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कथास्तू - खरोंच

सुखदा अभी-अभी ऑफिस से आई थी। घर में दाख़िल होते ही उसी थकी हुई हालत में वह सोफ़े पर बैठ गई।
“चाय पी लूँ और फिर खाना बनाना शुरू करूँ”—ऐसा उसने कुछ देर बाद सोचा।
वह उठने ही वाली थी कि तभी दरवाज़े की बेल बज गई।

सोफ़े से उठने में उसे थोड़ा समय लगा, तब तक फिर से बेल बज गई।
उसने जल्दी-जल्दी दरवाज़ा खोला, लेकिन तब तक तीसरी बार बेल बज चुकी थी।
दरवाज़े के बाहर बोपर्डीकर खड़े थे।

“अरे… बोपर्डीकर काका आप…? नमस्कार। आइए… अंदर आइए ना…”
सुखदा की आवाज़ में आश्चर्य था।

वह और भी कुछ कहने वाली थी, तभी चिड़चिड़ी आवाज़ में वे बोले—

“मिसेज़ देशमुख, मेरे पास घर के अंदर आने का समय नहीं है। पहले अपने राघव को बाहर बुलाइए और मेरे सामने उसके कान के नीचे ज़ोरदार तमाचा लगाइए। आप उसे मारेंगी या मैं उसे सबक सिखाऊँ?”

उसके पैरों की आग सिर तक चढ़ गई थी, लेकिन खुद को सँभालते हुए और आवाज़ पर नियंत्रण रखते हुए वह बोली—

“पहले अंदर आइए, फिर बात करते हैं।”

“मैं मौसम की बातें करने नहीं आया हूँ। आपके बेटे की शिकायत करने आया हूँ।
आपके बेटे ने मेरी गाड़ी पर खरोंचें मारी हैं। सीसीटीवी में सब देख लिया है और तभी आपके पास आया हूँ।”

“ठीक है। संयोग से कल मेरी छुट्टी है। आप जिस गैरेज में कहेंगे, कल हम वहाँ चलेंगे। जो भी खर्च होगा, मैं दे दूँगी। ओके?”

“नहीं… ओके नहीं। पहले आप उसे बाहर बुलाइए और मेरे सामने उसकी अच्छी तरह पिटाई कीजिए।”

बोपर्डीकर किसी की बात सुनने की हालत में नहीं थे।
सुखदा के हाथों अपने सामने राघव को पिटवाने की उनकी तीव्र इच्छा थी।

उसने शांति से उनकी ओर देखा और कहा—

“आपको जो कहना था, कह चुके? अगर हो गया हो तो मैं अब रसोई में जा रही हूँ।
चाय पीकर खाना बनाऊँगी। अगर आपको अभी भी कुछ कहना है तो अंदर आकर बैठिए।
चाय पीते-पीते बात करेंगे।”

उसकी बातों से वह ज़रा भी विचलित नहीं हुई—यह देखकर बोपर्डीकर घबरा गए।
उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि क्या कहें।

“ठीक है… खर्च तो आपको देना ही पड़ेगा।
लेकिन राघव मुझे मिलना चाहिए। उसे अच्छा सबक सिखाए बिना मैं नहीं छोड़ूँगा…”
ऐसा बड़बड़ाते हुए बोपर्डीकर चले गए।

राघव कहीं अपनी बेडरूम में किसी कोने में बैठा उसकी राह देख रहा होगा—यह सुखदा जानती थी।
लेकिन जैसे कुछ हुआ ही नहीं हो, वह फ्रेश होकर काम में लग गई।

माँ का यह शांत रहना राघव को असह्य लग रहा था।
वह बार-बार सोच रहा था कि जब माँ प्रतिक्रिया देगी, तब उसे क्या कहना है।
राघव इंतज़ार कर रहा था, लेकिन वह पल आ ही नहीं रहा था।

पापा तो बेफ़िक्र हैं—उन्हें पता चलेगा तो हँसते-हँसते पीठ पर एक धप्पड़ मारेंगे और नकली गुस्से में बस इतना कहेंगे—
“फिर ऐसा मत करना रे…”
यह उसे पूरा भरोसा था।
मसला माँ का था। उसका सामना कैसे करना है, उसे समझ नहीं आ रहा था।

“राघव, चाय पिएगा?”
उसने बेडरूम के दरवाज़े से ही पूछा।

“नहीं।”
भारी आवाज़ में राघव ने जवाब दिया।

असल में राघव को माँ के साथ चाय पीते हुए बातें करना बहुत पसंद था।
दिनभर की कहानियाँ कब माँ के कानों में डालूँ—ऐसा उसे लगता रहता था।

“आज क्या सीन हुआ पता है…”
इस वाक्य से शुरुआत होती तो एक-दूसरे में गुँथे कई किस्से सुनने को मिलते।
सुखदा को यह अच्छी तरह पता था।

