
जन्मकुंडली का नवां भाव भाग्य का होता है इसी भाव इस भाव के सहयोगी भाव लग्न और 5वे भाव से इस भाव की बलिष्ठता देखी जाती है।
कुंडली में जिस भी भावेश का सम्बन्ध मूल रूप से 6, 8 भावेश को छोड़कर आपके बली नवे भाव के स्वामी से होता है उस भाव सम्बंधित फलो की प्राप्ति में कोई विशेष मेहनत नही करनी पढ़ती ऐसे जातको को उस भाव संबंधी शुभ फल की प्राप्ति अपने भाग्य के बल से हो जाती है।
कहा जाता है कि अमुक व्यक्ति का भाग्य कितना बढ़िया बिना कुछ किये इसने यह सफलता आदि हासिल कर ली।इन सब के पीछे आपकी कुंडली का नवा भाव और भावेश शुभ परिणाम दे रहा होता है।
क्योंकि जिस भाव का सम्बन्ध बने भाव से बन गया उस भाव संबंधी फल भाग्य के बल से जातक को मिलते है इस स्थिति में नवे भाव भावेश दोनों का बलि होना जरूरी है।।
विशेष–मेष लग्न की कुंडली में 9वें भाव का स्वामी गुरु बनता है मतलब मेष लग्न में भाग्य का अधिपति गुरु है।अब मान लीजिये जातक को भूमि मकान बनबाना हो या खरीदना हो तो ऐसी स्थिति में
चौथे भाव के स्वामी का सम्बन्ध+भूमि मकान के कारक मंगल दोनों का सम्बन्ध नवे भाव के स्वामी(भाग्येश) गुरु से होने पर जातक को बिना प्रयास जैसे पिता , दादा, या किसी संस्था आदि की ओर से अपने भाग्य के बल से अच्छे मकान सुख की प्राप्ति बिना परिश्रम से हो जायेगी क्योंकि जातक के घर मकान(चोथे भाव/भावेश) का सम्बन्ध भाग्य(नवे भाव/भावेश) से बन गया है जो कि भाग्य के बल से जातक को मकान आदि का सुख मिलेगा।।
इसी तरह यदि सातवे भाव का सम्बन्ध जो जीवनसाथी और विवाह का है इस भाव भावेश का सम्बन्ध नवे भाव के स्वामी से केंद्र त्रिकोण में होने पर भाग्यशाली जीवनसाथी की प्राप्ति होगी जातक या जातिका की शादी के बाद कई तरह से उन्नति और सौभाग्य की वृद्धि होगी।
इसी तरह यदि दसवे भाव के स्वामी का सम्बन्ध नवे भाव से होने पर जातक को कम मेहनत से बढ़िया नौकरी या व्यापार करने के रास्ते मिल जायेंगे और जातक अपने कार्य क्षेत्र में खूब तरक्की करेगा।
कहने का मतलब है नवे भाव भावेश से जिस भी भाव के स्वामी का सम्बन्ध बन जाता है उस भाव सम्बन्ध फलो की प्राप्ति बहुत आसानी से और शुभ स्थिति में होती है यदि किसी भाव का स्वामी कमजोर या पीड़ित होकर अपने भाव के फल देने में सक्षम न भी हो तो ऐसी स्थिति में नवमेश(भाग्येश) से शुभ स्थिति में सम्बन्ध होने पर भाग्य के बल से उस भाव संबंधी फल की प्राप्ति होगी वह फल जातक के भाग्य में जरूर मिलेगा।
6 या 8वां भाव अशुभ भावेश होते है यदि इन भावेशों का सम्बन्ध भाग्येश या भाग्य भाव से हो जाता है तब भाग्य जातक को अशुभ फल देता है मतलब जातक के भाग्य में अशुभ फल की प्राप्ति होना भी लिखा है क्योंकि 6, 8 भाव प्रबल अशुभ फल देने वाले है भाग्येश से इनका सम्बन्ध होने से यह भाग्य में अशुभ फल मिलना लिख देते है।
इस तरह से जिस भी भाव का सम्बन्ध 9वे भाव से होगा उस भाग के फल जरूर मिलेंगे।
भाव शुभ है तो शुभ फल भाव 6, 8 है तो अशुभ फल।।