
आय, लाभ, संपत्ति, वित्त और आर्थिक सामर्थ्य का शास्त्रीय विवेचन
१. धन का आधार – द्वितीय और एकादश भाव
वैदिक ज्योतिष में यह मान्यता है कि धन केवल एक ग्रह का विषय नहीं, बल्कि अनेक ग्रह विभिन्न रूपों में आर्थिक स्थिति का निर्माण करते हैं।
फिर भी कुंडली में दो भाव अत्यंत मूलभूत माने गए हैं:
द्वितीय भाव (धन-संचय एवं पारिवारिक संपत्ति)
जन्म से मिली आर्थिक परिस्थिति
परिवार की आर्थिक पृष्ठभूमि
वाणी, मूल्यबोध एवं संचित धन
एकादश भाव (आय, लाभ एवं आर्थिक उपलब्धियाँ)
परिश्रम से अर्जित धन
लाभकारी परिस्थितियाँ
आय के विविध स्रोत
इन दोनों भावों के स्वामी ग्रह तथा इन पर स्थित ग्रह ही धन-निर्माण की वास्तविक तस्वीर प्रस्तुत करते हैं।
२. कालपुरुष कुंडली के अनुसार धन-सूचक ग्रह
(१) शुक्र – पारिवारिक धन और उपार्जन की समृद्धि
शुक्र द्वितीय भाव का नैसर्गिक स्वामी होने से बचपन में प्राप्त आर्थिक सुविधा को दर्शाता है।
व्यापार, साझेदारी तथा व्यावसायिक आय में भी शुक्र की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है।
(२) शनि – श्रम-आधारित धन और दीर्घकालिक आय
शनि एकादश भाव का नैसर्गिक स्वामी है, अतः कठोर श्रम, नौकरी तथा कर्मयोग से प्राप्त धन शनि दर्शाता है।
स्थायी एवं क्रमशः बढ़ने वाली आय शनि की देन है।
(३) बुध – व्यापार, लेन-देन और आर्थिक कौशल
व्यापार बुद्धि, लेखा-जोखा, गणना, वाणिज्य और सौदों से प्राप्त धन बुध से देखा जाता है।
चतुराई, संचार कौशल और बुद्धि-आधारित आय बुध की विरक्ति है।
(४) बृहस्पति – सुरक्षित धन, बचत और बैंक-बैलेंस
गुरु स्थायी पूँजी, बचत, बैंक में जमा धन, निवेश एवं दीर्घकालिक सुरक्षित राशि का कारक है।
(५) चन्द्रमा – दैनंदिन वित्तीय प्रवाह
हाथ में उपलब्ध धन, दैनिक आय-व्यय, नकद प्रवाह तथा भावनात्मक वित्तीय आदतें चन्द्रमा के अधीन हैं।
(६) सूर्य – सरकारी लाभ और स्वर्ण-समृद्धि
सरकार से प्राप्त धन, पद-प्रतिष्ठा आधारित कमाई तथा सोने से संबंधित लाभ सूर्य दर्शाता है।
(७) मंगल – भूमि एवं स्थावर संपत्ति का धन
मंगल भूमि, भवन, वाहन, कृषि-भूमि, प्लॉट आदि स्थावर संपत्ति से प्राप्त लाभ का कारक ग्रह है।
(८) राहु – आकस्मिक लाभ एवं जोखिम-जनित धन
अचानक प्राप्त धन, विदेशी माध्यमों से लाभ, सट्टा-लॉटरी, जुआ तथा जोखिम-पूर्ण आय राहु से देखी जाती है।
(९) केतु – अप्रत्याशित व्यय और सूक्ष्म आर्थिक हानि
केतु अचानक होने वाले खर्च, आध्यात्मिक व्यय तथा अदृश्य कारणों से होने वाली आर्थिक हानि का सूचक है।
३. धन का संपूर्ण विश्लेषण कैसे किया जाता है?
धन केवल “राशि” नहीं—
बल्कि उसकी प्रकृति, स्रोत, स्थिरता, प्रवाह, संपत्ति-रूप, भाग्य-निर्भरता और जोखिम-स्तर अलग-अलग ग्रहों से पता चलता है।
इसलिए आर्थिक स्थिति जानने के लिए देखना आवश्यक है:
ग्रहों की शक्ति (बल/नीच/उच्च)
दृष्टि, योग तथा संयोग
भावों का बल
दशा-भुक्ति और गोचर
उपचय भावों का प्रभाव
यदि कोई ग्रह दुर्बल हो तो —
रत्नों द्वारा बल, मंत्र-साधना, दान, उपवास एवं शांति-उपाय से आर्थिक स्थिति सुधारी जा सकती है।
किन ग्रहों पर उपाय करने हों, यह कुंडली देखकर ही निश्चित होता है।