
एक उदहारण है –
एक राजा था। वह पशु-पक्षी की भाषा जानता था।
एक बार राजा-रानी भोजन कर रहे थे,
तो एक चींटी ने भोजन का एक दाना रानी की थाली में से उठाकर राजा की थाली में रख दिया।
यह देखकर दूसरी चींटी ने कहा -यह अधर्म है। स्त्री का उच्छिष्ट अन्न पुरुष को खिलाना अविवेक है।
इन दोनों की बातों को सुनकर राजा को हँसी आई। रानी ने हँसने का कारण पूछा।
राजा ने कहा- छोड़ो इस बात को। सुनोगी तो अनर्थ होगा। फिर भी रानी ने जानने की जिद की.
जिस महात्मा ने राजा को यह विध्या दी थी,उसने कहा था कि मैंने यह विध्या सिखाई है,
यदि किसी को इसकी बात करोगे या सिखाओगे तो तुम्हारी मृत्यु हो जाएगी।
राजा ने पत्नी को बहुत समझाया पर पत्नी ने हठ नहीं छोड़ा।
वह कहने लगी चाहे आपकी मृत्यु हो भी जाए,किन्तु मै बात जानना चाहती हूँ। राजा पत्नी के आधीन था।
इसलिए मरने के लिए तैयार हो गया। राजा ने कहा -चलो हम दोनों काशी चले। मै वही तुम्हें सारी बात बताऊँगा।
राजा ने सोचा कि अगर मारना ही है तो काशी में मरकर मुक्ति पा लू।
वे दोनों काशी की ओर जाने निकले। रास्ते में एक बकरा-बकरी का जोड़ा मिला।
बकरी ने बकरे से कहा कि कुँए के पास जाकर मेरे लिए हरी घास ले आओ,नहीं मै डूब मरूंगी।
बकरे ने कहा कि मेरा पैर फिसल जायेगा तो कुँए में गिरकर मै मर जाऊँगा।
बकरी ने कहा चाहे जो भी हो मुझे घास लाकर दो।
तो बकरे ने तेवर बदलकर कहा कि- मै उस राजा जैसा मूर्ख नहीं हूँ,जो पत्नी के लिए बिना कारण जान दे दू।
राजा ने बकरे के ये शब्द सुने तो सोच में पड़ गया। मै कितना मूर्ख हूँ कि प्रभु-भजन के लिए जो शरीर मिला है,वह इस स्त्री की मूर्खताभरी हठ की खातिर उसका नाश करने के लिए तैयार हो गया। धिक्कार है मुझे। मुझसे तो बकरा ही अच्छा है। उसने रानी को दृढ़ता से कह दिया -मै तुम्हे कुछ भी बताना नहीं चाहता। तू जो चाहे वह कर सकती है। रानी को अपनी हठ छोड़नी पड़ी।
गृहस्थाश्रम में आज्ञा दी गई है कि वह दान करे,क्योंकि दान से धन शुध्धि होती है।
साल में एक मास गंगा किनारे रहकर नारायण की आराधना करनी चाहिए।
भक्ति करने के लिए स्थान-शुध्धि आवश्यक है। स्थान के वातावरण का मन पर असर पड़ता है।
मार्कडेय पुराण में एक कथा है।
राम लक्ष्मण एक जंगल में से जा रहे थे। मार्ग में एक स्थान पर लक्ष्मण के मन में कुभाव आया और मति भ्रष्ट हो गई। वे सोचने लगे-कैकयी ने वनवास तो राम को दिया है,मुझे नहीं। मै राम की सेवा के लिए क्यों कष्ट उठाऊ?
श्रीराम सब समज गए-कि लक्ष्मण के मन में कुभाव आया है.
राम ने लक्ष्मण से कहा -इस स्थल की मिटटी अच्छी दीखती है,थोड़ी साथ बांध ले।
लक्ष्मण ने एक पोटली में बांध ली। जब तक उस पोटली को लेकर चलते थे तब तक मन में कुभाव भी रहा।
जैसे वह पोटली को रखकर दूर जाते थे तब उनका मन में राम-सीता के लिए ममता और भक्ति से भर जाता था। लक्ष्मण को इस बात से आश्चर्य हुआ। उन्होंने इसका कारण राम से पूछा।
राम ने कहा -तेरे मन की इस परिवर्तन का दोषी तू नहीं है। इस मिटटी का प्रभाव है।
जिस भूमि पर जैसे काम किये जाते है,उसके अच्छे-बुरे परमाणु उस भूमिभाग में और वातावरण में रहते है।
जिस स्थान की यह मिटटी है,वहाँ सुंद और उपसुंद नाम के दो राक्षस का निवास था।
उन्होंने कड़ी तपश्चर्या करके ब्रह्मा को प्रसन्न करके अमरता का वरदान माँगा।
ब्रह्मा ने उनके मांग स्वीकार तो की पर कुछ नियंत्रण के साथ।
दोनों भाई में बहुत प्रेम था। और वे सोचते थे -कि दोनों का आपसमे कभी भी प्रेम कम नहीं हो शकता.
