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तृतीय भाव में शुक्र: क्यों इसे हमेशा शुभ नहीं माना जाता?

ज्योतिष शास्त्र में तृतीय भाव (पराक्रम, साहस, प्रयास, छोटे भाई-बहन, संचार और कामेच्छा का भाव) माना जाता है। जबकि शुक्र (भोग, प्रेम, सौंदर्य, स्त्री, विलास और सुख) का कारक ग्रह है।

इसी कारण कई शास्त्रों में कहा गया है कि तृतीय भाव में शुक्र हमेशा शुभ नहीं माना जाता, विशेषकर जब वह पाप प्रभाव में हो।

 

नीचे इसका शास्त्रीय कारण समझिए —

 

 उपचय भाव में भोग ग्रह

तृतीय भाव उपचय भाव (3,6,10,11) है। यहाँ पर क्रूर या पाप ग्रह अच्छे फल देते हैं, क्योंकि यह संघर्ष और पराक्रम का भाव है।

लेकिन शुक्र स्वभाव से सौम्य और भोगप्रधान ग्रह है, इसलिए यहाँ उसका स्वभाव कमजोर पड़ जाता है।

 

 कामेच्छा की अधिकता

तृतीय भाव को काम प्रेरणा और इंद्रिय सुख का भी सूचक माना गया है।

जब यहाँ शुक्र बैठता है तो व्यक्ति में

  • अत्यधिक कामुकता
  • विवाहेतर आकर्षण
  • प्रेम संबंधों में अस्थिरता

जैसी प्रवृत्तियाँ बढ़ सकती हैं।

 

 वैवाहिक सुख में कमी

तृतीय भाव, सप्तम भाव (विवाह) से नवम स्थान होता है, जो भाग्य तो देता है लेकिन यहाँ शुक्र होने पर

  • पत्नी से दूरी
  • दांपत्य में रोमांस की कमी
  • अलग-अलग आकर्षण

देखे जाते हैं।

 

 छोटे भाई-बहनों से संबंध

शुक्र यहाँ होने पर कई बार

  • भाई-बहनों के कारण खर्च
  • उनके कारण प्रेम या प्रतिष्ठा में समस्या

हो सकती है।

 

 प्रयास में विलासिता

तृतीय भाव परिश्रम और संघर्ष का है।

लेकिन शुक्र व्यक्ति को आराम और विलासिता की ओर ले जाता है, इसलिए

  • मेहनत में कमी
  • कला या मनोरंजन में ज्यादा रुचि

देखी जाती है।

 

 गुप्त प्रेम संबंध

शास्त्रों के अनुसार तृतीय भाव गुप्त संपर्क और संदेशों का भी भाव है।

इसलिए यहाँ शुक्र होने पर

  • छुपे प्रेम संबंध
  • संदेशों या सोशल संपर्क से प्रेम

ज्यादा बनते हैं।

 

लेकिन यह हमेशा खराब नहीं होता, अगर:

  • शुक्र स्व राशि (वृष / तुला) में हो
  • उच्च (मीन) में हो
  • गुरु की दृष्टि हो

तो यह व्यक्ति को

  • कलाकार
  • लेखक
  • संगीतकार
  • मीडिया या कला क्षेत्र में सफल भी बना सकता है।

ज्योतिष शास्त्र में तृतीय भाव (पराक्रम, साहस, प्रयास, छोटे भाई-बहन, संचार और कामेच्छा का भाव) माना जाता है। जबकि शुक्र (भोग, प्रेम, सौंदर्य, स्त्री, विलास और सुख) का कारक ग्रह है।

इसी कारण कई शास्त्रों में कहा गया है कि तृतीय भाव में शुक्र हमेशा शुभ नहीं माना जाता, विशेषकर जब वह पाप प्रभाव में हो।

 

नीचे इसका शास्त्रीय कारण समझिए —

 

 उपचय भाव में भोग ग्रह

तृतीय भाव उपचय भाव (3,6,10,11) है। यहाँ पर क्रूर या पाप ग्रह अच्छे फल देते हैं, क्योंकि यह संघर्ष और पराक्रम का भाव है।

लेकिन शुक्र स्वभाव से सौम्य और भोगप्रधान ग्रह है, इसलिए यहाँ उसका स्वभाव कमजोर पड़ जाता है।

