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ग्रहों की परस्पर सम्बन्ध फलविचार एवं नवमांश कुण्डली

ज्योतिष शास्त्र में कुंडली विवेचन हेतु मूल आधार हैं, 12 भाव, 12 राशियाँ, 27 नक्षत्रों में, 09 ग्रहों के परस्पर बनने वाले स्थान, युति, दृष्टि और परिवर्तन के अनेकानेक परस्पर सम्बन्ध।

 

  1. ग्रहों के “युति” सम्बन्ध – ग्रहों की युति अर्थात कुंडली के किसी भी भाव में एक से अधिक ग्रहों का स्थित होना। किसी भी कुंडली में अधिकतम 8 ग्रह लग्न कुंडली के एक भाव में युति कर सकते हैं। कुंडली में किन्ही 2 ग्रहों का कुंडली के किसी भी एक भाव में स्थित होना एक सामान्य घटना है। दो से अधिक ग्रहों की युति होने पर कुंडली विश्लेषण हेतु विशेष ध्यान देने की आवश्यकता होती है और विद्वान् ज्योतिषी विभिन्न कोणों द्वारा भाव विवेचन कर फलकथन करते हैं।

 

  1. ग्रहो के “दृष्टि” सम्बन्ध – किन्ही दो ग्रहों का परस्पर समसप्तक होना अर्थात परस्पर 1-7 स्थान पर स्थित होकर परस्पर पूर्ण दृष्टि देना एक मजबूत संयोग (शुभ या अशुभ) का निर्माण करता है।

मंगल और शनि दोनों ही पाप ग्रह हैं और परस्पर 1-7 स्थान पर स्थित न होकर भी परस्पर दृष्टि से देखते हैं। यह एक अशुभ संयोग का निर्माण कर सकता है। इस संयोग में अशुभ भाव, शत्रु राशि, निर्बल चंद्र, राहु-केतु आदि का सम्मिलित होना और कोई शुभ दृष्टि न होना योग के आकस्मिक और नकारात्मक परिणामों में वृद्धिकारी हो सकता है। अचानक प्रतिकूल परिस्थितिया, दुःख और हानि बनी रहती है। जीवन की चुनौतियाँ अत्यंत बलि होती हैं। जातक में दृढ निश्चय और आत्मविश्वास की कमी हो सकती है

 

  1. ग्रहों के “स्थान” सम्बन्ध – किन्ही दो ग्रहों का परस्पर केंद्र-त्रिकोण में स्थित होना एक उत्त्तम संयोग है। यह संयोग लग्न अथवा चंद्र से केंद्र-त्रिकोण में बने और शुभ प्रभाव में हो तो जातक जीवन में सकारात्मक परिणामों को उत्तम रूप में प्रदर्शित करता है।

 

  1. ग्रहों के “परिवर्तन” सम्बन्ध – किन्ही दो ग्रहों (शुभ/अशुभ) का परस्पर राशियों (मित्र/शत्रु) में स्थित होना इस संयोग का निर्माण करता है। चारों प्रकार के संबंधों में यह सम्बन्ध सर्वोत्तम श्रेणी का माना जाता है। इस सम्बन्ध पर शुभ ग्रहों का प्रभाव इस्क्के सकारात्मक फलों में वृद्धि और स्थायित्व प्रदान करता है। जातक जीवन की प्रतिकूल परिस्थितियों में भी हार स्वीकार नहीं करता है, साहस, दृढ निश्चय और आत्मविश्वास के साथ चुनौतियों पर विजय प्राप्त कर आगे बढ़ता जाता है।

 

नोट – ग्रहों द्वारा परस्पर निर्मित किसी भी सम्बन्ध में शुभ-अशुभ फलानुभूति के लिए लग्न तथा चंद्र की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। नवमांश, राशि के नौवें भाग या नक्षत्र-पद के बराबर का भाग होता है ! यह षोडसवर्गों में से एक प्रमुख वर्ग चार्ट होता है ! जन्म कुण्डली में किसी ग्रह या लग्न-बिंदु की अन्य राशियों और राशि-स्वामियों के साथ उसकी अच्छी या बुरी स्थिति बताने के लिए नवमांश कुण्डली का इस्तेमाल किया जाता है !

 

नवमांश कुण्डली बनाने के लिए सबसे पहले हम नवमांश कुण्डली का लग्न ज्ञात करते हैं ! यदि लग्न कुण्डली और नवमांश कुण्डली का लग्न एक ही होता है तो इसे वर्गोत्तम लग्न कहते हैं !

 

वर्गोत्तम लग्न होना बहुत शुभ माना जाता है !यानी कि यदि आपकी लग्न कुण्डली के पहले भाव में जो राशि है, वही राशि आपकी नवमांश कुण्डली मे भी पहले भाव में स्थिति हो तब वह लग्न वर्गोत्तम लग्न होता है !

ज्योतिष शास्त्र के अनुसार जिस व्यक्ति का लग्न वर्गोत्तम नवमांश होता है, उसकी  प्रतिष्ठा, मान सम्मान बढ़ जाता है !

 

राशिचक्र और नवांश चक्र अलग ही होता है ! कुल मिलाकर प्रयोजन अनुसार हम सोलह कुण्डली बनाते हैं ! एक राशि का मान 30° डिग्री होता है, 1 डिग्री में 60 मिनट होता है ! नवांश का मतलब नौ भाग में से एक भाग लेना ! इस प्रकार हर नवांश का मान हो जाता है 3 डिग्री 20 मिनट !

 

चर, स्थिर और द्विस्वभाव राशि के स्थिति के अनुसार नवांश कुण्डली तैयार होती है, जैसे कि चर राशि के लिए नवांश कि गिनती उसी राशि से शुरू होगी, स्थिर राशि के लिए उस राशि से नवम राशि से और द्विस्वभाव राशि के लिए उस राशि से पंचम राशि से नवांश कि गिनती शुरू होगी ! उदाहरण के साथ समझा रहा हूं ! मान लीजिए मेष राशि में मंगल ग्रह 12 डिग्री पर बैठा हुआ है, तो यह चौथे नवमांश के भाग में पडेगा, इस प्रकार कुण्डली में कर्क राशि में जायेगा !

 

नवमांश कुण्डली से जीवन के लगभग सभी प्रश्नों का उत्तर ज्ञात किया जा सकता है ! शिक्षा से सम्बन्धित, व्यवसाय से सम्बन्धित, विवाह से सम्बन्धित, माता पिता एवं संतान से सम्बन्धित प्रश्नों के उत्तर आप नवमांश कुण्डली से जान सकते हैं !

 

नवमांश_कुण्डली_क्या_है :

 

नवमांश कुण्डली, लग्न कुण्डली के बाद सबसे महत्वपूर्ण वर्ग चार्ट माना जाता है ! लग्न कुण्डली यदि शरीर है तो नवमांश कुण्डली को उसकी आत्मा कहा जा सकता है क्योंकि इसी से ग्रहों के फल देने की क्षमता का ज्ञान होता है ! कुण्डली से फलादेश करते समय जब तक नवमांश कुण्डली का सही आंकलन नहीं किया जाता है, फलादेश सही नहीं हो सकता !

 

नवमांश_क्या_है :

 

नवांश, “नव” का अर्थ है नौ और “अंश” का अर्थ है भाग ! नवांश चार्ट में हर राशि के 30 अंशों को नौ भागों में विभाजित किया जाता है, इस प्रकार प्रत्येक राशि के 30 अंशों को नौ भागों में बाँटकर 3°20′ का एक हिस्सा बनाया जाता है ! इनमें से कुछ नवमांश विशेष स्थिति के कारण पुष्कर नवमांश भी होते हैं !

 

ज्योतिष शास्त्र में ‘नवमांस चक्र’ कैसे बनाये जाते हैं ?

 

जन्म पत्रिका निर्माण के क्रम में सप्तवर्गी कुण्डली का विशेष महत्व होता है और उसमे भी नवमांश चक्र का अति विशेष महत्व है सत्य तो यह है की जन्म कुण्डली का लग्न शरीर है तो नवमांश प्राण है ! जैसे प्राण के बिना शरीर महत्वहीन हो जाता है इसी प्रकार जन्म पत्रिका नवमांश के बिना महत्वहीन होता है जन्म पत्रिका में समस्त फलो की सिद्धि नवमांश से ही होता है ! नवमांश चक्र भी उसी प्रकार बनता है जिस प्रकार होरा चक्र, द्रेष्काण चक्र और सप्तमांश चक्र बनता है अर्थात एक राशि में 30° अंश होता है और 30° अंश में नौ नवमांश होता है और एक नवमांश का मान 3 अंश 20 कला होता है !  अग्नि तत्व राशियों मेष, सिंह, धनु राशि का पहला नवमांश मेष राशि से आरम्भ होता है  ! एवं पृथ्वी तत्व राशियों वृष, कन्या व मकर राशि में पहला नवमांश मकर राशि से आरम्भ होता है ! वायु तत्व राशियों मिथुन, तुला व कुम्भ राशि में पहला नवमांश तुला राशि से आरम्भ होता है ! तथा जल तत्व राशियों वृश्चिक, मीन व कर्क का पहला नवमांश कर्क राशा से प्रारम्भ होता है !

 

अब हम नवमांश चक्र की सहायता से नवमांश कुण्डली का लग्न निर्धारित कर लेंगे जैसे हम होरा, द्रेष्काण, सप्तमांश का करते आये है इसके लिए भी हम वही ग्रह स्पष्ट चक्र प्रयोग करेंगे जो होरा, द्रेष्काण और सप्तमांश के लिए करते आये है यहाँ हम उस चक्र को शामिल नहीं कर रहे है, यदि आप उस स्पष्ट ग्रह चक्र को देखना चाहें तो हमारे पिछले पोस्ट होरा, द्रेष्काण, सप्तमांश बनाने की विधि को देख सकते है !

 

उस ग्रह स्पष्ट चक्र में लग्न मीन राशि 2 अंश पर है हम नवमांश लग्न निकालने के लिए नवमांश चक्रम को देखेंगे इसमें वायें तरफ अंश है और दाहिने तरफ राशि संख्या है तो सबसे पहले हम अंश तालिका में देखेंगे तो पहली लाइन 3 अंश 20 कला का मिला इसके दाहिने तरफ मीन राशि के नीचे पहला राशि कर्क मिला अतः नवमांश लग्न कर्क सिद्ध हुआ इसी आधार पर शेष राशियों की संख्या भी लिख लेंगे !

अब शेष  नव ग्रहों को भी स्थापित करेंगे जैसे सूर्य कन्या में 10 अंश पर है तो मकर से गणना करने पर तीसरा नवमांश मीन आया अतः मीन राशि में सूर्य को स्थापित करेंगे ऐसे ही चन्द्रमा जो तुला के 17 अंश पर है तो गणना तुला राशि से होगी, 17° छठवें नवमांस में आता है ! तुला से छठवीं राशि मीन राशि है इसलिए चन्द्रमा को मीन राशि में स्थापित किया जायेगा !

 

इसी प्रकार से मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि को भी स्थापित कर देंगे, इस प्रकार सहजता से आपका नवमांश चक्र बन जायेगा !

 

नवमांश_कुण्डली_से_क्या_देखते_हैं :

 

नवमांश कुण्डली, जन्म कुण्डली का एक विशिष्ट स्वरूप है जो लग्न राशि के नौवें भाग को दर्शाती है ! इसे D9 चार्ट भी कहा जाता है ! नवमांश कुण्डली का ज्योतिष में बहुत महत्व होता है ! यह जन्म कुण्डली के बाद सबसे महत्वपूर्ण कुण्डली मानी जाती है !

 

नवमांश_कुण्डली_से_निम्नलिखित_बातें_देदेखी_जाती_हैं :

 

  1. व्यक्ति की आंतरिक क्षमता और शक्ति !
  2. व्यक्ति की आध्यात्मिक प्रगति !
  3. व्यक्ति के स्वास्थ्य और जीवनशैली !
  4. व्यक्ति के वैवाहिक जीवन !
  5. व्यक्ति के करियर और व्यवसाय !
  6. व्यक्ति के भाग्य और वित्तीय स्थिति !
  7. नवमांश कुण्डली का अध्ययन करके, एक ज्योतिषी किसी व्यक्ति के जीवन के अन्य सभी पहलुओं के बारे में भी जानकारी प्राप्त कर सकता है !

 

नवमांश_कुण्डली_के_कुछ_विशिष्ट_लाभ :

 

यह जन्म कुण्डली के ग्रहों की वास्तविक स्थिति को दर्शाता है !

यह व्यक्ति के आंतरिक स्वभाव और व्यक्तित्व को समझने में मदद करता है !

यह व्यक्ति के भविष्य के बारे में अधिक सटीक भविष्यवाणी करने में मदद करता है !

नवमांश कुण्डली का अध्ययन करना एक जटिल प्रक्रिया है ! यह केवल अनुभवी ज्योतिषियों के लिए ही सम्भव है !

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  1. पुष्कर_नवमांश_कैसे_बनाया_जाता_है :

 

* पुष्कर नवमांश क्या है ?

* इसका प्रयोग कैसे किया जाता है ?

* इसका क्या महत्व होता है ?