अतः उन्होंने कहा कि- “हमारी मृत्यु केवल आपसी विग्रह से ही हो सके। ” ब्रह्मा ने वर दिया।
उन दोनों ने सोचा कि हम कभी झगड़ने वाले नहीं है अतः हम कभी नहीं मरेंगे।
अमरता का घमंड के-कारण उन्होंने देवो को सताना शुरू किया। देवो ने ब्रह्माजी का आसरा लिया।
ब्रह्माजी ने तिलोत्तमा नाम की अप्सरा का सर्जन किया और उन दो असुरो के पास जाने की आज्ञा दी।
सुंद और उपसुंद इस अप्सरा को देखकर मोहांध हो गए।
दोनों में उसको पाने के लिए युध्ध हुआ और दोनों की मृत्यु हो गई।
जिस भूमि पर जैसे कर्म किये जाते है,वैसे ही संस्कार वह भूमि भी प्राप्त कर लेती है।
गृहस्थ पितृश्राद्ध करे। काम क्रोध-लोभ का त्याग करे। काम का मूल है संकल्प।
संकल्प का त्याग करके काम को जितना चाहिए। मन में सुख का संकल्प नहीं आना चाहिए।
संकल्प ही दुःख का कारण है। काम की इच्छा अपूर्ण रहने पर क्रोध उत्पन्न होता है।क्रोध दुखदाता है।
संसारी लोग जिसे अनर्थ मानते है,वही अनर्थ लोभ है,ऐसा समझो और लोभ को जीतो।
तात्विक विचार से शोक,मोह और भय को जितना चाहिए।
गृहस्थ को सद्गुरु का आश्रय लेकर उसकी आज्ञा का पालन करना चाहिए। सात्विक भोजन,स्थान और सत्संग से निद्रा को पराजित करना चाहिए। सत्वगुण की वृध्धि से मनुष्य का देह विलीन हो जाता है।
ज्ञानेश्वर ने १६ वे साल में और शंकराचार्य ने ३२ साल की उम्र में प्रयाण किया था।
तमोगुण की वृध्धि से निद्रा बढ़ती है और सत्वगुण की वृध्धि से नींद कम होती है। निद्रा तमोगुण का धर्म है।
सदाचार,सयंम,सात्विक आहार,विहार,आचार आदि से सत्वगुण बढ़ता है।
सत्वगुण की वृध्धि से प्रभुमिलन की आतुरता बढ़ेगी।
हर रोज प्रभु का ध्यान करो। ध्यान करने से ध्यान करने वाले में ईश्वर की शक्ति आती है।
गृहस्थ को इन्द्रियरूपी घोड़ो को नियंत्रण में रखना चाहिए।
जब तक मनुष्य-देहरूपी रथ अपने वश में है तथा इन्द्रियाँ आदि सशक्त है,उस समय मनुष्य को सद्गुरु के चरणों की सेवा करके,तीक्ष्ण ज्ञानरूपी तलवार लेकर,श्री भगवान का बल धारण करके राग द्वेषादि शत्रुओं को जीत,और तत्पश्चात शांत होकर स्वानन्दरूपी स्वराज्य से संतुष्ट हो जाये।
गृहस्थ को मै कमाता हूँ ऐसा अभिमान नहीं रखना चहिये। द्रव्य मेरा है ऐसा भी अभिमान मत रखो।
द्रव्य सभी का है। गृहस्थ भावाद्वैत सिध्ध करे। पति-पत्नी सत्संग करे। एकांत में बैठकर हरि-कीर्तन करो।
कीर्तन से कलि के दोषों का नाश होता है।
नारदजी-धर्मराजा को कहते है -अनेक गृहस्थ सत्संग और हरि-कीर्तन से पार हो गए है।
राजा,तुम नसीब वाले हो -बड़े-बड़े जो ईश्वर को देखने के लिए तरसते है, घर में है। तुम्हारे संबंधी है।
इस प्रकार नारद ने धर्मराजा को उपदेश दिया।
अन्त में इस प्रकरण की समाप्ति में धर्मराजा ने नारदजी की पूजा की।
*गीता का दर्शन शाश्त्र (424)*
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(अध्याय-12)
*पाप और प्रार्थना*
सूत्र—
क्लेशोऽम्मितरस्लेशमस्थ्यासक्लचेतसाम्।
अव्यक्ता हि गतिर्दु:खं देहवद्भिरवाप्यते ।। 5।।
ये तु सवींणि कर्माणि मयि संन्यस्य मत्परा:।
अनन्येनैव योगेन मां ध्यायन्त उपासते।। 6।।
किंतु उन सच्चिदानंदघन निरस्कार ब्रह्म में आसक्त हुए चित्त वाले पुरुषों के साधन में केश अर्थात परिश्रम विशेष है, क्योंकि देहाभिमानियों से अव्यक्त विषयक गति दुखपूर्वक प्राप्त की जाती है। अर्थात जब तक शरीर में अभिमान रहता ह्रै तब क शुद्ध सच्चिदानंदघन निराकार ब्रह्म में स्थिति होनी कठिन है।
और जो मेरे परायण हुए भक्तजन संपूर्ण कर्मों की मेरे में अर्पण करके मुझ सगुणरूप परमेश्वर को हीं तैलधारा के सदृश अनन्य भक्ति— योग से निरंतर चिंतन करते हुए भजते है, उनका मैं शीघ्र ही उद्धार करता हूं।
पहले कुछ प्रश्न:
एक मित्र ने पूछा है कि आज के बौद्धिक युग में भक्ति, भाव—साधना का मार्ग कैसे उपयुक्त हो सकता है? श्रद्धा के अभाव में भक्ति—साधना में प्रवेश कैसे संभव है?
