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मेषलग्न में विभिन्न ग्रहों के द्वादशभावफल विचार को आगे बडाते हुये आज मंगल पर चर्चा करते हैं।

मेष लग्न के लिए यह भाग सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है क्योंकि लग्नेश की स्थिति ही सम्पूर्ण कुण्डली का बल निर्धारित करती है।

 

अथ भौमफलविचारः

 

भूमिका: मङ्गल मेष लग्न का लग्नेश (शरीर) और अष्टमेश (आयु) है। लग्नेश होने से अष्टमेश का दोष मङ्गल को नहीं लगता। यह जातक के स्वास्थ्य, साहस, रक्त और ऊर्जा का मुख्य स्रोत है।

 

१. प्रथम भाव (लग्न) में मङ्गल (स्वगृही – रुचक योग):

 

महापुरुष योग: यहाँ मङ्गल अपनी मूलत्रिकोण राशि में होने से “रुचक महापुरुष योग” बनाता है।

 

फल: जातक शूरवीर, स्वाभिमानी और जन्मजात नेता होता है। शरीर में लालिमा होती है। सिर पर चोट का चिह्न हो सकता है।

 

स्वभाव: अत्यधिक क्रोधी और हठी। पुलिस, सेना या अग्नि सम्बन्धी कार्यों में विशेष सफलता मिलती है।

 

शास्त्रमत: “बाल्ये दुःखी, शूरः, साहसी, चञ्चलः…” (जातक आरम्भिक जीवन में संघर्ष करता है, फिर अपनी भुजाओं से भाग्य बनाता है)।

 

२. द्वितीय भाव (वृषभ) में मङ्गल:

 

फल: वाणी में कठोरता और आदेशात्मक स्वर होता है। कुटुम्ब में विवाद हो सकते हैं।

 

धन: जातक धन कमाने के लिए कठोर परिश्रम और संघर्ष करता है। धन संचय में कठिनाई आती है।

 

भोजन: उष्ण और तीखे भोजन का शौकीन होता है। मुख या दाँतों में कष्ट सम्भव है।

 

३. तृतीय भाव (मिथुन) में मङ्गल:

 

फल: जातक ‘महा-पराक्रमी’ होता है। शत्रुओं का नाश करने वाला।

 

भ्रातृसुख: छोटे भाई-बहनों से मतभेद या कष्ट (कारक भावनाशाय)।

 

विशेष: कानों में विकार हो सकता है। आत्महत्या का विचार या हताशा (यदि पीड़ित हो) आ सकती है, परन्तु साहस से उबर जाता है।

 

४. चतुर्थ भाव (कर्क) में मङ्गल (नीचस्थ):

 

फल: यहाँ मङ्गल २८ अंश तक ‘नीच’ का होता है। यह “मङ्गल दोष” की प्रबल स्थिति है।

 

सुख: माता को कष्ट, गृह क्लेश, और अग्नि भय। वाहन दुर्घटना की सम्भावना रहती है।

 

हृदय: छाती में जलन या हृदय रोग का भय। यदि ‘नीचभंग’ हो जाए, तो भूमि-भवन का अपार सुख मिलता है।

 

५. पञ्चम भाव (सिंह) में मङ्गल:

 

फल: मित्र सूर्य के घर में मङ्गल शुभ है।

 

सन्तान: प्रथम सन्तान के लिए कष्टकारक (गर्भपात का भय)। सन्तान शल्य क्रिया से हो सकती है।

 

बुद्धि: बुद्धि तीक्ष्ण और उग्र होती है। सट्टे या जुए की लत लग सकती है।

 

६. षष्ठ भाव (कन्या) में मङ्गल:

 

फल: ‘शत्रुहन्ता’। जातक शत्रुओं को कुचल देता है।

 

प्रतियोगिता: वाद-विवाद, कोर्ट-कचहरी और प्रतियोगिताओं में विजय।

 

रोग: रक्त विकार, फोड़े-फुंसी या जलने का भय रहता है। मामा पक्ष से तनाव।

 

७. सप्तम भाव (तुला) में मङ्गल:

 

फल: यह प्रबल “मांगलिक दोष” है।

 

विवाह: जीवनसाथी के साथ निरन्तर कलह। जीवनसाथी का स्वभाव क्रोधी या वर्चस्ववादी हो सकता है। विवाह में विलम्ब या विच्छेद का भय।

 

व्यापार: साझेदारी में झगड़े होते हैं।

 

८. अष्टम भाव (वृश्चिक) में मङ्गल (स्वगृही):

 

फल: यहाँ मङ्गल अपने ही घर में है।

 

आयु: जातक दीर्घायु होता है (आयु भाव का स्वामी आयु भाव में)।

 

विपत्ति: जीवन में अचानक दुर्घटनाएँ होती हैं परन्तु जातक बच जाता है। बवासीर या गुदा रोग का भय।

 

धन: ससुराल पक्ष से धन लाभ हो सकता है।

 

९. नवम भाव (धनु) में मङ्गल:

 

फल: मित्र गुरु की राशि में मङ्गल जातक को अभिमानी धर्मात्मा बनाता है।

 

भाग्य: अपने पौरुष से भाग्योदय करता है।

 

पिता: पिता से वैचारिक मतभेद रहते हैं। विदेश यात्रा के योग बनते हैं।

 

१०. दशम भाव (मकर) में मङ्गल (उच्चस्थ – रुचक योग):

 

फल: यह मङ्गल की सर्वश्रेष्ठ स्थिति है। (उच्च राशि + दिग्बल)।

 

कुलदीपक: जातक सेनापति, पुलिस कमिश्नर, सर्जन, या बड़ा उद्योगपति बनता है।

 

कीर्ति: समाज में भय और सम्मान दोनों प्राप्त होते हैं। शत्रु इसके नाम से कांपते हैं।

 

सम्पत्ति: अचल सम्पत्ति का स्वामी होता है।

 

११. एकादश भाव (कुम्भ) में मङ्गल:

 

फल: भूमि-सम्पत्ति के क्रय-विक्रय से लाभ।

 

मित्र: मित्रों से धोखा मिल सकता है।

 

सन्तान: सन्तान प्राप्ति में बाधा या सन्तान को कष्ट।

 

१२. द्वादश भाव (मीन) में मङ्गल:

 

फल: यह भी “मांगलिक दोष” (कुज दोष) है।

 

व्यय: मुकदमों, रोगों और व्यर्थ के विवादों में धन नाश।

 

शय्या सुख: नेत्र रोग और निद्रा में बाधा। रक्तचाप (BP) की समस्या।

संघर्ष कब खत्म होगा जीवन से।

आपके उच्च ग्रह कैसा फल देंगे।

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