 

जब कोई ग्रह नवमांश कुण्डली में चन्द्रमा की कर्क राशि, बुध की कन्या राशि, शुक्र की वृष व तुला राशि या बृहस्पति की धनु व मीन राशि में स्थित होता है तो लग्न कुण्डली में उसकी स्थिति के अनुसार उसमें से कुछ को पुष्कर नवमांश में स्थित होना कहते हैं, क्योंकि उनकी लग्न कुण्डली में स्थिति राशियों के तत्व के अनुसार अग्नि तत्व की कुण्डली में स्थित होने पर तुला,धनु (7, 9 नवांश) पृथ्वी व वायु तत्व में स्थित होने पर मीन व मेष राशि में (क्रमशः – 3, 5 व 6, 8वां नवांश) तथा जल तत्व की राशियों में स्थित होने पर कर्क व कन्या राशि में ( पहले, व तीसरे नवांश ) नवमांश कुण्डली मे जाने पर ही वह पुष्कर नवमांश में माने जाते हैं !

पुष्कर नवमांश बहुत ही शुभ फल देता है, चाहे लग्न कुण्डली में वह ग्रह किसी भी राशि में क्यों न स्थित हो यदि वह नवमांश कुण्डली में पुष्कर नवमांश में आता है, तब उसका फल बहुत ही शुभ और अच्छा ही मिलता है !

 

पुष्कर नवमांश क्या है इसका प्रयोग कैसे किया जाता है ?

जब भी कोई ग्रह नवमांश में शुक्र या बृहस्पति की राशि में होता है और शुक्र की राशि 2, 7 तथा बृहस्पति की राशि 9 या 12 में स्थित होता है तभी उसे पुष्कर नवमांश में होना कहते हैं !

 

उसका फल कुण्डली में बहुत ही शुभ होता है चाहे वह लग्न कुण्डली में वह ग्रह किसी भी राशि में हो यदि वह नवांश में पुष्कर नवमांश। में होगा तो उसका फल अच्छा ही आएगा !

 

पुष्कर_नवमांश_विचार –

 

प्रत्येक राशि के कुल 9 नवांश होते हैं ! शुक्र, गुरु, चंद्र व बुद्ध के नवांश को ही “पुष्कर नवांश” कहा जाता है ! प्रत्येक राशि के “2” पुष्कर नवांश होते हैं अतः कुल “24” पुष्कर नवांश हैं जिनमें से 9 का स्वामी “गुरु”, 9 का स्वामी “शुक्र”, 3 का स्वामी “चंद्र” और 3 का स्वामी “बुद्ध” होता है !

 

  1. मेष, सिंह, धनु राशि का “सातवाँ” और “नौवाँ” नवांश क्रमशः “शुक्र” व “गुरु” की राशि “तुला” व “धनु” का होता है जोकि पुष्कर नवांश होता हैं !

 

  1. वृष, कन्या, मकर राशि का “तीसरा” व “पाँचवा” नवांश क्रमशः “गुरु” व “शुक्र” की राशि “मीन” व “वृष” का होता है, यह पुष्कर नवांश होता हैं !

 

  1. मिथुन, तुला, कुम्भ राशि का “छठवां” व “आठवाँ नवमांश पुष्कर नवमांश होता है !
  2. कर्क, वृश्चिक, मीन राशि का पहला व तीसरा नवमांश पुष्कर नवमांश होता है !

 

पुष्कर नवांश वैदिक ज्योतिष में एक महत्वपूर्ण अवधारणा है ! नवमांश कुण्डली में, प्रत्येक राशि के नौ भागों (नवांश) में से कुछ विशेष नवांश भी होते हैं जिन्हें शुभ और पवित्र माना जाता है ! इन्हें “पुष्कर नवांश” कहा जाता है ! इन नवांशों का सम्बंध व्यक्ति की कुण्डली में सकारात्मक ऊर्जा, भाग्य, समृद्धि और सफलता से होता है ! आइए इसे विस्तार से समझते हैं !

 

पुष्कर_नवांश_के_मुख्य_बिंदु :

 

  1. शुभता का प्रतीक – पुष्कर नवांश का संबंध किसी ग्रह की शुभता से होता है। यदि कोई ग्रह पुष्कर नवांश में स्थित हो, तो यह ग्रह की सकारात्मक ऊर्जा को बढ़ाता है और इसे अधिक शुभ माना जाता है !

 

  1. भाग्य और सफलता- पुष्कर नवांश का प्रभाव कुण्डली में अच्छे अव

 

पुष्कर नवांश क्या होता है?

ज्योतिष के मुताबिक, शुक्र, गुरु, चंद्र, और बुद्ध के नवांश को पुष्कर नवांश कहते हैं. हर राशि के दो पुष्कर नवांश होते हैं, इसलिए कुल 24 पुष्कर नवांश होते हैं. इनमें से 9 का स्वामी गुरु, 9 का स्वामी शुक्र, 3 का स्वामी चंद्र, और 3 का स्वामी बुद्ध है !

 

यहाँ पुष्कर नवांश के कुछ प्रमुख बिंदु दिये गए हैं :

 

 पुष्कर_नवांश_का_महत्व :

पुष्कर नवांश एक ज्योतिषीय सिद्धांत है, जो विशेष रूप से भारतीय ज्योतिष में महत्वपूर्ण माना जाता है ! यह नवांश या “नवांश चार्ट” का एक भाग है, जिसमें व्यक्ति की जन्म कुण्डली के विभिन्न पहलुओं का विश्लेषण किया जाता है !

पुष्कर नवांश विशेष रूप से उन व्यक्तियों के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है जो ज्योतिष में अपने जीवन के महत्वपूर्ण स्थिति में होते हैं !

 

पुष्कर_नवांश_विचार :

 

प्रत्येक राशि के कुल 9 नवांश होते हैं, शुक्र, गुरु, चंद्र व बुद्ध की राशि में जाने वाले नवांश को ही “पुष्कर नवांश” कहा जाता है !

 

  1. अग्नि तत्व की – मेष, सिंह, धनु राशि का “सातवाँ” और “नौवाँ” नवांश क्रमशः “शुक्र” व “गुरु” की राशि “तुला” व “धनु” का है, जोकि पुष्कर नवमांश कहे जाते हैं !

 

  1. प‌थ्वी तत्व की – वृष, कन्या, मकर राशि का “तीसरा” व “पाँचवा” नवांश क्रमशः “गुरु” व “शुक्र” की राशि “मीन” व “वृष” का होता है, यह भी पुष्कर नवांश कहलाता है !

 

  1. वायु तत्व की – मिथुन, तुला, कुम्भ राशि का “छठवां” व “आठवाँ” नवमांश क्रमशः “गुरु” व “शुक्र” की राशि “मीन” व “वृष” का होता है जोकि पुष्कर नवमांश कहलाता है !

 

  1. जल तत्व की – कर्क, वृश्चिक, मीन राशि का “पहला” व “तीसरा” नवमांश “चंद्र” व “बुद्ध” की राशि “कर्क” व “कन्या” का होता है, यह भी पुष्कर नवमांश कहलाता है !

 

प्रत्येक राशि के “दो” पुष्कर नवांश होते हैं अतः कुल “24” पुष्कर नवमांश होते हैं ! जिनमें से 9 का स्वामी “गुरु”, 9 का स्वामी “शुक्र” 3 का स्वामी “चंद्रमा” और 3 का स्वामी “बुद्ध” होता है !

 

उपरोक्त 24 नवंशों में से 3 नवमांश “वर्गोत्तम पुष्कर नवमांश” भी होते हैं !

.   वर्गोत्तम पुष्कर नवमांश अधिक शुभता  लिए हुए होते हैं ! यह तीन वर्गोत्तम पुष्कर नवमांश नीचे दिए जा रहे हैं –

 

  1. वृष राशि में “पाँचवा” वृष राशि का !

 

  1. कर्क राशि में “पहला” कर्क राशि का !

 

  1. धनु राशि में “नौवाँ” धनु राशि का !

यह वर्गोत्तम पुष्कर नवमांश होते हैं !

 

पुष्कर नवांश में स्थित शुभ ग्रह अपनी महादशा-अंतर्दशा में अपने कारकतत्वों के अनुरूप शुभ फलों में “वृद्धि” करता है तथा अशुभ/पाप ग्रह अपनी महादशा-अंतर्दशा में अपने कारकतत्वों के अनुरूप अपने अशुभ/पाप फलों में “कमी” लाता है ! अर्थात शुभ ग्रह उससे अधिक शुभ फल देता है जो वह लग्न कुण्डली में दर्शाता है और अशुभ/पाप ग्रह उतना अशुभ नहीं रह जाता है जितना कि वह लग्न कुण्डली में दर्शाता है !

 

अतः सरल शब्दों में हम कह सकते हैं कि पुष्कर नवमांश में स्थित कोई भी ग्रह शुभता में “वृद्धि” व अशुभता में ”न्यूनता” लेकर आता है !

 

पुष्कर_नवांश_ग्रह_और_उनका_फल :

 

पुष्कर नवांश ग्रह वह ग्रह होता है जिसकी स्थिति कुण्डली मे सर्वोच्च होती है अस्त होने के अलावा अन्य किसी भी स्थिति में पुष्कर नवांश में गया ग्रह काफी शुभ फल देता है, पुष्कर नवांश ग्रह की महादशा -अंतरदशा विशेष शुभ फल देने वाली होती है ! पुष्कर नवांश में गया ग्रह कुण्डली के लिए योगकारक, कारक ग्रह हो या अन्य स्थिति में शुभ अवस्था मे हो तब वह बहुत ही शानदार शुभ फल दाता होता है !

 

पुष्कर नवांश ग्रह की एक सबसे अच्छी खासियत यह होती है कि यह पीड़ित होने पर, शत्रु राशि मे होने पर, नीच राशि मे होने पर भी शुभ फल ही देता है और यदि पुष्कर नवांश में बैठा ग्रह बलवान हो गया हो या कोई राजयोग, शुभ योग बनाकर बैठा हो तब सोने पर सुहागा जैसे शुभ फल मिलता है !

 

किसी भी जातक की कुण्डली में एक या एक से अधिक ग्रह एक साथ पुष्कर नवांश में हो सकते हैं, जितने अधिक ग्रह पुष्कर नवांश में होंगे कुण्डली उतनी ही अधिक बलवान हो जाएगी ! अब एक स्थिति यह भी होती है कि कोई ग्रह पुष्कर नवांश में तो है लेकिन उस ग्रह की कुण्डली मे भाव स्थिति (placement) ठीक नही है, जैसे मकर लग्न में सूर्य अष्टमेश होकर चौथे भाव केंद्र में उच्च का होकर पुष्कर नवमांश में होता हो तब यहाँ सूर्य अपना शुभ फल कुछ असामान्य दुखद स्थितियों के साथ देता है, क्योंकि ऐसी स्थिति में सूर्य की भाव स्थिति ठीक नही होती है ! अष्टमेश होकर चौथे भाव केंद्र में बैठने पर उसके त्रिक भाव का स्वामी होने का प्रभाव उसे ऐसा करने के लिए विवश करता है ! ऐसे ग्रह पहले कुछ अशुभ फल देते हैं, बाद में अच्छी स्थिति आने पर शुभ फल दे सकते हैं !

 

पुष्कर नवांश में बैठे ग्रह के साथ बैठने वाले ग्रह क्या योग बना रहे है किस भाव के स्वामी के साथ बैठे है यह स्थिति भी सबसे अधिक उस भाव के लिए महत्वपूर्ण हो जाती है जिस भाव के स्वामी के साथ पुष्कर नवांश का ग्रह बैठा होता है, जैसे नवमेश पुष्कर नवांश में हो और सप्तमेश के साथ सप्तम भाव मे बैठा हो तब इसका शुभ प्रभाव वैवाहिक जीवन पर भी अच्छा पड़ेगा हालांकि ऐसी स्थिति में यहाँ शुभ ग्रह गुरु शुक्र बुध चन्द्र सप्तम भाव मे बैठने पर तब अधिक अच्छी स्थिति में होंगे !

 

कौन_ग्रह_कितने_अंशो_पर_पुष्कर_नवांश_में_होता_है :

 

अब आइये आगे इसके बारे में बात करते है…!

ग्रह राशियों के अनुसार पुष्कर नवांश में बैठते है ! राशियाँ चार तत्वों की होती हैं –

 

  1. अग्नि तत्व राशियाँ – मेष,सिंह,धनु,
  2. पृथ्वी तत्व राशियाँ – वृष,कन्या,मकर, 3. वायु तत्व राशियाँ – मिथुन,तुला, कुम्भ,
  3. जल तत्व राशियाँ – कर्क, वृश्चिक, मीन होती है !

 

  1. कोई भी ग्रह जब अग्नि तत्व राशि मेष, सिंह, धनु में 20° से 23° 20′ या 26°40′ से 30° का होगा तब वह ग्रह नवमांश कुण्डली मे तुला, धनु राशि में जायेगा, तब ऐसा ग्रह पुष्कर नवांश में होना कहलाता है !
  2. कोई ग्रह पृथ्वी तत्व राशि वृष, कन्या, मकर में 6° 40′ से 10° या 13°20′ से 16°40′ के बीच होगा तब ऐसा ग्रह नवमांश कुण्डली मे मीन, वृष राशि में जायेगा, तब यह पुष्कर नवांश में होता है !
  3. जब कोई ग्रह वायु तत्व राशियों मिथुन तुला कुम्भ में 16अंश 40कला से 20अंश का होगा तब ऐसा ग्रह नवमांश कुण्डली मे मीन राशि मे जायेगा मतलब वह पुष्कर नवांश में होगा !
  4. कोई ग्रह जल तत्व राशियों कर्क, वृश्चिक, मीन में 0° से 3° 20′ का होगा तब ऐसा ग्रह नवमांश कुण्डली मे कर्क राशि मे होगा और इन्ही जल तत्व राशियों में कोई जब कोई ग्रह 6° 40′ से 10° के बीच होगा तब ऐसा ग्रह नवमांश कुण्डली मे कन्या राशि में जायेगा और वह पुष्कर नवांश में होगा !