ऐसा प्रश्न बहुतों के मन में उठता है। युग तो बुद्धि का है, तो भाव की तरफ गति कैसे हो सके? दोनों में विपरीतता है; दोनों उलटे छोर मालूम पड़ते हैं।
हमारा सारा शिक्षण, सारा संस्कार बुद्धि का है। भाव की न तो कोई शिक्षा है, न कोई संस्कार है। भाव के विकसित होने का कोई उपाय भी दिखाई नहीं पड़ता। सारी जीवन की व्यवस्था बुद्धि से चलती मालूम पड़ती है। तो इस बुद्धि के शिखर पर बैठे हुए युग में, कैसे भाव की तरफ गति होगी? कैसे भक्ति की तरफ रास्ता खुलेगा?
जीवन का एक बहुत अनूठा नियम है, वह आप समझ लौ वह नियम है कि जब भी हम एक अति पर चले जाते हैं, तो दूसरी अति पर जाना आसान हो जाता है। जब भी हम एक छोर पर पहुंच जाते हैं, तो दूसरे छोर पर पहुंचना आसान हो जाता है, घड़ी के पेंडुलम की तरह। घड़ी का पेंडुलम घूमता है बाईं तरफ, और जब बाईं तरफ के आखिरी छोर को छू लेता है, तो दाईं तरफ घूमना शुरू हो जाता है।
यह युग बुद्धि का युग है, इतना ही काफी नहीं है जानना। यह युग बुद्धि से पीड़ित युग भी है। इस युग की ऊंचाइयां भी बुद्धि की हैं, इस युग की परेशानियां भी बुद्धि की हैं। इस युग की पीड़ा भी बुद्धि है।
यह सारा आज का चिंतनशील मस्तिष्क परेशान है, विक्षिप्त है। और जैसे—जैसे सभ्यता बढ़ती है, वैसे—वैसे हमें पागलखाने बढ़ाने पड़ते हैं। जितना सभ्य मुल्क हो, उसकी जांच का एक सीधा उपाय है कि वहां कितने ज्यादा लोग पागल हो रहे हैं!
बुद्धि पर ज्यादा जोर पड़ता है, तो तनाव सघन हो जाता है। हृदय हलका करता है, बुद्धि भारी कर जाती है। हृदय एक खेल है, बुद्धि एक तनाव है।
तो बुद्धि की इतनी पीड़ा के कारण और बुद्धि का इतना संताप जो पैदा हुआ है, उसके कारण, दूसरी तरफ घूमने की संभावना पैदा हो गई है।
हम बुद्धि से परेशान हैं। इस परेशानी के कारण हम भाव की तरफ उन्मूख हो सकते हैं। और मेरी अपनी समझ ऐसी है कि शीघ्र ही पृथ्वी पर वह समय आएगा, जब पहली दफा मनुष्य भाव में इतना गहरा उतरेगा, जितना इसके पहले कभी भी नहीं उतरा था।
गांव का एक ग्रामीण है, तो गांव का ग्रामीण भावपूर्ण होता है, लेकिन अगर कभी कोई शहर का बुद्धिमान भाव से भर जाए तो गांव का ग्रामीण उसके भाव का मुकाबला नहीं कर सकता है। क्योंकि जिसने बुद्धि के शिखर को जाना हो और जब उस शिखर से वह भाव की खाई में गिरता है, तो उस खाई की गहराई उतनी ही होती है, जितनी शिखर की ऊंचाई थी। जितनी ऊंचाई से आप गिरते हैं, उतनी ही गहराई में गिरते हैं। अगर आप समतल जमीन पर गिरते हैं, तो आप कहीं गिरते ही नहीं।
तो गांव के ग्रामीण की जो भाव—दशा है, वह बहुत गहरी नहीं हो सकती है। लेकिन शहर के बुद्धिमान की, सुशिक्षित की, सुसंस्कृत की जब भाव—दशा पैदा होती है, तो वह उतनी ही गहरी होती है—उतनी ही विपरीत गहरी होती है—जितने शिखर पर वह खड़ा था।
मनुष्यता बुद्धि के शिखर को छू रही है। और बुद्धि के शिखर को छूने से जो—जो आशाएं हमने बांधी थीं, वे सभी असफल हो गई हैं। जो भी हमने सोचा था, मिलेगा बुद्धि से, वह नहीं मिला।
और जो मिला है, वह बहुत कष्टपूर्ण है।
बर्ट्रेड रसेल जैसे बुद्धिमान आदमी ने कहा है—और इस सदी में जिनकी बुद्धि पर हम भरोसा कर सकें, उन थोड़े से लोगों में एक है रसेल। रसेल ने कहा है कि पहली बार आदिवासियों को एक जंगल में नाचते देखकर मुझे लगा, अगर यह नाच मैं भी नाच सकूं? तो मैं अपनी सारी बुद्धि को दांव पर लगाने को तैयार हूं। अगर यही उन्मूक्त, चांद की रात में यही उन्मूक्त गीत मैं भी गा सकूं, तो महंगा सौदा नहीं है। लेकिन सौदा महंगा भला न हो, करना. बहुत कठिन है।