“एक सीन से शुरुआत होती है और आगे पूरा स्क्रीनप्ले सुनने को मिलता है।”
सुखदा ने एक बार मज़ाक में उससे कहा था।
लेकिन राघव को फर्क नहीं पड़ा।
उसके पास रोज़ नई कहानियाँ तैयार रहती थीं।

खाना बनाते-बनाते सुखदा ने पति को मैसेज किया और जो हुआ था उसकी थोड़ी जानकारी दी।
मैसेज पढ़कर अमर ने जवाब भेजा—

“मुझे पूरा भरोसा है कि हमेशा की तरह तुम इस बात को भी बहुत अच्छे से सँभाल लोगी।
मुझे आने में काफ़ी देर होगी। तुम लोग खाना खा लेना।
मैं आकर खा लूँगा।”

अमर का मैसेज पढ़कर सुखदा संतोष से मुस्कुरा दी।

उसने डाइनिंग टेबल पर राघव की थाली लगाई और उसे आवाज़ दी।
खाते समय सुखदा ने राघव से कुछ नहीं पूछा।
राघव भी बात करने की स्थिति में नहीं था।

जब अमर आया, तब राघव अपने कमरे में सो चुका था।
सुखदा भी गहरी नींद में थी।

सुबह अमर उठा तो आठ बज चुके थे।
सुखदा घर में नहीं थी।
राघव अभी भी सो रहा था।

सुखदा कहाँ गई—उसे समझ नहीं आया।
एक पल के लिए उसने कई संभावनाओं पर सोचा और अगले ही पल उसे अंदाज़ा हो गया।
कल की बात पूरी करने वह बोपर्डीकर के घर गई होगी—यह उसने समझ लिया।

घर की बेल बजने पर जब बोपर्डीकर ने दरवाज़ा खोला, सामने सुखदा को देखकर वे चौंक गए।
इतनी सुबह वह आएगी—यह उन्होंने सोचा भी नहीं था।

कल की घटना के बाद बोपर्डीकर को संभलने में काफ़ी समय लगा था।
रात भर उन्हें नींद भी ठीक से नहीं आई थी।

उन्होंने दरवाज़ा तो खोल लिया, लेकिन क्या कहें—यह समझ नहीं आ रहा था।

“नमस्कार बोपर्डीकर।
मैं आपकी गाड़ी देखकर आ रही हूँ।
जहाँ-जहाँ छोटे-बड़े ओरखड़े थे, उन सबकी मैंने मोबाइल से तस्वीरें लीं
और हमारे गैरेज वाले को व्हाट्सऐप कर दीं।
उसने जो अनुमानित खर्च बताया, उससे कहीं ज़्यादा पैसे मैं आपको दे रही हूँ।”

यह कहकर सुखदा ने हाथ में पकड़ा पैसों का लिफ़ाफ़ा उनके हाथ में थमा दिया।
बोपर्डीकर ने यंत्रवत हाथ आगे बढ़ाया,
लेकिन लिफ़ाफ़ा हाथ में आते ही उन्हें अपनी गलती समझ आ गई।

“आपने पूरी गाड़ी के फ़ोटो ले लिए क्या?
अरे… राघव ने तो एक-दो जगह ही खरोंचें मारी थीं।
बाक़ी सब पहले से थीं।”

“कोई बात नहीं… एक ही बार में सब काम करवा लीजिए।
और हाँ, अगर और पैसे लगें तो बेझिझक बताइए।”

वह शांत लेकिन दृढ़ स्वर में बोल रही थी।

यह सब देखने के लिए श्रीमती बोपर्डीकर और उनका बेटा भी दरवाज़े पर आ गए।

“दरवाज़े पर खड़े-खड़े क्यों बात कर रही हैं… अंदर आइए।”
श्रीमती बोपर्डीकर ने विनती के स्वर में कहा।

“फिर कभी आऊँगी। आज रविवार है।
छुट्टी के दिन के काम मेरा इंतज़ार कर रहे हैं।”
यह कहते हुए सुखदा सहजता से मुड़ी और चली गई।

श्रीमती बोपर्डीकर अपने पति के हाथ में पकड़े लिफ़ाफ़े को उत्सुकता से देख रही थीं।
अब कल का पूरा रामायण सुनना पड़ेगा—इस सोच से बोपर्डीकर बेचैन हो गए।

एक-एक शब्द जुटाते हुए, हिम्मत करके उन्होंने कल की घटना सुनाई।

“पापा, जब मैं छोटा था और क्रिकेट खेलते हुए पवार काका की खिड़की का शीशा टूट गया था…
क्या आपने उन्हें पैसे दिए थे?”