इस तरह से ग्रह किसी राशि में एक निश्चित अंश से एक निश्चित अंश के बीच होने पर पुष्कर नवांश में होते हैं !

यदि पुष्कर नवांश का ग्रह कोई राजयोग, धन योग, विपरीत राजयोग या अन्य तरह से कोई शुभ योग बनाता हो या बनाते हों तब इनकी स्थिति और अधिक बेहतर हो जाती है ! उसकी शुभ फल देने की क्षमता बढ़ जाती है !

 

उदाहरण – 1

सिंह लग्न में मंगल केंद्र त्रिकोण का स्वामी होने पर प्रबल योगकारक होकर सफलता, तरक्की, अच्छा जीवन स्तर देने वाला होता है ! जब मंगल पुष्कर नवांश में ऐसी स्थिति में किसी जातक की कुण्डली मे होगा तब ऐसे मंगल की दशा, अन्तर्दशा में हमेशा मंगल के फल कई तरह से  बहुत अधिक सुखद होंगे, यदि ऐसा मंगल किसी अन्य तरह से राजयोग बना लेता हो या धनः योग बना लेता हो तब सोने पर सुहागा जैसे फल होंगे, ऐसा सिंह लग्न में होता है, क्योंकि वहाँ मंगल प्रबल योगकरल होकर उचाईयो तक ले जाने वाला ग्रह होता है !

 

उदाहरण – 2

मकर लग्न इसमे शुक्र प्रबल योगकारक होता है अब शुक्र पुष्कर नवांश में बैठा हो तब इसके फल बहुत अच्छे होंगे,शुक्र कोई राजयोग बना ले अन्य ग्रह के साथ बैठकर तब इसके शुभ फल कई ज्यादा बढ़ जाएंगे ! इसके अलावा अन्य जितने अधिक ग्रह पुष्कर नवांश में होंगे वह अच्छा ही फल देंगे चाहे वह नीच राशि के, शत्रु राशि मे हो या पाप ग्रहों के प्रभाव में ही क्यों न हो या कमजोर ही क्यों न दिख रहे हों !

 

नोट:-

 

  1. पुष्कर नवांश का ग्रह लग्न कुण्डली मे क्रूर या शुभ किसी भी राशि मे हो लेकिन जब वही ग्रह पुष्कर नवांश में जाता है तब वह हमेशा नवमांश कुण्डली मे शुभ ग्रहों की राशियों, वृष, मिथुन, कर्क, कन्या, तुला, धनु, मीन केवल इन 6 राशियों में ही होता है !

 

  1. पुष्कर नवांश का ग्रह कभी भी नवमांश कुण्डली मे क्रूर राशियों मेष, सिंह, वृश्चिक, मकर, कुम्भ या मिथुन में नही होता है !

 

  1. लग्न कुण्डली मे अस्त ग्रह पुष्कर नवमांश में भी जाने पर कोई शुभ फल नहीं दे सकता है !

 

  1. सूर्य, बुध, शुक्र लग्न कुण्डली में उच्च राशि में हों परन्तु नवमांश कुण्डली में जाने पर यदि वह पुष्कर नवमांश में जाते हैं चाहे वह वहाँ नीच राशि में ही क्यों न गए हों शुभ फल ही देंगे !

 

  1. यदि कोई ग्रह अष्टमेश हो तब वह चाहे पुष्कर नवमांश में ही क्यों न गया हो, वह ग्रह खराब महादशा अन्तर्दशा से प्रभावित होने पर गम्भीर समस्या, दुर्घटना, आर्थिक उतार चढ़ाव या किसी प्रियजन की मृत्यु का कारण भी बन सकता है !

 

  1. लग्न भी पुष्कर नवमांश या वर्गोत्तम पुष्कर नवमांश में जाने पर बहुत अधिक शुभ हो जाता है !

 

  1. किसी भी जातक की कुण्डली में 6 से अधिक ग्रह पुष्कर नवमांश में नहीं हो सकता है !

 

3 – विष_नवांश :

 

जैसे पुष्कर नवांश शुभता प्रदान करता है, उसी प्रकार विष नवांश में जाने वाले ग्रह अशुभ परिणाम ही देते हैं !  कुछ विशेष स्थिति में आने वाले नवांश विष नवांश बनाते हैं !

 

किसी_कुण्डली_में_विष_नवमांश_ज्ञात_करना :

 

.     किसी जातक की जन्म कुण्डली में विष नवमांश कुछ विशेष नवमांशो में लग्न या ग्रह के स्थित होने पर ही बनता है !

 

आइए जानते हैं कि विष नवमांश कब और किस राशि के किस नवमाश में स्थित होने पर बनता है –

 

जब किसी लग्न कुण्डली में –

 

1   2   6   9 राशि में – 00° से 3°20′ में,

 

3  5  7  11 राशि में – 13°20′ से 16°40′ में,

 

4   8   10  12 राशि में – 26°40′ से 30° डिग्री के मध्य में स्थित होने पर लग्न या ग्रह विष नवमांश में स्थित कहा जाता है !

 

ऐसे ग्रह अपनी महादशा अन्तर्दशा आने पर बुरा प्रभाव देते हैं, जिससे वह जिस भाव में स्थित होते हैं, या जिस भाव का वह स्वामी है, या जिस प्रकार के कारकत्व पर प्रभाव रखता है, उस पर बुरा प्रभाव डालता है ! उस भाव से सम्बन्धित फल को खराब कर देता है, उसके शुभ फल में कमीं लाता है और समस्या पैदा करता है ! परन्तु इन सबका फलित लग्न कुण्डली से ही करने पर परिणाम सामने आता है !

 

इस बात को हम एक कुण्डली के माध्यम से समझाते हैं –

नीचे संलग्न की गयी जन्म कुण्डली में उपरोक्त राशियों के सामने अंकित अंश में स्थित ग्रहों की जांच करने पर परिणाम इस प्रकार पाया गया –

 

(1)  1  2  6  9 राशियों में देखने पर इसमें स्थित कोई भी ग्रह 00° से 3°20′ पर स्थित नहीं है !

 

(2)  3  5  7  11 राशियों में देखने पर कोई भी ग्रह 13°20′ से 16°40′ के मध्य स्थित नहीं है !

 

(3)  4  8  10  12 राशियों में देखने पर इन राशियों में से किसी भी राशि में स्थित ग्रह #26°40′ से 30° के मध्य स्थित नहीं है !

 

इस प्रकार हम देख सकते हैं कि इस कुण्डली में स्थित लग्न अथवा कोई भी ग्रह विष नवमांश में स्थित नहीं है ! यह कुण्डली विष नवमांश के प्रभाव से मुक्त है !

 

हम एक दूसरी कुण्डली प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी की लेकर उसमें भी विष नवमांश की गणना करते हैं –

.  मोदीजी की कुण्डली के भोगांश का निरीक्षण करने पर हमें यह परिणाम मिल रहे हैं –

1  2  6  9 में 00° से 3°20′ के मध्य स्थित ग्रह सूर्य और बुध कन्या राशि में स्थित हैं !

 

3  5  7  11 में 13°20′ से 16°40′ के मध्य स्थित ग्रह केवल शुक्र है !

 

4  8  10  12 में 26°40′ से 30° के मध्य कोई ग्रह स्थित नहीं है  !

 

इनका विश्लेषण करने पर हम पाते हैं कि सूर्य के एकादश भाव में कुम्भ राशि में विष नवमांश में स्थित होने के कारण इनका अपने  पिता और परिवार से सम्बंध और सानिध्य अच्छा नहीं रह सका ! निजी आय भी प्रभावित रही हैं ! बुध कुण्डली में अस्त हैं अतः उन पर विष नवमांश का कोई प्रभाव नहीं पड़ा  !

परन्तु शुक्र के विष नवमांश में स्थित होने एवं सप्तम भाव व द्वादश भाव के स्वामी व सप्तम भाव के कारक भी होने के कारण वैवाहिक स्थिति, पत्नी के साथ अंतरंग  सम्बन्ध और संतान सम्बंधित सामंजस्य और सुख मिलने में विषतुल्य प्रभाव डाला जिससे यह सुख नहीं मिल सका ! अतः इस कुण्डली में विष नवमांश का प्रभाव स्पष्ट रूप से परिलक्षित हो रहा है ! फिर भी लग्न, लग्नेश, राशीश और चन्द्रमा तीनों ही पुष्कर नवमांश में स्थित हैं, यह बहुत ही शुभफलदायी स्थिति कुण्डली में होने के कारण मोदी जी का व्यक्तित्व आत्मविश्वास, मानसिक स्थिति, बहुत ही उच्च स्तर पर पहुँच जाती है, यही कारण है कि दुनिया के सभी राजनीतिज्ञ उनका लोहा मानते हैं ! उनका साहस पराक्रम और माँ का स्पोर्ट उन्हे सर्वोच्च पद तक पहुंचा दिया ! भाग्येश चन्द्रमा की वजह से उनका भाग्य हमेशा साथ दे रहा है ! चन्द्रमा भौतिक सुख का भी कारक होता है, अतः इसका भी हर सम्भव सुख उन्हे मिला !

 

 

 जन्मकुंडली का दशम भाव और रोजगार

 

कुंडली के दशम भाव से मुख्यरूप से मान-सम्मान, पद प्रतिष्ठा, पिता, नोकरी, व्यापार रोजगार आदि का अध्ययन किया जाता है। इनसे से ही आज बात करते रोजगार की। आजीविका चलाने के लिए रोजगार की आवश्यक्ता होती है जो दशम भाव से देखी जाती है।इस भाव की शुभ-अशुभ, बली-निर्बल अवस्था जातक के रोजगार का स्तर तय करती है कि रोजगार के क्षेत्र में जातक का रोजगार कैसा होगा।

 

लग्न से दशम भाव और दशमेश की स्थिति के अनुसार जातक की नोकरी, सरकारी नोकरी, व्यवसाय की स्थिति देखी जायेगी।

 

दशमेश दशम भाव में ही अपने राशि अंशो में बली होकर हो, अस्त न होकर बैठा हो, पाप ग्रहो या अनिष्ट भाव के स्वामी ग्रहो से युक्त या द्रष्ट न हो तब जातक को शीघ्र ही अच्छी नोकरी की प्राप्ति हो जाती है।

 

दशमेश का सम्बन्ध जितना अधिक केंद्र त्रिकोण के स्वामियों से होगा उतना ही श्रेष्ठ रोजगार जातक को प्राप्त होगा ऐसा जातक रोजगार के छेत्र में उच्च सफलताएँ प्राप्त करता है इसके साथ ही दूसरे भाव धन भाव और ग्यारहवे भाव लाभ भाव की स्थिति मजबूत होने से जातक उच्च स्तर का व्यवसायी होता है।

 

नौकरी और व्यापार की जाँच कुंडली में दूसरे भाव और ग्यारहवे भाव व शनि की स्थिति पर बहुत अधिक निर्भर करती है शनि को नवग्रहों में नोकर का पद प्राप्त है।शुभ और बली होने पर यह उच्च स्तर की नोकरी देता है।

 

दशम भाव की बली और दशमेश की अन्य केंद्र त्रिकोण के स्वामियों से बली सम्बन्ध दूसरे और ग्यारहवे भाव की बली स्थिति जातक को अधिकतर व्यापार ही कराती है।नौकरी से ज्यादा जातक व्यापार से अधिक धन अर्जित कर सकता है ।

 

यदि दूसरा और ग्यारहवा भाव बलवान होता है तो धन की स्थिति जातक की बलवान होती है।अधिक धन जातक व्यापार से ही अर्जित कर सकता है नौकरी में एक निश्चित आय की प्राप्ति ही संभव हो पाती है।

 

सूर्य, गुरु, बुध, शनि दशम भाव के कारक है व्यापार के लिए सूर्य, गुरु, बुध, शनि कारक ग्रहो का बली होना भी आवश्यक है।इसमें भी बुध व्यापार का प्रबल कारक है। दशमेश और दशम भाव के कमजोर होने से जातक के नौकरी के योग ही बनते है, सामान्य बली दशम भाव, दूसरा भाव और ग्यारहवा भाव नोकरी के अवसर ही प्रदान करता है।

 

कुंडली का छठा भाव सेवा का होता है यदि दशमेश का सम्बन्ध केवल छठे भाव या केवल षष्ठेश से हो तब भी जातक के नौकरी के योग ही बनते है यदि अन्य प्रकार से कुंडली की रोजगार और धन संबंधी स्थितियां बली हो और व्यापार कारक विशेष रूप से बुध बली भी हो तब व्यापार की के योग भी बन जाते है।

 

दशम भाव या दशमेश का सम्बन्ध सूर्य, मंगल या गुरु से होने पर सरकारी नोकरी के योग बनते है।सूर्य स्वयं राजा है यह सरकारी नोकरी का प्रबल कारक है।

 

इन ग्रहो के अतिरिक्त बुध, शनि, शुक्र अन्य ग्रह प्राइवेट नोकरी देते है।पाप ग्रहो से पीड़ित दशमेश या दशम भाव जातक को नोकरी ही कराता है।कमजोर और पीड़ित दशमेश, दशम भाव के होने से जातक को नौकरी में असंतुष्टि रहती है मेहनत अधिक और लाभ कम होता है।इस योग के साथ नवम भाव बलवान हो तब स्थितियां कुछ अनुकूल रहती है जातक जितनी मेहनत करता है अपनी मेहनत के अनुसार फल प्राप्त कर लेता है।

 

दशम भाव में अधिक से अधिक बैठे केंद्र त्रिकोण भाव के बली ग्रह रोजगार के क्षेत्रों में उच्च सफलताएं देते है।

 

लग्न कुंडली में रोजगार संबंधी ग्रह नवमांश कुंडली में भी बली होने आवश्यक होते है यदि यह ग्रह नवमांश कुंडली में कमजोर या नीच के हो जाए तब इनके शुभ फल देने की क्षमता बहुत कम हो जायेगी।

 

लग्न कुंडली के दशम भाव की उपरोक्त बताई गई बली स्थितियां दशमांश कुंडली में भी बन रही हो, दशमांश कुंडली में भी रोजगार के लिए शुभ और बली स्थितियां होने से यह सोने पर सुहागा जैसी स्थिति रोजगार के क्षेत्र में जातक के लिए होंगी।

 

 

 

 प्रतियोगिता में सफलता कैसे देखें………

 

कुंडली के आधार पर कैसे जाने की जातक

जीवन के कार्य क्षेत्र में अपने प्रतियोगी और प्रतिस्पर्धीओं से आगे रहेगा या पीछे इसके लिए भावात भावम का सिद्धांत का अनुसरण करते हुए विश्लेषण करने का प्रयास करते हैं और यही सिद्धांत ऋषि यों ने विपरीत राजयोग में भी लागू किया है जिसके अनुसार यदि 3,6,8 12 और विशेष रूप से 3,6,8 के स्वामी यदि 3,6,8 भाव में बैठकर यदि पीड़ित भी हो तो वह शुभ फल देने में सक्षम होते हैं इसे एक #उदाहरण कुंडली के माध्यम से सिद्ध करने का प्रयास करते हैं।

 

जातक की कुंडली मेष लग्न की है………….

