
भारत की आध्यात्मिक और सामाजिक चेतना के इतिहास में स्वामी दयानन्द सरस्वती का नाम अत्यंत श्रद्धा और सम्मान के साथ लिया जाता है। वे केवल एक संन्यासी या धर्मगुरु ही नहीं थे, बल्कि एक महान समाज सुधारक, राष्ट्रचिंतक और वैदिक पुनर्जागरण के प्रबल समर्थक भी थे। दयानन्द सरस्वती जयंती उनके जन्मदिवस के उपलक्ष्य में मनाई जाती है, जो हमें उनके विचारों, सिद्धांतों और समाज के प्रति उनके योगदान को स्मरण करने का अवसर प्रदान करती है। यह दिवस भारतीय समाज को अंधविश्वास, कुरीतियों और सामाजिक बुराइयों से मुक्त करने के उनके अथक प्रयासों को याद करने का दिन है।
स्वामी दयानन्द सरस्वती का जन्म 12 फरवरी 1824 को गुजरात के टंकारा नामक स्थान पर हुआ था। उनका बाल्यकाल का नाम मूलशंकर था। उनके पिता करशनजी तिवारी एक धार्मिक और समृद्ध ब्राह्मण थे। बचपन से ही मूलशंकर का झुकाव धार्मिक विषयों की ओर था। वे अत्यंत जिज्ञासु और तर्कशील स्वभाव के थे। शिवरात्रि के अवसर पर एक घटना ने उनके जीवन की दिशा ही बदल दी। उन्होंने देखा कि जिस शिवलिंग की पूजा की जा रही है, उस पर चूहे चढ़-उतर रहे हैं। इससे उनके मन में प्रश्न उठा कि जो स्वयं को चूहों से नहीं बचा सकता, वह संसार की रक्षा कैसे कर सकता है? यही प्रश्न उनके भीतर सत्य की खोज की ज्वाला बन गया।
युवावस्था में उन्होंने घर त्याग दिया और सत्य की खोज में निकल पड़े। अनेक वर्षों तक उन्होंने विभिन्न स्थानों की यात्रा की और विद्वानों से ज्ञान प्राप्त किया। अंततः उन्हें स्वामी विरजानन्द का सान्निध्य प्राप्त हुआ, जिन्होंने उन्हें वेदों का गहन अध्ययन कराया। गुरु की प्रेरणा से उन्होंने संकल्प लिया कि वे वेदों के सच्चे ज्ञान का प्रचार करेंगे और समाज में फैली अज्ञानता को दूर करेंगे।
स्वामी दयानन्द सरस्वती का प्रमुख संदेश था – “वेदों की ओर लौटो”। उनका विश्वास था कि वेद ही सच्चे ज्ञान का स्रोत हैं और उनमें जीवन के प्रत्येक क्षेत्र के लिए मार्गदर्शन निहित है। उन्होंने मूर्तिपूजा, जातिवाद, बाल विवाह, सती प्रथा और अन्य सामाजिक कुरीतियों का खुलकर विरोध किया। उनके विचारों ने समाज में एक नई चेतना का संचार किया। उन्होंने स्त्री शिक्षा और विधवा विवाह का समर्थन किया, जो उस समय अत्यंत क्रांतिकारी विचार माने जाते थे।
सन 1875 में उन्होंने ‘आर्य समाज’ की स्थापना की। आर्य समाज का उद्देश्य वेदों के सिद्धांतों का प्रचार-प्रसार करना और समाज में नैतिक तथा सामाजिक सुधार लाना था। आर्य समाज ने शिक्षा के क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण कार्य किए। देशभर में गुरुकुलों और विद्यालयों की स्थापना की गई, जिनमें वैदिक ज्ञान के साथ-साथ आधुनिक शिक्षा भी दी जाती थी। इससे भारतीय समाज में आत्मगौरव और राष्ट्रीय चेतना का विकास हुआ।
स्वामी दयानन्द ने ‘सत्यार्थ प्रकाश’ नामक ग्रंथ की रचना की, जो उनके विचारों का प्रमुख आधार है। इस ग्रंथ में उन्होंने धर्म, समाज और राजनीति से संबंधित अनेक विषयों पर अपने स्पष्ट और तर्कपूर्ण विचार प्रस्तुत किए। उन्होंने धर्म को आडंबर और पाखंड से मुक्त करने का प्रयास किया। उनका मानना था कि सच्चा धर्म वही है जो सत्य, अहिंसा, न्याय और मानवता पर आधारित हो।
दयानन्द सरस्वती ने केवल धार्मिक सुधार ही नहीं किए, बल्कि राष्ट्रीय जागरण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनके विचारों से अनेक स्वतंत्रता सेनानियों को प्रेरणा मिली। उन्होंने भारतीयों में आत्मविश्वास और स्वाभिमान की भावना जागृत की। उनका स्पष्ट मत था कि भारत को विदेशी शासन से मुक्त होना चाहिए और भारतीयों को अपने धर्म, संस्कृति और परंपराओं पर गर्व करना चाहिए। इस प्रकार वे अप्रत्यक्ष रूप से स्वतंत्रता आंदोलन के अग्रदूतों में गिने जाते हैं।
दयानन्द सरस्वती का जीवन संघर्ष और त्याग से भरा हुआ था। उन्होंने सत्य और न्याय के मार्ग पर चलते हुए अनेक विरोधों का सामना किया, किंतु अपने सिद्धांतों से कभी समझौता नहीं किया। उनका जीवन हमें यह सिखाता है कि यदि व्यक्ति में दृढ़ संकल्प और सच्चाई के प्रति निष्ठा हो, तो वह समाज में सकारात्मक परिवर्तन ला सकता है। 30 अक्टूबर 1883 को उन्होंने इस संसार को अलविदा कहा, किंतु उनके विचार आज भी जीवंत हैं।
दयानन्द सरस्वती जयंती के अवसर पर देशभर में विभिन्न कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। आर्य समाज के मंदिरों और शिक्षण संस्थानों में हवन, प्रवचन, संगोष्ठियाँ और सांस्कृतिक कार्यक्रम होते हैं। इस दिन उनके जीवन और शिक्षाओं पर विशेष व्याख्यान दिए जाते हैं, ताकि नई पीढ़ी उनके आदर्शों से प्रेरणा ले सके। विद्यालयों और महाविद्यालयों में निबंध प्रतियोगिताएँ, भाषण और वाद-विवाद प्रतियोगिताएँ भी आयोजित की जाती हैं।
आज के समय में, जब समाज अनेक प्रकार की चुनौतियों का सामना कर रहा है, स्वामी दयानन्द के विचार और भी अधिक प्रासंगिक हो उठते हैं। उन्होंने तर्क, शिक्षा और समानता पर आधारित समाज की कल्पना की थी। यदि हम उनके सिद्धांतों को अपनाएँ, तो सामाजिक समरसता और नैतिक मूल्यों को सुदृढ़ किया जा सकता है। उनका संदेश हमें अंधविश्वास से दूर रहकर विवेकपूर्ण जीवन जीने की प्रेरणा देता है।
अंततः कहा जा सकता है कि दयानन्द सरस्वती जयंती केवल एक महान संत के जन्मदिन का उत्सव नहीं है, बल्कि यह आत्मचिंतन और समाज सुधार का अवसर भी है। यह दिन हमें उनके आदर्शों को अपनाने और सत्य, ज्ञान तथा मानवता के मार्ग पर चलने का संकल्प दिलाता है। स्वामी दयानन्द सरस्वती का जीवन और उनका संदेश सदैव भारतीय समाज को दिशा देता रहेगा और आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित करता रहेगा।