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21 दिसम्बर से 27 दिसम्बर तक इन्हीं 7 दिनों में गुरु गोविंद सिंह जी का पूरा परिवार शहीद हो गया था।

उसी रात माता गूजरी ने भी ठन्डे बुर्ज में प्राण त्याग दिए।

 

यह सप्ताह भारत के इतिहास में शौर्य का सप्ताह होता है।

 

पूस का 13वां दिन

 

नवाब वजीर खां ने फिर पूछा बोलो इस्लाम कबूल करते हो?

 

6 साल के छोटे साहिबजादे फतेह सिंह ने नवाब से पूछा

 

अगर मुसलमान हो गए तो फिर कभी नहीं मरेंगे न?

वजीर खां अवाक रह गया

 

उसके मुंह से जवाब न फूटा तो साहिबजादे ने जवाब दिया कि

 

जब मुसलमान हो के भी मरना ही है तो अपने धर्म में ही अपने धर्म की खातिर क्यों न मरुं।

 

तब गुस्से में आकर नवाब ने दोनों साहिबजादों को जिंदा दीवार में चिनवाने का आदेश दे दिया।

 

दीवार चिनी जाने लगी जब दीवार 6 वर्षीय फतेह सिंह की गर्दन तक आ गयी तो

 

8 वर्षीय जोरावर सिंह रोने लगा

फतेह ने पूछा

 

जोरावर रोता क्यों है?

 

जोरावर बोला रो इसलिए रहा हूँ कि आया मैं पहले था पर कौम के लिए शहीद तू पहले हो रहा है।

 

गुरु साहब का पूरा परिवार 6 पूस से 13 पूस इस एक सप्ताह में कौम के लिए धर्म के लिए राष्ट्र के लिए शहीद हो गया।

दोनों बड़े साहीबजादों अजीत सिंह और जोरावर सिंह जी का शहीदी दिवस।

 

पहले पंजाब में इस हफ्ते सब लोग जमीन पर सोते थे क्योंकि माता गूजरी ने 25 दिसम्बर की वो रात दोनों छोटे साहिबजादो के साथ

 

नवाब वजीर खां की गिरफ्त में सर हिन्द के किले में ठंडी बुर्ज में गुजारी थी और 26 दिसम्बर को दोनो बच्चे शहीद हो गये थे।

 

27 तारीख को माता ने भी अपने प्राण त्याग दिए थे।

 

लेकिन अंग्रेजों की देखा-देखी पगलाए हुए हम भारतीयों ने गुरु गोविंद सिंह जी की कुर्बानियों को  सिर्फ 300 साल में भुला दिया।

 

ये बड़े शर्म की बात है कि हमने अपने गौरवशाली इतिहास को भुला दिया और यही मूल कारण है कि हम गुलाम बने।

 

कितनी जल्दी भुला दिया हमने इस शहादत को?

 

मेरी आप सभी से प्रार्थना है कि

 

उन सभी ज्ञात-अज्ञात महावीर-बलिदानियों को याद करें

 

जिनके कारण आज सनातन संस्कृति बची हुई है।

गुरु तेग बहादुर शहीद दिवस : त्याग, धर्म और मानवता का सर्वोच्च प्रतीक

24-नवंबर-1675 की तारीख

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