
द्वारका का भव्य राजमहल रात्रि के सन्नाटे में डूबा हुआ था। सुकोमल शैया पर थके-हारे सुदामा कब गहरी नींद में चले गए, उन्हें इसका आभास ही नहीं हुआ। परंतु, त्रिलोक के स्वामी श्रीकृष्ण की आँखों में नींद कहाँ? वे तो सुदामा की पैताने बैठे, अपने परम सखा के उन विवाई फटे, धूल-धूसरित पाँवों को अपने कोमल हाथों से सहला रहे थे।
कृष्ण की उंगलियाँ सुदामा के पाँवों के एक-एक घाव को ऐसे छू रही थीं, मानो वे घाव नहीं, मित्रता के पदक हों। वे अतीत की गलियों में खोए, अकेले ही बुदबुदा रहे थे, बचपन की शरारतें याद कर मुस्कुरा रहे थे।
तभी महारानी रुक्मिणी ने धीरे से उनके कंधे पर हाथ रखा। कृष्ण का ध्यान टूटा। उन्होंने पहले रुक्मिणी को देखा और फिर सोते हुए सुदामा को, मानो डर हो कि कहीं सखा की नींद न टूट जाए। रुक्मिणी का मूक संकेत समझकर वे धीरे से उठे और अपने निजी कक्ष की ओर चल दिए।
कक्ष में पहुँचते ही रुक्मिणी ने अपने मन में उमड़ रहे प्रश्नों के ज्वार को रोका नहीं। उन्होंने विस्मित होकर पूछा, “स्वामी! आज आपका यह रूप समझ से परे है।”
“आप, जिनके स्वागत के लिए बड़े-बड़े सम्राट तरसते हैं, वे एक दीन-हीन ब्राह्मण के आने की सूचना मात्र से अपना भोजन छोड़कर नंगे पाँव दौड़ पड़े? आप, जिन्हें जीवन का कोई भी दुःख विचलित नहीं कर पाया, गोकुल छोड़ते समय मैया यशोदा के आंसुओं ने भी जिन्हें नहीं रोका, आज वे उस मित्र के फटे पाँव देखकर फूट-फूटकर रो पड़े? आपने जल के पात्र को हाथ तक नहीं लगाया और अपने नयनों के जल से ही उनके चरण धो दिए?”
तभी सत्यभामा ने भी अपनी शंका व्यक्त की, “और नाथ! ये वही मित्र हैं न, जिन्होंने बचपन में गुरुमाता द्वारा दिए गए चने आपसे छिपाकर अकेले खा लिए थे? ऐसे ‘स्वार्थी’ मित्र के लिए आप त्रिलोक की संपदा लुटाने को तत्पर क्यों थे?”
कृष्ण के चेहरे पर एक अलौकिक मुस्कान तैर गई। उनकी आँखों में फिर से नमी उतर आई। उन्होंने कहा, “देवियों, तुम जिसे ‘स्वार्थ’ कह रही हो, वह त्याग की वह पराकाष्ठा है जिसका ऋण मैं कई जन्मों तक नहीं चुका सकता।”
कृष्ण का स्वर भारी हो गया, “सुदामा ने वे चने भूख के कारण नहीं खाए थे सत्यभामा। उसे ज्ञात था कि वे चने साधारण नहीं थे। वह जानता था कि उन चनों को चोर एक ब्राह्मणी के घर से चुराकर लाए थे, और उस ब्राह्मणी ने श्राप दिया था कि ‘जो भी इन चनों को खाएगा, वह जीवन भर घोर दरिद्रता भोगेगा।'”
रानियाँ स्तब्ध रह गईं। कृष्ण ने आगे कहा:
*> “आश्रम में जब हम लकड़ी बीन रहे थे, सुदामा को वह श्राप याद आ गया। उसने सोचा कि कृष्ण तो साक्षात ईश्वर का स्वरूप है, जगत का पालनहार है। यदि कृष्ण ने ये शापित चने खा लिए, तो वह दरिद्र हो जाएगा, और यदि ईश्वर दरिद्र हुआ, तो यह समस्त सृष्टि दरिद्र हो जाएगी, त्राहि-त्राहि कर उठेगी।”*
*> “सृष्टि को दुर्भाग्य से बचाने के लिए, मेरे सुदामा ने वह भीषण श्राप अपने माथे ले लिया। उसने जानबूझकर वे चने अकेले खाए ताकि दरिद्रता का विष वह स्वयं पी सके और उसका मित्र ‘कृष्ण’ सुखी रहे। उसने मेरे वैभव के लिए अपना जीवन भिक्षाटन में गुजार दिया।”*
रुक्मिणी की आँखों से झर-झर आँसू बहने लगे। उनके मुख से अनायास ही निकला, “इतना बड़ा त्याग! इतना निश्छल प्रेम!”
कृष्ण भावविह्वल होकर बोले, “रुक्मिणी, मेरा मित्र एक सच्चा ब्राह्मण है। और सच्चा ब्राह्मण वही है जो जगत के कल्याण के लिए विषपान कर ले। आज जब मैंने उसके पैरों में वे गहरे घाव देखे, तो मेरा ह्रदय फट गया। वे घाव गवाह हैं कि उसने मेरे सुख के लिए कितने कांटे चुभाए हैं।”
“संसार मुझसे केवल मांगता है, सब मेरे पास अपनी इच्छाओं की पूर्ति के लिए आते हैं। परंतु सुदामा… सुदामा वह है जिसने मुझे देने के लिए अपना सर्वस्व मिटा दिया। ऐसे मित्र के लिए यदि मैं तीनों लोक भी वार दूँ, तो वह कौड़ी के समान है।”
कक्ष के भीतर सन्नाटा था, केवल सिसकियों की आवाज थी। कृष्ण की आँखों में प्रेम के अश्रु थे, रानियाँ नतमस्तक थीं।
और उधर… कक्ष के द्वार के ठीक बाहर, दीवार से टिके सुदामा खड़े थे। उन्होंने सब सुन लिया था। उनकी आँखों से गंगा-यमुना बह रही थी। आज उन्हें पता चला कि उनका कन्हैया सब जानता था। उनका त्याग व्यर्थ नहीं गया। उस मौन रात्रि में, भक्त और भगवान के बीच प्रेम का एक नया अध्याय लिखा जा रहा था।
*🙏राधे राधे जय श्री कृष्ण