
जिन लोगों को ज्योतिष शास्त्र में रुचि है, उन्हें कृष्णमूर्ति ज्योतिष पद्धति का निश्चित रूप से परिचय होगा या कम से कम इसके बारे में सुना तो अवश्य होगा।
कौन थे ये कृष्णमूर्ति? ज्योतिष शास्त्र में उनका क्या योगदान था?
प्रो. के. एस. कृष्णमूर्ति का जन्म 1 नवंबर 1908 को तमिलनाडु राज्य के तंजावुर जिले के “कुथुर” नामक गांव में हुआ था।
उनकी प्रारंभिक शिक्षा गांव में ही हुई। इसके बाद उच्च शिक्षा के लिए वे त्रिची के सेंट जोसेफ कॉलेज में दाखिल हुए।
वहां की पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने मद्रास प्रांत के किंग्स इंस्टीट्यूट में जल परीक्षण विभाग में स्वास्थ्य निरीक्षक के रूप में काम शुरू किया। उस समय मद्रास प्रांत में तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश के कुछ हिस्से शामिल थे। काम के सिलसिले में उन्हें अक्सर लंबी यात्राएं करनी पड़ती थीं। इस दौरान समय का सदुपयोग करने के लिए उन्होंने ज्योतिष शास्त्र का अध्ययन शुरू किया।
उन्हें कई सरकारी और गैर-सरकारी कार्यालयों में भी जाना पड़ता था। वहां एक ही संस्था में अलग-अलग स्तर पर काम करने वाले लोगों को देखकर उन्हें आश्चर्य होता था।
जिज्ञासा और रुचि के कारण उन्होंने वहां के लोगों की जन्म कुंडलियां इकट्ठा करनी शुरू कीं और उनका अध्ययन करने लगे। इनमें कुछ कुंडलियां जुड़वां व्यक्तियों की भी थीं। जन्म समय में बहुत कम अंतर होने के बावजूद उनके कार्य और जीवन में काफी अंतर था, जिससे उनकी जिज्ञासा और बढ़ गई।
वे ये कुंडलियां अपने उन मित्रों के पास लेकर गए जो पाश्चात्य ज्योतिष पद्धति का अध्ययन करते थे।
मित्रों के साथ अध्ययन करते समय उन्हें पता चला कि इन जुड़वां व्यक्तियों की कुंडलियों में भावारंभ (cusp) और ग्रहों की स्थिति में अंतर है। इसी कारण, एक ही स्थान पर काम करने के बावजूद उनके कार्य का स्वरूप और स्तर अलग था। उन्होंने इसे “नक्षत्र ज्योतिष” (Stellar Astrology) नाम दिया।
सन् 1951 में उन्होंने मद्रास में इस पद्धति के अनुसंधान के लिए एक संस्था की स्थापना की और कई युवाओं व विद्यार्थियों को इसमें शोध के लिए प्रेरित किया।
11 सितंबर 1961 को उन्होंने स्वेच्छा से नौकरी छोड़ दी और अपना शेष जीवन ज्योतिष के प्रचार-प्रसार के लिए समर्पित कर दिया। इसके लिए मार्च 1963 से उन्होंने “Astrology and Athrishta” नामक पत्रिका शुरू की।
उन्होंने अपनी इस पद्धति को सीखने के इच्छुक लोगों को मद्रास के मायलापुर स्थित पी. एस. हाई स्कूल और ट्रिप्लिकेन में निःशुल्क पढ़ाना शुरू किया।
इसके साथ ही वे वैदिक और पाश्चात्य ज्योतिष का अध्ययन भी करते रहे।
अध्ययन के दौरान उन्होंने पाया कि प्राचीन भारतीय ग्रंथों में बताए गए कुछ योगों के आधार पर किए गए भविष्यवाणी हमेशा सही नहीं होती, और केवल दशा व ग्रहों के राश्यंतरण के आधार पर किए गए अनुमान भी कई बार गलत साबित होते हैं।
