
ज्योतिष में अक्सर यह प्रश्न उठता है कि कौन-सी राशि किसकी मित्र है और कौन सी शत्रु, लेकिन शास्त्रीय दृष्टि से यह समझना बहुत आवश्यक है कि राशियों के भीतर स्वयं कोई मित्रता या शत्रुता नहीं होती, मित्रता और शत्रुता का वास्तविक संबंध ग्रहों के बीच होता है, क्योंकि प्रत्येक राशि का संचालन एक अधिपति ग्रह करता है, इसलिए जब दो राशियों के आपसी संबंध की बात की जाती है तो वास्तव में उनके अधिपति ग्रहों के आपसी संबंधों को समझा जाता है, यही कारण है कि बिना ग्रहों को समझे केवल राशि के आधार पर निष्कर्ष निकालना अधूरा और कई बार भ्रमित करने वाला हो सकता है।
ज्योतिष शास्त्र में ग्रहों को उनके स्वभाव और प्रवृत्ति के आधार पर मुख्य रूप से दो वर्गों में विभाजित किया गया है, पहला देवता गण और दूसरा दानव गण, देवता गण में सूर्य, चंद्रमा, मंगल और गुरु को रखा गया है, ये ग्रह तेज, धर्म, साहस, नेतृत्व और संरक्षण से जुड़े माने जाते हैं, वहीं दानव गण में बुध, शुक्र और शनि को रखा गया है, जो बुद्धि, भोग, कर्म, व्यवहारिकता और सांसारिक जीवन से संबंधित माने जाते हैं, शास्त्रों में यह माना गया है कि एक ही गण के ग्रहों में सामान्यतः सहयोग और सामंजस्य रहता है और भिन्न गण के ग्रहों में वैचारिक मतभेद या टकराव की प्रवृत्ति देखी जाती है।
अब यदि इन ग्रहों की राशियों को देखें तो देवता गण के अंतर्गत सूर्य की सिंह राशि आती है, मंगल की मेष और वृश्चिक राशि आती है, चंद्रमा की कर्क राशि होती है और गुरु की धनु तथा मीन राशि होती है, इस प्रकार सिंह, मेष, वृश्चिक, कर्क, धनु और मीन राशियों को देवता गण की राशियाँ माना जाता है और सामान्य रूप से इनके बीच आपसी अनुकूलता और सहयोग की संभावना अधिक मानी जाती है। इसी प्रकार दानव गण में बुध की मिथुन और कन्या राशि होती है, शुक्र की वृषभ और तुला राशि होती है और शनि की मकर और कुंभ राशि होती है, इसलिए मिथुन, कन्या, वृषभ, तुला, मकर और कुंभ राशियों को दानव गण की राशियाँ माना जाता है और इनके बीच भी स्वाभाविक तालमेल देखा जाता है।
शास्त्रों के अनुसार जब देवता गण और दानव गण की राशियाँ आपस में आती हैं तो सामान्यतः उन्हें परस्पर विरोधी स्वभाव का माना जाता है, लेकिन यह नियम सर्वत्र और हर स्थिति में लागू हो ऐसा नहीं है, इसे केवल एक आधार या प्रारंभिक संकेत के रूप में समझना चाहिए, क्योंकि वास्तविक फलादेश केवल यहीं तक सीमित नहीं होता बल्कि कुंडली के कई अन्य महत्वपूर्ण तत्व इसमें निर्णायक भूमिका निभाते हैं।
अब यदि हम किसी कुंडली का गहराई से विश्लेषण करें तो सबसे पहले भाव बल का विचार करना आवश्यक होता है, कोई भी ग्रह यदि अपने मित्र ग्रह की राशि में होकर भी छठे, आठवें या बारहवें भाव में स्थित हो तो वह शुभ फल देने में कमजोर पड़ सकता है, वहीं कोई ग्रह यदि अपने शत्रु ग्रह की राशि में होकर भी केंद्र या त्रिकोण भाव में स्थित हो तो वह अपेक्षाकृत अच्छे फल दे सकता है, इसलिए केवल राशि की मित्रता या शत्रुता देखकर ग्रह को पूर्ण रूप से शुभ या अशुभ घोषित नहीं किया जा सकता।