बुद्धि के तनाव को छोड़कर भाव और हृदय की तरफ उतरना जटिल है। लेकिन पश्चिम में, जो निश्चित ही हम से बुद्धि की दौड़ में आगे हैं, बुद्धि की पीड़ा बहुत स्पष्ट हो गई है। हम स्कूल, कालेज, युनिवर्सिटी बना रहे हैं, पश्चिम में उनके उजड़ने का वक्त करीब आ गया है।
आज अगर अमेरिका में विचारशील युवक है, तो वह पूछता है, पढ़कर क्या होगा? अगर मुझे एम ए. या डाक्टरेट की उपाधि मिल गई, तो क्या होगा? मुझे क्या मिल जाएगा? और पश्चिम के पिताओ के पास, गुरुओं के पास उत्तर नहीं है। क्योंकि बच्चे जब अपने बाप से पूछते हैं कि आप पढ़—लिख गए, आपको जीवन में क्या मिल गया है जिसकी वजह से हम भी इस पढ़ने के चक्र से गुजारे जाएं? आपने क्या पा लिया है?
आज पश्चिम में अगर हिप्पी, और बीटनिक, और युवकों का बड़ा वर्ग विद्रोह कर रहा है शिक्षा से, संस्कृति से, समाज से, तो उसका मौलिक कारण यही है कि बुद्धि ने जो—जो आशाएं दी थीं, वे पूरी नहीं हुईं। और बुद्धि का भ्रम—जाल टूट गया। एक डिसइलूजनमेंट, सब भ्रम टूट गए हैं।
भ्रम टूटते ही तब हैं, जब कोई चीज उपलब्ध होती है; उसके पहले नहीं टूटते। गरीब आदमी को भ्रम बना ही रहता है कि धन से सुख मिलता होगा। धन से सुख नहीं मिलता, इसके लिए धनी होना जरूरी है। इसके पहले यह अनुभव में नहीं आता। आएगा भी कैसे? अनुभव का अर्थ ही यह होता है कि जो हमारे पास है, उसका ही हम अनुभव कर सकते हैं। जो हमारे पास नहीं है, उसकी हम आशाएं और सपने बांध सकते हैं।
जमीन पर पहली दफा इन पांच हजार वर्षों में, बुद्धि ने पूरा शिखर छुआ है। बुद्धि का भ्रम टूट गया है। और इस भ्रम के टूटने के कारण इस क्रांति की संभावना है कि मनुष्य पहली दफा भक्ति की तरफ उतर जाए। निश्चित ही, इस आदमी की भक्ति गहरी होगी। ऐसा समझें कि एक गरीब आदमी संन्यासी हो जाए, सब छोड़ दे। लेकिन सब था क्या उसके पास छोड़ने को! उसके त्याग की कितनी गहराई होगी? उसके त्याग की उतनी ही गहराई होगी, जितना उसने छोड़ा है। उससे ज्यादा नहीं हो सकती। उसके पास कुछ था ही नहीं। एक सम्राट संन्यासी हो जाए। इस सम्राट के त्याग की गहराई उतनी ही होगी, जितना इसने छोड़ा है।
ध्यान रहे, जब बुद्ध और महावीर सब छोड़कर सडक पर भिखारी की तरह खड़े हो जाते हैं, तब आप यह मत समझना कि ये वैसे ही भिखारी हैं, जैसे दूसरे भिखारी हैं। इनके भिखारीपन में एक तरह की ज्ञान है। और इनके भिखारीपन में एक अमीरी है। और इनके भिखारीपन में छिपा हुआ सम्राट मौजूद है। कोई भिखारी इनका मुकाबला नहीं कर सकता। क्योंकि दूसरा भिखारी फिर भी भिखारी ही है। उसे सम्राट होने का कोई अनुभव नहीं है। इसलिए उसके संन्यास में कोई गहराई नहीं हो सकती।
उसका संन्यास हो सकता है एक सांत्वना हो, अपने को समझाना हो। उसने शायद इसलिए सब छोड़ दिया हो कि पहली तो बात कुछ था भी नहीं, पकड़ने योग्य भी कुछ नहीं था। और फिर दूसरी बात, सोचा हो कि अंगुर खट्टे हैं। जो नहीं मिलता, वह पाने योग्य भी नहीं है। शायद उसने अपने को समझा लिया हो कि मैं त्याग करके परमात्मा को पाने जा रहा हूं। कुछ उसके पास था नहीं। उसके छोड़ने का कोई मूल्य नहीं है।
लेकिन जब कोई बुद्ध या महावीर सब छोड़कर जमीन पर भिखारी की तरह खड़ा हो जाता है, तो इस छोड़ने का राज और है। बुद्ध की शान और है। यह बुद्ध कितना ही बड़ा भिक्षापात्र अपने हाथ में ले लें, इनकी आंखों में सम्राट मौजूद रहेगा। और जब ये बुद्ध एक वृक्ष के नीचे सो जाएंगे—इन्होंने महल जाने हैं और यह भी जान लिया है कि उन महलों में कोई सुख न था—तो इनकी नींद वृक्ष के नीचे और है। और एक भिखारी जब वृक्ष के नीचे सोता है, जिसने महल नहीं जाने हैं, वह भी कहता हो कि महलों में कुछ नहीं है, लेकिन उसकी नींद की गुणवत्ता और होगी। ये दोनों अलग तरह के लोग हैं।