इससे प्रेरित होकर उन्होंने और गहन शोध किया। उन्हें पारंपरिक ज्योतिष में कई सीमाएं और त्रुटियां दिखाई दीं। उन्होंने देखा कि जिन लोगों की कुंडली में राजयोग है, वे भी साधारण या संघर्षपूर्ण जीवन जी रहे हैं।
उन्हें पाश्चात्य ज्योतिष की सीमाएं भी समझ में आईं।
उन्होंने वैदिक, पाश्चात्य ज्योतिष, ब्लैक मैजिक और शकुन शास्त्र का भी गहन अध्ययन किया।
लंबे शोध के बाद उन्होंने “Advanced Stellar Astrology” अर्थात प्रसिद्ध कृष्णमूर्ति ज्योतिष पद्धति विकसित की, जो अधिक सटीक और स्पष्ट मानी जाती है।
इस पद्धति में मुख्य अंतर यह है कि पारंपरिक ज्योतिष में ग्रहों के गुणों को अधिक महत्व दिया जाता है, जबकि इस पद्धति में ग्रह जिस भाव, नक्षत्र और उप-नक्षत्र में स्थित होता है, उसके आधार पर फल निर्धारित होता है।
उप-नक्षत्र स्वामी की अवधारणा कृष्णमूर्ति जी का एक अत्यंत महत्वपूर्ण योगदान है। पारंपरिक ज्योतिष में प्रत्येक राशि में नक्षत्रों के नौ चरण होते हैं, जबकि कृष्णमूर्ति पद्धति में प्रत्येक नक्षत्र को आगे नौ भागों में विभाजित किया गया है, जो ग्रहों की महादशा के वर्षों के अनुपात में होते हैं। इन्हें उप-नक्षत्र कहा जाता है।
इन उप-नक्षत्रों को आगे और नौ भागों में बांटने पर उन्हें उप-उप नक्षत्र कहा जाता है।
कृष्णमूर्ति जी द्वारा लिखे गए छह “Readers” के माध्यम से आज भी इस पद्धति को सीखा जा सकता है।
एक और बड़ा बदलाव उन्होंने भावारंभ (cusp) पद्धति को अपनाकर किया, जबकि पहले पारंपरिक ज्योतिष में भावमध्य पद्धति का उपयोग होता था।
इस पद्धति से कई लोग आकर्षित हुए। कृष्णमूर्ति जी को लगा कि इसका व्यापक प्रचार होना चाहिए, इसलिए उन्होंने पूरे भारत में व्याख्यान देने शुरू किए। कुछ वैज्ञानिक दृष्टिकोण रखने वाले लोगों ने इसका विरोध भी किया और कई वाद-विवाद हुए।
उन्होंने केवल भारत ही नहीं, बल्कि श्रीलंका और सिंगापुर में भी अपनी “Stellar Astrological Research” संस्था की शाखाएं स्थापित कीं और इस पद्धति का प्रचार किया।
उनके इस कार्य के लिए उन्हें कई पुरस्कार और सम्मान प्राप्त हुए।
के. एस. कृष्णमूर्ति को प्राप्त प्रमुख सम्मान:
उनके कार्य से प्रभावित होकर डॉ. के. एस. मुंशी ने भारतीय विद्या भवन में ज्योतिष विषय के लिए एक विशेष पद स्थापित किया। वहीं 1964 में महाराष्ट्र के राज्यपाल पी. वी. चेरियन ने उन्हें “ज्योतिष मार्तंड” की उपाधि से सम्मानित किया।
1970 में उन्होंने मलेशिया का दौरा किया, जहां दूरदर्शन पर उनका साक्षात्कार प्रसारित हुआ। 29 जून 1970 को उन्हें “ज्योतिषराज” (Sothida Mannan) की उपाधि Malay Astrological Society द्वारा दी गई और एक स्वर्ण पदक भी प्रदान किया गया।
श्रीलंका में उन्हें “नए वराहमिहिर” के रूप में सम्मानित किया गया।
उन्होंने अपने शोध को छह खंडों में पुस्तक के रूप में प्रकाशित किया।
29 मार्च 1972 को रात 2 बजे उनका निधन हो गया।
ऐसे महान ज्योतिष शोधकर्ता को उनकी पुण्यतिथि पर विनम्र श्रद्धांजलि।