
पति और नारियल
कैसे निकलेंगे, यह तो किस्मत ही जानती है—
ऐसा दादी कहा करती थीं।
अच्छा, लेते समय तो फोड़कर भी नहीं देख सकते।
दोनों ही जैसे भी निकलें,
“गोद में जो आ गया वही पवित्र हो गया।”
दोनों को ही देवघर में स्थान,
दोनों ही पूजनीय!
पार्ले के फिश मार्केट के बाहर
मद्रासी अण्णा के स्टॉल पर
नारियल ऐसे ही ढेर में सजाए रहते थे।
आजकल ऑनलाइन साइट्स पर
हर कीमत के पति
कुछ इसी तरह सजे रहते हैं!
नारियल का नाम लेते ही मेरा दिल धड़कने लगता था।
अच्छा नारियल पहचानें कैसे?
मैं बेवजह उसे कान के पास ले जाकर
हिलाकर वगैरह देखा करती थी।
अण्णा समझ जाता कि यह ग्राहक नया है।
वह अपनी मोटी पीतल की अँगूठी
दो–तीन नारियलों पर टन्-टन् बजाता
और हाथ में एक नारियल पकड़ा देता।
“ले, लो!” कहता।
मैं पूछती— “अगर यह खट्टा निकला तो?”
वह हँसकर कहता— “तुम्हारी किस्मत!!”
दादी कहती थीं— अगर नारियल मीठा निकला
तो दडपे पोहे, सोलकढी,
नारियल की बर्फ़ी—
और न जाने क्या-क्या!
खट्टा निकला तो उसे पानी में उबालकर
ऊपर तैर आने वाला कच्चा तेल
अलग निकाल लेते—घानी का होता है वैसा।
कटा, जला, होंठ फटे,
एड़ी फट गई हो,
बालों में लगाना हो,
ठंड में मालिश करनी हो,
कान में दर्द हो—
सबमें काम आता!
कितना उपयोगी…
कितना गुणी!!
सीधे शब्दों में—
पति हो या नारियल,
मीठा निकला तो किस्मत,
और खट्टा निकला तो भी उपयोगी—
यह है कोकणी दर्शन।
इसे ही कहते हैं “जीवन”!
नोट:
इसमें ‘पति’ की जगह ‘पत्नी’ रखकर भी पढ़ सकते हैं।
मज़ा उतना ही आएगा!