 

 कामेच्छा की अधिकता

तृतीय भाव को काम प्रेरणा और इंद्रिय सुख का भी सूचक माना गया है।

जब यहाँ शुक्र बैठता है तो व्यक्ति में

  • अत्यधिक कामुकता
  • विवाहेतर आकर्षण
  • प्रेम संबंधों में अस्थिरता

जैसी प्रवृत्तियाँ बढ़ सकती हैं।

 

 वैवाहिक सुख में कमी

तृतीय भाव, सप्तम भाव (विवाह) से नवम स्थान होता है, जो भाग्य तो देता है लेकिन यहाँ शुक्र होने पर

  • पत्नी से दूरी
  • दांपत्य में रोमांस की कमी
  • अलग-अलग आकर्षण

देखे जाते हैं।

 

 छोटे भाई-बहनों से संबंध

शुक्र यहाँ होने पर कई बार

  • भाई-बहनों के कारण खर्च
  • उनके कारण प्रेम या प्रतिष्ठा में समस्या

हो सकती है।

 

 प्रयास में विलासिता

तृतीय भाव परिश्रम और संघर्ष का है।

लेकिन शुक्र व्यक्ति को आराम और विलासिता की ओर ले जाता है, इसलिए

  • मेहनत में कमी
  • कला या मनोरंजन में ज्यादा रुचि

देखी जाती है।

 

 गुप्त प्रेम संबंध

शास्त्रों के अनुसार तृतीय भाव गुप्त संपर्क और संदेशों का भी भाव है।

इसलिए यहाँ शुक्र होने पर

  • छुपे प्रेम संबंध
  • संदेशों या सोशल संपर्क से प्रेम

ज्यादा बनते हैं।

 

 लेकिन यह हमेशा खराब नहीं होता, अगर:

  • शुक्र स्व राशि (वृष / तुला) में हो
  • उच्च (मीन) में हो
  • गुरु की दृष्टि हो

तो यह व्यक्ति को

  • कलाकार
  • लेखक
  • संगीतकार
  • मीडिया या कला क्षेत्र में सफल भी बना सकता है।

ज्योतिष शास्त्र में तृतीय भाव (पराक्रम, साहस, प्रयास, छोटे भाई-बहन, संचार और कामेच्छा का भाव) माना जाता है। जबकि शुक्र (भोग, प्रेम, सौंदर्य, स्त्री, विलास और सुख) का कारक ग्रह है।

इसी कारण कई शास्त्रों में कहा गया है कि तृतीय भाव में शुक्र हमेशा शुभ नहीं माना जाता, विशेषकर जब वह पाप प्रभाव में हो।

 

नीचे इसका शास्त्रीय कारण समझिए —

 

 उपचय भाव में भोग ग्रह

तृतीय भाव उपचय भाव (3,6,10,11) है। यहाँ पर क्रूर या पाप ग्रह अच्छे फल देते हैं, क्योंकि यह संघर्ष और पराक्रम का भाव है।

लेकिन शुक्र स्वभाव से सौम्य और भोगप्रधान ग्रह है, इसलिए यहाँ उसका स्वभाव कमजोर पड़ जाता है।

 

 कामेच्छा की अधिकता

तृतीय भाव को काम प्रेरणा और इंद्रिय सुख का भी सूचक माना गया है।

जब यहाँ शुक्र बैठता है तो व्यक्ति में

  • अत्यधिक कामुकता
  • विवाहेतर आकर्षण
  • प्रेम संबंधों में अस्थिरता

जैसी प्रवृत्तियाँ बढ़ सकती हैं।

 

 वैवाहिक सुख में कमी

तृतीय भाव, सप्तम भाव (विवाह) से नवम स्थान होता है, जो भाग्य तो देता है लेकिन यहाँ शुक्र होने पर

  • पत्नी से दूरी
  • दांपत्य में रोमांस की कमी
  • अलग-अलग आकर्षण

देखे जाते हैं।

 

 छोटे भाई-बहनों से संबंध

शुक्र यहाँ होने पर कई बार

  • भाई-बहनों के कारण खर्च
  • उनके कारण प्रेम या प्रतिष्ठा में समस्या

हो सकती है।

 

