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आइए वैदिक ज्योतिष के भावों को आसान भाषा में समझते हैं

(इसे सेव कर लें… आगे काम आएगा)

 केन्द्र भाव (1, 4, 7, 10)

“दिखने वाली ज़िंदगी”

 ये सबसे प्रभावशाली और दिखाई देने वाले भाव हैं।

 दुनिया आपको किस रूप में देखती है, ये बताते हैं।

  • यहाँ बैठे ग्रह बाहरी जीवन को मजबूत बनाते हैं
  • करियर, पद, प्रतिष्ठा, पब्लिक इमेज मजबूत होती है
  • लेकिन अंदर की खुशी की गारंटी नहीं

 उदाहरण: कोई व्यक्ति बाहर से बहुत सफल दिखे, पर अंदर से खालीपन महसूस करे।

 दुष्ट स्थान / दुःस्थान (6, 8, 12)

“छुपी हुई ज़िंदगी”

 ये आंतरिक और कर्मात्मक भाव हैं।

  • आसानी से भौतिक सफलता नहीं देते
  • संघर्ष और चुनौतियाँ ला सकते हैं
  • लेकिन अंदरूनी ताकत और आध्यात्मिक गहराई बनाते हैं

 उदाहरण: कठिनाइयों से गुज़रने वाला व्यक्ति अक्सर अधिक समझदार और विरक्त बनता है।

 त्रिकोण भाव (1, 5, 9)

सबसे शुभ भाव

 इन्हें सबसे सहायक माना जाता है।

  • सफलता भी देते हैं और आंतरिक शक्ति भी
  • भौतिक और आध्यात्मिक जीवन में संतुलन
  • भाग्य और पूर्व जन्म के पुण्य से जुड़े

 उदाहरण: ऐसा व्यक्ति जो सफलता भी पाए और मन की शांति भी बनाए रखे।

 तीसरा और ग्यारहवाँ भाव (3, 11)

इच्छा और प्रयास

 इनके फल ग्रहों की स्थिति पर निर्भर करते हैं।

  • महत्वाकांक्षा और इच्छा शक्ति देते हैं
  • आगे बढ़ने की ऊर्जा देते हैं
  • पीड़ित हों तो जल्दबाजी या गलत निर्णय

 उदाहरण: जोखिम लेना — जो या तो सफलता दिलाए या समस्या खड़ी करे।

 दूसरा भाव (2)

तटस्थ क्षेत्र

 यह अपने आप में न बहुत शुभ है न अशुभ।

  • धन, वाणी और परिवार से जुड़ा
  • परिणाम पूरे कुंडली विश्लेषण पर निर्भर
  • अकेले इस भाव से निष्कर्ष नहीं निकालना चाहिए

 उदाहरण: धन योग या वाणी का प्रभाव पूरी कुंडली देखकर ही तय होता है।

सरल सत्य:

 कुछ भाव आपकी बाहरी दुनिया बनाते हैं।

 कुछ आपके अंदर की दुनिया।

 कुछ दोनों को संतुलित करते हैं।

 और ज़्यादातर लोग सिर्फ वही चाहते हैं जो दिखता है।

कुंडली का 7वां भाव: विवाह और जीवनसाथी पर ग्रहों का प्रभाव

कुण्डली में बनने वाले विभिन्न अच्छे व बुरे योग

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