हम जिस अनुभव से गुजर जाते हैं, उसके विपरीत जब हम जाते हैं, तो उसकी गहराई उतनी ही बढ जाती है। इसलिए गरीब का जो आनंद है, वह केवल अमीर को मिलता है। गरीब होने का जो मजा है, वह केवल अमीर को मिलता है। और जो अमीर अभी अमीरी से ऊबा नहीं है, उसे जिंदगी के सब से बड़े मजे की अभी कमी है। वह है अमीरी के बाद गरीबी का मजा। और जो आदमी बुद्धि से अभी ऊबा नहीं है, समझ लेना कि अभी बुद्धि के शिखर पर नहीं पहुंचा। जिस दिन शिखर पर पहुंचेगा, उस दिन ऊबकर छोड़ देगा। क्योंकि जो भी आशाएं बंधी थीं, वे इंद्रधनुष साबित होती हैं। दूर से दिखाई पड़ती हैं, पास पहुंचकर खो जाती हैं।
अगर आप अब भी बुद्धि को पकड़े हैं, तो समझना कि काफी बुद्धिमान नहीं हैं। क्योंकि बड़े बुद्धिमान बुद्धि को छोड़ दिए हैं। बड़े धनियों ने धन छोड़ दिया है। बड़े बुद्धिमानों ने बुद्धि छोड दी है। जिन्होंने संसार का अनुभव ठीक से लिया है, वे मोक्ष की तरफ चल पड़े हैं।
अगर आप अभी भी संसार में चल रहे हैं, तो समझना कि अभी संसार का अनुभव नहीं मिला। और अगर अभी भी बुद्धि को पकड़े हैं और छोटे—छोटे तर्क लगाते रहते हैं, तो समझना कि अभी बुद्धि के शिखर पर नहीं पहुंचे हैं। अभी आपको आशा है। और अगर अभी भी रुपए इकट्ठे करने में लगे हैं, तो उसका मतलब है कि अभी रुपए से आपकी पहचान नहीं है। अभी आप गरीब हैं; अभी अमीर नहीं हुए हैं। अमीर तो जब भी कोई आदमी होता है, रुपए को छोड़ देता है। क्योंकि अमीर का भ्रम भंग हो जाता है। और जब तक भ्रम भंग न हो, तब तक समझना कि गरीब है।
गरीब सोच भी नहीं सकता कि अमीरी के बाद आने वाली गरीबी क्या होगी। गरीब तो अमीरी के संबंध में भी जो सोचता है, वह भी गरीब की ही धारणा होती है।
मैंने सुना है, एक भिखमंगा अपनी पत्नी से कह रहा था कि अगर मैं राकफेलर होता, तो राकफेलर से भी ज्यादा धनी होता। उसकी पत्नी ने कहा, हैरानी की बात है! क्या तुम्हारा मतलब है? भिखमंगा कह रहा है कि अगर मैं राकफेलर होता, तो राकफेलर से भी ज्यादा धनी होता। उसकी पत्नी ने कहा, हैरानी है! क्या मतलब है तुम्हारा कि अगर तुम राकफेलर होते, तो राकफेलर से भी ज्यादा धनी होते? उस भिखमंगे ने कहा कि तू समझी नहीं। राकफेलर अगर मैं होता, तो किनारे—किनारे भीख मांगने का धंधा भी जारी रखता। वह जो अतिरिक्त कमाई होती, वह राकफेलर से ज्यादा होती! साइड बाइ साइड वह मैं अपना धंधा भीख मांगने का भी करता रहता। तो राकफेलर से निश्चित मैं ज्यादा धनी होता, क्योंकि जो मैं भिखमंगेपन से कमाता, वह राकफेलर के पास नहीं है।
अगर भिखमंगा राकफेलर होने का भी सपना देखे, तो भी भिखमंगा ही रहता है। सम्राट अगर भिखारी होने का भी सपना देखे, तो भी सम्राट ही रहता है। अनुभव खोते नहीं। जो भी अनुभव आपको मिल गया है, वह आपके जीवन का अंग हो गया।
तो जब कोई बुद्धि के शिखर पर पहुंच जाता है..। थोड़ा सोचें। अगर कभी आइंस्टीन भक्त हो जाए, तो आपके साधारण भक्त टिकेंगे नहीं। ऐसा हुआ है।