इसके साथ ही नक्षत्र की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होती है, ग्रह जिस नक्षत्र में स्थित होता है उस नक्षत्र का स्वामी ग्रह उस ग्रह के फल को नियंत्रित करता है, मान लीजिए कोई ग्रह शत्रु राशि में बैठा है लेकिन वह अपने मित्र ग्रह के नक्षत्र में स्थित है तो उसका अशुभ प्रभाव काफी हद तक कम हो जाता है, वहीं यदि कोई ग्रह मित्र राशि में होकर भी शत्रु नक्षत्र में बैठा हो तो उसके फल में बाधा आ सकती है, इसलिए नक्षत्र को अनदेखा करना शास्त्रीय दृष्टि से बड़ी भूल मानी जाती है।
डिग्री की स्थिति भी ग्रह की शक्ति तय करती है, कोई ग्रह यदि अत्यंत कम डिग्री या अत्यधिक अंतिम डिग्री पर स्थित हो तो वह बाल या वृद्ध अवस्था में माना जाता है और उसका प्रभाव पूर्ण रूप से विकसित नहीं होता, वहीं ग्रह यदि अपनी उच्चतम प्रभावी डिग्री के आसपास हो तो वह अधिक सक्षम होकर फल देता है, चाहे वह मित्र राशि में हो या शत्रु राशि में। इसी प्रकार ग्रह का अस्त होना भी बहुत महत्वपूर्ण विषय है, सूर्य के अत्यधिक समीप होने पर जब कोई ग्रह अस्त हो जाता है तो उसकी स्वाभाविक शक्ति क्षीण हो जाती है, विशेषकर बुध, शुक्र और शनि के अस्त होने पर उनके शुभ फल कम हो जाते हैं, ऐसे में राशि की मित्रता होते हुए भी ग्रह कमजोर परिणाम दे सकता है।
वक्री ग्रहों का विचार भी अत्यंत आवश्यक है, वक्री ग्रह सामान्यतः अपनी शक्ति को भीतर की ओर मोड़ लेते हैं और कई बार सामान्य स्थिति से अलग परिणाम देते हैं, कुछ शास्त्रों में वक्री ग्रह को बलवान माना गया है, लेकिन यदि वक्री ग्रह पाप भाव में स्थित हो या अशुभ दृष्टियों से ग्रस्त हो तो वह अधिक कष्टकारी भी बन सकता है, इसलिए वक्री होना अपने आप में न तो पूर्ण शुभ है और न ही पूर्ण अशुभ, उसका निर्णय भाव, राशि और दृष्टि के साथ मिलाकर किया जाता है।
ग्रह किस कोण या भाव में स्थित है यह भी अत्यंत निर्णायक होता है, केंद्र भाव में स्थित ग्रह व्यक्ति के जीवन में सक्रिय भूमिका निभाते हैं, त्रिकोण भाव में स्थित ग्रह भाग्य और धर्म को मजबूत करते हैं, जबकि छठा, आठवां और बारहवां भाव ग्रह के लिए चुनौतीपूर्ण माने जाते हैं, यदि कोई ग्रह अपने मित्र राशि में होकर भी इन भावों में हो तो संघर्ष देता है और यदि कोई ग्रह शत्रु राशि में होकर भी केंद्र या त्रिकोण में हो तो वह अपेक्षाकृत बेहतर परिणाम दे सकता है।
अंततः शास्त्र सम्मत निष्कर्ष यही निकलता है कि राशियों की मित्रता और शत्रुता को केवल ग्रह गण के आधार पर समझना एक सामान्य और प्रारंभिक तरीका है, वास्तविक ज्योतिषीय निर्णय के लिए ग्रह का भाव बल, नक्षत्र, डिग्री, अस्त या वक्री अवस्था, शुभ या अशुभ दृष्टियाँ और कुंडली की समग्र स्थिति का अध्ययन अनिवार्य है, यही समग्र दृष्टिकोण ज्योतिष को गहराई और सत्य के अधिक निकट ले जाता है और यही कारण है कि शास्त्रों में एक ही नियम को अंतिम सत्य नहीं माना गया बल्कि समन्वय और विवेक पर सबसे अधिक बल दिया गया है।।