
अयोध्या…
ध्वज लहरा रहा था…
हवा में श्रद्धा थी…
आँखों में इतिहास था…
और जमा हुई भीड़—मानो साँस रोककर किसी अनकहे सत्य का इंतज़ार कर रही हो।
जैसे ही प्रधानमंत्री मंच पर आए,
वैसे ही वातावरण में एक अजीब सा कंपन फैल गया।
फिर वे शब्द गूँजे…
वे शब्द नहीं थे—
वे इतिहास के सबसे अँधेरे कमरे की चाबियाँ थे।
“190 वर्ष पहले, 1835 में…
एक ब्रिटिश व्यक्ति ने भारत की आत्मा पर गहरी चोट की।”
पूरा सभागार स्तब्ध रह गया।
एक नाम गूँजा—
“मैकॉले।”
और उसी क्षण…
सदियों से बंद पड़ी एक फ़ाइल खुल गई।
फ़ाइल नंबर 27 — ‘इंडियन माइंड प्रोजेक्ट’
ब्रिटिश संग्रहालय में रखी यह फ़ाइल हमेशा TOP SECRET के रूप में बंद रखी गई थी।
काग़ज़ पीले पड़ चुके थे…
लेकिन उन पर लिखी स्याही आज भी जलती हुई थी।
पहली ही पंक्ति रोंगटे खड़े कर देती है—
“भारत को तलवार से नहीं, विचारों से हराओ।”
अगला पन्ना और भी भयावह—
“उनकी शक्ति भूमि में नहीं… अध्यात्म में है।
उन्हें कमज़ोर करो।
उनकी शिक्षा प्रणाली बदलो।
उनके बच्चों को ऐसा बनाओ—
शरीर से भारतीय, पर विचारों से ब्रिटिश।”
यही था वह ‘मानसिक गुलामी का मॉडल’
जिसका उल्लेख प्रधानमंत्री ने अयोध्या में किया।
1835 — अँधेरे कमरे का सत्य
एक बड़े कमरे में लंबे मेज़ पर किताबें बिखरी थीं—
संस्कृत ग्रंथ, वेद, गणित, ज्योतिष, दर्शन…
हर पुस्तक का गहन अध्ययन किया गया।
अंत में निष्कर्ष एक ही निकला—
“भारत को शारीरिक रूप से हराया नहीं जा सकता।”
अर्थात भारत पर हथियारों से विजय पाना असंभव है।
इसलिए निर्णय लिया गया—
“उनकी सोच बदलो।
उनका आत्मविश्वास तोड़ो।
उन्हें अपनी ही संस्कृति पर शर्म महसूस कराओ।”
उस कमरे में लिया गया वह निर्णय
पीढ़ियों का भविष्य बदलने वाला सिद्ध हुआ—
• अंग्रेज़ी शिक्षा थोपी गई
• भारतीय ज्ञान को हीन बताया गया
• संस्कृति को ‘मिथक’ कहा गया
सब कुछ चुपचाप…
लेकिन अत्यंत घातक तरीके से।
फ़ाइल का अंतिम पन्ना — सबसे भयानक सत्य
एक पंक्ति थी… जो कभी सार्वजनिक नहीं हुई—
“जिस दिन भारत अपनी जड़ों की ओर लौटेगा,
उस दिन हमारे द्वारा बनाई गई मानसिक कैद ढह जाएगी।”
और यही शब्द—
प्रधानमंत्री ने अयोध्या में दोहराए।
आज का सत्य — ताले खुल रहे हैं
जैसे ही धर्मध्वज लहराया,
वैसा लगा—पुरानी बेड़ियाँ टूट रही हैं।
मैकॉले की फ़ाइल की चेतावनी सच होती प्रतीत होती है—
“भारत उस दिन खड़ा होगा,
जिस दिन वह स्वयं को पहचान लेगा।”
आज देश ऐसे मोड़ पर खड़ा है,
जहाँ इतिहास बदला नहीं जा रहा—
इतिहास फिर से लिखा जा रहा है।
अंतिम प्रश्न…
मैकॉले की पूरी योजना इसी विश्वास पर टिकी थी
कि भारत अपनी जड़ों को भूल जाएगा।
लेकिन आज—
जब लोग फिर से सनातन,
संस्कृति, अध्यात्म और अपनी अस्मिता की ओर लौट रहे हैं…
तो फिर—
190 वर्षों की मानसिक गुलामी की दीवार
क्या अब ढह रही है?
और सबसे बड़ा सवाल—
1835 में शुरू हुई यह कहानी
क्या 2035 में समाप्त होने जा रही है…?