चैतन्य महाप्रभु आइंस्टीन जैसी बुद्धि के आदमी थे। बंगाल में कोई मुकाबला न था उनकी प्रतिभा का। उनके तर्क के सामने कोई टिकता न था। उनसे जूझने की हिम्मत किसी की न थी। उनके शिक्षक भी उनसे भयभीत होते थे। दूर—दूर तक खबर पहुंच गई थी कि उनकी बुद्धि का कोई मुकाबला नहीं है। और फिर जब यह चैतन्य इस बुद्धि को छोड़कर और झांझ—मजीरा लेकर रास्तों पर नाचने लगा, तो फिर चैतन्य महाप्रभु का मुकाबला भी नहीं है—इस नृत्य, और इस गीत, और इस प्रार्थना, और इस भाव, और इस भक्ति का।
न होने का कारण है। नाचे बहुत लोग हैं। गीत बहुत लोगों ने गाए हैं। प्रार्थना बहुत लोगों ने की है। भाव बहुत लोगों ने किया है, लेकिन चैतन्य की सीमा को छूना मुश्किल है। क्योंकि चैतन्य का एक और अनुभव भी है, वे बुद्धि के आखिरी शिखर से उतरकर लौटे हैं। उन्होंने ऊंचाइयां देखी हैं। उनकी नीचाइयों में भी ऊंचाइया छिपी रहेंगी
तो इस युग के लिए यह ध्यान में रख लेना जरूरी है कि यह युग एक शिखर अनुभव के करीब पहुंच रहा है, जहां बुद्धि व्यर्थ हो जाएगी। और जब बुद्धि व्यर्थ होती है, तो जीवन के लिए एक ही आयाम खुला रह जाता है, वह है भाव का, वह है हृदय का, वह है प्रेम का, वह है भक्ति का।
आदमी अब पुराने अर्थों में भावपूर्ण नहीं हो सकता। अब तो नए अर्थों में भावपूर्ण होगा। पुराना आदमी सरलता से भावपूर्ण था। उसकी भावना में सरलता थी, गहराई नहीं थी। नया आदमी जब भावपूर्ण होता है, आज का आदमी जब भावपूर्ण होता है, तो उसके भाव में सरलता नहीं होती, गहराई होती है। और गहराई बड़ी कीमत की चीज है।
इसे हम ऐसा समझें, एक छोटा बच्चा है। छोटा बच्चा सरल होता है, लेकिन गहरा नहीं होता। गहरा हो नहीं सकता। क्योंकि गहराई तो आती है अनुभव से। गहराई तो आती है हजार दरवाजों पर भटकने से। गहराई तो आती है हजारों भूल करने से। गहराई तो आती है प्रौढ़ता से, अनुभव से। सार जब बच जाता है सब अनुभव का, तो गहराई आती है।
एक का आदमी सरल नहीं हो सकता, लेकिन गहरा हो सकता है। एक बच्चा गहरा नहीं हो सकता, सरल हो सकता है। और जब कोई का आदमी अपनी गहराई के साथ सरल हो जाता है, तो संत का जन्म होता है।
इसलिए जीसस ने कहा है कि वे लोग मेरे स्वर्ग के राज्य में प्रवेश कर सकेंगे, जो बच्चों की भांति भोले हैं।
लेकिन ध्यान रहे, जीसस ने यह नहीं कहा है कि बच्चे मेरे स्वर्ग के राज्य में प्रवेश कर सकेंगे। बच्चे नहीं; जो बच्चों की भांति भोले हैं। इसका मतलब साफ है कि पहली तो बात बच्चे नहीं हैं। तभी तो कहा कि बच्चों की भांति। बच्चे नहीं हैं; जो के हैं सब अर्थों में, लेकिन फिर भी बच्चों की भांति भोले हैं, वे ही स्वर्ग के राज्य में प्रवेश कर सकेंगे।
एक बच्चा सरल है, अज्ञानी है। अभी उसकी जिंदगी में जटिलता नहीं है, लेकिन जटिलता आएगी। अभी जटिलता आने का वक्त करीब आ रहा है। जल्दी ही वह भटकेगा, उलझेगा, वासना से भरेगा। जमानेभर की आकांक्षाएं उसे घेर लेंगी। उसकी सरलता के नीचे ज्वालामुखी छिपा है।
गांव का आदमी सरल दिखाई पड़ता है। वह भी बच्चे की तरह सरल है। उसके भीतर वह सारा ज्वालामुखी छिपा है, जो शहर के आदमी में प्रकट हो गया है। उसे शहर ले आओ, वह शहर के आदमी जैसा ही जटिल हो जाएगा। और यह भी हो सकता है, ज्यादा जटिल हो जाए। जब गाव के लोग चालाक होते हैं, तो शहर के लोगों से ज्यादा चालाक हो जाते हैं। क्योंकि उनकी जमीन बहुत दिन से बिना उपयोग की पड़ी है। उसमें चालाकी के बीज पड़ जाते हैं, तो जो फसल आती है, वह आप में नहीं आ सकती। आपकी जमीन काफी फसल ला चुकी है चालाकी की।
