
रेवती नक्षत्र वैदिक ज्योतिष का 27वाँ और अंतिम नक्षत्र है। यह पूरी तरह मीन राशि में स्थित है और 16°40′ से 30°00′ मीन तक विस्तृत होता है। खगोलीय दृष्टि से यह नक्षत्र मुख्य रूप से ζ Piscium (Zeta Piscium) से संबद्ध है। यह तारा मीन तारामंडल के दक्षिणी भाग में स्थित है और अत्यंत कोमल, शुभ और शांत ऊर्जा का प्रतिनिधित्व करता है।
ज्योतिषीय गणना में प्रत्येक नक्षत्र 13°20′ का होता है। रेवती के चरण (पद) इस प्रकार हैं:
इन चारों चरणों से नक्षत्र की ऊर्जा ग्रहों के अनुसार बदलती है, जो जातक के मन, विचार और जीवन दिशा को विशिष्ट रूप से प्रभावित करती है।
रेवती नक्षत्र की अधिष्ठात्री देवी पोषक देवी (Pushan) हैं—जो विश्व की यात्राओं, सुरक्षा, मार्गदर्शन, पोषण, संपत्ति की रक्षा और खोई हुई वस्तुओं को वापस दिलाने की शक्ति रखती हैं।
पोषन देवता को:
बताया गया है।
नक्षत्र का प्रतीक मछलियों का समूह या ढोलक (मृदंग) है, जो समृद्धि, ताल-मेल, शांति और पूर्णता का द्योतक है।
दक्ष प्रजापति की पुत्रियों में से यह नक्षत्र सबसे सौम्य और शांत माना जाता है, क्योंकि यह चंद्रमा के विच्छिन्न और व्यस्त मन को स्थिरता और पोषण देता है।
रेवती, मीन राशि का अंतिम नक्षत्र होने के कारण समापन, सिद्धि और मुक्ति की ओर संकेत करता है।
रेवती नक्षत्र पूरी तरह मीन राशि में आता है, जिसका स्वामी बृहस्पति (गुरु) है। परंतु नक्षत्र का स्वामी बुध है।
यह संयोजन बहुत अद्भुत है—बुध की बुद्धि और गुरु की आध्यात्मिकता मिलकर संतुलित, विनम्र और दयालु स्वभाव बनाते हैं।
चरणों के प्रभाव
प्रथम चरण (बृहस्पति नवांश):
द्वितीय चरण (शनि नवांश):
तृतीय चरण (बुध नवांश):
चतुर्थ चरण (केतु नवांश):
गोचर प्रभाव:
ग्रह जब रेवती से गुजरते हैं, तब समापन, शांति, पूर्णता और नए आरंभ के संकेत मिलते हैं।
रेवती नक्षत्र में जन्मे जातक अत्यंत शुभ, विनम्र, स्वाभाविक रूप से दयालु और संवेदनशील माने जाते हैं। बुध और गुरु के संयुक्त प्रभाव से इनमें ज्ञान, प्रतिभा और करुणा का अत्यंत सुंदर मेल देखने को मिलता है।
बुध का प्रभाव
गुरु का प्रभाव
केतु का प्रभाव (चतुर्थ चरण)
शनि का प्रभाव (द्वितीय चरण)
रेवती के जातक अक्सर:
होते हैं।
समाज इन्हें स्वभाव से शांत, सहयोगी और करुणाशील मानकर सम्मान देता है।
रेवती नक्षत्र का मुख्य तारा ζ Piscium सूर्य से कई गुना बड़ा और अधिक दूर स्थित है। यह तारा चमकीला होने के साथ-साथ अत्यधिक स्थिर भी है—जो भारतीय ज्योतिष में शांत, शुभ और कोमल ऊर्जा का स्रोत माना जाता है।
खगोलीय दृष्टि से:
क्वांटम सिद्धांत का दृष्टिकोण
हर तारा और ग्रह विद्युत-चुंबकीय तरंगों का उत्सर्जन करता है।
क्वांटम सिद्धांत के अनुसार:
यह अवधारणा वैदिक विचार “यत् पिण्डे तत् ब्रह्माण्डे” से मेल खाती है।
रेवती को अत्यंत शुभ, स्थिर और सौम्य नक्षत्र माना गया है। यह संपूर्णता और समापन का प्रतीक है—क्योंकि यह 27 नक्षत्रों का अंतिम चरण है।
यह नक्षत्र दर्शाता है:
रेवती हमें सिखाता है कि सच्ची समृद्धि बाहरी नहीं, बल्कि भीतरी संतुष्टि और मन की शांति में है।
दार्शनिक दृष्टि से यह नक्षत्र अद्वैत वेदांत का समर्थन करता है—
“आत्मा और ब्रह्म एक ही हैं, भेद केवल प्रतीत है।”
रेवती का रहस्य उसके समापन की ऊर्जा में निहित है। यह ब्रह्मांडीय चक्र का अंतिम बिंदु है, जहाँ:
रेवती नक्षत्र बार-बार यह प्रश्न उठाता है—
“क्या जीवन का उद्देश्य केवल अनुभव है, या आत्मा का विस्तार और मोक्ष?”
जातकों में:
बहुत अधिक होती है।
खगोलीय स्तर पर, रेवती हमें ब्रह्मांड की विशालता और मन की सूक्ष्मता के बीच अद्भुत संतुलन को समझने की प्रेरणा देता है।
समापन
रेवती नक्षत्र सिर्फ एक तारामंडल नहीं, बल्कि पूर्णता, शांति, दया और मुक्ति की ब्रह्मांडीय ऊर्जा है।
बुध और गुरु के संतुलित प्रभाव से यह नक्षत्र मनुष्य को:
बनाता है।
क्वांटम सिद्धांत और वैदिक दर्शन के संगम पर खड़ा यह नक्षत्र हमें बताता है कि जीवन की यात्रा वहीं समाप्त होती है जहाँ आत्मा ब्रह्मांड की अनंत चेतना में विलीन हो जाती है।
यही रेवती नक्षत्र का गूढ़ और उज्ज्वल संदेश है—
समापन ही नया आरंभ है।