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परमहंस योगानंद जयंती: आत्मबोध, क्रियायोग और विश्वबंधुत्व का अमर संदेश

परमहंस योगानंद जयंती केवल एक महान संत के जन्मदिवस का स्मरण नहीं है, बल्कि यह आत्मबोध, योग, ध्यान और मानवता के सार्वभौमिक कल्याण के संदेश को पुनः जीवंत करने का अवसर है। 5 जनवरी 1893 को उत्तर प्रदेश के गोरखपुर में जन्मे परमहंस योगानंद ने भारत की प्राचीन योग परंपरा को पश्चिम तक पहुँचाकर आध्यात्मिक इतिहास की दिशा ही बदल दी। वे एक महान योगी, संत, दार्शनिक, शिक्षक और लेखक थे, जिन्होंने जीवन भर यह सिखाया कि ईश्वर की अनुभूति प्रत्येक मानव का जन्मसिद्ध अधिकार है।

प्रारंभिक जीवन और आध्यात्मिक झुकाव

परमहंस योगानंद का बचपन का नाम मुकुंद लाल घोष था। बाल्यावस्था से ही उनमें ईश्वर के प्रति गहरी जिज्ञासा और साधना की तीव्र लालसा दिखाई देती थी। वे संतों और योगियों के संपर्क में रहते और ध्यान व योग में रुचि लेते। किशोरावस्था में ही उन्हें अपने जीवन के उद्देश्य का बोध हो गया था—ईश्वर-प्राप्ति और मानवता की सेवा।
1910 में वे स्वामी श्रीयुक्तेश्वर गिरी के शिष्य बने, जिन्होंने उन्हें क्रियायोग की गूढ़ शिक्षा दी। अपने गुरु के सान्निध्य में योगानंद ने आत्मानुशासन, ध्यान और आध्यात्मिक साधना के गहरे रहस्यों को समझा।

संन्यास और शिक्षा का मार्ग

1915 में उन्होंने संन्यास ग्रहण किया और “स्वामी योगानंद” नाम से दीक्षित हुए। आगे चलकर उन्हें “परमहंस” की उपाधि प्राप्त हुई, जो उनके उच्च आध्यात्मिक स्तर का प्रमाण थी। भारत में रहते हुए उन्होंने शिक्षा के क्षेत्र में भी योगदान दिया और योग-आधारित शिक्षा पद्धति को बढ़ावा दिया, जिसमें शरीर, मन और आत्मा—तीनों के संतुलित विकास पर जोर दिया गया।

पश्चिम की यात्रा और विश्वव्यापी प्रभाव

1920 में परमहंस योगानंद अमेरिका गए, जहाँ उन्होंने बोस्टन में आयोजित धार्मिक उदारवादियों के अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में भारत का प्रतिनिधित्व किया। उनके विचारों और आध्यात्मिक दृष्टि ने पश्चिमी जगत को गहराई से प्रभावित किया।
उन्होंने अमेरिका में Self-Realization Fellowship (SRF) की स्थापना की, जिसका उद्देश्य क्रियायोग के माध्यम से आत्म-साक्षात्कार का मार्ग प्रशस्त करना था। SRF आज भी विश्वभर में सक्रिय है और लाखों साधकों को ध्यान, योग और आत्मिक शांति की ओर प्रेरित कर रही है।

क्रियायोग: आत्मसाक्षात्कार की कुंजी

परमहंस योगानंद ने क्रियायोग को आत्म-साक्षात्कार का सबसे प्रभावी और वैज्ञानिक मार्ग बताया। उनके अनुसार, नियमित ध्यान और प्राणायाम से मन की चंचलता शांत होती है और व्यक्ति अपने वास्तविक स्वरूप—आत्मा—का अनुभव करता है।
क्रियायोग केवल साधना नहीं, बल्कि जीवन जीने की एक कला है, जो व्यक्ति को तनाव, भय और अशांति से मुक्त कर आत्मिक आनंद की ओर ले जाती है।

एक योगी की आत्मकथा”: अमर कृति

परमहंस योगानंद की सर्वाधिक प्रसिद्ध पुस्तक एक योगी की आत्मकथा” (Autobiography of a Yogi) है, जिसने विश्वभर में करोड़ों पाठकों को प्रभावित किया। यह पुस्तक केवल आत्मकथा नहीं, बल्कि योग, ध्यान, गुरु-शिष्य परंपरा और आध्यात्मिक अनुभवों का अद्भुत दस्तावेज़ है।
इस पुस्तक ने पूर्व और पश्चिम के बीच आध्यात्मिक सेतु का कार्य किया और कई महान व्यक्तित्वों—जैसे स्टीव जॉब्स—को गहराई से प्रभावित किया।

विश्वबंधुत्व और धार्मिक समन्वय

योगानंद का संदेश किसी एक धर्म या संप्रदाय तक सीमित नहीं था। वे मानते थे कि सभी धर्मों का मूल उद्देश्य एक ही है—ईश्वर से मिलन और मानवता की सेवा। उन्होंने ईसाई धर्म, हिंदू धर्म और अन्य आस्थाओं के बीच समन्वय स्थापित करते हुए प्रेम, करुणा और एकता का संदेश दिया।
उनका जीवन इस सत्य का प्रमाण है कि आध्यात्मिकता सीमाओं, भाषाओं और संस्कृतियों से परे है।

परमहंस योगानंद जयंती का महत्व

परमहंस योगानंद जयंती हमें आत्मचिंतन, साधना और सेवा के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देती है। इस दिन उनके अनुयायी ध्यान-सत्र, प्रवचन, भजन और सेवा कार्यों के माध्यम से उनके आदर्शों को स्मरण करते हैं। यह जयंती हमें याद दिलाती है कि सच्ची शांति बाहरी उपलब्धियों में नहीं, बल्कि भीतर की चेतना में निहित है।

आज के युग में योगानंद का संदेश

आज के तनावपूर्ण और भौतिकतावादी युग में परमहंस योगानंद का संदेश और भी प्रासंगिक हो गया है। उन्होंने सिखाया कि सफलता और आध्यात्मिकता एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हैं। यदि मन शांत और चेतना जाग्रत हो, तो जीवन में संतुलन, स्वास्थ्य और आनंद स्वाभाविक रूप से आते हैं।

निष्कर्ष

परमहंस योगानंद केवल एक संत या योगी नहीं थे; वे मानवता के मार्गदर्शक थे। उनकी शिक्षाएँ आज भी करोड़ों लोगों के जीवन को प्रकाशमान कर रही हैं। उनकी जयंती पर हमें संकल्प लेना चाहिए कि हम ध्यान, आत्मअनुशासन और करुणा को अपने जीवन में अपनाएँ और विश्व में शांति व प्रेम का प्रसार करें।
परमहंस योगानंद का जीवन यह सिखाता है कि आत्मसाक्षात्कार ही जीवन का परम लक्ष्य है—और यह लक्ष्य प्रत्येक मानव के लिए सुलभ है।

रामकृष्ण परमहंस की पुण्यतिथि : अध्यात्म का अमर दीपक

स्वामी विवेकानन्द

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