अर्थात छठे भाव शत्रु भाव हुआ जिसमें कन्या राशि है

इस तरह से अपने शत्रु या फिर प्रतिस्पर्धी की लग्न कन्या लग्न बनी विशेष ध्यान देने वाली बात अर्थात जातक की लग्न मेष लग्न और प्रतिस्पर्धा करने वालों की लग्न कन्या…………

अब यह देखना यह है कि मेष लग्न वाले जातक का 1,3,5 9 और 10 भाव एवं 11 बलवान है या कन्या लग्न बाले का 1,3,5,9 और 10 एवं 11 भाव बलवान एवं है

 

मेरी नजर में यदि कन्या लग्न वाले के यानी जातक के शत्रु के 1,3,5,9 10 एवं 11भाव मेष लग्न वाले से अधिक बलवान होंगे तो जातक अपने प्रतिस्पर्धी और से हर क्षेत्र में पीछे हो जाएगा ……………

क्योंकि मेष लग्न उसके स्वयं की है……………

और कन्या लग्न उनके शत्रुओं और प्रतिस्पर्धी की बन रही है

और यदि मेष लग्न वाले जातक का 135 9 10 11 भाव

कन्या लग्न के जातक अर्थात शत्रु से बलवान हुए तो जातक के प्रतिस्पर्धी मीलों पीछे रह जाएंगे………….

और जातक हर क्षेत्र में तेजी से तरक्की करते हुए प्रतिस्पधियो को पीछे छोड़ देगा…………

 

सबसे पहले लग्न को देखें……………..

मेष लग्न का स्वामी मंगल पंचम भाव में बैठकर नवम भाव के स्वामी गुरु से दृष्ट होकर लग्न को बेहद बलवान बना रहा है जबकि शत्रु का छठा भाव को कन्या लग्न मानते है तो उसका स्वामी बुध शत्रु राशि वृश्चिक राशि में राहु से युक्त होकर बैठा है अर्थात शत्रुओं या प्रतिस्पर्धियो की लग्न #कमजोर हो गई…………..

 

अब तीसरे भाव को देखते हैं…………

मेष लग्न वाले जातक की तीसरे भाव में मिथुन राशि है उसका स्वामी अष्टम भाव में बैठकर राहु से युत होकर कमजोर हो रहा है

लेकिन वही बुध राहूं से युक्त होकर शत्रु की लग्न से तीसरे भाव यानी जातक के अष्टम भाव में वृश्चिक राशि में बैठकर शत्रु के तीसरे भाव को भी कमजोर कर रहा है

 

अर्थात दोनों का तीसरा भाव यानी पराक्रम भाव लगभग बराबर माना जा सकता है या मेष लग्न वाले का कुछ बलवान ही दिखाई देता है क्योंकि पंचम भाव के स्वामी सूर्य की दृष्टि भी तृतीय भाव पर मित्र राशि में है

 

इसलिए बौद्धिक बल में मेष लग्न वाले जातक कुछ अधिक ही दिखाई देता है अगर अधिक ना मानो तो दोनों का पराक्रम बराबर रहेगा जातक का और जातक के शत्रु का……………

 

अब पंचम भाव को देखें……….

जातक के पंचम भाव में लग्न का स्वामी मंगल लग्नेश होकर बैठा हुआ है पंचम भाव की शुभता को बढ़ा रहा है

एवं पंचम भाव का स्वामी नवम भाव में बैठकर नवम भाव से  दृष्ट होकर पंचम भाव को बलवान बना रहा है

 

लेकिन शत्रुओं की लग्न यदि कन्या मानी जाए तो कन्या लग्न में भी पंचम भाव बलवान दिखाई देता है यहां मकर राशि पंचम भाव में आएगी जिसका स्वामी शनि उच्च का होकर दिगवल्ली होकर बैठा है अर्थात जातक के शत्रु बुद्धि बल में कम नहीं होंगे लेकिन शनि  कन्या लग्न के लिए छठे भाव का स्वामी भी होता है अर्थात जातक के शत्रुओं के शत्रु अर्थात जातक स्वयं भी महाबली होगा

अर्थात बुद्धि बल में बराबर होने के बावजूद जातक शत्रु पर भारी होगा………….

 

अब नवम भाव

जीवन में तुरंत सफलता के लिए और उच्च शिक्षा के लिए और प्रबल बुद्धि के लिए पंचम के साथ नवम का बलवान होना भी आवश्यक होता है अर्थात यहां मेष लग्न का जातक का नवम भाव बेहद बलवान है अपने प्रतिस्पर्धी यानी कन्या लग्न वाले शत्रुओं के सामने क्योंकि शत्रु की माने जाने वाली कन्या लग्न में नवम भाव वृष राशि में पड़ता है वृष राशि में केतु बैठ कर शत्रु के नवम भाव को पीड़ित कर रहा है और किसी भी प्रकार की शुभ दृष्टि से वृष राशि को बल नहीं मिल रहा केवल वृषभ राशि पर बुद्ध की दृष्टि है और बुध राहु जैसे पाप ग्रह से पीड़ित होने के कारण पाप ग्रह के रूप में दृष्टि प्रदान करेगा………

यह ज्योतिष का बेसिक नियम है चंद्रमा और बुध पाप ग्रह की संगत में रहकर पाप ग्रह जैसा फल देते हैं

लेकिन पूर्व जन्म के सुकर्म के कारण जातक का नवम भाव अपने शत्रुओं से कोसों आगे दिखाई देता है अर्थात इस जातक से इसके प्रतिस्पर्धी जीवन में हमेशा पीछे ही रहेंगे पल-पल #भाग्य जातक के साथ खड़ा रहेगा

जबकि शत्रुओं के भाग्य में हमेशा बाधाएं आएंगी अर्थात अपने प्रतिस्पर्धी और से जातक का नवम भाव बेहद बलवान है………..

 

अब दशम भाव देखें…….

मेष लग्न के जातक का दशम भाव और लाभ भाव का का स्वामी शनि उच्च का भी है दिग्बली भी है अर्थात बेहद ताकतवर है  और सबसे बड़ी बात किसी भी पाप ग्रह से पीड़ित भी नहीं है जबकि इसके जबकि जातक के शत्रु की कन्या लग्न होने के कारण दशम भाव में मिथुन राशि हुई जिसका स्वामी बुरी तरह पीड़ित है अर्थात शत्रुओं का दशम भाव भी कमजोर है और जातक के चतुर्थ भाव और उसी को शत्रुओं का एकादश भाव माना जाएगा उसमें कर्क राशि हुई कर्क राशि पर शनि और राहु जैसे पाप ग्रहों का दृष्टि का प्रभाव है अर्थात दशम भाव और एकादश भाव में जातक अपने शत्रुओं से मीलों आगे #दिखाई देता है यानी जातक का दशम भाव और एकादश भाव शत्रुओं के दशम भाव और एकादश भाव से बहुत अधिक बलवान माना जाएगा

 

अर्थात निष्कर्ष यह निकलता है।

जातक का लग्न भाव और लग्नेश बलवान होने से

और शत्रु का लग्नेश पीड़ित होने से यह सिद्ध होता है जातक का व्यक्तित्व अपने शत्रुओं से व्यक्तित्व के मामले में काफी भारी होगा………….. तीसरा भाव लगभग बराबर की स्थिति में होने के कारण जातक और जातक  के शत्रु लगभग बराबर के पराक्रमी और मेहनती होंगे पंचम भाव भी लगभग बराबर की स्थिति में होने के कारण जातक के शत्रु भी बुद्धिमत्ता में जातक को टक्कर देंगे लेकिन नवम भाव दशम भाव और एकादश भाव में जातक अपने शत्रुओं से मीलों आगे रहेगा जातक का लग्न और लग्नेश शत्रुओं के लग्न और लग्नेश से काफी बलवान रहेगा उसके ऊपर ईश्वर कृपा राज्य कृपा और लाभ भाव बलवान होने के कारण लक्ष्मी की कृपा अपने शत्रुओं की तुलना में कई गुना अधिक रहेगी अर्थात यह जातक अपनी इस कुंडली के ग्रहों के आधार पर ऐसा लगता है अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ख्याति प्राप्त करेगा हो सकता है

 

 इसी प्रकार से विपरीत राजयोग का भी ऋषि यों ने इसी आधार पर प्रतिपादन किया है क्योंकि छठे भाव शत्रु की लग्न आठवां भाव शत्रु के पराक्रम का होता है और द्वादश भाव शत्रु के साझेदारी और सहयोगियों का होता है अर्थात इस स्थिति में जब यह भाव पीड़ित होते हैं इनके भाव पति पीड़ित होते हैं और 3,6,8 12 में बैठकर कि पीड़ित होते हैं तो विपरीत राजयोग की सृष्टि होती है

 

*विनय से सदा इस लोक में,

*मिले आदर सम्मान।

*विनय से ही प्राप्त होवे,

*परलोक में मुक्ति स्थान।

 

*” गर्वितो नियमादविनीतो भवति ‘

 

*अभिमानी मनुष्य की कोई कीमत नही होती। जो अभिमानी होता है वह अविनीत होता है। उसके ह्रदय पर पडा़ हुआ अभिमान का पत्थर विनय के पुष्प को खिलने नहीं देता। नम्रता और विनय का घनिष्ट संबध है। जहा नम्रता रहेगी वहां विनय रहेगा ही। जहा नम्रता नहीं वहां विनय नहीं। नम्रता तो अभिमान की परछाई तक नहीं स्वीकार करती है।

 

*प्रकाश और अंधकार में जितना अंतर है नम्रता और अभिमान में भी उतना ही अंतर है। अभिमान या गर्व के अनेक प्रकार हैं। जाति का गर्व, रुप का गर्व,बल का गर्व, बुद्धि का गर्व, संपत्ति का गर्व, ज्ञान का गर्व आदि। यदि एक भी गर्व मनुष्य में है, तो वह अविनीत बनेगा ही। विनय, नम्रता, विवेक उससे कोसों दूर रहेगा। ऐसे मनुष्य कभी आत्मज्ञान नही पा सकते है। विनय ही मनुष्य की शोभा है।

ग्रहों की परस्पर सम्बन्ध फलविचार –

 

ज्योतिष शास्त्र में कुंडली विवेचन हेतु मूल आधार हैं, 12 भाव, 12 राशियाँ, 27 नक्षत्रों में, 09 ग्रहों के परस्पर बनने वाले स्थान, युति, दृष्टि और परिवर्तन के अनेकानेक परस्पर सम्बन्ध।

 

  1. ग्रहों के “युति” सम्बन्ध – ग्रहों की युति अर्थात कुंडली के किसी भी भाव में एक से अधिक ग्रहों का स्थित होना। किसी भी कुंडली में अधिकतम 8 ग्रह लग्न कुंडली के एक भाव में युति कर सकते हैं। कुंडली में किन्ही 2 ग्रहों का कुंडली के किसी भी एक भाव में स्थित होना एक सामान्य घटना है। दो से अधिक ग्रहों की युति होने पर कुंडली विश्लेषण हेतु विशेष ध्यान देने की आवश्यकता होती है और विद्वान् ज्योतिषी विभिन्न कोणों द्वारा भाव विवेचन कर फलकथन करते हैं।

 

  1. ग्रहो के “दृष्टि” सम्बन्ध – किन्ही दो ग्रहों का परस्पर समसप्तक होना अर्थात परस्पर 1-7 स्थान पर स्थित होकर परस्पर पूर्ण दृष्टि देना एक मजबूत संयोग (शुभ या अशुभ) का निर्माण करता है।

