
हर एक ग्रह की अपनी उच्च राशि होती है साथ ही कुंडली मे कई ग्रह उच्च हो सकते है।अब बात महत्वपूर्ण यह है उच्च होने पर ग्रह कैसे फल देता है और जीवन को प्रभावित करता है।किसी भी ग्रह का उच्च होने का मतलब है कि उच्च होने पर ग्रह बहुत ज्यादा बलवान है लेकिन उच्च ग्रह के भी एक निश्चित अंश होते है उसी अनुसार ग्रह उच्च रहता है जैसे;- शनि तुला राशि पर उच्च होता है लेकिन यह केवल तुला राशि पर 20अंश होने पर ही उच्च होगा जैसे ही 20अंश से ऊपर चला जायेगा यह तुला उच्च पर होने पर भी उच्च नही रहेगा इसी तरह अन्य ग्रह भी एक निश्चित अंश तक उच्च होते है अपनी उच्च राशि पर।।
कई जातको में इस बात की जानकारी न होने से यह भ्रम है कि मेरे 3 ग्रह उच्च है या यह ग्रह उच्च है तो यह मेरे बहुत अच्छी स्थिति में है ऐसा हमेशा नही होना।किसी भी ग्रह या ग्रहो का उच्च होना केवल उस ग्रह को बल को बताता है शुभता-शुभता नही, ग्रह शुभ है या अशुभ यह ग्रह की परिस्थिति और भाव स्थिति(placement) पर निर्भर करता है।जैसे।
उदाहरण_अनुसार1:-
मीन लग्न में सूर्य छठे भाव का स्वामी बनता है छठा भाव जो कि कर्ज, रोग, धनः हानि आदि का है सूर्य हमे पता है मेष राशि पर उच्च होता है मीन लग्न में छठे भाव के स्वामी सूर्य की उच्च राशि दूसरे भाव(धन भाव) मे होगी मतलब सूर्य षष्ठेश होकर धन भाव मे उच्च होगा जो कि सबसे ज्यादा अशुभ स्थिति है क्योंकि सूर्य अशुभ भावपति होकर धन के घर मे बलवान होकर बेठा है तो यह यहाँ धन का नुकसान देगा क्योंकि अशुभ भावपति है।अब यहा सूर्य के धनः भाव मे उच्च होने से कोई खास लाभ नही।।
उदाहरण_अनुसार2:-
धनु लग्न में बृहस्पति लग्नेश और चतुर्थेश होने से बेहद शुभ है लेकिन धनु लग्न में बृहस्पति की उच्च राशि कर्क आठवें भाव मे होती है यदि बृहस्पति उच्च होगा तो 8वे भाव मे होगा लग्नेश होकर आठवे भाव मे उच्च होना सबसे ज्यादा ऐसे जातक के लिए अशुभ स्थिति है ऐसे उच्च बृहस्पति या ऐसी स्थिति के किसी भी उच्च ग्रह का कोई फायदा नही।।
अब दूसरी तरह इसी धनु लग्न में चन्द्रमा चन्द्रमा को देखे तो आठवे भाव(अशुभ भाव स्वामी) होकर यह अशुभ भाव छठे भाव मे ही उच्च होगा क्योंकि धनु लग्न में चन्द्र की उच्च राशि छ्ठे भाव मे पड़ती है तब यह स्थिति चन्द्र की उच्च होना सबसे ज्यादा शानदार और शुभ फल देने वाली स्थिति है क्योंकि चन्द्र उच्च भी हो गया साथ ही अशुभ भाव पति होकर अशुभ भाव मे ही है मतलब (placement) ठीक होने से शुभ भी हो गया तब ऐसे उच्च ग्रह के फल अच्छे होंगे।।
उच्चग्रह_शानदार_फल_कब_देते_है। जब कोई भी उच्च ग्रह अनुकूल भाव पति होकर अपने अनुकूल भाव मे बेठा होगा तब उच्च होने पर बहुत शुभ फल देगा चाहे वह अशुभ भावपति होकर अशुभ भाव मे उच्च हो या शुभ भाव पति होकर शुभ भाव मे उच्च हो, लेकिन उच्च होकर यदि उसकी प्लेसमेंट ठीक नही है जैसे ऊपर के उदाहरणों में बताया है तब दिक्कत देगा उच्च ग्रह भी और उसकी दशा में सबसे ज्यादा दिक्कते होगी।।
जैसे;- कर्क लग्न में मंगल दो शुभ भाव पंचम और दशम भाव का स्वामी होता है अब मंगल कर्क लग्न में सप्तम भाव केंद्र भाव(शुभ भाव मे) उच्च होगा मकर राशि मे इस कारण ऐसा उच्च ग्रह बेहद शानदार फल देगा क्योंकि शुभ भावपति है साथ शुभ भाव(केंद्र भाव) मे उच्च हुआ है।। अब मंगल की ग्रह दशा जब भी आएगी बहुत बढ़िया फल विशेष रूप से देगी और अन्य समय मे भी अच्छे फल ऐसे उच्च ग्रह के मिलेंगे, लेकिन जब कोई ग्रह या कई ग्रह उच्च होकर बैठे हो लेकिन उनकी भाव स्थिति ठीक नही है तब ऐसे उच्च ग्रहो के फल दिक्कत-परेशानियां देगे और ऐसे उच्च ग्रह की महादशाएं-अन्तरदशाये व अन्य दशाओ में दिक्कते काफी रहेगी।इस तरह कोई भी ग्रह उच्च है इसका अर्थ केवल इतना कि वह बलवान है लेकिन यदि उच्च होकर प्लेसमेंट भी अच्छी हो तब सोने पर सुहागा जैसे फल होंगे।।
नीचे तुला_लग्न कुंडली अनुसार, मंगल गुरु दोनो उच्च राशी के है लेकिन इसमें मंगल उच्च अच्छा है जबकि उच्च गुरु की स्थिति खास ठीक नही है क्योंकि मंगल धनेश और सप्तमेश होकर केंद्र में उच्च होकर बैठने से पूर्ण बलवान भी है और प्लेसमेंट भी अच्छी है यह मंगल के फल बहुत अच्छे होंगे,साथ ही मंगल की दशा भी।और गुरु तृतीयेश और षष्ठेश अशुभ भावपति होकर व अकारक होकर केंद्र दशम भाव मे उच्च है यह गुरु उच्च होकर भी किसी तरह अच्छे फल देने की स्थिति में नही है और न कुछ खास विशेष फल देगा क्योंकि उच्च होकर बलवान जरूर है उच्च भी है लेकिन भाव स्थिति नही है।