Sshree Astro Vastu

आज गुरुप्रतिपदा - माघ कृष्ण प्रतिपदा

माघ कृष्ण प्रतिपदा को गुरुप्रतिपदा कहा जाता है। यह दिन दत्तभक्तों के लिए विशेष महत्व रखता है। श्रीनृसिंह सरस्वती को श्रीपाद श्रीवल्लभ के बाद श्रीदत्तात्रेय का दूसरा पूर्ण अवतार माना जाता है। नरसोबाची वाड़ी, औदुंबर और गाणगापूर में उनकी पादुकाएँ स्थित हैं, जहाँ लाखों भक्त सेवा और दर्शन के लिए जाते हैं।

वर्‍हाड क्षेत्र का लाडकारंजे गाँव श्रीनृसिंह सरस्वती की जन्मभूमि है। उनके पिता का नाम माधव और माता का नाम अंबाभवानी था। उनका नाम शालग्राम देव रखा गया था, लेकिन लोग उन्हें नरहरी कहकर पुकारते थे और यही नाम आगे चलकर प्रचलित हुआ। नरहरी सात वर्ष की आयु तक बोले नहीं थे, जिससे माता-पिता को यह भय होने लगा कि उनका पुत्र गूंगा रहेगा। इस कारण उपचार स्वरूप सात वर्ष की आयु में ही उनका मौजीबंधन (उपनयन संस्कार) करने का निश्चय किया गया।

उस संस्कार में जब गायत्री मंत्र का उपदेश दिया गया और वे माता से भिक्षा माँगने गए, तब उन्होंने वेदवाणी में भिक्षा याचना की। उसी क्षण से उनका मौन समाप्त हो गया। केवल आठ वर्ष की आयु में उन्होंने बदरिकेदार की यात्रा का संकल्प लिया। मार्ग में वे कुछ समय काशी क्षेत्र में रहे। संन्यास ग्रहण के बाद नरसिंह सरस्वती ने वाराणसी में कुछ समय तक ज्ञानदान का कार्य किया।

केदार यात्रा पूर्ण होने के पश्चात वे अपने शिष्यों सहित दक्षिण यात्रा पर निकले। सबसे पहले वे करंजनगर पहुँचे, जहाँ उन्होंने अपने माता-पिता और भाइयों से भेंट की। वहाँ से त्र्यंबकेश्वर और नासिक की यात्रा कर वे परळी वैजनाथ पहुँचे और वहाँ एक वर्ष तक एकांतवास किया। इसके बाद चार महीने औदुंबर क्षेत्र में रहे। फिर वे कृष्णा-पंचगंगा संगम स्थित अमरापूर गाँव पहुँचे, जहाँ उन्होंने बारह वर्षों तक निवास किया। उनके दीर्घ निवास के कारण ही उस स्थान का नाम नरसोबाची वाड़ी पड़ा।

अमरापूर से वे गाणगापूर गए, जहाँ उन्होंने चौबीस वर्षों तक निवास किया। गाणगापूर प्रवास के दौरान उनके जीवन में अनेक महत्वपूर्ण घटनाएँ घटीं। उन्होंने कई चमत्कार किए और अनेक लोगों के दुःख दूर किए। उनके दिव्य सामर्थ्य से प्रभावित होकर बहुत से लोग उनकी सेवा में लग गए। इसके बाद नरसिंह सरस्वती सिंहस्थ कुंभ यात्रा हेतु पुनः नासिक-त्र्यंबकेश्वर गए। यात्रा से लौटने पर उन्होंने गाणगापूर के लोगों से विदा ली और शिष्यों सहित श्रीशैल की ओर प्रस्थान किया।

माघ कृष्ण प्रतिपदा के दिन श्रीनृसिंह सरस्वती कर्दळीवन में गुप्त हो गए। इस दिन उन्होंने अपने अवतार कार्य को पूर्ण कर अपने प्रिय शिष्यों को विदा दी और अंतर्धान हो गए। यही दिन गुरुप्रतिपदा के रूप में पूजित किया जाता है।

श्रीगुरुचरित्र ग्रंथ के विषय में

श्रीगुरुचरित्र एक ओवीबद्ध (छंदबद्ध) ग्रंथ है, जिसमें श्रीनृसिंह सरस्वती की लीलाओं का वर्णन है। यह ग्रंथ दत्तभक्तों का ‘वेद’ माना जाता है और दत्त संप्रदाय का प्रमुख उपासना ग्रंथ है। इसकी रचना सरस्वती गंगाधर ने की है। ऐसा माना जाता है कि इस ग्रंथ का प्रत्येक शब्द मंत्र सामर्थ्य से युक्त है।

इस ग्रंथ की रचना ईस्वी सन् 1535 में मानी जाती है। इसमें कुल 52 अध्याय और 7491 ओवियाँ हैं।

  • प्रथम अध्याय मंगलाचरण है
  • प्रारंभिक अध्यायों में दत्तावतार का वर्णन है
  • अध्याय 5 से 10 में श्रीपाद श्रीवल्लभ का चरित्र
  • अध्याय 11 से 51 में श्रीनृसिंह सरस्वती का चरित्र
  • तथा 52वाँ अध्याय अवतरणिका है

अवतरणिका अध्याय बाद में जोड़ा गया माना जाता है और विद्वानों के अनुसार मूल गुरुचरित्र केवल 51 अध्यायों का ही था। गुरुभक्ति और गुरु-प्रसाद इस ग्रंथ के दो प्रमुख विषय हैं। दो दत्तावतारों के चरित्र के साथ-साथ आचार धर्म, सती धर्म, गुरुभक्ति, व्रत, तीर्थ आदि अनेक विषयों का वर्णन सरस्वती गंगाधर ने उस समय की महाराष्ट्री भाषा में किया है।

धर्मनाथ बीज : धर्मनाथ की कथा

दत्त की गाय

दत्त पूर्णिमा: श्रद्धा, ज्ञान और करुणा का पर्व

श्री दत्त प्रसन्न हैं!

आप सभी लोगों से निवेदन है कि हमारी पोस्ट अधिक से अधिक शेयर करें जिससे अधिक से अधिक लोगों को पोस्ट पढ़कर फायदा मिले |
Share This Article
error: Content is protected !!
×