
ज्योतिष शास्त्र में नौवां भाव भाग्य का स्थान माना जाता है। किसी भी व्यक्ति का भाग्योदय कब और कैसे होगा, यह मुख्य रूप से कुंडली के नौवें भाव, उसके स्वामी (#भाग्येश) और उस पर पड़ने वाले ग्रहों के प्रभाव पर निर्भर करता है।
यहाँ विस्तार से समझिये कि भाग्योदय का आकलन कैसे किया जाता है:
भाग्योदय के समय को जानने के मुख्य रूप से तीन तरीके हैं:
क) ग्रहों की आयु के अनुसार
ज्योतिष के अनुसार हर ग्रह की एक निश्चित आयु होती है जिसमें वह अपना पूर्ण फल देता है। यदि आपका भाग्येश (9वें घर का स्वामी) बलवान है, तो उस ग्रह की निर्धारित आयु में भाग्योदय होता है:
बृहस्पति (Guru): 16, 22 या 24 वर्ष की आयु में।
सूर्य (Surya): 22 वर्ष की आयु में।
चंद्रमा (Chandra): 24 वर्ष की आयु में।
शुक्र (Shukra): 25 वर्ष की आयु में।
मंगल (Mangal): 28 वर्ष की आयु में।
बुध (Budh): 32 वर्ष की आयु में।
शनि (Shani): 36 वर्ष की आयु में।
राहु/केतु: 42 या 48 वर्ष की आयु में।
ख) दशा और अंतर्दशा
जब कुंडली में भाग्येश (9th Lord), #धनेश (2nd Lord) या #लाभेश (11th Lord) की महादशा या अंतर्दशा आती है, तो वह समय भाग्योदय का होता है।
ग) गोचर (Transits)
जब गोचर में बृहस्पति (Jupiter) आपकी कुंडली के नौवें भाव, लग्न भाव या चंद्रमा के ऊपर से निकलता है, तो वह समय उन्नति के द्वार खोलता है।
यह इस पर निर्भर करता है कि आपका भाग्येश (9th Lord) किस भाव में बैठा है:
यदि भाग्येश लग्न (1st House) में है: व्यक्ति अपने स्वयं के प्रयासों और व्यक्तित्व से भाग्य बनाता है।
यदि भाग्येश चतुर्थ भाव (4th House) में है: भाग्योदय जन्मभूमि, माता या पैतृक संपत्ति के माध्यम से होता है।
यदि भाग्येश सप्तम भाव (7th House) में है: विवाह के पश्चात या जीवनसाथी के आने से भाग्य चमकता है।
यदि भाग्येश दशम भाव (10th House) में है: करियर, नौकरी या राजनीति में सफलता के साथ भाग्योदय होता है।
उदाहरण 1: विवाह के बाद भाग्योदय
मान लीजिए किसी व्यक्ति की मेष लग्न की कुंडली है। मेष लग्न में नौवें भाव का स्वामी बृहस्पति होता है। यदि बृहस्पति सातवें भाव (विवाह भाव) में स्थित है, तो ऐसे व्यक्ति का भाग्योदय अक्सर विवाह के बाद होता है। पत्नी/पति के आने से उनके जीवन में आर्थिक और सामाजिक उन्नति आती है।
उदाहरण 2: संघर्ष के बाद देरी से सफलता
यदि किसी की कुंडली में शनि भाग्येश होकर नौवें भाव में बैठा है, तो ऐसा व्यक्ति शुरुआती जीवन में बहुत संघर्ष करता है। शनि “धीमे” फल देने वाला ग्रह है, इसलिए ऐसे व्यक्ति का वास्तविक भाग्योदय 36 वर्ष की आयु के बाद होता है, लेकिन यह सफलता स्थायी होती है।
उदाहरण 3: विदेश या घर से दूर सफलता
यदि भाग्येश बारहवें भाव (12th House) में बैठा हो, तो व्यक्ति का भाग्योदय अपनी जन्मभूमि से दूर या विदेश जाने पर होता है। घर पर रहने तक उसे संघर्ष करना पड़ सकता है।
भाग्योदय को मजबूत करने के कुछ सरल उपाय
यदि आपका भाग्य साथ नहीं दे रहा है, तो ये उपाय सहायक हो सकते हैं:
भाग्येश का रत्न: अपनी कुंडली के अनुसार भाग्येश ग्रह का रत्न धारण करें (विशेषज्ञ की सलाह पर)।
बड़ों का आशीर्वाद: नौवां भाव ‘धर्म’ और ‘गुरु’ का भी है, इसलिए माता-पिता और गुरुजनों का सम्मान करने से भाग्य जागृत होता है।
इष्ट देव की पूजा: अपने नौवें भाव के स्वामी के अनुसार देवता की उपासना करें।