मंगल और शनि दोनों ही पाप ग्रह हैं और परस्पर 1-7 स्थान पर स्थित न होकर भी परस्पर दृष्टि से देखते हैं। यह एक अशुभ संयोग का निर्माण कर सकता है। इस संयोग में अशुभ भाव, शत्रु राशि, निर्बल चंद्र, राहु-केतु आदि का सम्मिलित होना और कोई शुभ दृष्टि न होना योग के आकस्मिक और नकारात्मक परिणामों में वृद्धिकारी हो सकता है। अचानक प्रतिकूल परिस्थितिया, दुःख और हानि बनी रहती है। जीवन की चुनौतियाँ अत्यंत बलि होती हैं। जातक में दृढ निश्चय और आत्मविश्वास की कमी हो सकती है

 

  1. ग्रहों के “स्थान” सम्बन्ध – किन्ही दो ग्रहों का परस्पर केंद्र-त्रिकोण में स्थित होना एक उत्त्तम संयोग है। यह संयोग लग्न अथवा चंद्र से केंद्र-त्रिकोण में बने और शुभ प्रभाव में हो तो जातक जीवन में सकारात्मक परिणामों को उत्तम रूप में प्रदर्शित करता है।

 

  1. ग्रहों के “परिवर्तन” सम्बन्ध – किन्ही दो ग्रहों (शुभ/अशुभ) का परस्पर राशियों (मित्र/शत्रु) में स्थित होना इस संयोग का निर्माण करता है। चारों प्रकार के संबंधों में यह सम्बन्ध सर्वोत्तम श्रेणी का माना जाता है। इस सम्बन्ध पर शुभ ग्रहों का प्रभाव इस्क्के सकारात्मक फलों में वृद्धि और स्थायित्व प्रदान करता है। जातक जीवन की प्रतिकूल परिस्थितियों में भी हार स्वीकार नहीं करता है, साहस, दृढ निश्चय और आत्मविश्वास के साथ चुनौतियों पर विजय प्राप्त कर आगे बढ़ता जाता है।

 

नोट – ग्रहों द्वारा परस्पर निर्मित किसी भी सम्बन्ध में शुभ-अशुभ फलानुभूति के लिए लग्न तथा चंद्र की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।

 

ज्योतिष के जिज्ञासुओं द्वारा सामान्य रूप से पूछे जाने वाले एक सामान्य से प्रश्न, जिसका उत्तर जिज्ञासु को तुरंत चाहिए होता है। परन्तु वह स्वयं के द्वारा पूछे गए प्रश्न की गूढ़ता से अपरिचित रहता है।

 

प्रश्न – आमुक लग्न कुंडली के आमुक भाव में आमुक दो ग्रहों की युति/ दृष्टि/ स्थान/ परिवर्तन का संभावित फल क्या होगा?

इस सरल से प्रतीत होने वाले प्रश्न के जटिल स्वरुप को समझते हैं।

 

माना कि प्रश्नकर्ता मेष लग्न के कुंडली के षष्ठम भाव में स्थित सूर्य और शनि की “युति” के सन्दर्भ में प्रश्न करता है। यदि मात्र कालपुरुष की कुंडली को आधार मान कर हम इस प्रश्न का उत्तर दे भी देते हैं तो प्रथम दृष्टया तो प्रश्नकर्ता संतुष्ट हो सकता है परन्तु सभी 12 लग्नों के लिए उत्तर में भिन्नता होना स्वाभाविक है।

 

ग्रहों की युति के सन्दर्भ उत्तर हेतु विचारणीय बिंदु-

 

  • युति किस भाव में है?
  • भावेश की स्थिति क्या है और क्या भावेश अपने भाव को दृष्टि दे रहा है?
  • क्या भाव को कोई अन्य गृह अपनी शुभाशुभ दृष्टि प्रभाव, परस्पर परिवर्तन प्रभाव अथवा परस्पर स्थान प्रभाव से प्रभावित कर रहा है?
  • जिन ग्रहों की युति है, वे एक ही नक्षत्र में हैं अथवा अलग अलग नक्षत्रों में? यदि वे एक ही नक्षत्र में हैं तो क्या वे एक ही चरण में हैं, या अलग-अलग चरण में स्थित हैं?
  • दोनों ग्रहों में से अधिक बलि गृह कौन सा है और दोनों गृह नैसर्गिक रूप से परस्पर किस तरह के सम्बन्ध रखते हैं, साथ ही पंचधा मैत्री उन ग्रहो के नैसर्गिक सम्बन्ध पर क्या प्रभाव डाल रही है?
  • दोनों ग्रहों की अंशात्मक रूप से अवस्था क्या है?
  • क्या कोई एक ग्रह अथवा दोनोँ ग्रह वक्री हैं?
  • दोनों ग्रह भावेश के साथ किस प्रकार के सम्बन्ध में हैं अर्थात मित्र, शत्रु, सम, अति मित्र, अति शत्रु?

 

यूँ तो विचारणीय बिंदु और भी हैं जिनमें हम, स्थान बल, दिग्बल, चेष्टाबल, अष्टकवर्ग आदि पर भी विचार कर सकते हैं। परन्तु प्रथम दृष्ट्या ऊपर निर्देशित बिंदु अत्यंत महत्त्वपूर्ण हैं जिनको आधार बना कर हम दो ग्रहों की युति के फल की विवचना कर सकते हैं।

“अब आप स्वयं जी जानिये और समझिये कि एक सरल सा प्रतीत होने वाला प्रश्न स्वयं में कितनी गूढ़ता छिपाये होता है। संभवतया विद्द्जनों का मंतव्य है कि कुंडली विवेचन हेतु सूत्रीय ज्ञान के साथ, चित्त की स्थिरता और ईश्वरीय कृपा का होना परम आवश्यक है। किसी भी परा विद्या को सीखना एक विषय है और उस को समझना दूसरा विषय है। सीखने के लिए पढ़ना, सुनना और देखना होता है और समझने के लिए पढ़े, सुने, देखे को आत्मसात करना होता है।“

किसी की बुझी हुई ज्योति को फिर से प्रकाशित करने के लिए सर्वप्रथम स्वयं को जलना होता है।

 

कुंडली में ग्रहों की किसी भी युति का विचार करते समय निम्न बिंदुओं का ध्यान रखें,

  • युति किस भाव में है?
  • युति कर रहे ग्रहों की अंशात्मक रूप से अवस्था क्या है?
  • क्या युति कर रहे ग्रहों में कोई गृह वक्री अथवा अस्त है?
  • युति में सम्मिलित ग्रहों का भावेश के साथ किस प्रकार का सम्बन्ध है?
  • युति शुभ प्रभाव में है, अशुभ प्रभाव में है अथवा पाप प्रभाव में है?
  • क्या युति केतु-राहु प्रभाव में है

नोट – केतु-राहु के साथ सम्बंधित होने सूक्षम विचार करें और केतु-राहु तारतम्य स्थापित कर कुंडली विवेचन करें।

 

 

 

 

 विवाह भाव का विश्लेषण

 

 

— शुक्र के विभिन्न ग्रहों से संयुत होने पर पत्नी के स्वभाव व भाग्यफल

 शुक्र + सूर्य

ऐसे पुरुष की पत्नी सम्मानित, आत्मसम्मान से भरी, सुशील और अच्छे परिवार से होती है। धन-संचय में दक्ष, क्षमाशील, परोपकारी और सामाजिक कार्यों में रुचि रखने वाली। पित्त संबंधी तकलीफ़ें हो सकती हैं।

 शुक्र + चन्द्रमा

पत्नी दूर स्थान से, कला-रूचि वाली, यात्रा-प्रिय लेकिन चंचल प्रवृत्ति की। दूसरों की बातों में जल्दी आ जाती है। मन अस्थिरता और जुकाम/ठंड की समस्या रहती है। ससुराल पक्ष से गलतफहमियाँ संभव।

 शुक्र + मंगल

पति से तकरार व वाद-विवाद की प्रवृत्ति। सीधी, तेज़, गुस्सैल और कभी-कभी अहंकारी। चापलूसी पसंद कर सकती है। हृदय संबंधी समस्याएँ भी संकेतित।

 शुक्र + बुध

पत्नी वाचाल, मिलनसार, हँसमुख और समझदार। कठिनाइयों से उभरने की क्षमता। शिक्षा सामान्य रहे पर बुद्धि तेज़ होती है। बाद में कुछ त्वचा रोग हो सकते हैं। पति वाणिज्य/व्यापार में प्रगति पाता है।

 शुक्र + बृहस्पति

पत्नी धार्मिक, सभ्य, विनम्र, मार्गदर्शक, सम्मानित और दोनों परिवारों को मान देने वाली। मोटापे की समस्या हो सकती है।

 शुक्र + शनि

धीमी प्रवृत्ति, लेकिन कर्मशील। नौकरी या कार्य लेने की प्रवृत्ति। जीवन में अनुशासन भी आ सकता है।

शुक्र + राहु

पत्नी अत्यंत आकर्षक व सुंदर, परंतु रहस्यमयी, कभी झूठ बोलने वाली या आलसी। धन संचय में कुशल। पति को वाहन सुख मिलता है। गर्मी व गैस की समस्या संभव।

 शुक्र + केतु

पत्नी दैव-चिंतनशील, दानशील और धन संचय में रुचि रखने वाली। आध्यात्मिकता की ओर झुकाव।

त्रिग्रही योग — शुक्र + दो ग्रहों का संयुक्त फल

 शुक्र + सूर्य + चन्द्रमा

पत्नी सम्मानित और यात्राप्रिय।

 शुक्र + सूर्य + मंगल

बहुत भाग्यशाली लेकिन गर्वीली और जिद्दी। निर्देश पसंद नहीं करती।

 शुक्र + सूर्य + बुध

बुद्धिमान, व्यावहारिक और दोनों परिवारों के लिए सम्मान लाने वाली।

 शुक्र + सूर्य + बृहस्पति

पत्नी न्यायप्रिय, लोगों के विवाद सुलझाने में सक्षम, प्रभावशाली, सामाजिक कार्यों में सक्रिय। संतान भाग्य उत्तम।

 शुक्र + सूर्य + शनि

उच्च कुल में जन्म, पर पिता ने जन्म समय संघर्ष झेले। पुत्र सुख में बाधा, जब तक शुभ दृष्टि न हो।

शुक्र + सूर्य + राहु

पत्नी के पिता ने जीवन में विपत्ति झेली। विवाह के बाद पत्नी पति को अधिक सुख देती है। पुत्र के योग निर्बल।

 शुक्र + सूर्य + केतु

पिता की संपत्ति में झगड़े या मुकदमे। औसत भाग्य।

 शुक्र + चन्द्र + सूर्य

पत्नी का पिता स्थानांतरित रहता है। स्वभाव परिवर्तनीय, कलात्मक।

 शुक्र + चन्द्र + मंगल

बुद्धिमान लेकिन कभी-कभी ज़िद्दी। जेठ-जेठानी या बड़े लोगों से कलह। पति को यात्रा से लाभ।

 शुक्र + चन्द्र + बुध

बहुत बुद्धिमान, कलाकार, सामाजिक, अतिथि-प्रिय। बहनें/भाई होंगे। पवित्र स्थानों की यात्रा। पति का भाग्य पत्नी से उभरता है। लोग उसकी भलमनसाहत का लाभ उठाकर बाद में दोष देते हैं।

शुक्र + चन्द्र + बृहस्पति

भोली, धार्मिक, अतिथि सेवी, पवित्र स्थल में जन्म। पति के भाग्य में वृद्धि करते हुए समृद्धि लाती है।

 शुक्र + चन्द्र + शनि

सुंदर, घरेलू, थोड़ा आलसी, ठंड से समस्या। पति की नौकरी/कैरियर में परिवर्तन।

 शुक्र + चन्द्र + राहु

पत्नी सुंदर लेकिन मानसिक अस्थिरता, ठंड और रूमेटिज़्म की समस्या। ससुराल से सहयोग कम। डर, अवसाद, बुरी शक्तियों का प्रभाव संभव—रात, अकेलेपन, जलाशयों से बचना चाहिए।

 शुक्र + चन्द्र + केतु

भाग्यशाली, पवित्र, आध्यात्मिक, अत्यधिक सफ़ाई पसंद, लेकिन आत्मविश्वास कमी और बार-बार प्रयास की प्रवृत्ति।

 शुक्र + बुध + सूर्य

सुसंस्कृत, बुध्दिमान, पति के भाग्य में उन्नति लाने वाली। भूमि/जायदाद देती है।

 शुक्र + बुध + चन्द्र

बातों से सबको आकर्षित करने वाली, समायोजनशील, कलात्मक। बहन अथवा सहेली पति पर मोहित हो सकती है।

 शुक्र + बुध + मंगल

शिक्षा औसत पर बुद्धि तीक्ष्ण। पहले विवाह प्रस्ताव टूट सकता है। स्वभाव थोड़ा तुनकमिजाज।

 शुक्र + बुध + बृहस्पति

ज्ञानप्रिय, शिक्षिका/गाइड जैसे गुण। सामाजिक और सम्माननीय।

 शुक्र + बुध + शनि

उच्च बुद्धि, करियर-उन्मुख। पति को भूमि लाभ देती है, परंतु पति कुछ मनोव्यथा भी देता है।

 शुक्र + बुध + राहु

डर या चिंता की प्रवृत्ति। लेकिन भाग्य पत्नी से बढ़ता है और विलासिता प्राप्त होती है।

 शुक्र + बुध + केतु

बहुत आध्यात्मिक, विष्णु-भक्त, तंत्र/ज्ञान की रुचि। पति कृषि/भूमि से लाभ पाता है।

 शुक्र + बृहस्पति + सूर्य

भाग्यशाली, धनवान, सुंदर भोजन व आभूषणों की रुचि। बाद में अपार सम्मान। पुत्र भाग्य उत्तम।

