जानकी जयंती (सीता अष्टमी): आदर्श नारीत्व, त्याग और धर्म का दिव्य उत्सव भारतीय संस्कृति में कुछ पर्व केवल तिथियाँ नहीं होते, बल्कि वे जीवन के मूल्यों, आदर्शों और नैतिकता के जीवंत प्रतीक होते हैं। जानकी जयंती, जिसे सीता अष्टमी भी कहा जाता है, ऐसा ही एक पावन पर्व है। यह दिन माता सीता के जन्मोत्सव के रूप में मनाया जाता है, जो भगवान श्रीराम की अर्धांगिनी, मिथिला की राजकुमारी और धरती से उत्पन्न हुई दिव्य नारी थीं। यह पर्व वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाया जाता है और विशेष रूप से मिथिला, अयोध्या, जनकपुर तथा रामभक्तों के लिए अत्यंत श्रद्धा का विषय है।माता सीता का दिव्य अवतरण धार्मिक ग्रंथों के अनुसार माता सीता का जन्म सामान्य रूप से नहीं, बल्कि धरती की गोद से हुआ था। मिथिला के राजा जनक जब एक यज्ञ के लिए भूमि जोत रहे थे, तब हल की नोक से धरती फटी और वहाँ से एक कन्या प्रकट हुई। इसी कारण उनका नाम सीता पड़ा और वे जनक की पुत्री होने के कारण जानकी कहलाईं। यह जन्म स्वयं में यह संदेश देता है कि माता सीता केवल एक राजकुमारी नहीं, बल्कि प्रकृति, धैर्य और पवित्रता की प्रतिमूर्ति थीं। सीता: नारी गरिमा और सहनशीलता की मूर्ति माता सीता का जीवन त्याग, तप, सहनशीलता और धर्मपालन का अनुपम उदाहरण है। विवाह के बाद उन्होंने राजमहल का सुख छोड़ा और वनवास में श्रीराम के साथ चलना स्वीकार किया। वनवास के दौरान उन्होंने कठिन परिस्थितियों, अभावों और भय के बीच भी अपने कर्तव्यों से कभी मुख नहीं मोड़ा। रावण द्वारा लंका हरण के बाद अशोक वाटिका में उनका संयम, आत्मबल और पतिव्रता धर्म आज भी नारी शक्ति का सर्वोच्च उदाहरण माना जाता है। सीता का चरित्र यह सिखाता है कि सच्ची शक्ति केवल बाहुबल में नहीं, बल्कि धैर्य, आत्मसम्मान और सत्य में होती है। Playlist 3 Videos Sshree Astro Vastu | Abroad Study, Loan Approval- Review | Yash Mehta 0:34 Sshree Astro Vastu | Student Visa, Abroad Study - Review In Eng |Sahil Warge | #sshreeastrovastu 0:58 Sshree Astro Vastu |Astro Vastu Course | Martial, Business, Kid Health Case review|Er. Ulhas Chimaji 5:10 अग्नि परीक्षा और सामाजिक प्रश्न लंका विजय के बाद माता सीता को अग्नि परीक्षा देनी पड़ी, जो आज भी समाज को सोचने पर मजबूर करती है। यह घटना न केवल उनके चरित्र की पवित्रता को दर्शाती है, बल्कि उस समय के सामाजिक मानदंडों और नारी के प्रति दृष्टिकोण पर भी प्रश्न उठाती है। अग्नि से सुरक्षित निकलना इस बात का प्रतीक था कि सत्य और पवित्रता को कोई आंच नहीं छू सकती। धरती में विलय: मौन प्रतिरोध का संदेश अपने जीवन के अंतिम चरण में माता सीता ने पुनः धरती माता की शरण ली। यह घटना उनके मौन प्रतिरोध और आत्मसम्मान का प्रतीक मानी जाती है। उन्होंने किसी से संघर्ष नहीं किया, कोई आरोप नहीं लगाया, बल्कि गरिमा के साथ स्वयं को संसार से अलग कर लिया। यह आज की नारी के लिए भी एक गहन संदेश है—स्वाभिमान से बड़ा कोई समझौता नहीं। जानकी जयंती का धार्मिक और सामाजिक महत्व जानकी जयंती केवल एक धार्मिक पर्व नहीं है, बल्कि यह नारी सम्मान, पारिवारिक मूल्यों और धर्मनिष्ठा का उत्सव है। इस दिन मंदिरों में माता सीता की विशेष पूजा की जाती है, रामायण पाठ, भजन-कीर्तन और कथा आयोजन होते हैं। विवाहित महिलाएँ अपने वैवाहिक जीवन की सुख-शांति के लिए व्रत रखती हैं, वहीं अविवाहित कन्याएँ आदर्श जीवनसाथी की कामना करती