बेटे ने बिल्कुल सही जगह उँगली रखी थी।

“और ये मारपीट की बातें कैसी कर रहे थे आप?
अभी तुरंत उठिए और पैसे देकर आइए।
जो हुआ उसके लिए माफ़ी भी माँगिए। समझे?”
श्रीमती बोपर्डीकर ने जीवन में पहली बार पति पर आवाज़ ऊँची की थी।

“अरे बोपर्डीकर काका आप…?
कितना बड़ा सौभाग्य! कितने दिनों बाद मुलाक़ात हो रही है…”
यह कहते हुए अमर ने उनका ज़ोरदार स्वागत किया।

“सुखदा, बोपर्डीकर काका आए हैं। चाय ले आओ…”

“अरे, मैं चाय पीकर आया हूँ।”

“हमारे साथ फिर से पी लीजिए…
हमारी तो पहली चाय अभी तक हुई ही नहीं है।”
बोलने का मौका दिए बिना अमर ने उनका हाथ पकड़कर सोफ़े पर बिठा लिया।

सुखदा जब चाय लेकर बाहर आई,
अमर अकेला ही बोलता जा रहा था
और बोपर्डीकर “हूँ… हूँ…” कहते हुए असहज बैठे थे।

सुखदा ने टेबल पर बिस्किट की प्लेट और चाय का ट्रे रख दिया।

बोपर्डीकर की सुखदा की ओर देखने की हिम्मत नहीं हो रही थी।
फिर भी पूरी ताक़त जुटाकर वे बोले—

“कल मेरी गलती थी। बोलते-बोलते मैं संतुलन खो बैठा।
आप ये पैसे वापस ले लीजिए। तभी मैं चाय पीऊँगा।”

स्नेहभरी नज़र से उनकी ओर देखते हुए सुखदा बोली—

“काका, अगर आपने राघव को माफ़ कर दिया, तभी मैं पैसे लूँगी।”

“कल ग़ुस्से में मैं कुछ भी बोल गया।
मेरा बेटा आज भले ही शादी की उम्र का हो गया हो,
लेकिन वह भी कभी बच्चा था।
उसने भी शरारतें की थीं।
इसलिए राघव की शरारत भी मुझे समझनी चाहिए थी।
लेकिन कल मैं ठीक मनःस्थिति में नहीं था…”

“काका, आप जैसे बड़ों का डर होना ज़रूरी है।
इतना दिल पर मत लीजिए।
अब पहले चाय पी लीजिए, फिर बात करेंगे।”
अमर ने उन्हें बोलने से रोका और चाय पीने को कहा।

“काका, कल आपको लगा होगा कि मैं राघव की गलती पर पर्दा डाल रही हूँ।
लेकिन ऐसा नहीं है।
राघव ने जो किया, वह ग़लत है।
लेकिन मारना समाधान नहीं है—यह मैं अपने अनुभव से कह रही हूँ।”

यह कहते हुए सुखदा ने अपने दोनों कलाई दिखाए।
दोनों पर हल्के काले निशान थे।

“काका, हमारे पड़ोस में एक लड़की रहती थी।
उसके पापा ने उसे नई साइकिल दिलाई थी।
‘मुझे साइकिल चलाने दोगी क्या?’
मैंने एक बार उससे पूछा।
वह तिरछी हँसी हँसकर बिना कुछ बोले चली गई।

मुझे बहुत ग़ुस्सा आया।
मुझे पता था कि वह साइकिल बाहर ताला लगाकर रखती है।
रात को मैंने अपने कंपास बॉक्स से नुकीला औज़ार निकाला।
बिना आवाज़ किए बाहर जाकर उसकी साइकिल की सीट पर खरोंचें डाल दीं।

अगली सुबह उस लड़की ने मेरी माँ से कहा कि यह काम मैंने ही किया है।
माँ ने कंपास बॉक्स खोला।
औज़ार की नोक पर सीट कवर के रेशे चिपके हुए थे।

बिना कुछ बोले माँ ने करछुल को आग पर लाल होने तक तपाया।
मैं गिड़गिड़ा रही थी, ज़ोर-ज़ोर से रो रही थी।
लेकिन माँ शांत थीं।
उन्होंने मेरे हाथ कसकर पकड़े
और उसी लड़की के सामने
मेरी दोनों कलाई पर गरम करछुल के निशान दे दिए।”

सुखदा पलभर रुकी, गहरी साँस ली और बोली—

“काका…
गाड़ी की खरोंचें मिटाई जा सकती हैं,
लेकिन मन पर पड़े घाव नहीं मिटते…
वे ज़िंदगी भर दर्द देते रहते हैं।”

आँसू छिपाने के लिए सुखदा जल्दी से उठी
और खाली चाय के कप लेकर रसोई में चली गई।

राघव सिसकियाँ भरते हुए अंदर खड़ा था।
माँ को देखते ही उसने उसे कसकर गले लगा लिया।
अब दोनों ने अपने आँसुओं को खुलकर बहने दिया था।

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