
डॉ. ए. पी. जे. अब्दुल कलाम के इसरो में कार्यरत रहने के समय की एक घटना बताई जाती है। उस समय इंडिजिनस गाइडेड मिसाइल प्रोजेक्ट पर ज़ोरों से काम चल रहा था। वैज्ञानिकों की एक बड़ी टीम इस प्रोजेक्ट पर काम कर रही थी। एक दिन इस प्रोजेक्ट पर काम करने वाले एक वैज्ञानिक उनके पास आए और बोले,
“सर, क्या मैं आज शाम को थोड़ा जल्दी घर जा सकता हूँ?”
कलाम साहब मुस्कराते हुए बोले,
“ज़रूर, कोई समस्या है क्या?”
वैज्ञानिक बोले,
“नहीं सर, बात ये है कि हमारे गाँव में एक महीने से सर्कस आया हुआ है। बच्चे रोज़ ज़िद करते हैं कि सर्कस देखने चलें, लेकिन ऑफिस से घर पहुँचते-पहुँचते देर हो जाती है, इसलिए जा नहीं पाया। अब कल सर्कस दूसरे गाँव चला जाएगा और फिर कम से कम एक साल तक हमारे यहाँ नहीं आएगा। इसलिए आज जल्दी घर जाकर बच्चों को सर्कस दिखाने ले जाना चाहता हूँ।”
कलाम साहब बोले,
“अरे तो जाइए न, ज़रूर जाइए। मैं तो आपको अभी घर जाने की इजाज़त देता हूँ। हमेशा अपने परिवार को प्राथमिकता दीजिए।”
वैज्ञानिक बोले,
“नहीं सर, मैं हाथ का काम निपटा कर दोपहर चार बजे जाऊँगा।”
इतना कहकर वे अपनी जगह जाकर काम में लग गए।
चार बजकर तीस मिनट पर कलाम साहब ने सहज ही उस जूनियर वैज्ञानिक के केबिन की ओर देखा। वे सिर झुकाए अपने काम में पूरी तरह डूबे हुए थे। यह देखकर कलाम साहब तुरंत ऑफिस से बाहर निकले, ड्राइवर से गाड़ी निकालने को कहा और सीधे उस वैज्ञानिक के घर पहुँचे। बच्चों को साथ लिया, अपने पास बैठाया, उन्हें सर्कस दिखाने ले गए। लौटते समय एक अच्छे होटल में ले जाकर बच्चों को मनपसंद खाना खिलाया और रात नौ बजे बच्चों को फिर से घर छोड़ आए।
उधर शाम साढ़े सात बजे उस जूनियर वैज्ञानिक को याद आया कि उन्हें तो साढ़े चार बजे निकलना था। घड़ी देखी तो साढ़े सात बज चुके थे। काम में उलझे रहने की वजह से इस साल भी वे बच्चों को सर्कस नहीं दिखा पाए—यह सोचकर उन्हें बहुत बुरा लगा। उदास मन से वे काम समेटकर घर पहुँचे तो घर एकदम शांत था। पत्नी आराम से टीवी देख रही थीं। उन्होंने घबराते हुए पूछा,
“बच्चे कहाँ गए?”
पत्नी बोलीं,
“अरे आप भी न! आपको देर होने वाली थी, इसलिए क्या आपने ही अपने बॉस को हमारे घर नहीं भेजा था? वे आकर बच्चों को ले गए और कब के सर्कस देखने चले गए। और सुनिए, इतने बड़े आदमी को आप अपनी घर की बातें कैसे बता सकते हैं?”
जूनियर वैज्ञानिक सब समझ गए। मन ही मन कलाम साहब को धन्यवाद देते हुए सोफे पर बैठ गए। तभी बच्चों की हँसी-शोर सुनाई दी। पीछे-पीछे हँसते, खेलते बच्चे और कलाम साहब घर में आए। कलाम साहब को देखकर वे शर्मिंदा होकर खड़े हो गए। कलाम साहब ने प्यार से उनके कंधे पर हाथ रखा और बैठने का इशारा करते हुए बोले,
“देखिए, साढ़े चार बज गए थे, फिर भी आप काम में लगे हुए थे। आपकी एकाग्रता देखकर मुझे समझ आ गया कि आप सर्कस की बात पूरी तरह भूल चुके हैं। बच्चों की सर्कस छूट न जाए, इसलिए मैं उन्हें सर्कस दिखाकर ले आया।”
वैज्ञानिक समझ नहीं पा रहे थे कि कलाम साहब को धन्यवाद दें या उन्हें काम में लगाए रखने के लिए माफ़ी माँगें। खुद को सँभालते हुए हाथ जोड़कर बोले,
“थैंक यू वेरी मच, सर!”
कलाम साहब मुस्कराकर बोले,
“नहीं-नहीं, इसके उलट मुझे आपको धन्यवाद कहना चाहिए।”
इतना कहकर उन्होंने उनके हाथ अपने हाथों में लिए और आगे बोले,
“कई सालों बाद आज मैं भी आपके बच्चों के साथ सर्कस का आनंद ले पाया। हमें बहुत मज़ा आया। बहुत दिनों बाद मैं भी बच्चों के साथ खेल पाया।”
बच्चों के चेहरों से खुशी छलक रही थी। वैज्ञानिक ने धीरे से अपने हाथ कलाम साहब के हाथों से छुड़ाए और रुमाल से अपनी आँखें पोंछ लीं। बॉस और जूनियर के बीच का यह स्नेह देखकर पास खड़ी उनकी पत्नी भी काफी देर तक अपनी साड़ी के पल्लू से नम आँखें पोंछती रहीं।
(यह कहानी डॉ. कलाम के साथ इसरो में काम कर चुके एक वैज्ञानिक से प्रत्यक्ष सुनी गई है।)