 शुक्र + बृहस्पति + चन्द्र

सम्मानीय, कलात्मक, यात्रा से लाभ, पति को समृद्ध बनाने वाली।

 शुक्र + बृहस्पति + मंगल

पत्नी भली लेकिन पति के स्वभाव से कलह। यदि पति सुधरे तो भाग्य अत्यंत बढ़ेगा।

 शुक्र + बृहस्पति + बुध

बुद्धिमान लेकिन पति का महिला सम्बन्धों से तनाव। फिर भी पति का भाग्य पत्नी से उभरता है।

 शुक्र + बृहस्पति + शनि

शिक्षक/मार्गदर्शक गुण, महान भाग्य, दोनों कुलों में नाम।

 शुक्र + बृहस्पति + राहु

पत्नी घर में प्रभावशाली, धार्मिक, और पति को अत्यधिक भाग्य देती है।

 शुक्र + बृहस्पति + केतु

सीधी, दानशील, धार्मिक, थोड़ा गुस्सैल पर अत्यंत शुभ भाग्य।

 शुक्र + शनि + सूर्य

कर्तव्यनिष्ठ, करियरमुखी। जन्म के समय पिता को कष्ट।

 शुक्र + शनि + चन्द्र

कामकाजी, घुमक्कड़, आरोपों का सामना करने वाली।

 शुक्र + शनि + मंगल

पति के कारण कलह और अलगाव की स्थिति, पर पत्नी के भाग्य से पति समृद्ध।

 शुक्र + शनि + बुध

पति को भूमि/लाभ मिलता है, पर पति के अन्य सम्बन्धों के कारण दुख।

 शुक्र + शनि + बृहस्पति

करियर-उन्मुख, बाद में बहुत समृद्ध व सम्मानित।

 शुक्र + शनि + राहु

सुंदर, लेकिन हृदय रोग संकेतित। पति को अपार सम्पत्ति व वैभव।

 शुक्र + शनि + केतु

विवाह बाद जीवन में संकट आते हैं, फिर सुधार।

शुक्र + राहु + सूर्य

पत्नी के पिता ने विपत्ति झेली लेकिन विवाह बाद उबर गए। पत्नी से पति को प्रतिष्ठा।

 शुक्र + राहु + चन्द्र

भाग्यशाली पर मानसिक तनाव और दोषारोपण। रात/जल/अकेलेपन से बचाव आवश्यक।

 शुक्र + राहु + मंगल

बहस, झगड़े व अशांति। पति को वाहन सुख।

 शुक्र + राहु + बुध

पति-पत्नी दोनों में बाहरी सम्बन्ध के संकेत।

शुक्र + राहु + बृहस्पति

भाग्य धीरे-धीरे बढ़ता है। बाद में समृद्धि।

 शुक्र + राहु + शनि

पति को अत्यधिक धन, भवन, वाहन। भाग्य पत्नी से।

 शुक्र + राहु + केतु

विवाह उपरांत चरम संकट, फिर उन्नति। सुख में स्थिरता कम।

 शुक्र + केतु + सूर्य

पत्नी मोक्षमुखी, समझदार, और पति को सरकारी लाभ दिलाने वाली।

 शुक्र + केतु + चन्द्र

गृह-प्रवीण, धार्मिक, कलाकारी व सिलाई-कढ़ाई में रुचि।

 शुक्र + केतु + मंगल

शिक्षा में अड़चन; पति-पत्नी में असामंजस्य।

 शुक्र + केतु + बुध

पति को धोखे का सामना, बाद में भूमि लाभ। स्वतः विवादों पर विजय।

 शुक्र + केतु + बृहस्पति

आध्यात्मिक, औसत भाग्य, शिक्षा/चिकित्सा क्षेत्र में रुचि।

 शुक्र + केतु + शनि

विवाह के बाद गंभीर संकट; फिर धीरे सुधार।

शुक्र + केतु + राहु

अत्यंत कष्टकारी — वैवाहिक सुख न्यून, स्वास्थ्य बिगड़ना, मानसिक तनाव, परिवार में अशांति

 

 

 

 ग्रहो का स्थानाधिपति स्वभाव

 

ज्योतिष में फलादेश को जानने के लिए एक बड़ा सरल और सत्य आंकड़ा ये है की जन्म कुण्डली के अंदर बारह भावो के अधिपति सात ग्रहो का ये प्राकृतिक स्वाभाव होता है की किसी भी स्थान का स्वामी कोई भी ग्रह जिस किसी भी स्थान पर बैठेगा, तो उस स्थान में अपने स्थान की शक्ति के योग से सफलता या असफलता प्राप्त करेगा अर्थात भाग्य का स्वामी ग्रह यदि भाग्य स्थान पर ही बैठा है तो भाग्य स्वयं कुदरती रूप से जाग्रत रहेगाओर भाग्य का स्वामी कोई ग्रह यदि राज्य स्थान पर बैठा है तो पिता ,राज्य व्यापार आदि के योग से भाग्य की जागृति होगी और भाग्य का स्वामी यदि लाभ स्थान पर बैठा है तो आमदनी के उत्तम मार्ग से भाग्य की जागृति होगी। और यदि भाग्य का स्वामी यदि बारहवे भाव में बैठा है तो पहले भाग्य स्थान में कमजोरी रहेगी फिर बाहरी स्थानों के सम्बन्ध से भाग्य की जागृति होगी।

यदि भाग्य का स्वामी प्रथम यानि तन भाव में बैठा है तो देह के योग से भाग्य की उन्नति होगी।और भाग्य का स्वामी यदि धन भाव में बैठा है तो भाग्य की शक्ति व् उन्नति धन जान के योग से बनेगी।

यदि भाग्य का स्वामी पराक्रम स्थान में बैठा है तो स्वयं के पराक्रम और भाई के सहयोग से भाग्य की उन्नति होगी।

भाग्य का स्वामी यदि चौथे स्थान पर बैठा है माता और भूमि के योग से भाग्योन्नति होगी।

यदि भाग्य का स्वामी पंचम स्थान में बैठा है, तो विद्या और संतान के योग से भाग्य की जागृति होगी।

भाग्येश यदि छठे स्थान पर बैठा है तो परतंत्रता या परेशानियो से भाग्य की जागृति होगी।

भाग्येश यदि सातवें स्थान पर बैठा है तो दैनिक रोजगार और स्त्री की सहयोग से भाग्य की जागृति होगी।

भाग्य का स्वामी यदि आठवे मृत्यु स्थान पर बैठा है तो काफी मुसीबतो और पुरातत्त्व के प्रभाव से भाग्योन्नति होगी।

 

इसी प्रकार किसी भी स्थान का स्वामी कोई भी ग्रह जिस स्थान पर भी बैठा होगा उसी स्थान के द्वारा उसी स्थान के द्वारा अपने स्थान की शक्ति प्राप्त करता है।

 

इसलिए उपरोक्त बारह घरो के स्वामी समस्त ग्रहो का वर्णन हर एक स्थान और हर एक राशियों में भिन्न-भिन्न रूप से फलादेश में किया जाता है

 

इसके अतिरिक्त जन्म कुंडली के अंदर लग्न से छठे ,आठवे ,बारहवे तीनो स्थानों का सम्बन्ध या इनके स्थान पतियो का सम्बन्ध हर जगह कष्टप्रद सिद्ध होता है। एवं अच्छे स्थानों का एवं स्थान पतियों का सम्बन्ध हमेशा उन्नति व् सुख दायक सिद्ध होता है।

 

 

 

क्या टूटे रिश्ते दोबारा जुड़ पाएंगे ??

 

रिश्तों की अहमियत हर प्राणी के जीवन मे होती है, कभी-कभी ऐसी परिस्थितिया जीवन मे बन जाती है कि रिश्ते टूट जाते है, जैसे पति-पत्नी  आपसी दिक्कतों की वजह से दूर रहने लगे या रिश्ता ही तोड़ दिया, प्रेम संबंध में रिश्ता प्रेमी या प्रेमिका से खत्म हो गया, माता-पिता से संतान किसी कारण रिश्ता तोड़कर अलग हो गई, आदि।आज इसी विषय पर बात करेंगे कोई भी रिश्ता क्यों और किन ग्रहो के योगों से खत्म हो जाता है या कौन ग्रह रिश्तों को तोड़ देते है और क्या वह रिश्ता पहले की तरह अच्छे से जुड़ पायेगा या रिश्ता खत्म होने के बाद, बिछड़ने के बाद क्या दोबारा मिलन हो पायेगा और कौन ग्रह पुनः रिश्ता या जो भी संबंध है उसे ठीक कर पाता यही,तो कैसे।                                                                                            

 

कुण्डली में कुछ नैसर्गिक रूप से शनि राहु केतु और 12वा घर और इसका स्वामी रिश्तों में दूरियां और पृथकता कराता है, तो शुभ ग्रहो का प्रभाव  #जैसे गुरु शुक्र बुध चन्द्र और लग्न स्वामी, 5वे,  9वे भाव स्वामी रिश्तों को जोड़कर रखते सकते है या टूटे रिश्तों को दोबारा यही ग्रह और भाव के स्वामी जुड़वाकर ,दोवारा मिलन करा सकते है, जैसे पति-पत्नी अलग हो गए हो या प्रेमी-प्रेमिका, संतान-मातापिता से, भाई भाई से या दोस्त-दोस्त से किसी से भी रिश्ता खत्म होने या टूटने। के बाद दोबारा उस व्यक्ति से रिश्ता तब ही जुड़ेंगे जब शुभ ग्रहों का सहयोग होगा कैसे ?इस बात को आसान तरह से समझने के लिए उदाहरणो की मदद से समझते है:-                                                  

 

पति-पत्नी में अलग होने। के बाद क्या वापस एक साथ पुनः रिश्ते को पति पत्नी को निभा पायेगे, क्या पति या पत्नी से रिश्ता टूटने पर ठीक हो सकेगा आदि इस बात को मेष लग्न के अनुसार समझते है।                                                              

 

उदाहरण_मेष_लग्न वैवाहिक रिश्ता :-

मेष लग्न में सातवें भाव का स्वामी शुक्र बनता है अब यहाँ शुक्र के ऊपर राहु का प्रभाव पड़ता हो और सातवें भाव पर भी राहु का प्रभाव हो या अन्य किसी पाप ग्रह का प्रभाव हो तब ऐसी स्थिति में पति-पत्नी एक दूसरे से अलग होने की स्थितियां बनेगी और बन जाएगी।सातवे भाव और सातवें भाव स्वामी शुक्र पर पाप। ग्रहों का असर पति को पत्नी और पत्नी को पति से अलग कर रहा है अब रिश्ता टूट गया ख़राब दशाओ के चलते , लेकिन यदि यही अब शुक्र को शुभ बृहस्पति का सहयोग मिल रहा हो बृहस्पति विवाह स्वामी शुक्र के साथ सम्बंध में हो साथ ही शुक्र बलवान होगा तब ऐसी स्थिति में पति पत्नी का रिश्ता टूटने के बाद, अलग होने के बाद दोबारा जुड़ जाएगा, क्योंकि शादी पर नवे भाव के स्वामी गुरु का असर है, रिश्ता टूटा क्यों क्योंकि। राहु का प्रभाव शादी पर था और समय भी राहु या खराब दशाओ का था इसीलिए अलगाब हो जाएगा, लेकिन बचाब की स्थिति ग्रहो की हुई तब रिश्ता शुभ समय शुरू  होते ही दोबारा जुड़ जाएगा और सही चलेगा, जबकि शुभ प्रभाव टूटे रिश्तों पर। नही हुआ तब दोबारा रिश्ता नही जुड़ेगा।।                       

 

उदाहरण_अनुसार2:-

प्रेमी_प्रेमिका अलगाब और दोबारा मिलन

वृश्चिक लग्न अनुसार, प्रेम और प्रेमी-प्रेमिका का विचार 5वे घर से होता है, वृश्चिक लग्न के 5वे घर का स्वामी गुरु होता है साथ ही   प्रेम का कारक मंगल और शुक्र।अब यहां अगर 5वे घर(प्रेम भाव स्वामी)के स्वामी गुरु पर शनि की दृष्टि पड़ जाए साथ ही 5वे भाव पर। या प्रेम के कारक लड़के की कुण्डली में शुक्र ,लड़की कुण्डली में मंगल  पर राहु की दृष्टि हो या 5वे घर पर राहु या केतु की दृष्टि पड़ेगी तब यहाँ 5वे भाव स्वामी भी गुरु शनि से और 5वा भाव या प्रेम कारक ग्रह मंगल से पीड़ित तब प्रेमी ,प्रेमिका से और प्रेमिका के प्रेमी से अलग होने की स्थितियां बन जाएगी, लेकिन क्या अलग होने के बाद दोबारा मिलन हो पायेगा, रिश्ता जुड़ पायेगा, इसके लिए जरूरी होगा। 5वे घर और गुरु जो प्रेम के घर का स्वामी है इनका शुभ होना कैसे।

 