 प्रयास में विलासिता

तृतीय भाव परिश्रम और संघर्ष का है।

लेकिन शुक्र व्यक्ति को आराम और विलासिता की ओर ले जाता है, इसलिए

  • मेहनत में कमी
  • कला या मनोरंजन में ज्यादा रुचि

देखी जाती है।

 

गुप्त प्रेम संबंध

शास्त्रों के अनुसार तृतीय भाव गुप्त संपर्क और संदेशों का भी भाव है।

इसलिए यहाँ शुक्र होने पर

  • छुपे प्रेम संबंध
  • संदेशों या सोशल संपर्क से प्रेम

ज्यादा बनते हैं।

 

 लेकिन यह हमेशा खराब नहीं होता, अगर:

  • शुक्र स्व राशि (वृष / तुला) में हो
  • उच्च (मीन) में हो
  • गुरु की दृष्टि हो

तो यह व्यक्ति को

  • कलाकार
  • लेखक
  • संगीतकार
  • मीडिया या कला क्षेत्र में सफल भी बना सकता है। ज्योतिष शास्त्र में तृतीय भाव (पराक्रम, साहस, प्रयास, छोटे भाई-बहन, संचार और कामेच्छा का भाव) माना जाता है। जबकि शुक्र (भोग, प्रेम, सौंदर्य, स्त्री, विलास और सुख) का कारक ग्रह है।

इसी कारण कई शास्त्रों में कहा गया है कि तृतीय भाव में शुक्र हमेशा शुभ नहीं माना जाता, विशेषकर जब वह पाप प्रभाव में हो।

 

नीचे इसका शास्त्रीय कारण समझिए —

 

 उपचय भाव में भोग ग्रह

तृतीय भाव उपचय भाव (3,6,10,11) है। यहाँ पर क्रूर या पाप ग्रह अच्छे फल देते हैं, क्योंकि यह संघर्ष और पराक्रम का भाव है।

लेकिन शुक्र स्वभाव से सौम्य और भोगप्रधान ग्रह है, इसलिए यहाँ उसका स्वभाव कमजोर पड़ जाता है।

 

 कामेच्छा की अधिकता

तृतीय भाव को काम प्रेरणा और इंद्रिय सुख का भी सूचक माना गया है।

जब यहाँ शुक्र बैठता है तो व्यक्ति में

  • अत्यधिक कामुकता
  • विवाहेतर आकर्षण
  • प्रेम संबंधों में अस्थिरता

जैसी प्रवृत्तियाँ बढ़ सकती हैं।

 

 वैवाहिक सुख में कमी

तृतीय भाव, सप्तम भाव (विवाह) से नवम स्थान होता है, जो भाग्य तो देता है लेकिन यहाँ शुक्र होने पर

  • पत्नी से दूरी
  • दांपत्य में रोमांस की कमी
  • अलग-अलग आकर्षण

देखे जाते हैं।

 

 छोटे भाई-बहनों से संबंध

शुक्र यहाँ होने पर कई बार

  • भाई-बहनों के कारण खर्च
  • उनके कारण प्रेम या प्रतिष्ठा में समस्या

हो सकती है।

 

 प्रयास में विलासिता

तृतीय भाव परिश्रम और संघर्ष का है।

लेकिन शुक्र व्यक्ति को आराम और विलासिता की ओर ले जाता है, इसलिए

  • मेहनत में कमी
  • कला या मनोरंजन में ज्यादा रुचि

देखी जाती है।

 

 गुप्त प्रेम संबंध

शास्त्रों के अनुसार तृतीय भाव गुप्त संपर्क और संदेशों का भी भाव है।

इसलिए यहाँ शुक्र होने पर

  • छुपे प्रेम संबंध
  • संदेशों या सोशल संपर्क से प्रेम

ज्यादा बनते हैं।

लेकिन यह हमेशा खराब नहीं होता, अगर:

  • शुक्र स्व राशि (वृष / तुला) में हो
  • उच्च (मीन) में हो
  • गुरु की दृष्टि हो

तो यह व्यक्ति को

  • कलाकार
  • लेखक
  • संगीतकार
  • मीडिया या कला क्षेत्र में सफल भी बना सकता है।

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