हमारी सामूहिक विफलता है।

बाबू लोहार हमें यह सिखाते हैं कि सच्चा प्यार संसाधनों का मोहताज नहीं होता, लेकिन एक सभ्य समाज जरूर ऐसा होना चाहिए जहां किसी को इस हद तक मजबूर न होना पड़े।

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