जैसे गुरु पीड़ित हो लेकिन 5वे घर को देखता हो तब रिश्ता पुनः जुड़ने की स्थिति बन जाएगी कुछ समय बाद,  इसके अलावा प्रेम कारक शुक्र लड़की की कुण्डली में, मंगल लड़की कुण्डली में 5वे घर को प्रभावित करते हो, जैसे 5वे घर मे बैठे हो या देखते हो तब और ज्यादा स्थिति मजबूत हो जाएगी वापस रिश्ता जुड़ने की, क्यों, क्योंकि प्रेम के घर पर प्रेम संबंन्धी ग्रहो का असर है जिससे प्रेम की वृद्धि होनी है, जब प्रेम वृद्धि होगी तब रिश्ता यह ग्रह दोबारा जुड़वा देते है शुभ दशा आने पर इसके अलावा 5वे घर पर शुक्र, गुरु,बुध,चन्द्र की दृष्टि पढ़ती हो तब अलग होने के योग होने पर भी ,खराब समय के चलते अलग हो जाने के बाबजूद भी , दोबारा मिकन प्रेमी या प्रेमिका से हो जाएगा शुभ प्रभाव से ग्रहो के इसी तरह किसी भी रिश्तों के खंडित होने के योग होने पर यदि रिश्ता खत्म हो गया है तो क्या दोबारा रिश्ता सही हो पायेगा, दोबारा जुड़ पायेगा रिश्ता तो इसके लिए जरूरी है आपके उस रिश्ते(Relation)से सम्बन्धित कुण्डली के घर और घर के स्वामी पर शुभ ग्रहों का असर होना चाहिए।।                                                                  

 

जैसे एक उदाहरण_अनुसार ओर समझते है:-                                 परिवार से अलग होने पर क्या #परिवार से दोबारा रिश्ता जुड़ेगा?                                                                                                                      

 

उदाहरण_अनुसार

पारिवारिक_रिश्ता:-अब इसके लिए कुण्डली के दूसरे भाव और  दूसरे भाव पर शुभ असर ग्रहो का होगा तब रिश्ता  पारिवारिक संबंध टूटने पर भी परिवार से रिश्ता जुड़ जाएगा,                                                                  

 

जैसे,

तुला_लग्न अनुसार, यहां दूसरे घर का स्वामी मंगल होता है अब मंगल /दूसरा घर यहाँ थोड़ा शनि राहु से पीड़ित हो जाने से परिवार से रिश्ता टूट गया लेकिन यहाँ दूसरे घर पर गुरु शुक्र की दृष्टि पढ़ जाएगी और दूसरे घर का स्वामी मंगल बलवान होगा तब पारिवारिक रिश्ता ,परिवार के लोगो के साथ जुड़कर सही हो जाएगा, यहां बुध नवे घर का स्वामी बनता है। नवा घर रिश्तों को विशेष रूप से मजबूती देता है, यदि केवल बुध ही दूसरे घर मे बैठा हो या दूसरे घर को दृष्टि से देखे। साथ ही दूसरे घर का स्वामी मंगल बलवान होकर केंद्र1,4,7,10 या त्रिकोण5,9 स्थान में होगा तब इसी स्थिति से रिश्ता पारिवारिक सदस्यों के साथ ठीक हो जाएगा।।                                                                                      

 

नोट:-

किसी भी रिश्ते को जुड़ने के लिए उस रिश्ते से संबंधित कुण्डलीई के भाव पर शुभ ग्रहों का ज्यादा से ज्यादा प्रभाव होगा तो रिश्ता टूटने के बाद भी जुड़ेगा, शुभ प्रभाव ग्रहो का रिश्तों को टूटने से बचाता है।अब ज्यादा अशुभ असर ग्रहो का है या कम या शुभ ग्रहों का असर कम है या ज्यादा, उसी के अनुसार जुड़ने  के बाद रिश्तों में प्यार कम या ज्यादा रहेगा, यदि कोई भी रिश्ता जुड़ भी गया हो लेकिन प्रेम उसमे तब ही रहेगा जब ज्यादा से ज्यादा असर शुभ ग्रहों जैसे गुरु शुक्र बुध, 5वे, 9 वे घर के शुभ ग्रहो का होगा।।                                                             इस तरह रिश्ते टूटने पर दोबारा भी जुड़ जायेगे यदि शुभ असर रिश्तों पर ग्रहो का होगा।।

 

 

 

 

फसा हुआ पैसा वापस मिलेगा या नही और कब।

 

रुपये पैसा फस जाना मतलब व्यापार में पार्टनर के साथ ज्यादा पैसा लगा दिया, किसी को उधार दे दिया, किसी न किसी तरहः से रूपये-पैसे कही फसे होना।तब यही जिज्ञाषा मन मे रहती है की फसा पैसा वापस मिलेगा या नही या पैसा नुकसान में गया।आज इसी विषय पर बात करते है कब और किन ग्रहो की किस स्थिति से रुपये-पैसा फस जाता है और फसने के बाद वापस मिलेगा या नही।।                                                                       

 

कुंडली का दूसरा भाव धन का होता है तो ग्यारहवा भाव धन या किसी भी वस्तु के आने का होता है।जब दूसरे भाव और इसके स्वामी की स्थिति शुभ होती है। तब फसा रुपया-पैसा  वापस मिल जाता है साथ ही इसके ग्यारहवे भाव की स्थिति भी अच्छा होना जरूरी है क्योंकि जो पैसा दिया है वह वापस आएगा यह ग्यारहवे भाव पर निर्भर करेगा।दूसरी स्थिति में जब दूसरे भाव/दूसरे भाव के स्वामी की स्थिति बहुत ज्यादा खराब हुई तब जैसे पीड़ित हुआ, अशुभ ग्रहों 6,8 12 भाव स्वामी या पाप ग्रहों शनि राहु केतु से पीड़ित हुआ  यह भाव या इसका स्वामी तब रुपये-पैसा वापस फस जाएगा और ग्यारहवा भाव अच्छा हुआ तो फसा हुआ पैसा वापस मिलेगा जरूर लेकिन देर से और कम होकर पूरा पैसा वापस नही मिल पायेगा क्योंकि धन का घर दूसरा भाव अशुभ/पीड़ित है जिससे धनः फँसेगा, ग्यारहवा भाव अच्छा होगा तो फसा धन भी निकल आएगा।पूरा पैसा कही फसा हुआ वापस तब ही मिलता है जब दूसरा भाव(धन भाव)भी अच्छी स्थिति में हो और ग्यारहवा भाव(धन आने का वाला भाव)अच्छा होगा।अब कैसे इसे और आसान तरह से समझने के लिए उदाहरणों से समझते है:-                                          

 

उदाहरण_अनुसार_मेष_लग्न:-

मेष लग्न की कुंडली जिस भी जातक या जातिका की होगी तब शुक्र यहाँ दूसरे भाव(धन भाव)का स्वामी बनेगा अब शुक्र बलवान होकर बेठा हो ,शुक्र बलवान होकर किसी राजयोग में हो, जैसे शुक्र सातवें भाव मे तुला राशि का होकर बैठे और राहु के साथ बैठकर पीड़ित हो साथ ही लग्न में केतु होगा अब मंगल तीसरे में बैठ है तब यहाँ क्या होगा कि धन स्वामी शुक्र राहु के साथ पीड़ित है साथ ही धन का घर दूसरा भाव मंगल और केतु के बीच मे फसकर पीड़ित हो गया अब धन भाव पीड़ित हो गया  यहाँ तो पैसा तो फसेगा निश्चित ही। जब धन संबंधी ग्रहो की या शुक्र या दूसरे भाव को प्रभावित करने वाले ग्रहो की दशाएं चल रही होगी,तब ऐसी स्थिति ज्यादा बनेगी,तब पैसा उधार देकर यहाँ फस जाएगा।लेकिन अब यही शुक्र पर शुभ प्रभाव भी हो दूसरे भाव पर भी शुभ प्रभाव हो ग्रहो का और ग्यारहवा घर बलवान हो जैसे दूसरे घर पर गुरु की दृष्टि भी चली जाए तब धन भाव बलवान हो जाएगा यहाँ साथ ही शुक्र तो बलवान है ही तुला राशि मे बैठकर, तब पैसा सुरक्षित रहेगा फसने के बाद भी मिल जाएगा कुछ दिक्कतों से, क्योंकि धन पर शुभ असर भी ग्रहो का है यहाँ मिलेगा कितना पूरा मिलेगा या कम यह निर्धारिक करेगा ग्यारहवा भाव।।                           

 

उदाहरण_अनुसार_सिंह_लग्न:-

सिंह लग्न कुंडली में धन स्वामी बुध और धन आने का स्वामी मतलब ग्यारहवे भाव का स्वामी भी बुध होता है अब बुध पर यहाँ जैसे असर हो जैसे बुध शनि की दृष्टि से पीड़ित हो जाये साथ ही 12वे भाव स्वामी भी चन्द्र(हानि का भाव स्वामी)धन स्वामी बुध के साथ बैठ जाये और धन भाव मे राहु या केतू हो या राहु केतु की दृष्टि पड़े तब भी पैसा देने के बाद या किसी के साथ काम मे लगाने के बाद फस जाएगा क्योंकि धन भाव स्वामी और यहां धन आने का स्वामी भी बुध होगा ग्यारहवे भाव का स्वामी ऐसी स्थिति में यहाँ बुध देखा 12वे भाव स्वामी के साथ पैसे की हानि क्योंकि बारहवा भाव हानि का है साथ ही धन स्थान में राहु और धनेश बुध के ऊपर शनि की दृष्टि से धन भाव और धनस्वामी/धनागमन स्वामी बुध पीड़ित और अशुभ स्थिति में है यहाँ रुपया पैसा देकर फस जाएगा।।                                                                                    

 

अब एक अन्य उदाहरण से समझते कब उधर दिया पैसा या फसा हुआ पैसा वापस मिल जाता है?:-                  

 

अन्य_उदाहरण_से:-

धनु_लग्न में धन स्वामी शनि और धन आने का स्वामी शूक्र होता है अब यहाँ शनि और शुक्र जितनी ज्यादा अच्छी अवस्था मे होंगे शुभ जैसे केंद्र में होआआदि तरह से शुभ होंगे अशुभ असर। ग्रहो का इन पर नही होगा तब उधार दिया गया पैसा, फसा हुआ पैसा वापस मिल जाएगा, इसके अलावा शनि और शुक्र जितना ज्यादा से ज्यादा राजयोगों में /शुभ योगों में होंगे उतना ही अच्छा है ऐसी स्थिति में बड़ी से बड़ी फसी हुई धन राशि वापस मिक जाती है क्योंकि यहां धनः स्वामी  और धनागमन स्वामी शूक्र दोनो अच्छी स्थिति में है।।                                                           

 

नोट:- पैसा तब ही वापस मिलता है उधार देने के बाद जब धन स्थान और धन स्वामी(दूसरे स्थान/दूसरे। भाव के स्वामी)की स्थिति ठीक होती है साथ ही पूरा पैसा तब मिलेगा जब ग्यारहवा भाव और इसका स्वामी भी अच्छी अवस्था मे होगा क्योंकि आपने पैसा दे दिया देने के बाद पैसा वापस आये और आपका ही पैसा वापस आये इसके लिए ,आने के लिए ग्यारहवा भाव अच्छी अवस्था मे हो ,अशुभ प्रभाव ग्रहो का न हो।।                                                                                      

 

कम शब्दों में कहू तो जब दूसरे भाव दूसरे भाव स्वामी और ग्यारहवे भाव ग्यारहवे भाव स्वामी की स्थिति अच्छी होगी तब उधार पैसा वापस भी मिल जाएगा और पूरा मिलेगा वापस।इसके विपरीत जब दूसरा भाव पीड़ित होगा तब दिया गया धन फसेगा , और साथ ग्यारहवे भाव का स्वामी और भाव भी बहुत अच्छी अवस्था मे होगा तब पैसा भी उधार देने के बाद वापस मिल जाएगा।।                                                                           

 

धन फसने पर वापस मिलने पर परेशानी होंने पर दूसरे/ग्यारहवे भाव स्वामी को बलवान करके और जो भी ग्रह धन वापस मिलने में बिघ्न बन रहे हैं उनकी शांति और धन संबंधी उपाय करके पैसा नुकसान में जाने से बचाया जा सकता है और पैसा वापस मिलने की स्थिति बन जाएगी, धन संबंधी जब शुभ दशाएं ग्रहो को चल रही होगी उसी समय फसा हुआ धन वापस आ जाता है ऐसी स्थिति में ग्रह दशाओ का अनुकुल होना जरूरी है।।

 

 

 

 अत्यन्त महत्वपूर्ण योग

 

 

दीर्घायु संतान व समृद्धि – लग्नेश, गुरु या शुक्र केंद्र में स्थित हो।

पूर्णायु – लग्नेश गुरु से केंद्र में तथा कोई शुभ ग्रह लग्न से केंद्र में।

सुखी जीवन – लग्नेश लग्न से या चंद्र से केंद्र में हो तथा उदित भाग में हो। (सप्तम से दशम तक व दशम से लग्न तक उदित भाग) या नवमेश-लग्नेश की युति दशम में हो।

उच्च शिक्षा – नवमेश-लग्नेश की युति केंद्र में हो और उन पर पंचमेश की दृष्टि हो।

ख्याति व समृद्धि – लग्नेश उच्च राशि में हो और उन पर शुभ ग्रह की दृष्टि हो, एक शुभ ग्रह चंद्र या लग्न से युत हो।

दुर्बल शरीर – निर्बल लग्नेश शुष्क राशि (मेष, 5, 9) में स्थित हो और उस पर पाप ग्रह की दृष्टि हो।

राज्य कृपा – लग्न में शुभ ग्रह व नवमेश-दशमेश की युति हो।

जुड़वां संतान – राहु लग्न में, लग्न पर मंगल व शनि की दृष्टि तथा लग्नेश गुलिक से युत हो।

भरण पोषण – चंद्र व सूर्य एक ही राशि व एक ही नवांश में हों तो जातक का भरण/पालन-पोषण माता सहित तीन स्त्रियां करेंगी।