गांव का आदमी चालाक हो जाए, तो बहुत चालाक हो जाता है। गांव का आदमी सरल है, लेकिन उसकी सरलता की कोई कीमत नहीं है। उसकी सरलता बच्चे की सरलता है। उसके भीतर ज्वालामुखी छिपा है। वह कभी भी भ्रष्ट होगा। शायद उसे भ्रष्ट होना ही पड़ेगा। क्योंकि इस जगत में भ्रष्ट हुए बिना कोई अनुभव नहीं है। उसे इस जगत से गुजरना ही पड़ेगा। और अगर इस जगत से गुजरकर यह जगत उसे व्यर्थ हो जाए और वह वापस गांव लौट जाए, और वापस लौट जाए उसी ग्राम्य—सरलता में, तो उसकी जो गहराई होगी, वह संत की गहराई है।
विपरीत का अनुभव उपयोगी है। बच्चे को जवान होना जरूरी है। जवान का अर्थ है, वासना। सभी बच्चे जवान हो जाते हैं, लेकिन सभी जवान के नहीं हो पाते हैं! शरीर का हो जाता है, चित्त का नहीं हो पाता। और जिसका चित्त का होता है, वह संत हो गया। चित्त के के होने का अर्थ यह है कि जवानी में जो तूफान उठे थे, वे समझ लिए और पाया कि व्यर्थ हैं।
के भी कहते हैं कि सब बेकार है। कहते हैं; ऐसा उन्होंने पाया नहीं है। अगर कोई चमत्कारी उनसे कहे कि हम तुम्हें फिर जवान !, बनाए देते हैं, तो वे अभी तैयार हो जाएंगे। खो गया है, हाथ से ताकत खो गई है, वासना नहीं खो गई है। मरते दम तक वासना !? पीछा करती है।
सब बच्चे जवान हो जाते हैं, लेकिन सभी जवान के नहीं हो पाते हैं। के तो बहुत थोड़े से लोग होते हैं। के का मतलब है, जिनके लिए जवानी अनुभव से व्यर्थ हो गई। और जो के होकर फिर वापस उस सरलता को पहुंच गए जिस सरलता को लेकर पैदा हुए थे। लेकिन इस सरलता में एक गुणात्मक, क्यालिटेटिव फर्क है। इस सरलता के नीचे जो तूफान छिपा था, ज्वालामुखी, वह नहीं है। इस सरलता को भ्रष्ट नहीं किया जा सकता। यह सरलता बोधपूर्वक है।
बच्चे की सरलता भ्रष्ट की जा सकती है। भ्रष्ट होगी ही; होनी चाहिए। नहीं तो उसके जीवन में गहराई नहीं आएगी। उसे भ्रष्ट भी होना पड़ेगा और उसे भ्रष्टता के ऊपर भी उठना पड़ेगा। जीवन एक शिक्षण है। उसमें भूल करके हम सीखते हैं।
बुद्धि की भूल हमने कर ली है इस युग में। अब अगर हम सीख जाएं, तो हम हृदय की तरफ वापस लौट सकते हैं।
पृथ्वी पर भक्ति के एक बड़े युग के आने की संभावना है। उलटा लगेगा, क्योंकि हमें तो लग रहा है कि सब नष्ट हुआ जा रहा है। लेकिन तूफान के बाद ही शाति आती है। और यह जो नष्ट होना दिखाई पड़ रहा है, यह तूफान का आखिरी चरण है। और इसके पीछे एक गहन सरलता उत्पन्न हो सकती है।
मगर आप, सारी दुनिया कब सरल होगी, इसकी प्रतीक्षा में मत रहें। आप होना चाहें, तो आज ही हो सकते हैं। और सारी दुनिया होगी या नहीं होगी, यह प्रयोजन भी नहीं है। दुनिया हो भी जाएगी और आप नहीं हुए, तो उसका कोई अर्थ नहीं है। आप हो सकते हैं अभी। लेकिन शायद आप भी अभी बुद्धि से ऊबे नहीं हैं। अभी शायद आपको भी यह साफ नहीं हुआ है कि बुद्धि का जाल कुछ अर्थ नहीं रखता है।
आदमी की बुद्धि कितनी छोटी है! इस छोटी—सी बुद्धि से हम क्या हल कर रहे हैं? इस जीवन की विराट पहेली को! कितने दर्शन हैं, कितने शास्त्र हैं, कुछ भी हल नहीं हुआ। बुद्धि अब तक एक नतीजे पर नहीं पहुंची है। अभी तक जीवन की पहेली पहेली की पहेली बनी हुई है। अभी तक कोई जवाब नहीं है।
हजारों साल की निरंतर हजारों मस्तिष्कों की मेहनत के बाद भी जीवन क्या है, इसका कोई उत्तर नहीं है। मनुष्य इतने दिन से कोशिश करके भी बुद्धि से कुछ पा नहीं सका है। जीवन के सभी प्रश्न अभी भी प्रश्न हैं। कुछ हल नहीं हुआ।
धर्म या भक्ति केवल इसी बात की पहचान है कि बुद्धि से एक भी उत्तर मिल नहीं सका। शायद बुद्धि से उत्तर मिल ही नहीं सकता। हम गलत दिशा से खोज रहे हैं। लेकिन यह स्मरण आ जाए, यह खयाल में आ जाए, तो आप दूसरी दिशा में खोज शुरू कर दें।
