
भारत की धरती वीरों और बलिदानियों की धरती रही है। इस पावन भूमि पर ऐसे अनेक महापुरुष और वीर बालक जन्मे, जिन्होंने बहुत कम आयु में भी असाधारण साहस, अटूट श्रद्धा और अदम्य आत्मबल का परिचय दिया। इन्हीं अमर बाल वीरों की स्मृति में भारत सरकार द्वारा 26 दिसंबर को वीर बाल दिवस मनाया जाता है। यह दिवस विशेष रूप से दसवें सिख गुरु, श्री गुरु गोबिंद सिंह जी महाराज के छोटे साहिबजादों — साहिबजादा बाबा जोरावर सिंह जी (9 वर्ष) और साहिबजादा बाबा फतेह सिंह जी (7 वर्ष) — के अद्वितीय बलिदान को समर्पित है।
वीर बाल दिवस की पृष्ठभूमि
वीर बाल दिवस की घोषणा भारत के प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी द्वारा वर्ष 2022 में की गई। इसका उद्देश्य देश के बच्चों और युवाओं को भारतीय इतिहास के उन अध्यायों से परिचित कराना है, जिनमें बाल अवस्था में भी धर्म, सत्य और आत्मसम्मान के लिए सर्वोच्च बलिदान दिए गए। 26 दिसंबर का दिन इसलिए चुना गया क्योंकि इसी दिन सन् 1705 में साहिबजादों को मुग़ल शासक औरंगज़ेब के आदेश पर जिंदा दीवार में चुनवा दिया गया था।
साहिबजादों का अद्वितीय बलिदान
गुरु गोबिंद सिंह जी महाराज के चार पुत्र थे — बड़े साहिबजादे बाबा अजीत सिंह जी और बाबा जुझार सिंह जी चमकौर के युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुए, जबकि छोटे साहिबजादे बाबा जोरावर सिंह जी और बाबा फतेह सिंह जी ने सरहिंद में अमानवीय अत्याचारों का सामना किया।
मुग़ल अधिकारियों ने दोनों बालकों को इस्लाम धर्म स्वीकार करने का प्रलोभन दिया। कहा गया कि यदि वे अपना धर्म छोड़ दें तो उन्हें ऐशो-आराम, ऊँचा पद और जीवनदान दिया जाएगा। किंतु मात्र 7 और 9 वर्ष की आयु में इन बालकों ने जो उत्तर दिया, वह आज भी सम्पूर्ण मानवता को प्रेरणा देता है। उन्होंने स्पष्ट कहा कि वे धर्म परिवर्तन नहीं करेंगे, चाहे इसके लिए उन्हें प्राण ही क्यों न देने पड़ें।
अंततः उन्हें ठंडे मौसम में दीवार में जिंदा चुनवा दिया गया। यह इतिहास का ऐसा क्रूर अध्याय है जो आज भी आँखें नम कर देता है, किंतु साथ ही आत्मबल और साहस से हृदय को गर्व से भर देता है।
मातृ शक्ति और दादी माँ का योगदान
इस बलिदान में माता गुजरी जी, साहिबजादों की दादी, का योगदान भी अविस्मरणीय है। उन्होंने ही अपने पोतों को धर्म, साहस और आत्मसम्मान की शिक्षा दी थी। सरहिंद की ठंडी बुर्ज में कैद रहते हुए भी उन्होंने बच्चों का मनोबल टूटने नहीं दिया। अंततः साहिबजादों के बलिदान का समाचार सुनकर माता गुजरी जी ने भी उसी बुर्ज में अपने प्राण त्याग दिए।
वीर बाल दिवस का उद्देश्य
वीर बाल दिवस केवल एक स्मृति दिवस नहीं है, बल्कि यह चरित्र निर्माण और राष्ट्रीय चेतना का पर्व है। इसके प्रमुख उद्देश्य हैं:
आज के समय में वीर बाल दिवस का महत्व
आज के भौतिकवादी और सुविधा-प्रधान युग में, जहाँ बच्चे छोटी-छोटी असुविधाओं से भी घबरा जाते हैं, वीर बाल दिवस हमें त्याग और आत्मबल का वास्तविक अर्थ सिखाता है। साहिबजादों का जीवन यह संदेश देता है कि सिद्धांतों से बड़ा कोई सुख नहीं और स्वाभिमान से बढ़कर कोई धन नहीं।
यह दिवस यह भी सिखाता है कि बच्चों को केवल किताबी ज्ञान ही नहीं, बल्कि संस्कार, इतिहास और आत्मसम्मान की शिक्षा देना भी उतना ही आवश्यक है।
विद्यालयों और समाज में आयोजन
वीर बाल दिवस के अवसर पर देशभर में विद्यालयों, गुरुद्वारों और सामाजिक संस्थानों में विभिन्न कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं, जैसे:
इन आयोजनों से बच्चों में न केवल ज्ञान बढ़ता है, बल्कि वे अपने इतिहास पर गर्व करना भी सीखते हैं।
वीर बाल दिवस से मिलने वाली प्रेरणा
साहिबजादों का बलिदान हमें यह सिखाता है कि:
उपसंहार
वीर बाल दिवस भारत के इतिहास का एक गौरवशाली अध्याय है, जो आने वाली पीढ़ियों को सदैव प्रेरणा देता रहेगा। यह दिवस हमें याद दिलाता है कि हमारे देश की स्वतंत्रता, संस्कृति और धर्म की रक्षा केवल वयस्कों ने ही नहीं, बल्कि नन्हे बाल वीरों ने भी अपने प्राणों की आहुति देकर की है।
आज आवश्यकता है कि हम वीर बाल दिवस को केवल एक औपचारिक दिवस न मानकर, इसे जीवन मूल्यों का उत्सव बनाएं। अपने बच्चों को साहिबजादों की गाथाएँ सुनाएँ, उन्हें सत्य, साहस और सेवा के मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करें। यही वीर बाल दिवस की सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
“ऐसे बालक कभी मरते नहीं,
वे इतिहास बन जाते हैं।”