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प्री-पेड अंतिम संस्कार

पुणे के एक बड़े श्मशान घाट में दोपहर के 3 बजे थे। ‘रोहन’ (उम्र 35), जो अमेरिका की एक बड़ी सॉफ्टवेयर कंपनी में वाइस प्रेसिडेंट था, अभी-अभी फ्लाइट से उतरकर सीधे श्मशान घाट पहुँचा था।
उसके पिता ‘सदाशिवराव’ (उम्र 75) का पिछली रात निधन हो गया था।

रोहन के हाथ में एक महँगा लैपटॉप बैग था और आँखों पर रे-बैन का चश्मा। उसे पसीना आ रहा था और वह बार-बार घड़ी देख रहा था।

वहाँ ‘मोक्ष इवेंट मैनेजमेंट’ (अंत्येष्टि कराने वाली एजेंसी) का कर्मचारी ‘सुमित’ खड़ा था।
सुमित ने सारी तैयारी कर रखी थी। लकड़ियाँ सजा दी थीं, पंडित बुला लिए थे और सदाशिवराव के पार्थिव शरीर को स्नान कराकर तैयार रखा था।

रोहन आया। उसने पिता के चेहरे की ओर एक नजर डाली। आँखों से एक-दो आँसू टपक पड़े।
उसने सुमित से पूछा—

“मिस्टर सुमित, सब तैयार है ना? मुझे 6 बजे की रिटर्न फ्लाइट पकड़नी है। कल मेरी एक बहुत जरूरी मीटिंग है। प्लीज़ जल्दी खत्म करवा दीजिए।”

सुमित को आश्चर्य हुआ। जिस पिता ने इस बेटे को पाल-पोसकर बड़ा किया, उसकी चिता के पास ठहरने के लिए बेटे के पास 3 घंटे भी नहीं थे?

सुमित ने शांत होकर सिर हिला दिया।
विधि-विधान पूरे हुए। रोहन ने मुखाग्नि दी।
धुएँ के गुबार आसमान में उठने लगे।

रोहन ने सुमित को एक तरफ बुलाया और चेकबुक निकाल लिया।

“सुमित, थैंक्यू। आपने अच्छी व्यवस्था की।
आपका बिल कितना हुआ? 50 हजार? 1 लाख? अमाउंट बताइए, मैं अभी चेक दे देता हूँ। मैं दोबारा नहीं आ पाऊँगा, अस्थि-विसर्जन भी आप ही कर दीजिए।”

सुमित ने रोहन की ओर देखा। उसके चेहरे पर एक अजीब सी मुस्कान थी।
उसने जेब से एक पुरानी फाइल निकाली और रोहन के हाथ में थमा दी।

“साहब, बिल देने की जरूरत नहीं है। आपका बिल ‘पेड’ है।”

रोहन चौंक गया। “पेड? किसने भरा? मेरे चाचा ने?”

सुमित बोला—

“नहीं साहब।
5 साल पहले सदाशिवराव (आपके पिता) हमारे ऑफिस आए थे।
वे बहुत बीमार थे। ठीक से चल भी नहीं पा रहे थे।

उन्होंने मुझसे पूछा था— ‘आपका पैकेज क्या है? बेटे को परेशानी न हो, सब इंतजाम कर देंगे ना?’

हमने उन्हें पैकेज बताया।
उन्होंने उसी दिन 50,000 रुपये एडवांस जमा कर दिए थे।

और यह ‘चिट्ठी’ मुझे देकर गए थे।
उन्होंने कहा था— ‘मेरा बेटा आए तो उसे यह चिट्ठी देना। और अगर वह न आए, तो आप ही मेरा काम कर देना।’”

सुमित ने वह चिट्ठी रोहन को दे दी।
रोहन ने काँपते हाथों से चिट्ठी खोली।

उसमें सदाशिवराव के काँपते अक्षरों में लिखा था—

*”प्रिय रोहन,
बेटा, मुझे पता है तुम बहुत व्यस्त हो। अमेरिका में तुम्हें साँस लेने तक की फुर्सत नहीं होती।
मुझे मालूम है, मेरे निधन की खबर सुनकर तुम्हें चिंता होगी।

‘छुट्टी मिलेगी या नहीं? टिकट मिलेगा या नहीं? मीटिंग का क्या होगा?’— ये सवाल तुम्हें परेशान करेंगे।

बेटा, तुम्हारा समय और तुम्हारा करियर बहुत महत्वपूर्ण है।
मैंने तुम्हें इसलिए पाला कि तुम दुनिया जीत सको।
एक बूढ़े की लाश के लिए तुम अपना नुकसान मत करना।

इसलिए मैंने अपने अंतिम संस्कार का इंतजाम पहले ही कर दिया है।
एजेंसी को पैसे दे दिए हैं। वे सब संभाल लेंगे।

तुम आ जाओ तो अच्छा है, नहीं आओगे तो भी मुझे शिकायत नहीं।
बस एक विनती है—

जब तुम्हें बचपन में स्कूल छोड़ने जाता था, तो मैंने तुम्हारा हाथ कभी नहीं छोड़ा था।
आज जब तुम मुझे अग्नि दो, तो तुम्हारा हाथ न काँपे।

जल्दी वापस चले जाना। तुम्हारी पत्नी इंतजार कर रही होगी।

तुम्हारा,
पिता.”*

चिट्ठी पढ़ते ही रोहन के हाथ से चेकबुक गिरकर कीचड़ में जा पड़ा।

उस श्मशान घाट में, जहाँ लकड़ियों के जलने की आवाज आ रही थी…
वहाँ अब रोहन का ‘अहंकार’ और ‘करियर का घमंड’ जलकर राख हो रहा था।

वह घुटनों के बल बैठ गया।
वह चीख पड़ा— “बाबा…! मुझे माफ कर दो!”

रोहन ने सुमित के पैर पकड़ लिए।
“सुमित, मुझे अमेरिका नहीं जाना! मुझे अपने पिताजी के साथ रहना है!
मैंने करोड़ों रुपये कमाए, लेकिन असल में मैं गरीब निकला!
मेरे पिता ने मरते समय भी मेरी मीटिंग का ख्याल रखा… और मैं उनके अंतिम दर्शन की कीमत लगा रहा था?”

उस दिन रोहन फ्लाइट नहीं पकड़ सका।
वह वहीं, उस जलती चिता के सामने, पूरी रात बैठा रहा।

क्योंकि उसे समझ आ गया था कि ‘प्री-पेड’ सिर्फ सिम कार्ड हो सकता है, पिता का प्यार नहीं।
पिता का प्रेम ‘अनलिमिटेड’ होता है, और उसकी कीमत दुनिया की कोई भी मुद्रा नहीं चुका सकती।

आप दुनिया में चाहे कितने भी बड़े बन जाएँ, कितने भी पैसे कमा लें…
लेकिन जिन माता-पिता ने आपका लंगोट बदला, उनके अंतिम समय में अगर आपको उनका ‘डायपर’ बदलना पड़े, तो मुँह मत बनाइए।

एजेंसी अंतिम संस्कार कर सकती है, लेकिन आँसू एजेंसी के नहीं होते—
वे अपने ही खून के होते हैं।

पिता की प्रार्थना

पिता के साथ बचपन की यादें (अच्छे विचारों और प्यारी तस्वीरों की एक सुंदर झलक)

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