आपके पास बुद्धि है। अच्छा है होना; क्योंकि अगर बुद्धि न हो, तो यह भी समझ में आना मुश्किल है कि बुद्धि से कुछ मिल नहीं सकता। इतना उसका उपयोग है।
बायजीद ने कहा है कि शास्त्रों को पढ़कर एक ही बात समझ में आई कि शास्त्रों से सत्य नहीं मिलेगा। लेकिन काफी बड़ी बात समझ में आई।
झेन फकीर रिंझाई ने कहा है कि सोच—सोचकर इतना ही पाया कि सोचना फिजूल है। लेकिन बहुत पाया। इतना भी मिल जाए बुद्धि से, तो बुद्धि का बड़ा दान है। लेकिन इसके लिए भी साहसपूर्वक बुद्धि का प्रयोग करना चाहिए।
हम तो बुद्धि का प्रयोग भी नहीं करते हैं। इसलिए हम बुद्धिमान बने रहते हैं। अगर हम बुद्धि का प्रयोग कर लें, तो आज नहीं कल हम उस जगह पहुंच जाएंगे, जहां खाई आ जाती है और रास्ता समाप्त हो जाता है। वहां से लौटना शुरू हो जाता है।
सभी बुद्धिमान बुद्धि के विपरीत हो गए हैं। चाहे बुद्ध हों, और चाहे जीसस, चाहे कृष्ण, सभी बुद्धिमानों ने एक बात एक स्वर से कही है कि बुद्धि से जीवन का रहस्य हल नहीं होगा। जीवन का रहस्य हृदय से हल होगा।
हा, बुद्धि से संसार की उलझनें हल हो सकती हैं। क्योंकि संसार की सब उलझनें मृत हैं। गणित का कोई सवाल हो, बुद्धि हल कर देगी। और ध्यान रखना, गणित का सवाल हृदय से हल करने की
कोशिश भी मत करना। उससे कोई संबंध नहीं है। विज्ञान की कोई उलझन हो, बुद्धि हल कर देगी। टेक्नालाजी का कोई सवाल हो, बुद्धि कल कर देगी। जो भी मृत है, पदार्थ है, उसकी उलझन बुद्धि हल कर देती है। बुद्धि का उपयोग यही है।
लेकिन जहां भी जीवित है, और जहां भी जीवन की धारा है, और जहां अमृत का प्रश्न है, वहीं बुद्धि थक जाती है और व्यर्थ हो जाती है।
सुना है मैंने कि एक बहुत बड़े सूफी फकीर हसन के पास एक युवक आया। वह बहुत कुशल तार्किक था पंडित था, शास्त्रों का ज्ञाता था। जल्दी ही उसकी खबर पहुंच गई और हसन के शिष्यों में वह सब से ज्यादा प्रसिद्ध हो गया। दूर—दूर से लोग उससे पूछने आने लगे। यहां तक हालत आ गई कि लोग हसन की भी कम फिक्र करते और उसके शिष्य की ज्यादा फिक्र करते। क्योंकि हसन तो अक्सर चुप रहता। और उसका शिष्य बड़ा कुशल था सवालों। को सुलझाने में।
एक दिन एक आदमी ने हसन से आकर कहा, इतना अदभुत शिष्य है तुम्हारा! इतना वह जानता है कि हमने तो दूसरा ऐसा कोई आदमी नहीं देखा। धन्यभागी हो तुम ऐसे शिष्य को पाकर। हसन ने कहा कि मैं उसके लिए रोता हूं क्योंकि वह केवल जानता है। और जानने में इतना समय लगा रहा है कि भावना कब कर पाएगा? भाव कब कर पाएगा? जानने में ही जिंदगी उसकी खोई जा रही है, तो भाव कब करेगा? मैं उसके लिए रोता हूं। उसको अवसर भी नहीं है, समय भी नहीं है। वह बुद्धि से ही लगा हुआ है।
बुद्धि से सब कुछ मिल जाए, जीवन का स्रोत नहीं मिलता। वह वहा नहीं है। बुद्धि एक यूटिलिटी है; एक उपयोगिता है; एक यंत्र ‘ है, जिसकी जरूरत है। लेकिन वह आप नहीं हैं। जैसे हाथ है, ऐसे बुद्धि एक आपका यंत्र है। उसकी उपयोग करें, लेकिन उसके साथ एक मत हो जाएं। उसका उपयोग करें और एक तरफ रख दें। लेकिन हम उससे एक हो गए हैं।
आप चलते हैं, तो पैर का उपयोग कर लेते हैं। फिर बैठते हैं, तब आप पैर नहीं चलाते रहते हैं। अगर चलाए, तो लोग पागल समझेंगे। पैर चलने के लिए है, बैठकर चलाने के लिए नहीं है। बुद्धि, जब पदार्थ के जगत में कोई उलझन हो, उसे सुलझाने के लिए है। लेकिन आप बैठे हैं, तो भी बुद्धि चल रही है। नहीं है कोई सवाल, तो भी बुद्धि चल रही है!
क्रमशः ……..)
जय श्री कृष्ण