
चैत्रमास की कृष्णपक्ष त्रयोदशी शतभिषा नक्षत्र मंगलवार श्रेष्ठ फलदायी मानी जाती है।*
*💠वारुणेनसमायुक्ता मधो: कृष्णा त्रयोदशी।*
*💠गंगायाः यदि लभ्येत सूर्यग्रहशतैः समा॥*
(स्कन्द पुराण)
*🌕भावार्थ —*
चैत्र कृष्ण त्रयोदशी तिथि के दिन वारुणी एवं महावारुणी पर्व होता है। स्कन्द पुराण में कहा है वरणाशतभिषा नक्षत्र से युक्त चैत्रमास के कृष्णपक्ष की त्रयोदशी तिथि के दिन यदि काशी में (वारणा संगम) गंगा जी का दर्शन और स्नान प्राप्त हो जाए, तो वह सौ सूर्यग्रहण में स्नान करने के समान फल देता है।
अतः यदि उत्तरवाहिनी गंगा, उनमें भी काशी प्राप्त हो जाए, तो हजार गुना अधिक सूर्य ग्रहण फल प्राप्त होता है।
उत्तरवाहिनी गंगा, उनमें भी काशी प्राप्त हो जाए तो हजार गुना अधिक सूर्य ग्रहण फल प्राप्त होता है।
*💠शनिवारसमायुक्ता सा महावारुणी स्मृता।*
*💠गंगायां यदि लभ्येत कोटि सूर्यग्रहैः समा॥*
वह शनिवार से युक्त हो तो महावारुणी होती है। कृष्ण त्रयोदशी के दिन गंगा जी में स्नान प्राप्त हो जाए तो करोड़ों सूर्यग्रहण में स्नान करने के समान फल प्राप्त होता है।
*💠शुभयोगसमायुक्ता शनौ: शतभिषा यति।*
*💠महामहेति विख्याता त्रिकोटिकुलमुद्धरेत्॥*
यदि शनिवार, शतभिषा नक्षत्र तथा शुभ योग से युक्त हो, तो उस दिन वारुणी को महामहावारुणी कहते हैं। इस महावारुणी पर्व में संगम गंगा आदि नदियों में स्नान और दान करने से तीन करोड़ कुलों का उद्धार हो जाता है।
*💠मधु कृष्ण त्रयोर्दश्यां रात्रौ शतभिषा युता।*
*💠वारुणीति समाख्याता शुभे तु महती स्मृता॥*
कल्पतरु में भी इसी प्रकार से मिलता है — शनिवार तथा शतभिषा नक्षत्र से युक्त चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि को वारुणी कहा जाता है। शुभ योग से युक्त होने पर महावारुणी हो जाती है।
चैत्र कृष्ण त्रयोदशी तिथि के दिन महावारुणी या वारुणी पर्व के अवसर पर काशीपुरी में अनेक संगम आदि स्थानों में जहाँ सुविधा हो, वहीं स्नान तथा यथाशक्ति दान व महादान करना चाहिए। अन्य तीर्थों में स्नान करने से जो फल मिलता है, उसका सहत्र शतगुण फल यहाँ प्राप्त होता है।
काशीपुरी के उत्तरवाहिनी गंगा जी संगम में स्नान करने से फल मिलता है।
*♦️वारुणी योग के तीन प्रकार* माना जाता है कि वारुणी योग तीन तरह से बनता है, जिसके परिणामस्वरूप इसका महत्व उत्तरोत्तर बढ़ता जाता है। यह योग मुख्य रूप से महीने, नक्षत्र, वार और शुभ योगों के आधार पर अलग-अलग रूपों में शुभता प्रकट करता है।
वारुणी योग के संबंध में भी कई मत प्रचलित हैं। वारुणी योग के उल्लेख के साथ-साथ यह भी बताया गया है कि महावारुणी योग फाल्गुन, चैत्र और मार्गशीर्ष माह में आता है।
वारुणी योग चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि को शतभिषा नक्षत्र होने पर “वारुणी योग” का निर्माण होता है।
महावारुणी योग चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि, शनिवार के दिन शतभिषा नक्षत्र होने पर “महावारुणी योग” का निर्माण होता है।
महामहावारुणी योग “महामहावारुणी योग” तब बनता है जब चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि को शनिवार के दिन शुभ योग के साथ शतभिषा नक्षत्र होता है। वारुणी योग का पौराणिक महत्व वारुणी योग के बारे में पौराणिक कथाओं में वारुणी योग को विभिन्न तरीकों से परिभाषित किया गया है। ऐसा माना जाता है कि वारुणी योग चैत्र, फाल्गुन, मार्गशीर्ष आदि महीनों में होता है। भविष्यपुराण के अनुसार, जब चैत्र माह के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि शनिवार या शतभिषा नक्षत्र में होती है, तब महावारुणी पर्व होता है। इस अवधि में पवित्र नदियों में किया गया स्नान, दान और श्राद्ध अक्षय फल प्रदान करता है।
*💠चैत्रे मासि सिताष्टम्यां शनौ शतभिषा यदि ।*
*💠गंगाया यदि लभ्येत सूर्यग्रहशतैः समा ।।*
*💠सेयं महावारुणीति ख्याता कृष्णत्रयोदशी ।*
*💠अस्यां स्नानं च दानं च श्राद्धं वाक्षयमुच्यते ।।*
*💠चैत्रे मासि सीताष्टमयां शनौ शतभिषा यदि।*
*💠गंगाया यदि लभ्येत सूर्यग्रहशतैः समा।*
*💠सेयं महावारुणीति ख्याता कृष्णत्रयोदशी।*
*💠अस्यं स्नानं च दानं च श्राद्धं वक्षायमुच्यते।*
*💠नारदपुराण वरुणेन समाचारा माधौ कृष्णा त्रयोदशी।।*
*💠गंगायां यदि लभ्येत् सूर्यग्रहशतैः समा।।*
*💠वरुणेन समायुक्त माधौ कृष्ण त्रयोदशी।*
*💠गंगायां यदि लभ्येत सूर्यग्रहशतैः समा।*
*💠स्कंदपुराण वरुणेन समाहार माधौ कृष्ण त्रयोदशी।*
*💠गंगायां यदि लभ्येत् सूर्यग्रहशतैः समा॥*
*💠सप्तमीसमाचार सा महावारुणि स्मृता।*
*💠गंगायां यदि लभ्येत् कोटिसूर्यग्रहयः समा ॥*
*💠वरुणेन समायुक्त माधौ कृष्ण त्रयोदशी।*
*💠गंगायां यदि लभ्येत सूर्यग्रहशतैः समा।*
*💠शनिवारसमायुक्त स महावारुणि स्मृता।*
*💠गंगायां यदि लभ्येत कोटिससूर्याग्रहैः समा।* *
*💠देवीभागवत पुराण वरुणं कालिकाख्याञ्च शम्बं नन्दिकृतं शुभम्।*
*💠सौरं पाराशरप्रोक्तमादित्यं चातिविस्तारम् ॥*
*💠वरूणं कालिकाख्यांच शमबां नन्दीकृतं शुभम्।*
*💠सौरं पाराशरप्रोक्तमादित्यं चातिविस्तारम्*
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*♦️काशीपुरी में जन्मोजन्मान्तर का प्रायश्चित शमन करने के लिए पुजन करना चाहिए।*
*♦️५१ प्रकार का महादान भी कराया जाता है। जन्मों जन्मांतर प्रायश्चित के लिए।*
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❤️यह स्थल ९स्थानो का दर्शनीय स्थल हैं।