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मुर्गे की आख़िरी बाँग अस्मिता का सबक

गाँव के एक किनारे, मिट्टी की झोपड़ी में रहने वाला पप्पू एक दिन हाट से एक सुंदर मुर्गा खरीद कर ले आया। वह लाल कलगी वाला, चमकीले पंखों से सजा और बाँग देने में सबसे आगे था। हर सुबह उसकी “कुकड़ूँ-कू” की गूँज से गाँव के लोग उठते और दिन की शुरुआत करते।

 

पर पप्पू का मन कुछ और था। उसने कई बार सोचा—“अब इसका मांस काट दूँ, बहुत दिन पाल लिया।” पर सीधे मारने का हिम्मत नहीं हुई, इसलिए उसने चालाकी से एक तरीका निकाला।

पप्पू ने मुर्गे से कहा,

“सुनो, कल से अगर तुम बाँग दोगे तो मैं तुम्हें मार डालूँगा।”

 

मुर्गा चौंका, पर विनयपूर्वक बोला,

“ठीक है मालिक, जैसा आप चाहें।”

 

अगली सुबह जब सूरज की पहली किरणें फूटीं, मुर्गा चुप रहा। उसने हल्के से अपने पंख फड़फड़ाए, पर कोई आवाज़ नहीं निकाली। पप्पू ने सोचा—यह तो ठीक नहीं है।

 

गुस्से में पप्पू ने कहा, “कल से पंख भी नहीं फड़फड़ाना, नहीं तो वध कर दूँगा।”

 

दूसरे दिन मुर्गा और भी सतर्क हो गया। न बाँग दी, न पंख हिलाए—बस अपनी गर्दन ज़रा सी हिलाई कि मालिक फिर भड़क उठा। पप्पू ने निराश होकर अगले आदेश दिए, “कल से गर्दन भी नहीं हिलनी चाहिए।”

 

अब मुर्गा पूरी तरह सहम गया। अगले दिन वह एकदम स्थिर बैठा रहा, जैसे उसकी जान ही निकल गई हो। गाँव वाले भी हैरान थे कि इतना चुप्पी कैसे हो सकती है। पप्पू ने देखा कि मुर्गे ने अपनी हर प्राकृतिक क्रिया पर काबू पा लिया है—भय ने उसकी बोलती बंद कर दी थी।

 

पप्पू ने सोचा, “अब ये बिल्कुल मुर्गी बन गया! चलो, आख़िरी आदेश देता हूँ।” उसने व्यंग्य में कहा, “कल से अंडे देना शुरू कर दो, वरना काट दूँगा।”

 

मुर्गा कांप उठा। अंडे देना तो उसकी प्रकृति में ही नहीं था—यह तो उसकी असंभवता थी। उसकी आँखों में आँसू उतर आए।

 

पप्पू ने पूछा, “क्यों रो रहे हो? मौत से डर गए?”

 

मुर्गा ने धीमे से कहा, “नहीं मालिक, मैं मौत से नहीं डर रहा। मैं इसलिए रो रहा हूँ क्योंकि मैंने अपनी पहचान खो दी।

जब आपने बाँग रोकने को कहा, मैंने रोना बंद कर दिया।

जब पंख न फड़फड़ाने को कहा, मैंने झुक जाना चुना।

जब गर्दन न हिलाने को कहा, मैंने अपनी स्वाभाविक चाल को भी दबा लिया।

पर आज मुझे एहसास हुआ — जिस इंसान का इरादा ही मारने का हो, उसके सामने समर्पण कभी-कभी आत्मा की हत्या है।

 

काश! मैं उसी समय खुलकर बाँग दे देता और मर जाता—कम-से-कम मेरी पहचान बची रहती।”

 

मुर्गे की यह बात पप्पू के सीने पर ताड़नी बनकर तनी रही। उसकी आँखें झुक गईं। वह अचानक शर्म और पछतावे से भर उठा। उसे समझ में आ गया कि उसने सिर्फ अपनी भूख के लिए कितने कष्ट दिये और किसी की अस्मिता छीन ली।

 

उस दिन पप्पू ने मुर्गे को नहीं मारा। उसने उसे खुला छोड़ दिया और गाँववालों से कहा कि जीवों के साथ क्रूरता बंद करो। क्योंकि अब पप्पू जान गया था कि जीवन केवल साँस लेने का नाम नहीं—यह अपनी पहचान बनाए रखने का नाम है।

 

मुर्गे की आँखों में आँसू थे, पर उनमें अब एक नयी चमक थी—स्वाभिमान की चमक। उसने धीरे से सिर हिलाया और वही पुरानी बाँग नहीं दी, पर उसकी आत्मा जिंदा थी।

 

 

*संदेश:*

यह कहानी मुर्गे की नहीं, हमारी अस्मिता की बात है।

🌺 *आत्म-सम्मान सर्वोपरि है*: हमें कभी भी अपने आत्म-सम्मान, मौलिक पहचान और प्राकृतिक अभिव्यक्ति के साथ समझौता नहीं करना चाहिए, भले ही जान का खतरा क्यों न हो।

 

🌺 *​पहचान की रक्षा करें*: अपनी पहचान और प्रकृति को दबाकर, भय के कारण जीना, मृत्यु से भी बदतर हो सकता है, क्योंकि यह आत्मा की हत्या है।

 

🌺 *​अधिकार के लिए खड़े हों*: अन्याय या क्रूरता के सामने चुपचाप समर्पण करने से बेहतर है कि हम अपने अधिकार और अस्तित्व को बचाए रखने के लिए आवाज़ उठाएँ।

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