हैं। मिथिला परंपरा और उत्सव मिथिला क्षेत्र में जानकी जयंती बड़े हर्षोल्लास के साथ मनाई जाती है। यहाँ लोकगीत, झांकियाँ, सांस्कृतिक कार्यक्रम और राम-सीता विवाह की झलकियाँ प्रस्तुत की जाती हैं। जनकपुर (नेपाल) में यह पर्व अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी प्रसिद्ध है, जहाँ हजारों श्रद्धालु भाग लेते हैं। आज के युग में माता सीता की प्रासंगिकता आज के आधुनिक युग में, जहाँ नारी स्वतंत्रता, अधिकार और आत्मसम्मान पर चर्चा होती है, माता सीता का चरित्र और भी अधिक प्रासंगिक हो जाता है। वे न तो कमजोर थीं और न ही मौन सहने वाली—वे संतुलन थीं: प्रेम और मर्यादा, सहनशीलता और आत्मबल का संतुलन।सीता हमें सिखाती हैं कि:शक्ति शोर में नहीं, संयम में होती हैत्याग कमजोरी नहीं, सचेत निर्णय होता हैआत्मसम्मान सर्वोपरि है जानकी जयंती / सीता अष्टमीकेवल माता सीता के जन्म का उत्सव नहीं, बल्कि उनके जीवन मूल्यों को आत्मसात करने का अवसर है। यह पर्व हमें याद दिलाता है कि सच्चा धर्म आचरण में होता है, न कि केवल शब्दों में। माता सीता भारतीय संस्कृति की आत्मा हैं—वे नारीत्व की वह ज्योति हैं, जो युगों-युगों तक मानवता को मार्गदर्शन देती रहेंगी।इस पावन दिन पर आइए, हम सभी सीता जी के आदर्शों को अपने जीवन में उतारने का संकल्प लें—सत्य, धैर्य, करुणा और आत्मसम्मान के साथ। सीता माता द्वारा दिया श्राद्ध भोज सीता माता द्वारा दिया श्राद्ध भोज 🔊 Listen to this भगवान श्रीकृष्ण से पक्षीराज गरुड़ ने पूछा- हे प्रभु ! पृथ्वी पर लोग अपने मृत पितरों का श्राद्ध करते हैं. उनकी रुचि का भोजन ब्राह्मणों आदि को कराते हैं. पर क्या पितृ लोक से पृथ्वी पर आकर श्राद्ध में भोजन करते पितरों को किसी ने देखा भी है। भगवान श्रीकृष्ण ने कहा- हे गरुड़ ! तुम्हारी शंका का निवारण करने के लिए मैं देवी सीता के साथ हुई घटना सुनाता हूं. सीताजी ने पुष्कर तीर्थ में अपने ससुर आदि तीन पितरों को श्राद्ध में निमंत्रित ब्राह्मणों के शरीर में देखा था, जनक ने सीता स्वयंवर में अयोध्या नरेश दशरथ को आमंत्रण क्यों नहीं भेजा ? जनक ने सीता स्वयंवर में अयोध्या नरेश दशरथ को आमंत्रण क्यों नहीं भेजा ? 🔊 Listen to this रामु अमित गुन सागर थाह कि पावइ कोइ।* *संतन्ह सन जस किछु सुनेउँ तुम्हहि सुनायउँ सोइ॥ भावार्थ:-श्री रामजी अपार गुणों के समुद्र हैं, क्या उनकी कोई थाह पा सकता है? संतों से मैंने जैसा कुछ सुना था, वही आपको सुनाया॥ राजा जनक के शासनकाल में एक व्यक्ति का विवाह हुआ। जब वह पहली बार सज-सँवरकर ससुराल के लिए चला, तो रास्ते में चलते-चलते एक जगह उसको दलदल मिला, जिसमें एक गाय फँसी हुई थी, जो लगभग मरने के कगार पर सीता माता जी का जन्मदिन सीता नवमी सीता माता जी का जन्मदिन सीता नवमी 🔊 Listen to this माता सीता पौराणिक कथाओं में उन सशक्त स्त्रियों में गिनी जाती हैं, जिन्होंने हर मुसीबत में न केवल अपने पति का साथ दिया बल्कि विपरीत समय में अपने चरित्र और सम्मान की रक्षा भी की। उनकी महिमा के कारण ही भगवान् राम से पहले उनका नाम लिया जाता है। जिस प्रकार भगवान् राम को कई शुभ अवसर समर्पित हैं, उसी प्रकार माता सीता को भी एक ख़ास दिन समर्पित है और उस दिन को उत्सव की तरह मनाया जाता है और वह है सीता नवमी। भगवान् राम के जन्मदिन आप सभी लोगों से निवेदन है कि हमारी पोस्ट अधिक से अधिक शेयर करें जिससे अधिक से अधिक लोगों को पोस्ट पढ़कर फायदा मिले | Join Our Whatsapp Group