अतुल धन लाभ – द्वितीयेश केंद्र में व एकादशेश उससे केंद्र में या त्रिकोण में तथा गुरु व शुक्र से युत या दृष्ट हो।

शत्रु से धन लाभ – द्वितीयेश की छठे भाव में एकादशेश से युति होने पर।

दरिद्रता – द्वितीयेश + एकादशेश नीचस्थ व पापग्रह युक्त होने पर।

धन कुबेर – द्वितीयेश परमोच्च स्थिति में होने पर

असीमित धन प्राप्ति – द्वितीयेश एकादश में वर्गोत्तम भी (नवांश में), स्वराशि, निम्न राशि या शुक्र/बुध से युक्त हो, गुरु की दृष्टि भी हो।

नेत्र – बली द्वितीयेश-सुंदर नेत्र, द्वितीयेश 6, 8, 12 में नेत्र कष्ट/नेत्र/प्रकाशहीन की संभावना।

क्रूर व असत्यवादी – द्वितीय में पापग्रह तथा द्वितीयेश भी पापयुक्त होने पर।

भाई-बहनों का सुख – केंद्र/त्रिकोण/उच्च या स्वराशि के अथवा शुभवर्गों में हो और कारक (मंगल) शुभग्रह से युक्त हो तो भाई-बहनों का सुख निश्चित है।

सुख व वाहन – चतुर्थेश वर्गोत्तम या उच्चस्थ तथा शुभ ग्रह चतुर्थ भावस्थ।

समृद्धि – चतुर्थेश दशम में तथा नवमेश, दशमेश व लग्नेश चतुर्थस्थ।

प्रतिष्ठा – चतुर्थेश शुभ ग्रह हो, उस पर शुभ दृष्टि भी हो तथा चंद्र सशक्त हो।

माता की आयु – चतुर्थेश उच्चस्थ, चतुर्थ में शुभ ग्रह व चंद्रमा बली हो,

गृह तथा भूमि संपत्ति – चतुर्थेश स्थिर राशि (2, 5, 8, 11) तथा शुभ षडवर्गों में, दशमेश उच्चस्थ होने पर भी।

आयु व शिक्षा – गुरु व शुक्र लग्न या चंद्रमा से चतुर्थ में स्थित, बुध उच्चस्थ।

धार्मिक प्रवृत्ति – सूर्य-चतुर्थस्थ, चंद्र-नवमस्थ व मंगल एकादशस्थ।

शराबी – पाप ग्रह 6, 8, 12 में, चतुर्थ में नीचस्थ ग्रह या चतुर्थेश स्वयं नीचस्थ या नीच ग्रह से युति करे।

यात्रा – चतुर्थेश-अष्टमेश चर राशियों में (1, 4, 7, 10) या चर नवांश में हो,उनपर द्वादशेश की दृष्टि हो या द्वादशेश नीच हो।

ऋण – छठे भाव का स्वामी चतुर्थ में, चतुर्थ भाव का स्वामी स्थिर राशि में और दशमेश की दृष्टि पड़े।

गृह संपत्ति – चतुर्थेश निर्बल हो, अष्टम या नीच राशि के निकट हो तो गृह/सम्पत्ति नहीं, यदि जन्म नक्षत्रेश एकादशेश भी हो तो स्वयं के लिए गृह निर्माण करायेगा।

सुख-शांति – दशमेश जलीय राशि में हो तो जल संबंधी व्यवसाय से सुख (व्यवसाय, जल सेना, जल यान, यात्रा)।

दत्तक पुत्र – 1. पंचम में बुध या शनि की राशि तथा शनि/गुलिक से युत/दृष्ट हो। 2. पंचममेश षष्ठ में, षष्ठेश द्वादश में व द्वादशेश लग्न में हो तो।

संतान सुख – पंचम में वृष या तुला राशि हो, शुक्र हो, पाप ग्रह की दृष्टि/प्रभाव से भी कोई बाधा नहीं।

संतान हानि – शनि पंचम में, पंचमेश द्वादश में तथा चंद्र-राहु युति।

पर स्त्री/पुरुष से संतान – ए. स्वराशि के पंचमेश की पंचम में राहु से युति हो और गुरु व चंद्र की दृष्टि न हो। बी. चंद्रमा द्वादश में गुरु अष्टम में पाप प्रभाव में।

संतान संख्या – लग्नेश से पंचम भाव तक जितने अंश हों उन पर 12 से भाग देने पर शेष संख्या।

संतान नाश – राहु उच्चस्थ हो, पंचमेश पापग्रह हो और गुरु नीच राशिस्थ हो।

शत्रु नाशक योग – षष्ठ भाव ए. छठे में पापग्रह, छठे भाव का स्वामी पापस्थ तथा शनि-राहु युति। बी. मंगल छठे में षष्ठेश अष्टम में हो।

पाप कर्म – षष्ठेश व नवमेश दोनों पापग्रह युक्त होकर दशम में षष्ठ में स्थित हो।

मृत्यु – लग्नेश व नवमेश-दशमेश से युत या दृष्ट हो, एकादशेश शुभ हो तो शांतिपूर्ण मृत्यु।

दुर्घटना/प्रेतात्मा पीड़ा – अष्टम भाव का स्वामी छठे में, लग्नेश द्वादश में, चंद्रमा क्रूर राशि/ग्रहों के साथ दुर्घटना या प्रेतात्माओं की पीड़ा।

पीड़ित ग्रहों से रोग –

सूर्य – अग्नि, ज्वर, जलन, क्षय।

चंद्रमा – कफ, अग्नि, धात, घाव।

बुध – गुह्य, उदर, वायु, कुष्ठ।

गुरु – शाप दोष, गुल्भ (जिगर, तिल्ली)।

शुक्र – गुप्तांग।

शनि – रोगों की वृद्धि, गठिया, क्षय

राहु- मिर्गी, फांसी, संक्रामक, नेम, कृमि, प्रेत पिशाच भय। केतु – राहु व मंगल के समान।

दांपत्य सुख – ए. सप्तमेश शुभ ग्रह युक्त या दृष्ट हो। बी. ग्रहों के बल से सुख की प्रचुरता का अनुमान। सप्तमस्थ ग्रहों से जातकों का संबंध पता चलता है। सूर्य सप्तम – जातक को अधिकार में रखने वाला/वाली। चंद्र- कल्पना के श्रोत में बहाव। मंगल – मासिक रक्तस्राव में भी रतिक्रिया पसंद/ आपत्ति नहीं। बुध – नपुंसकता/ बंध्या गुरु – ब्राह्मण/

धार्मिक प्रवृत्ति। शुक्र – संदेहास्पद आचरण। शनि – राहु व केतु- नीच जाति या स्तर।

बंध्या – द्वादश में पापग्रह, निर्बल चंद्र व पंचम में सप्तमेश बंध्या।

आचरण संदेहास्पद – ए. शनि सप्तमस्थ व सप्तमेश शनि की राशि में बी. शुक्र मंगल युति राशि या नवांश में हो तो अधिक कामवासना/ अनैतिक व अप्राकृतिक क्रियायें करने वाले।

सदाचारी – सप्तमेश शुभग्रह, सप्तमस्थ शुभ ग्रह व शुक्र केंद्रस्थ हो।

पति/पत्नी की आयु – शुक्र नीचस्थ व दशमेश निर्बल होकर 6, 8, 12 में हो तो अल्पायु, मंगलीक योग भी जीवनसाथी की अल्पायु का कारण।

मंगलीक योग – मंगल 1, 4, 7, 8 या 12 में।

शीघ्र विवाह – बली सप्तमेश शुभ ग्रह की राशि में। शुक्र केंद्र या त्रिकोण में शुक्र द्वितीय में व एकादशेश अपने भाव में, शुक्र चंद्र से सप्तम में शुक्र, लग्न से केंद्र त्रिकोण में।

विलंब से विवाह – लग्न-लग्नेश, सप्तम-सप्तमेश व शुक्र स्थिर राशियों में हो और चंद्रमा चर राशि में हो। ग्रह निर्बल हो (लग्न का स्वामी, सप्तम भाव का स्वामी व शुक्र)। शनि भी ऊपरी योग बनाये तो वृद्धावस्था में विवाह।

अल्पायु – निर्बल अष्टमेश अष्टम में या केंद्र में और लग्नेश भी कमजोर।

मध्यायु – अल्पायु के योगों के साथ लग्नेश व चंद्र बली हो तो मध्यायु।

आयु की वृद्धि – तृतीय भाव में स्वराशि, उच्च या मित्र राशीश हों तो वृद्धि।

दीर्घायु – बुध, गुरु, शुक्र केंद्र त्रिकोणस्थ। – लग्न/

लग्नेश चंद्र व सूर्य यदि बली हो तो दीर्घायु व भविष्य भी निष्कंटक व सुख-शांतिपूर्ण।

पैतृक संपत्ति – बली नवमेश दशम में, चंद्र सूर्य से नवम में व गुरु चंद्र से नवम।

धनहीन – पिता चंद्र-मंगल द्वितीय या नवमस्थ और नवमेश नीचस्थ।

समृद्धि व दीर्घायु – शुक्र चतुर्थ में, नवमेश परमोच्च में तथा नवम में गुरु।

पिता की समृद्धि – केंद्रस्थ नवमेश पर गुरु व सूर्य की दृष्टि हो।

पितृ भक्ति – सूर्य केंद्र या त्रिकोण में, नवम में शुभ ग्रह, गुरु लग्न में हो।

पिता की मृत्यु – नवमेश नीचस्थ और उसका स्वामी नवम में हो और तृतीय में पाप ग्रह हो उस पाप ग्रह की दशा में पिता की मृत्य

गंगा स्नान – राहु-सूर्य का संबंध। – संन्यास दशम में मीन राशि, सांसारिक प्रलोभनों का त्याग।

ज्ञान व सम्मान – गुरु-शुक्र की दशम में युति, लग्नेश बली, शनि उच्च के।

सफलता – दशमेश-लग्नेश की एकादश में युति पर मंगल की दृष्टि।

ख्याति – दशमेश केंद्र-त्रिकोण में और गुरु उससे त्रिकोण में

पापकर्म – अष्टमेश-दशमेश का परिवर्तन योग। –

असफलता – दशमेश निर्बल व दशम में पापग्रह युक्त हो।

प्रतिष्ठा – लग्न, दशम व चंद्र बली प्रतिष्ठा प्राप्त।

आयु – दशमेश – नवमेश द्वादश में अल्पायु – राजयोग – बली नवमेश व दशमेश हो, उच्च के ग्रह केंद्र/त्रिकोण में ।

राजदंड- दशम में सूर्य-राहु-मंगल युति हो और शनि द्वारा दृष्ट हो।

भारी आर्थिक लाभ – ए. एकादश में गुरु बी. एकादशेश तीव्रगति का ग्रह स्थिर राशि में हो।

धन लाभ – ए. चंद्रमा द्वितीय में, शुक्र नवम में और गुरु एकादश में। बी. 11 भाव चर राशि में, द्वितीयेश स्थिर ग्रह व द्वितीय में चंद्रमा। – लाभ की सीमा दशमेश व लग्नेश के बल पर निर्भर। – एकादश में पापग्रह व ग्यारहवां भाव का स्वामी पाप ग्रह युत/दृष्ट व लग्न में भी पापग्रह होने पर आप कम व जो भी हो वह भी तुरंत समाप्त। – एकादशेश अस्त हो तो भीख मांगकर उदर पूर्ति। सप्तमेश एकादश में हो तो विवाह पश्चात धनोपार्जन।

नर्क प्राप्ति- राहु, मंगल या सूर्य द्वादश में हो, द्वादशेश नीचस्थ हो तो नर्क प्राप्ति।

स्वर्गलोक – द्वादश में गुरु पर शुभ दृष्टि हो, केतु उच्च का हो तो स्वर्गलोक।

द्वादशेश पापयुक्त तथा द्वादश में भी पाप ग्रह हो तथा उस पर पापग्रह की दृष्टि हो तो अपमानित होकर मातृभूमि का त्याग।

द्वादशेश शुभ ग्रह की राशि में, शुभ दृष्टि भी हो तो सुखपूर्वक भ्रमण।

शनि द्वादश में हो, मंगल की उस पर दृष्टि-संपत्ति दुष्कर्मों में नष्ट।

लग्नेश-द्वादशेश में परिवर्तन योग- दान, धार्मिक व परोपकार के कार्यों में धन व्यय।

अनेक पर्वतों पर मणि-माणिक्य मिलते हैं, परंतु सभी पर्वतों पर नहीं मिलते । शास्त्र कहते है कि – कुछ हाथियों के मस्तक में भी मणि होती है – जिसे ‘गज-मुक्ता कहते है । परंतु ऐसा भी सभी हाथियों में नहीं होता । इसी प्रकार इस पृथ्वी पर पर्वतों, जंगलों और वनों की कमी नहीं है । परंतु सभी वनों में चन्दन भी नहीं मिलता । इसी प्रकार साधु व्यक्ति भी सभी जगह नहीं दिखाई देते हैं । साधु अर्थात कोई भगवे कपडे पहनने वाला साधु नहीं बल्कि वो व्यक्ति जो दूसरों के बिगड़े कार्य बनाये, जो स्वयं के मन पर नियंत्रण करके अध्यात्म की अग्रसर हो और जो निस्वार्थ भाव से लोक कल्याण की बात करता हो । अर्थात समाज सेवी हो परंतु ऐसे आदर्श व्यक्ति भी सभी जगहों पर कहाँ मिलते हैं ।

नवमांश कुंडली

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