
दत्त संप्रदाय के महान योगी, गुरु और समाज-सुधारक
भारत की आध्यात्मिक परंपरा में अनेक संतों और महापुरुषों ने जन्म लेकर मानवता को धर्म, ज्ञान और भक्ति का मार्ग दिखाया। ऐसे ही एक दिव्य संत थे श्री नरसिम्हा सरस्वती, जिन्हें भगवान दत्तात्रेय का द्वितीय अवतार माना जाता है। उनकी जयंती को श्री नरसिम्हा सरस्वती जयंती के रूप में पूरे भारत, विशेषकर महाराष्ट्र, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाया जाता है।
यह जयंती न केवल एक संत के जन्म का उत्सव है, बल्कि सनातन धर्म, वेदांत, गुरु-शिष्य परंपरा और समाज में नैतिक मूल्यों की पुनर्स्थापना का स्मरण भी है।
श्री नरसिम्हा सरस्वती का जन्म और बाल्यकाल
श्री नरसिम्हा सरस्वती का जन्म शक संवत 1299 (ईस्वी सन् 1378) में महाराष्ट्र के करंजा नगर में हुआ था। उनके पिता का नाम माधवराव और माता का नाम अंबाभवानी था। बाल्यकाल में उनका नाम नरसिंह भट्ट रखा गया।
कहा जाता है कि जन्म के समय वे मूक (बोल नहीं पाते थे) थे। माता-पिता अत्यंत दुखी रहते थे और भगवान दत्तात्रेय की उपासना करते थे। एक दिन माता के गहन तप और प्रार्थना के फलस्वरूप बालक ने अचानक “ॐ नमः शिवाय” का उच्चारण किया। यह घटना उनके दिव्य स्वरूप का पहला संकेत मानी जाती है।
संन्यास दीक्षा और आध्यात्मिक यात्रा
युवावस्था में प्रवेश करते ही नरसिंह भट्ट का मन सांसारिक विषयों से विरक्त हो गया। उन्होंने माता-पिता की अनुमति लेकर संन्यास ग्रहण किया और उनका नाम पड़ा — श्री नरसिम्हा सरस्वती।
संन्यास के पश्चात उन्होंने काशी, प्रयाग, बदरिकाश्रम, द्वारका, गया आदि तीर्थों की यात्रा की। वे वेद, उपनिषद, ब्रह्मसूत्र और गीता के महान ज्ञाता थे। उनका मुख्य उद्देश्य था:
दत्त संप्रदाय का पुनर्जागरण
उस काल में समाज में धर्म के नाम पर आडंबर और अज्ञान फैला हुआ था। श्री नरसिम्हा सरस्वती ने दत्त संप्रदाय को पुनः जीवंत किया। वे स्वयं को केवल संत नहीं, बल्कि गुरु मानते थे।
उनका संदेश स्पष्ट था —
“गुरु के बिना ज्ञान संभव नहीं।”
उन्होंने लोगों को बताया कि गुरु ही ब्रह्मा, विष्णु और महेश हैं। गुरु सेवा और भक्ति को उन्होंने मोक्ष का सरल मार्ग बताया।
श्रीपाद श्रीवल्लभ और नरसिम्हा सरस्वती
दत्त परंपरा के अनुसार, भगवान दत्तात्रेय के तीन प्रमुख अवतार माने जाते हैं:
श्री नरसिम्हा सरस्वती ने अपने प्रवचनों में श्रीपाद श्रीवल्लभ के सिद्धांतों को आगे बढ़ाया और उन्हें जन-जन तक पहुँचाया।
गाणगापुर और भीमाशंकर में तपस्या
श्री नरसिम्हा सरस्वती ने अपने जीवन का बड़ा भाग कर्नाटक के गाणगापुर में व्यतीत किया। गाणगापुर को आज भी दत्त संप्रदाय की राजधानी माना जाता है।
उन्होंने जीवन के अंतिम वर्षों में भीमाशंकर के निकट अमरजापुर में तपस्या की और वहीं निजधाम गमन किया। मान्यता है कि वे आज भी सूक्ष्म रूप में भक्तों का मार्गदर्शन करते हैं।
श्री गुरु चरित्र और शिक्षाएँ
श्री नरसिम्हा सरस्वती के जीवन और उपदेशों का वर्णन “श्री गुरु चरित्र” ग्रंथ में मिलता है। यह ग्रंथ दत्त भक्तों के लिए अत्यंत पूजनीय है।
उनकी प्रमुख शिक्षाएँ थीं:
वे कहते थे कि सच्चा धर्म वही है जो मनुष्य को विनम्र और करुणाशील बनाए।
श्री नरसिम्हा सरस्वती जयंती का महत्व
यह जयंती सामान्यतः मार्गशीर्ष मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को मनाई जाती है। इस दिन भक्त:
यह दिन गुरु भक्ति, आत्मचिंतन और साधना के लिए अत्यंत शुभ माना जाता है।
आज के युग में श्री नरसिम्हा सरस्वती की प्रासंगिकता
आज के भौतिकवादी और तनावपूर्ण युग में श्री नरसिम्हा सरस्वती की शिक्षाएँ अत्यंत प्रासंगिक हैं। उन्होंने सिखाया कि:
उनका जीवन हमें यह प्रेरणा देता है कि साधारण जीवन जीते हुए भी आध्यात्मिक ऊँचाइयों को प्राप्त किया जा सकता है।
श्री नरसिम्हा सरस्वती जयंती केवल एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि गुरु परंपरा, सनातन मूल्यों और आत्मिक जागरण का पर्व है। उनका जीवन त्याग, तप, करुणा और ज्ञान का अद्भुत संगम था।
आज भी उनके नाम-स्मरण मात्र से भक्तों को शांति, शक्ति और मार्गदर्शन की अनुभूति होती है। उनका संदेश हमें यह सिखाता है कि गुरु कृपा से ही जीवन का अंधकार दूर होता है और सत्य का प्रकाश प्राप्त होता है।
“जय गुरु दत्त। जय श्री नरसिम्हा सरस्वती।” 🙏